Posted in: इतिहास

नेपोलियन सम्राट के रूप में (1804-1814)

नेपोलियन सम्राट के रूप में (1804-1814)

नेपोलियन ने अपनी लोकप्रियता का लाभ उठाते हुये, 1802 में सीनेट से यह प्रस्ताव पारित करवा लिया कि नेपोलियन को आजीवन कॉन्सल के पद पर नियुक्त किया जाता है और उसे अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करने का भी अधिकार होगा इस प्रस्ताव पर मतदान द्वारा फ्रांस की जनता की राय ली गई। प्रस्ताव के पक्ष में 35,58,885 वोट पड़े तथा विपक्ष में 8 374। स्पष्ट है कि फ्रांस की जनता नेपोलियन के नेतृत्व के प्रति एक प्रकार का भक्ति भाव रखती थी। लेकिन नेपोलियन आजीवन कॉन्सल के पद पर नियुक्ति से ही सन्तुष्ट नहीं हुआ। वह सीजर या सिकन्दर महान् की भांति स्वयं को एक सम्राट के ऐश्वर्यपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित देखना चाहता था अत: 1804 में नेपोलियन ने उसके अधीन कार्य करने वाली सीनेट में यह प्रस्ताव पारित करवाया कि नेपोलियन को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया जाये। इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक मतदान करवाया गया प्रस्ताव के पक्ष में 35,72,329 मत पड़े तथा विपक्ष में 2,569। फ्रांस की जनता ने बड़े असाधारण बहुमत से नेपोलियन को सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया था क्रान्ति की प्रगति की दृष्टि से फ्रांस में पुनः साम्राज्य की स्थापना एक प्रतिक्रियावादी कदम था। लेकिन फ्रांस की जनता ने स्वतन्त्रता की तुलना में नेपोलियन की सत्ता-वादिता को प्रमुखता दी। ऐसा क्यों ? एक ओर फ्रांस की जनता क्रान्तिकालीन गणतन्त्रवादी सरकारों की अक्षमता से असन्तुष्ट थी, तो दूसरी ओर नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा फ्रांस के उत्कर्ष के लिए किये गये जादुई प्रयासों से.अभिभूत। नेपोलियन ने 18 मई, 1804 को फ्रांस के सम्राट की उपाधि धारण की तथा 2 दिसम्बर, 1804 को,.नोत्रेदाम के कैथेड़राल में, एक भव्य समारोह में, नेपोलियन का सम्राट पद पर राज्याभिषेक किया गया इस अवसर पर पोप पाल सप्तम के हाथों से राजमुकुट छीनकर नेपोलियन ने स्वयं उसे अपने सिर पर रख लिया।

वह दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि यह राजमुकुट उसे पोप या किसी अन्य अधिकारी द्वारा दिया गया
उपहार नहीं था, उसे अपने स्वयं अपने परिश्रम से प्राप्त किया था। इस बारे में नेपोलियन का कथन है कि ‘मैंने.फ्रांस के राजमुकुट को जमीन पर पड़े हुये पाया, एवं उसे अपनी तलवार के जोर पर ऊपर उठाया । नेपोलियन के सम्राट बनते ही फ्रांस में गणतन्त्र का रहा-सहा सतही तामझाम भी समाप्त हो गया । लेकिन जैसा कि हेज ने लिखा, ‘फ्रांस में साम्राज्य की स्थापना का अर्थ फ्रांस की क्रान्ति का एकदम अस्वीकरण नहीं था जनप्रभुसत्ता के विचार को अभी भी सिद्धान्तत: स्वीकार किया जाता था क्रान्ति के सामाजिक लाभ अभी भी अक्षुण्ण थे। जादुई शब्द ‘स्वतन्त्रता, समानता एवं भ्रातृत्व’ अभी पफ्रांस के सार्वजनिक भवनों पर दमकते थे। क्रान्तिकाल का तिरंगा झंडा अभी भी फ्रांस का राष्ट्रीय झण्डा था ।

नेपोलियन के कान्सुलेट के पाँच वर्ष (1799 1804) फ्रांस में आंतरिक सुधार कार्य पर केन्द्रित रहे और इस काल में उसने शान्ति की नीति का अनुसरण किया लेकिन सम्राट बनने के बाद नेपोलियन ने अपनी विस्तारवादी आकांक्षा तथा सैनिक कीर्ति की प्यास को पूरा करने के लिये आक्रामक रवैया अपनाया और आने.वाले दस वर्षों (1804-1814) में फ्रांस निरन्तर युद्धों में प्रवृत्त रहा। नेपोलियन 1814 तक फ्रांस का सम्राट रहा,.जब लिपजिग में युद्ध के बाद उसे फ्रांस छोड़कर एल्बा के द्वीप में शरण लेनी पड़ी, एल्बा से लौटने के बाद वह पुन: सौ दिन के लिए फ्रांस का सम्राट बन गया, लेकिन 1815 में वाटरलू के युद्ध में उसकी निर्णायक.नेपोलियन बोनापार्ट पराजय हो गयी उसके बाद उसे सेंट हेलेना के द्वीप में भेज दिया गया जहाँ छः साल के निर्वासन के बाद 1821 में उसकी मृत्यु हो गयी

नेपालियन का साम्राज्य दस वर्ष तक चला, 1804 से 1814 तक। इस युग को ‘नेपोलयन के युग’ के रूप में जाना जाता है। हेजन (मॉडर्न यूरोप अप टू 1945) के शब्दों में, ‘यह अनवरत अवाधित युद्धों का काल था, जिसके अन्तर्गत चमत्कारी विजयों का एक लम्बी श्रृंखला का अंत एक निर्णायक, भारी पराजय में हुआ। इस उत्तेजनात्मक कहानी का केन्द्रीय, सर्वोपरि व्यक्तित्व नेपोलियन था, जो इस दशक पर इस कदर छाया रहा कि इस दशक को उसके नाम से जाना जाता है तथा जिसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने इतने विस्मयकारी तरीके से छलांग लगाई कि वे उन्हीं को पार कर गईं। नेपोलियन की तुलना सिकन्दर, सीजर तथा शालेमन के साथ की जा सकती है।

