विक्रमादित्य : भ्रातियों के बादल के पीछे छुपा हुआ भारत का महान राजा
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विक्रमादित्य : भ्रातियों के बादल के पीछे छुपा हुआ भारत का महान राजा

विक्रमादित्य : भ्रातियों के बादल के पीछे छुपा हुआ भारत का महान राजा

‘देव कथाओं के अनुसार विक्रमादित्य उज्जयिनी का राजा था, जिसके दरबार में नवरत्न थे इन नवरत्नों में कालिदास भी एक थे। कहा जाता है, वह बहुत पराक्रमी राजा था। उसने शकों को परास्त कर सुदृढ़ राज्य स्थापित किया था ईसा पूर्व 58- 57 में आरम्भ हुआ विक्रम संवत् राजा विक्रमादित्य का ही चलाया हुआ माना जाता है, परन्तु इतिहस में ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी भारत में शासन करने वाले ऐसे किसी पराक्रमी राजा का उल्लेख नहीं प्राप्त होता जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की हो।

इतिहास से प्रमाणित होता है कि विक्रमादित्य उपाधि अनेक शक्तिशाली सम्राटों ने धारण की, यथा चन्द्रगुप्त द्वितीय (380-414 ई) उसके पुत्र स्कन्दगुप्त (455- 67 ई० ), और अनेक चालुक्य राजाओं ने; यथा विक्रमादित्य प्रथम (655-80 ई०) विक्रमादित्य द्वितीय (733-46 ई॰) त्रिभुवनमल्ल (1009-16 ई०) तथा विक्रमादित्य अथवा विक्रमांक (1076-1125 ई० ) इन राजाओं में तृतीय गुप्त सम्राट, चन्द्रगुप्त द्वितीय
जिसने शक क्षत्रपों को परास्त किया, उज्जैन जिसकी राजधानी थी और जिसका शासनकाल बौद्धिक उपलब्धियों तथा चतुर्दिक समृद्धि के कारण प्रसिद्ध है और जिसके काल में सम्भवत: कालिदास भी हुआ था, उसी को मूल राजा विक्रमादित्य मानना अधिक युक्तिसंगत है। बाद में विक्रमादित्य को लेकर अनेक दंतकथाएं प्रचलित हो गईं। भारतीय इतिहास कोष ने विक्रमादित्य के विषय में उक्त विवरण प्रस्तुत किया
विक्रमादित्य के वास्तविक अस्तित्व को सिद्ध करने वाला विक्रम सम्वत् से अच्छा पुष्ट प्रमाण और क्या हो सकता है? यह सम्वत् प्रमाणित करता है कि इस नाम का कोई विख्यात व्यक्ति इस काल में जन्मा था। प्रतिष्ठान के राजा हाल का सप्तशती में विक्रमादित्य का उल्लेख सिद्ध करता है कि उसका ईसा पूर्व पहला शताब्दी में जन्म हुआ होगा सप्तशती में लिखा है, ‘विक्रमादित्य नामी, उदार एव प्रतापी राजा ने भृत्यों को लाखों का उपहार दिया।’ स्पष्ट है विक्रम का अस्तित्व ई० पू० पहली शताब्दी में था। विक्रम सम्वत् ईसवी सन् में 57 वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ। यह सम्वत् व्रिक्रमादित्य द्वारा किसी महान विजय की प्रसन्नता में आरम्भ किया गया होगा। यह सिद्ध करता है कि विक्रम का ऐतिहासिक ‘अस्तित्व ई० पू०. पहली शताब्दी में था। अनुसंधान के आधार पर नए-नए तथ्य सामने आते रहे हैं। और भविष्य में भी आते रहेंगे। जिस महाराजा के विषय में असंख्य जनश्रुतियां उपलब्ध हैं, उसके प्रमाणिक साक्ष्य भी उपलब्ध होंगे।

विक्रमादित्य : भ्रातियों के बादल के पीछे छुपा हुआ भारत का महान राजा
विक्रमादित्य : भ्रातियों के बादल के पीछे छुपा हुआ भारत का महान राजा