ग्रेट ब्रिटेन के साथ संघर्षात्मक मनःस्थिति

( 1803-1805 ): इंग्लैण्ड एवं फ्रांस के मध्य 1802 में किया गया आमियाँ का शान्ति-समझौता एक वर्ष तक ही चल पाया। 1803 में दोनों देश युद्ध के लिये पुन: आमने-सामने आ गये। दोनों देशों के मध्य वैमनस्य का मूलभूत कारण दोनों देशों की साम्राज्यवादी आकांक्षायें थीं। ब्रिटेन अपनी नौसैनिक क्षमता एवं व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोप में एक बड़ी शक्ति बना हुआ था।

नेपोलियन जानता था कि ब्रिटेन को परास्त किये बिना, यूरोपीय महाद्वीप में फ्रांस की सर्वोच्चता स्थापित कर पाना मुश्किल होगा। इटली, स्विट्जरलैण्ड एवं हॉलैण्ड में नेपोलियन की प्रसारवादी गतिविधियों को देखकर.ग्रेट ब्रिटेन ने मई, 1803 में फ्रांस के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। नेपोलियन ने इस घोषणा का स्वागत किया,.क्योंकि वह भी इंग्लैण्ड के विरुद्ध युद्ध की तैयारी में लगा हुआ था। इंग्लिश चैनल के तट पर उसने इंग्लैण्ड.पर आक्रमण करने की विशद तैयारियाँ कर रखी थीं। नेपोलियन ने बुलोन्य (Boulogne) नामक स्थल पर अपना नौसैनिक कैम्प लगा रखा था जहाँ उसके 1,50,000 सैनिक विभिन्न प्रकार के नौसैनिक वाहनों के साथ इंग्लैण्ड पर आक्रमण करने के लिए तैयार खड़े थे। चैनल के दूसरे तट पर इंग्लैण्ड की सेना दो वर्ष तक नेपोलियन के आक्रमण की प्रतीक्षा करती रही, लेकिन नेपोलियन ने आक्रमण नहीं किया ऐसा उसने क्यों किया ? सम्भवत: नेपोलियन इंग्लिश चैनल के पार अपनी सेना को ले जा पाने की व्यवस्थाओं से विश्वस्त नहीं था।

हेजन के अनुसार, ‘क्या बह सारा नाटक इंग्लैण्ड को डराने के लिए था या नेपोलियन को यह जानकारी थी कि यह एक निराशापूर्ण प्रयास होगा, अतः उसकी सैनिक गतिविधियाँ इंग्लैण्ड को यह सोचने के लिए विवश करना चाहती थीं कि आक्रमण के खतरे की बजाय शान्ति का मार्ग अधिक बुद्धिमतापूर्ण होगा, यह हम निश्चित रूप से नहीं जानते। उधर इस काल में नेपोलियन की सेनायें थलक्षेत्र में महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त कर रही थीं। तभी अक्टूबर, 1805 में नेपोलियन को यह दु:खद समाचार मिला कि टैफल्गर अन्तरीप (Cape Trafalgar ), जो कि स्पेन के दक्षिणी तट के पास अवस्थित था, के निकट हुए एक नौसैनिक युद्ध में एडमिरल नेल्सन के नेतृत्व में इंग्लैण्ड के जहाजी बेड़ों ने फ्रांस एवं स्पेन की सम्मिलित नौसैनिक टुकड़ी को बुरी तरह परास्त कर दिया। है। इस युद्ध में यद्यपि नेल्मन व्यक्तिगत रूप से मारा गया, लेकिन ब्रिटिश सेना ने फ्रांस एवं स्पेन के 19 बड़े जहाजों को पकड़ लिया तथा 12,000 लोगों को युद्धबन्दी बना लिया। इस नौसैनिक पराजय ने नेपोलियन की इंग्लैण्ड- विजय की आशाओं पर तुषारापात कर दिया। नेपोलियन युग में इसके बाद ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता को कोई गम्भीर चुनौती नहीं मिल पायी। नेपोलियन ने अपना ध्यान समुद्री विजयों से हटाकर स्थलीय विजयों पर केन्द्रित कर दिया।

फ्रांस के विरुद्ध तृतीय संयुक्त गठबन्धन (1805 ): फ्रांस के विरुद्ध इससे पूर्व, बड़ी शक्तियों ने दो बार संयुक्त गठबन्धन का निर्माण किया था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पायी थी। 1805 में इंग्लैण्ड के विलियम पिट जूनियर के प्रयासों से फ्रांस के विरुद्ध एक तृतीय संयुक्त गठबन्धन (Third Coalition) का निर्माण किया गया। इस गठबन्धन में शामिल होने वाले देश थे- ब्रिटेन, आस्ट्रिया, रूस एवं स्वीडन। उधर, नेपोलियन ने इस गठबन्धन के निर्माण के बाद हतोत्साहित होने की बजाय, अधिक आक्रामक रुख अपना लिया, और उसने गठबन्धन की शक्तियों को अलग-अलग युद्धों में बुरी तरह परास्त किया।

नेपोलियन की सैनिक तेजस्विता अद्भुत एवं चमत्कारी थी, यही कारण है कि विश्व के महानतम सेनानायकों
में उसकी गणना की जाती है।

आस्ट्रिया की पराजय (1805)

सबसे पहले नेपोलियन ने आस्ट्रिया से युद्धक्षेत्र में मोर्चा लेने को योजना बनाई। प्रशिया फ्रांस के विरुद्ध तुृतीय संयुक्त गठबन्धन में शामिल नहीं हुआ था। नेपोलियन ने प्रशिया के राजा फ्रेंडरिक विलियम तृतीय (1797-1840 ) को हनोवर का क्षेत्र देने के बदले में, आस्ट्रिया और फ्रांस के भावी युद्ध में, उसकी तटस्थता का आश्वासन ले लिया। यह आस्ट्रिया को प्रशिया के समर्थन से विहन करने की, नेपोलियन की कूटनीतिक चाल थी नेपोलियन ने इंग्लैण्ड पर आक्रमण करने का विचार त्याग दिया, और इंग्लिश चैनल के तट पर जमी अपनी सात सैनिक टुकड़ियों को डेन्यूब नदी की ऊपरी घाटी की ओर जाने के आदेश दिये। उधर आस्ट्रिया की सेना, अपने मित्र राष्ट्र, रूस की सेना की प्रतीक्षा किये बिना ही, जनरल मैक के नेतृत्व में डेन्यूब नदी की ऊपरी घाटी में स्थित बवारिया (Bavaria) के प्रान्त में इकट्ठी हो गयी थी। वहाँ ऊम (UIm) नामक स्थल पर जनरल मैक ने आस्ट्रिया की सेना को जमा दिया था।

ऊम का युद्ध (20 अक्टूबर, 1805) : जनरल मैक को पूरी आशा थी कि नेपोलियन काले जंगल (Black Forest) के रास्तों से निकलकर वहाँ आयेगा, क्योंकि दक्षिणी जर्मनी तक पहुँचने के लिये यही सबसे
सीधा और लोकप्रिय मार्ग था नेपोलियन ने मैक को भ्रमित करने के लिये अपनी कुछ सैनिक टुकड़ियों को
काले जंगल के रास्तों में भेज दिया, लेकिन अपनी बड़ी सेना को वह इंग्लिश चैनल के तट पर अवस्थित
बूलोन्य के कैम्प से चुपचाप ले गया और उत्तरी जर्मनी से दक्षिणी जर्मनी का अपेक्षाकृत अधिक लम्बा मार्ग
तय करते हुये, उसने मैक की सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया। नेपोलियन की सेना ने इस मार्ग से आकर विएना और मैक का सम्पर्क-सूत्र भी तोड़ दिया। नेपोलियन ने 20 अक्टूबर, 1805 को ऊम के यद्ध में, हतप्रभ जनरल मैक एवं उसकी सेनाओं का, बड़ी शीघ्रता से बोरिया बिस्तर समेट दिया। नेपोलियन ने अपनी पत्नी.जोसेफिन को एक पत्र में लिखा था-‘मैंने आस्ट्रिया की सेना को अपने कदम गति (marches) के बलबूते.पर ही परास्त कर दिया।

ऊम के युद्ध में आस्ट्रिया की सेना की पराजय के बाद, डेन्यूब से विएना जाने का मार्ग नेपोलियन के
लिये खुल गया। नेपोलियन ने आगे बढ़ते हुए बड़ी सहजता से विएना पर कब्जा कर लिया। आस्ट्रिया का राजा फ्रांसिस विएना छोड़कर भाग गया। वह मोरेविया में सेनाओं के साथ मिलकर नेपोलियन को हराने की कल्पना कर रहा था।

आस्टरलिट्ज का युद्ध (2 दिसम्बर, 1805)

नेपोलियन ने फ्रांसिस का पीछा किया, और 2 दिसम्बर, 1805 को जब नेपोलियन के राज्याभिषेक की पहली वर्षगांठ थी, आस्टरलिट्ज (Austerlitz) के युद्ध में उसने आस्ट्रिया एवं रूस की संयुक्त सेनाओं को परास्त कर दिया। यह नेपोलियन की सम्भवत: सबसे प्रमुख विजय थी। युद्ध बड़ा घमासान हुआ और पूरे दिन चला। शीतकालीन कोहरे से झांकती हुई सूरज की किरणों को फ्रांस की सेनाओं ने एक शुभ संकेत माना। दोनों तरफ के सैनिक बड़ी बहादुरी से लड़े, लेकिन नेपोलियन के कुश नेतृत्व तथा उसके सैनिकों के अद्भुत जोश ने विपक्षी सेनाओं की धजियाँ उड़ा दी। जिस दिशा में जगह मिली, उसी दिशा में पराजित राष्ट्रों के सैनिक भाग छूटे । इस विजय से प्रसन्न होकर नेपोलियन ने अपने सैनिकों से कहा था-‘सैनिकों! मैं तुमसे सन्तुष्ट हूँ। आस्टरलिट्ज के युद्ध में तुमने अपनी निर्भीकता से मेरी सब अपेक्षाओं को उचित सिद्ध कर दिया है। प्रेसबर्ग की सन्धि (26 दिसम्बर, 1805): नेपोलियन ने आस्ट्रिया को तीसरी बार युद्ध में हराया.था, लेकिन इस बार की हार आस्ट्रिया के लिये बहुत भारी, अत्यन्त अपमानजनक एवं नुकसानदायी रही। ऊम.एवं आस्टरलिट्ज के युद्धों में आस्ट्रिया की पराजय का एक तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि आस्ट्रिया को.तृतीय संयुक्त गठबन्धन की सदस्यता से अलग होना पड़ा। 26 दिसम्बर, 1805 को, नेपोलियन के निर्देश पर. आस्ट्रिया को फ्रांस के साथ प्रेसबर्ग की सन्ध (Treaty of Pressburg) पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस सन्धि के द्वारा आस्ट्रिया को वेनेशिया का क्षेत्र इटली के राज्य को देना पड़ा, जिसका राजा नेपोलियन था ।

ऊपरी.एड्रियेटिक के तटवर्ती क्षेत्र में आस्ट्रिया के पास सिर्फ ट्रिएस्टे का बंदरगाह ही रह गया । इसके बाद से.आस्ट्रिया नहीं, बल्कि फ्रांस एड्रियेटिक समुद्र की मुख्य शक्ति बन गया । आस्ट्रिया ने टाइरोल का क्षेत्र बवारिया (दक्षिणी जर्मनी का राज्य) को तभा हैप्सबर्ग का क्षेत्र वटेम्बर्ग (दक्षिणी जर्मनी का राज्य ) को दे दिया। बवारिया एवं वर्टेम्बर्ग दोनों को नेपोलियन ने फ्रांस के सहयोगी राजतन्त्रों में बदल दिया । हेजन के शब्दों में..’एड्रियेटिक से निष्कासित तथा इटली से निष्कासित, आस्ट्रिया को अपने 30 लाख लोगों से हाथ धोना पड़ा।’ इसके साथ जो आर्थिक नुकसान और अपमान हुआ, वह तो था ही।