भारतीय जनमानस में विक्रमादित्य सर्वाधिक प्रचलित पूज्यनीय, आदरणीय नाम है। सम्भवत: राम और कृष्ण के पश्चात् इसी को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, परहितकारिता, जन-जन कष्ट निवारण प्रवृत्ति, अनुपम शौर्य, नीति-निपुणता, चातुर्य इत्यादि का जन – कथाओं में वर्णन है। इनकी कथाओं में निहित साम्य योग इनको ख्याति का मूल कारण बना। इसी कारण कथाएं भी लोकप्रिय बनीं और उनका नायक भी। इन कथाओं में मात्र साजा-रानी और राजकुमार- राजकुमारी को ही चित्रित नहीं किया गया है, वरन निम्न श्रेणी के लोग जैसे नाई, धोबी, गड़रिया, जोगी, सिपाही, मुनि इत्यादि को भी लिया गया है । इन विभिन्न श्रेणियों के पात्रों को लेकर सामाजिक सामंजस्य के उच्चतम दृष्टान्त प्रस्तुत किए गए हैं। इन कथाओं से विक्रम की पर-दुःख निवारण प्रवृत्ति, प्रजापालन प्रवृत्ति, उदारता, दयालुता, वीरता, वैभव और प्रभाव का पता चलता है। जनश्रुतियों से विक्रमादित्य का आदर्श प्रजापालक, जनहितकारी, दयावान चरित्र उभरकर सामने आता है।

सोमदेव भट्ट रचित कथा सरित् सागर में विक्रमादित्य के विषय में उल्लेखनीय जनश्रुति है। यह ग्रन्थ गुणाढय् रचित वृहत्क था पर आधारित है। गुणाढय् सातवाहन सम्राट हाल का समकालीन था वह ईसवीं प्रथम शताब्दी में जन्मा था । कथासरिंत् सागर में विक्रमादित्य को उज्जैन का राजा बताया है। उनके पिता का नाम महेन्द्रादित्य और माता का सौम्यदर्शना था। महेन्द्रादित्य के जब पर्याप्त समय कोई सन्तान न हुई तो उन्होंने शिव का लेश नहीं रहा था शकों के रूप में म्लेच्छों का अत्याचारपूर्ण आधिपत्य था। धर्म की पुनर्संस्थापना की दृष्टि से देवताओं ने भी शिव का आह्वान किया। तब शिव ने अपने गण माल्यवान को आदेश दिया, ‘तुम पुत्र को जन्म दोगे। पुत्र- जन्म होने पर तुम उसका नाम विक्रमादित्य रखना।’ सोमदेव विक्रमादित्य के लिए लिखते हैं कि वह पितृहीनों के पिता, बन्धुहीनों के बन्धु, अनाथों के नाथ और सामान्यजन के संरक्षक थे विक्रमादित्य-सम्बन्धी कुछ जनश्रुतियां जैन ग्रन्थों से भी प्राप्त होती हैं। मेरुतुंगाचार्य द्वारा रचित पदावली में लिखा है कि महावीर निर्वाण- संवत् के 470 वें वर्ष में विक्रमादित्य ने शकों का उन्मूलन कर सम्वत् की स्थापना को। इसका समर्थन प्रबन्धक कोष एवं धनेश्वर सूरि द्वारा रचित शत्रुंजय महात्म्यnने किया है। पूजा-आराधना की। कहते हैं, उस समय पृथ्वी पर धर्म एक अन्य जैन अनुश्रुति के अनुसार जैन साधु कालकाचार्य और उनकी बहिन साध्वी सरस्वती उज्जयिनी में रहते थे उस समय वहां गर्भमिल्ल नाम का राजा राज्य करता था। साध्वी सरस्वती परिव्राजिका होने पर भी अद्वितीय सुन्दरी थी। गर्भमिल्ल उसके रूप पर आसक्त हो गया। गर्भमिल्ल के विलासी तथा विषयी होनेbवृत्तान्त मिलते हैं। गर्भमिल्ल ने अपनी वासना तुष्टि हेतु साध्वी सरस्वती को बलात अपने अन्त:पुर में बुलाया। कालकाचार्य ने उसे अनाचार न करने को समझाया।