नेपोलियन, राजाओं के निर्माता के रूप में : एक चक्रवर्ती सम्राट की शैली में, नेपोलियन ने अपने अधीनस्थ बाह्म क्षेत्रों में, अपने परिवार के लोगों को राजा बनाना आरम्भ कर दिया 1806 में उसने चार नहे राजतन्त्रात्मक राज्यों का निर्माण कर, वहाँ राजाओं की नियुक्ति की। नेपोलियन के बटावियन गणतन्त्र (Batavian.Republic, Holland) को राजतन्त्रात्मक राज्य में बदल दिया और वहाँ अपने भाई लुई को शासक नियुक्त.किया। नेपल्स के राजतन्त्रात्मक राज्य पर उसने अपने दूसरे भाई जोसेफ की नियुक्ति की। दक्षिणी जर्मनी में.स्थित बवारिया एवं, वट्टेम्बर्ग की डचियों को भी नेपोलियन ने राजतंत्रात्मक राज्यों में बदल दिया 1806 के बाद भी अवसर मिलने पर नेपोलियन ने यह क्रम जारी रखा।

जर्मनी का पुनर्गठन

नेपोलियन के हाथों में जर्मनी के छोटे-छोटे बहुसंख्यक राज्यों के संगठन एवं
पुनर्गठन का कार्य सम्पन्न हुआ। नेपोलियन से पूर्व जर्मनी में अनेक प्रकार के, छोटे बड़े, बहुत सारे राज्य
थे-30 मध्यम आकार के राज्य जैसे कि बवारिया, वर्टेम्बर्ग, सैक्सनी, बड़ेन आदि; 150 छोटे राज्य जिनमें
बहुत से धार्मिक राज्य (ecclesiastical kingdom) भी थे, तथा 1,500 लघुत्तर राज्य साम्राज्य के नाइट्स (Knights) के अधीन थे। हर राज्य का शासक अपने क्षेत्र में, भले ही वह कुछ वर्ग मीलों का क्षेत्र हो, स्वतन्त्र.एवं प्रभुतासम्पन शासक की भांति राज्य करता था। इनमें से लगभग 360 राज्य, परम्परागत पवित्र रोमन साम्राज्य (Holy Roman Empire) के प्रति आस्था रखते थे। नेपोलियन ने जर्मनी के बड़े राज्यों को नयी राजतन्त्रात्मक इकाइयों में बदल दिया, बहुत से छोटे एवं.लघुतर राज्यों को बड़े राज्यों में मिला दिया तथा लगभग सभी धार्मिक राज्यों का अन्य राज्यों में विलीनीकरण कर दिया। नेपोलियन के प्रयासों के फलस्वरूप ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ के प्रति आस्था रखने वाले पूर्ववर्ती 360 राज्य पुनर्गठित होकर 82 राज्यों में बदल गये । जर्मनी के राज्यों का यह संगठन एवं पुनर्गठन नेपोलियन के बाद
भी चलता रहा, और इसने उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मनी के राष्ट्रीय एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।

नेपोलियन ने पिछले 1000 वर्ष से अस्तत्वमान ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ की इकाई को समाप्त कर दिया। यह ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ जर्मनी के बहुसंख्यक राज्यों के मध्य एक परम्परागत सूत्र के रूप में कार्य कर रहा था। इसके प्रमुख आस्ट्रिया के पराजित राजा फ्रांसिस ने ‘पवित्र रोमन सम्राट’ (Holy Roman Empire) की उपाधि का परित्याग कर दिया।

प्रशिया पर विजय ( 1806-1807)

पिछले एक दशक के दौरान फ्रांस और प्रशिया के सम्बन्ध शान्तिपूर्ण रहे। प्रशिया ने फ्रांस के विरुद्ध तृतीय संयुक्त गठबन्धन में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

लेकिन प्रशिया दक्षिणी जर्मनी में नेपोलियन की सैनिक गतिविधियों से दुःखी था। प्रशिया का राजा फ्रेडरिक
विलियम तृतीय स्वयं भी साम्राज्यवादी विस्तार की आकांक्षायें संजोये हुये था। प्रशिया के युद्धप्रिय दरबारी गुट,जिनका नेतृत्व प्रेडरिक की सुन्दर पत्नी रानी लुईजा कर रही थी, के प्रेरित करने पर फ्रेडरिक ने नेपोलियन को अल्टीमेटम दिया कि वह दक्षिणी जर्मनी के क्षेत्र से फ्रांसीसी सेनाओं को हटा ले। जैसा कि हेजन ने लिखा है ‘नेपोलियन अल्टीमेटम लेने की बजाय उन्हें देना ज्यादा अच्छी तरह से जानता था। नेपोलियन द्वारा प्रशिया की बात पर ध्यान नहीं देने पर प्रशिया ने 1806 में फ्रांस के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। रूसी सेना की सहायता के बिना ही प्रशिया के राजा ने अपने 1,50 ,000 सैनिकों को नेपोलियन की सेना से युद्ध करने के लिए भेज दिया। नेपोलियन अपने 2,00,000 सैनिकों के साथ ऐसी परिस्थिति के स्वागत के लिए पूरी तरह से तैयार था। नेपोलियन की सेना प्रशिया की सेना पर बरसात के बादल की तरह फट गई तथा जेना (Jena) एवं.आरेस्टेड (Auerstadt) नामक स्थानों पर (ये दोनों स्थल कुछ मीलों की दूरी पर अवस्थित हैं), अक्टूबर 14,.1806 को लड़े गये युद्धों में प्रशिया की सेना की करारी पराजय हुई। प्रशिया की सेना का पूरी तरह से विध्वंस हो गया, और फ्रेडरिक द ग्रेट के शासनकाल से अर्जित प्रशिया की उच्च सैनिक प्रतिष्ठा धूलधूसरित हो गई।.नेपोलियन ने प्रशिया के विभिन्न क्षेत्रों में ध्वंस मचाते हुए प्रशिया की राजधानी बल्लिन तथा उसके बहुत सारे क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। फ्रेडरिक विलियम तृतीय, पूरक की ओर रूस की सेना का संरक्षण प्राप्त करने के लिए भाग गया।

रूस का पराभव ( 1807)

नेपोलियन के समक्ष, अब रूस एक बड़ी शक्ति के रूप में बचा था जिसका पराभव आवश्यक था। पोलैण्ड एवं पूर्वी प्रशिया के क्षेत्रों से, दुर्गम रास्तों एवं जंगलों से गुजरते हुये, नेपोलियन की सेना का रूस की सेना के साथ प्रथम मुकाबला इअलाऊ (Eylau) के युद्ध (7-8 फरवरी, 1807) में हुआ। यह बड़े भीषण रक्तपातपूर्ण युद्धों में से एक था, जो अनिर्णीत रहा। लेकिन नेपोलियन की सेनाओं ने फ्रेंडलेंड (Friedland) के युद्ध में 14 जून, 1807 को रूस की सेनाओं को एक करारी मात दो, लगभग वैसी ही जैसी कि आस्टरलिट्ज के युद्ध में आस्ट्रिया को तथा जेना के युद्ध में प्रशिया को मिली था।

इस पराजय से घबराकर रूस के जार अलेक्जेण्डर प्रथम ने नेपोलियन के सम्मुख शान्ति समझौते का प्रस्ताव तिलसित की सन्धि (7 जुलाई, 1807): तिलसित (Tilsit) नामक स्थान पर, नीमन (Niemen)
नदी के बीच बांधे हुए एक बेड़े पर, नेपोलियन तथा रूस के जार अलेक्जेण्डर प्रथम के मध्य शान्ति-वात्तं की
शुरुआत हुई। अलेक्जेण्डर प्रथम नेपोलियन के व्यक्तित्व तथा उसकी अप्रत्याशित उदारता से बहुत प्रभावित
हुआ नेपोलियन ने जार से किसी भी रूसी क्षेत्र के अधिग्रहण की माँग नहीं की यूरोप के नक्शे को सामने
लेकर, दोनों सम्राट यूरोप के पारस्परिक विभाजन के कार्य में लग गये अलेक्जेण्डर को यह संकेत दे दिया
गया कि वह फिनलैण्ड एवं तुर्की साम्राज्य के क्षेत्रों पर अपनी इच्छानुसार कब्जा कर सकता है। दूसरी ओर,
अलेक्जेण्डर ने नेपोलियन द्वारा किये गये तथा भविष्य में किये जाने वाले उन सभी परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया जो पश्चिमी यूरोप, इटली तथा जर्मनी से सम्बद्ध थे अलेक्जेण्डर ने यह आश्वासन दिया कि वह फ्रांस तथा इंग्लैण्ड के मध्य शान्ति स्थापित करने का प्रयास करेगा, तथा शान्ति वार्ता सफल ने होने की स्थिति में वह फ्रांस द्वारा इंग्लैण्ड पर लागू किये जाने वाले महाद्वीपीय प्रतिबन्ध (Continental blockade) में फ्रांस का साथ देगा।

प्रशिया को फ्रांस एवं रूस के मध्य हुई उपर्युक्त सन्धि की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। प्रशिया से नेपोलियन ने एल्बे (EIbe) नदी के पश्चिम का सारा क्षेत्र ले लिया, तथा इसमें जर्मनी के कुछ अन्य क्षेत्रों को मिलाकर वेस्टफालिया के शाही राज्य (Kingdon of Westphalia) का गठन किया गया तथा नेपोलियन के.भाई जेरोम को इसका राजा बना दिया गया । प्रशिया से पोलेण्ड के क्षेत्र को छीनकर वहाँ पर ‘वारसा की ग्राण्ड डची’ (Grand Duchy of Warshaw) बना दी गई । कुल मिलाकर, प्रशिया को अपने लगभग आधे क्षेत्रों से हाथ धोना पड़ा, उसकी सेना को 42,000 तक सीमित कर दिया गया, तथा उसके ऊपर अपनी भूमि पर फ्रांसीसी सेना के निर्वाह का, युद्ध की क्षतिपूर्ति राशि के भुगतान तक, दायित्व डाल दिया गया।

नेपोलियन का चरमोत्कर्ष

तिलसित की सन्धि ने फ्रांस के विरुद्ध तृतीय संयुक्त गठबन्धन को समाप्त
कर दिया तथा नेपोलियन को यूरोपीय महाद्वीप का स्वामी बना दिया। तिलसित के पश्चात् का एक वर्ष
नेपोलियन के साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है । नेपोलियन अब यूरोपीय महाद्वीप का अधिनायक था,
इतिहास के किसी भी सम्राट की भांति। जैसा कि हेज (मॉडर्न यूरोप टू 1870) ने लिखा है, ‘नेपोलियन के
अधीन फ्रांस का विस्तार पो (Po) नदी से लेकर उत्तरी समुद्र (Nonth Sea) तक था, पाइरेनिज एवं पोप के अधीनस्थ राज्यों से लेकर राइन नदी तक था। वह इटली का राजा था, जिसके अन्तर्गत पो की उर्वर घाटी थी.तथा वेनिस की प्राचीन वस्तुएँ थीं। नेपोलियन का भाई जोसेफ नेपल्स के शाही राज्य का शासक था। उसका भाई लुई एवं उसकी सौतेली पुत्री हॉर्टेन्स हॉलैण्ड के राजा एवं रानी थे। उसकी बहन एलिस, लूका (Lucca).के राज्य की राजकुमारी थी। स्पेन एवं डेनमार्क के राजा उसके प्रशंसक थे, एवं रूस का जार उसका मित्र।.पोलैण्ड उसकी सेना का प्रशिक्षण केन्द्र था। प्रशिया एवं आस्ट्रिया दूसरे दर्जे की शक्तियाँ बन गई थीं, एवं जर्मनी में फ्रांस की तृती बोलती थी।