अनुनय-विनय भी की परन्तु उसकी कुछ समझ में न आया। तो कालकाचार्य ने उसके विनाशार्थ सिंधु का मार्ग पकड़ा जहां शाही वंश का राजा रहता था। कालकाचार्य की प्रेरणा से शक राजा गर्भमिल्ल से युद्ध ठाना। युद्ध में गर्भमिल्ल पराजित हो गया। पराजित होकर उसके भागने से साध्वी को मुक्ति मिली। शक राजा का राज भी अधिक दिन न चला। गर्भमिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों का वंशोच्छेद कर दिया। कहते हैं उसने प्रजा-जन को दान-दक्षिणा भी दी। विक्रमादित्य शब्द इस काल में किसी व्यक्ति विशेष का नाम मात्र न रहकर एक उपाधि के रूपnनिकालना ही एक समस्या बन गया । कुछ पुरातत्ववेत्ता गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को और चौथी शताब्दी में और सातवाहन सम्राट दूसरी शताब्दी में हुए। इन दोनों ने अपना विरुद विश्वामित्र धारण किया था इस समय विक्रम के विरुद की सर्वाधिक मान्यता थी कि जनसाधारण भी इसके महत्त्व को मान्यता देता और इस विरुद्धारी को आदर की दृष्टि से देखा जाता है। इस विरुद्धारी को अपार यश-वैभव का प्राप्तकर्ता मानते।


इस विरुद को पहले इतनी मान्यता प्राप्त नहीं थी क्योंकि इसे यह यश पहली शताब्दी में ही प्राप्त हुआ था। यह विरुद उस अपार यश और वैभव का द्योतक था जो महान विक्रमादित्य के साथ नत्थी किया जाता था।
विक्रमादित्य के नाम के साथ एक और आभा संलग्न थी। इसीलिए उनके बाद आने वाले सम्राटों ने यह उपाधि धारण की । इसे धारण कर उन्होंने स्वयं को गौरवपूर्ण माना। चन्द्रगुप्त द्वितीय की राजधानी पाटलिपुत्र थी। वह मगध के सम्राट थे। अवन्ती, जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी, उसके आधीन था। इस बात का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं कि चन्द्रगुप्त ने कभी उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया यह सिद्ध करता है कि गुप्त सम्राट विक्रमादित्य उज्जयिनी सम्राट विक्रमादित्य से नितान्त भिन्न था। इसी तरह सातवाहन सम्राट सातकण्णि महाराष्ट्र के थे, उज्जयिनी उनकी राजधानी नहीं रही। उन्हें भी मूल विक्रमादित्य नहीं कहा जा सकता, उनकें और मूल में भेद है।

कुछ विद्वान विक्रमादित्य को मालव गण-नायक कहते हैं। यह सम्भव है कि वह मालव गणों के प्रमुख रहे हों। महाभारत-काल में कृष्ण वृष्णियों के गण प्रमुख थे। विक्रमादित्य के नवरत्नों के तिथि-क्रम पर विचार करने से नवीनतम मान्यता यही है कि ई० पू० पहली शताब्दी में जन्मे यह भी माना जाने लगा है कि निम्न
विक्रमादित्य की सभा के थे :-

धनवन्वरि, 2. क्षपक्षण, 3. अमरसिंह, 4. शंकु, 5, वैतालभट्ट, 6. घंटथर्पर, 7. कालिदास, 8. वराहमिहिर, 9. वररुचि। विक्रमादित्य और कालिदास एक काल में जन्मे जयशंकर प्रसाद ने अनेक प्रयुक्त होने लगा था इसीलिए मूल विक्रमादित्य को खोज ने गौतमीपुत्र सातकर्णि को विक्रमादित्य माना परन्तु गुप्त वंशीय सम्राट तत्वों से यह प्रमाणित किया है कि विक्रमादित्य पहली शताब्दी में हुए थे। कालिदास के नाटकों की भाषा भी उस काल की थी, परन्तु कालिदास के अपने नाटकों में कहीं इस नाम का उल्लेख नहीं मिलता। अन्य नवरत्नों की खोज से स्पष्ट हो जाता है कि ई० पू. पहली शताब्दी में उर्जैन में कोई प्रतापी राजा हुआ। इन रत्नों के काल का विश्लेषण भी सिद्ध करता है कि ये उसी काल के थे। उक्त सब प्रमाणों से पुष्ट प्रमाण इस सम्राट के वास्तविक विक्रमादित्य होने का यह प्रमाणित होता है कि इससे पूर्व किसी अन्य सम्राट ने अपने नाम के साथ विक्रमादित्य विरुद उपयोग नहीं किया। इस विरुद का सर्वप्रथम उपयोग इन्हीं के नाम के साथ किया गया। यह अपंने आप में मौलिक प्रयोग था, किसी अन्य की नकल नहीं थी। जैसे वैदिक काल में अश्वमेध यज्ञ कुछ विशेष विजयों के पश्चात् करना गौरवपूर्ण माना जाता था, उसी प्रकार उपाधि धारण करने की प्रथा बन गई थी और इसे महान गौरव का प्रतीक माना जाने लगा था। पुष्यमित्र शुृंग ने अश्वमेध यज्ञ किया उसने विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण नहीं की । इसके विपरीत गुप्तवंशीय चन्द्रगुप्त ने अश्वमेध
यज्ञ न करके विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण की । ई० पु० चौथी शताब्दी में पंजाब में मालव गण राज्य था। मालव राज्य के निवासी अपनी वीरता और बाहुबल के लिए विख्यात थे। इस गणराज्य ने सिकन्दर के आक्रमण का शानदार सामना किया थ!। सिकन्दर को मालवों की वीरता का लोहा मानना पड़ा। ये मालव अपना अधिकार क्षेत्र छोड़कर बाद में राजपूताने में जाकर बस गए थे।