1799 के दिन से जब नेपोलियन ने डाइरेक्टरी के शासन का उन्मूलन किया था, 1808 के समय तक
नेपोलियन की कहानी युद्ध एवं शान्ति की विजयों की एक भव्य श्रृंखला है।’.यह नेपोलियन की शक्ति की वास्तविक पराकाष्ठा थी। नवम्बर, महाद्वीपीय व्यवस्था नाकाबन्दी तिलसित की सन्धि के बाद अब इंग्लैण्ड ही फ्रांस का एकमात्र अविजित शत्रु बचा था। आस्टरलिट्ज, जेना एवं फ्रेडलेंड के युद्धों में क्रमश: आसट्रिया, प्रशिया एवं रूस को परास्त करने के बाद, यूरोपीय महाद्वीप में नेपोलियन ने अपनी सैनिक एवं साम्राज्यवादी वर्चस्व का सिक्का जमा लिया था लेकिन नेपोलियन के साम्राज्यवादी अहंकार के सीने में, स्वतन्त्र इंग्लैण्ड का अस्तित्व, एक जहरीला तीर की तरह चुभा हुआ था।

नेपोलियन की आकांक्षा थी कि वह इंग्लैण्ड को इंग्लैण्ड की भूमि पर जाकर परास्त करे। स्थलीय युद्धों में
नेपोलियन का कोई सानी नहीं था लेकिन नेपोलियन की मुख्य समस्या यह थी इंग्लिश चैनल को पार करके
इंग्लैण्ड की भूमि पर कैसे पहुँचा जाये ? इंग्लैण्ड की नौसैनिक शक्ति बहुत प्रबल थी, और इंग्लिश चैनल में
ब्रिटिश नौसेना के चक्रव्यूह को तोड़ पाना बड़ा दुष्कर कार्य था 1803 में नेपोलियन ने इंग्लिश चैनल के दूसरे तट पर बूलोन्य नामक स्थान पर अपनी सैनिक टुकड़ियों को जमा करके, इंग्लैण्ड पर आक्रमण करने की.भारी योजनायें बना रखी थीं लेकिन दो वर्ष तक वह इस प्रयास में लगा रहा कि इंग्लिश चैनल को सफलतापूर्वक पार करने की कोई कुंजी उसके हाथ लग जाये। लेकिन ट्रैफल्गर (स्पेन) के नौसैनिक संघर्ष में, ब्रिटिश सेना के हाथों हुई फ्रांसीसी एवं स्पेन की संयुक्त सैनिक टुकड़ियों की गम्भीर पराजय ने, नेपोलियन के इंग्लिश चैनल को पार करने के हौँसले को पस्त कर दिया तथा उसने इंग्लैण्ड पर आक्रमण करने का इरादा त्याग दिया । लेकिन नेपोलियन इंग्लैण्ड को येन-केन-प्रकारेण परास्त करने के लिये कटिबद्ध था। इंग्लैण्ड को उसकी विशिष्ट नौसैनिक शक्ति के कारण प्रत्यक्ष न हरा पाने की विवशता को जानकर, नेपोलियन ने उसको अप्रत्यक्ष रूप से हराने की योजना बनाई यह अप्रत्यक्ष तरीका था-आर्थिक युद्ध का नेपोलियन द्वारा इंग्लैण्ड के विरुद्ध चलाये गये इस आर्थिक युद्ध को ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ (Continental System) या महाद्वीपीय नाकाबंदी’ (Continental Blockade) कहा जाता है।

इंग्लैण्ड की समृद्धि का मुख्य आधार उसके औद्योगिक उत्पादनों का विदेशी क्षेत्रों में निर्यात था।
इंग्लैण्ड को नेपोलियन ‘दुकानदारों का देश’ (A Nation of Shopkeepers ) कहता था। नेपालियन का मानना था कि यदि इंग्लैण्ड में तैयार की जाने वाली वस्तुओं का बाह्य क्षेत्रों में विक्रय प्रतिबन्धित हो जाये, तो इसका इंग्लैण्ड के व्यापार एवं उद्योगों पर बड़ा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इंग्लैण्ड आर्थिक बरबादी की स्थिति में आ जायेगा, तब वह स्वतः ही फ्रांस के सम्मुख घुटने टेक देगा। फ्रांस एवं उसके सहयोगी देशों द्वारा.यूरोप में ब्रिटिश वस्तुओं के व्यापार पर लगाये गये प्रतिबन्ध की नीति को ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ या ‘महाद्वीपीय प्रतिबन्ध या नाकाबन्दी’ कहा जाता है।.नेपोलियन का विश्वास था कि ब्रिटेन के वाणिज्यिक विनाश का अर्थ होगा उसके हृदय की गति का.रुक जाना। ब्रिटिश व्यापार के ‘महाद्वीपीय प्रतिबन्ध’ की कल्पना का जन्म फ्रांस में राष्ट्रीय सम्मेलन एवं डाइरेक्टरी की सरकारों के काल में हो चुका था, लेकिन इस नीति का विस्तृत क्रियान्वयन नेपोलियन द्वारा किया गया।

‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ को नेपोलियन द्वारा 21 नवम्बर, 1896 की ‘बल्लिन आज्ञप्ति’ (Berlin Decree)
द्वारा लागू किया गया। इस आज्ञप्ति में यह घोषणा की गई-‘ब्रिटिश द्वीपों को तत्काल प्रभाव से अवरुद्ध
(bloackaded) घोषित किया जाता है। उनसे किये जाने वाले समस्त वाणिज्य पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है; यूरोपीय महाद्वीप में फ्रांस एवं उसके मित्र राष्ट्रों की सीमाओं के अन्तर्गत अंग्रेजी नाम-पते वाले पत्रों तथा
गट्ठरों को जब्त कर लिया जायेगा;B अग्रेजी सामानों के संग्रह-स्थलों को भी जब्त कर लिया जायेगा; अंग्रेजी
सामान की प्रत्येक वस्तु, समस्त अंग्रेजी जहाज, ब्रिटिश उपनिवेशों से आने वाले कच्चे माल से लदे जहाज-
इन सभी को यूरोपीय बन्दरगाहों, जिसमें तटस्थ राषट्रों के बन्दरगाह भी शामिल होंगे, से बहिष्कृत रखा जायेगा।’ ब्रिटिश वस्तुओं के प्रतिबन्ध की इस ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ को बाद में जारी अन्य आज्ञप्तियों द्वाराअधिक सुदृढ़ एवं व्यापक बना दिया गया; ऐसी आज्ञप्तियाँ थीं-‘वारसा आज्ञप्ति’ (जनवरी, 1807 ), ‘मिलान.आज्ञप्ति’ (दिसम्बर, 1807), एवं फाउण्टेनब्लियू आज्ञप्ति ( अक्टूबर, 1810) । ‘मिलान आज्ञप्ति’ के अनुसार यह व्यवस्था की गई कि किसी ब्रिटिश बन्दरगाह या ब्रिटेश सेना द्वारा अधिकृत किसी भी देश के बन्दरगाह से चलने वाले तटस्थ जहाजों को भी फ्रांस या अन्य निजी कम्पनियों की युद्ध पोतों द्वारा पकड़ा जा सकता है। 1810 की ‘फाउण्टेनब्लियू आज्ञसि’ में तो यह आदेश प्रसारित कर दिया गया कि फ्रांसीसी साम्राज्य में ब्रिटिश-.उत्पादित वस्तुओं का अधिग्रहण कर लिया जाये एवं उनका सार्वजनिक अग्निदहन कर दिया जाये।

ब्रिटिश सरकार ने नेपोलियन की बल्लिन आज्ञप्ति का जवाब ‘काउंसलीय आदेशों’ (Orders in Council).के द्वारा दिया जो जनवरी, 1807 से नवम्बर, 1807 के मध्य पारित किये गये इन काउंसलीय आदेशों के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा कर दी कि प्रांस एवं उसके मित्र राष्ट्रों से व्यापार करने वाले जहाजों को पकड़ लिया जाये, साथ ही तटस्थ जहाजों का ब्रिटिश बन्दरगाहों पर रुकना अनिवार्य कर दिया गया ताकि.उनके माध्यम से ब्रिटेन का सामान शत्रु देशों के क्षेत्रों में पहुँचाया जा सके। इस प्रकार व्यापारिक प्रतिबन्ध का यह युद्ध फ्रांस और इंग्लेण्ड के मध्य एकतरफा नहीं रहा, बल्कि पारस्परिक हो गया। नेपोलियन ने फ्रांस एवं.यूरोपीय महाद्वीप में उसके सहयोगी राष्ट्रों के क्षे्र में, ब्रिटिश जहाजों या तटस्थ राज्यों के जहाजों के माध्यम से होने वाले ब्रिटिश वस्तुओं के आयात पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया। दूसरी ओर, इंग्लैण्ड ने फ्रांस एवं उसके.आश्रित राष्ट्रों द्वारा किये जाने वाले सामुद्रिक व्यापार के दमन का प्रयास किया फ्रांस एवं ब्रिटेन के इस पारस्परिक आर्थिक युद्ध में तटस्थ राष्ट्रों के समक्ष बडा धर्मसंकट उपस्थित हो गया कि वे किसका पक्ष ल, किसका नहीं लें। इस नवीन प्रकार के आर्थिक संघर्ष के महत्त्वपूर्ण एवं दूरगामी प्रभाव हुये। हेजन के शब्दो.में, ‘फ्रांस एवं ब्रिटेन का यह आर्थिक संघर्ष 1807 से 1814 के सम्पूर्ण काल पर छाया रहा। यह वह केन्द्रीय सूत्र है जो इन वर्षों के सारे उलझे हुए एवं विक्षुब्ध इतिहास से जुड़ा हुआ है।

देखते हैं, चाहे स्पेन में हो या रूस में, रोम में हो या कोपेनहेगेन में, डेन्यूब के किनारे हो या टेगस के किनारे ।
‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ की पृष्ठभूमि में नेपोलियन की एक सकारात्मक अपेक्षा यह भी थी कि ब्रिटिश वस्तुओं के प्रतिबन्ध के बाद फ्रांस को यूरोप में उद्योग एवं व्यापार के केन्द्र के रूप में विकसित किया जा सकेगा। तद्नुसार इटली को फ्रांस का आर्थिक उपनिवेश बना दिया गया, जहाँ से फ्रांस के उद्योगों के लिए कच्चा माल लाया जाता था, तथा जो फ्रांस में तैयार किये वस्त्रों के लिए बाजार का कार्य करता था। हालैंड का आर्थिक विकास भी फ्रांस के अधीन कर दिया गया । जबकि फ्रांस में मशीनों के प्रयोग को प्रोत्साहित किया गया, अन्य सहयोगी देशों में इस प्रक्रिया को रोकने का प्रयास किया गया डेविड थामसन के अनुसार, ‘महाद्वीपीय व्यवस्था ….. ब्रिटेन के विरुद्ध आर्थिक युद्ध की नीति से अधिक बड़ी व्यवस्था थी। यह फ्रांस के पक्ष में आर्थिक वरीयता एवं संरक्षण की एक व्यापक योजना थी …. आर्थिक दृष्टि से फ्रांसीसी साम्राज्य को अच्छा लाभ हुआ, कम से कम एक लघु अन्तराल में।