जयपुर के करकोट नगर में ई० पू० दूसरी शताब्दी के मालवों के सिक्के प्राप्त हुए हैं। जहां वे जाकर बसे उसका नाम मालवा पड़ा। मालवों के इस गणराज्य के अधिपति ही वह विक्रमादित्य थे जिन्होंने ईसा से 57 पूर्व अपना सम्वत् चलाया था। इस सम्वत् को स्थापना शको पर हुई विजय के उपलक्ष्य में की गई।

ख्यातों के अनुसार विक्रम उज्जयिनी के राजा गन्धर्वसेन के पुत्र थे। अपने बड़े भाई शंख को पद से हटाकर वह राजा बन गए। वह कुछ समय पश्चात् अपना राज-भार अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर कहीं भ्रमण करने चले गए। भर्तृहरि के संन्यास धारण करने पर उन्होंने फिर आकर राज्य-व्यवस्था सम्भाली। उन्होंने 60 वर्ष राज किया। उनके पुत्र विक्रमचरित्र ने 40 वर्ष राज किया। उनकी बहन मैनावती थी। गौड देश के गोपी चन्द उनके भांजे थे। विक्रमादित्य-सम्बन्धी साहित्य देश की कई भाषाओं में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। पैशाची, प्राकृत, अर्धमागधी, संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगाली इत्यादि सब भाषाओं में विक्रमादित्य की अनेकों कहानियां उपलब्ध हैं और उन्हें चाव से पढ़ा जाता है। इन कहानियों के सुसंस्कृत प्रकाशन उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी इनकी चिरकालिता प्रमाणित करती उनमें से अनेकों कहानियां तो लोगों को कंठस्थ याद हैं। इन कथाओं का प्रचार कि जनमानस में उनकी पैठ विद्यमान है।

शहरों की अपेक्षा ग्रामों में अधिक है। इनका सम्बन्ध भी जन- जीवन से है। किसी विशेष समुदाय को लेकर या किन्हीं विशेष पात्रों से सम्बन्धित इस साहित्य कीनरचना नहीं की गई। भारतीय जनता में विक्रमादित्य की मान्यता हमारे महापुरुषों के ही समान है। इनकी मान्यता और प्रसिद्धि इनके अगणित गुणों के कारण है। विक्रमादित्य को जनता अपने हितों की रक्षक मानती थी और उसकी मान्यता थी कि उनका राजा उनके कष्टों का निवारण करेगा। जनता के मन में उनका दैविक रूप विद्यमान हो गया था। इसी धारणा के कारण विदेशी इतिहासकारों ने विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को मान्यता देने में संकोच किया है। सम्भव है कुछ नवीन खोजें कुछ गुत्थियों को सुलझाने में सफल हों और विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पहलू कुछ और स्पष्ट बनें। इस काल में विक्रमादित्य किसी परिवार के प्रतीक स्वरूप नहीं वरन् एक विशिष्ट उपाधि-स्वरूप प्रयोग में लाया गया, जिसने मूल व्यक्ति के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया और उसके अस्तित्व के विषय में भ्रांतियां उत्पन्न हो गईं। उन भ्रांतियों में मूल को खोजने में विद्वान कठिनाई अनुभव कर रहे हैं।

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