लेकिन ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ के द्वारा नेपोलियन इंग्लैण्ड को परास्त करने के अपने प्रयोजन में असफल रहा। आर्थिक असहिष्णुता का जो लंबा युद्ध फ्रांस एवं इंग्लैण्ड के मध्य हुआ, उसमें हार इंग्लैण्ड की नहीं, बल्कि फ्रांस की हुई। नेपोलियन ने ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ को यूरोप में निरपवाद रूप में लागू करने के अति उत्साह में, यूरोप के अनेक देशों से अपने सम्बन्ध शत्रुतापूर्ण बना लिये। महाद्वीपीय व्यवस्था की अनुपालना करवाने के लिये नेपोलियन को अनेक राष्ट्रों के प्रति आक्रामक रवैया अपनाना पड़ा। इस प्रकार का सारा घटनाक्रम नेपोलियन के अन्त का मुख्य कारण बना।

‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ की सफलता के लिये यह आवश्यक था कि यूरोप में उसका सर्वत्र एवं अनवरत
अनुपालन हो। इसके लिए यूरोप के सभी देशों का सहयोग नेपोलियन के लिये अनिवार्य था नेपोलियन ने
तिलसित की सन्धि के माध्यम से महाद्वीपीय व्यवस्था में रूस का सहयोग प्राप्त कर लिया। आस्ट्रिया एवं
प्रशिया, जिनको नेपोलियन ने बुरी तरह परास्त किया था, ने भी महाद्वीपीय व्यवस्था को अपनाने की स्वीकृति दे दी। डेनमार्क ने भी नेपोलियन का पक्ष लिया। लेकिन स्वीडन ने ब्रिटेन का साथ दिया। स्वीडन के इस रुख का लाभ उठाते हुये रूस ने फिनलैण्ड पर कब्जा कर लिया जो स्वीडन के अधीन था; इस अधिग्रहण की स्वीकृति नेपोलियन रूस को तिलसित की सन्धि में ही दे चुका था । हॉलैण्ड के राजा लुई, जो कि नेपोलियन का भाई था, ने महाद्वीपीय प्रतिबन्ध को लागू नहीं किया, क्योंकि ऐसा करने पर हॉलेण्ड बरबाद हो जाता। इस प्रकार प्रकार के रवैये के कारण नेपोलियन ने लुई को अपना सिंहासन छोड़ने के लिये मजबूर किया तथा 1810 में हॉलेण्ड को फ्रांस में मिला लिया गया इटली में पोप ने फ्रांस का साथ देने की बजाय तटस्थ रहने की नीति अपनाई। नेपोलियन ने नाराज होकर पोप के अधीनस्थ राज्यों को इटली के शाही राज्य में मिला लिया, जिसका वह स्वयं राजा था । पोप ने नेपोलियन को धर्म से निष्कासित कर दिया। नेपोलियन ने पोप को गिरफ्तार कर लिया और उसे इस अवस्था में कई वर्षों तक रखा। पुरतगाल ने इंग्लैण्ड से अच्छे सम्बन्ध बना रखे थे।


उसने महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने के प्रति अनिच्छा प्रदर्शित की। नेपोलियन को पुर्तगाल के विरुद्ध युद्ध करना पड़ा। सारांशत: कहा जा सकता है कि नेपोलियन ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ को लागू करने के लिए निरन्तर प्रयासरत एवं संघर्षरत रहा, इसके लिये उसने अपना रुख आक्रामक बनाये रखा। लेकिन इस सबके बावजद महाद्वीपीय व्यवस्था’ असफल हो गई। इसकी असफलता के क्या कारण थे ।

महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण

01 यूरोप के लिये ब्रिटिश उत्पादित वस्तुओं की अपरिहार्यता

यूरोप में विभिन्न देशों में ब्रिटेन में उत्पादित कुछ वस्तुओं की आवश्यकता इतनी प्रबल थी कि यूरोप के देशों, यहाँ तक की फ्रांस के मित्र राटों ने भी महाद्वीपीय व्यवस्था को हृदय से स्वीकार नहीं किया, और कुछ देशों ने तो इसे प्रत्यक्षतः अस्वीकार कर दिया, जिसके कारण नेपोलियन को ऐसे देशों के साथ युद्धों में उलझना पड़ा। यूरोप के विभिन्न देशों को महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार करने का एक तात्कालिक परिणाम यह स्पष्टत: दिखाई देने लगा था कि ब्रिटिश उत्पादित आवश्यकता वस्तुओं की कमी के कारण उनकी आर्थिक व्यवस्था डांवाडोल हो जायेगी, तथा जन-असंतोष भी बढ़ेगा। स्वयं नेपोलियन के भाई लुई ने जो कि हॉलैण्ड का राजा था, महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने के प्रति अनिच्छा प्रदर्शित की, क्योंकि इस व्यवस्था को लागू करने पर हॉलैण्ड की अर्थव्यवस्था बरबाद हो जाती। ब्रिटेन से भारी मात्रा में चाय, काफी एवं चीनी की आपूर्ति ‘राइन संघ’ के जर्मन देशों तथा यूरोप के अन्य देशों को की जाती थी इन वस्तुओं की आपूर्ति को पूरी तरह समाप्त कर देने का अर्थ होता, यूरोप में इन वस्तुओं की कमी तथा इनकी कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि जो जनता के आर्थिक असंतोष का कारण बनती। यह उल्लेखनीय है कि विशेष परमिटों के द्वारा एवं तस्करी के द्वारा इस प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति यूरोप में जारी रही। ब्रिटिश उत्पादित वस्तुयें, स्पेन एवं पुर्तगाल के माध्यम से, डेन्यूब नदी की ऊपरी घाटी तक आती रहीं। जेम्स टामसन (नेपोलियन बोनापार्ट-हिज राइज एण्ड फाल ) के अनुसार, महाद्वीपीय व्यवस्था के काल में इंग्लैण्ड से यूरोप को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के प्रतिशत में कोई भारी परिवर्तन नहीं आया।

उपर्युक्त आंकड़ों को दृष्टिगोचर रखते हुये कहा जा सकता है, जैसा कि टामसन ने लिखा है-‘ अपने मुख्य ध्येय में, महाद्वीपीय प्रतिबन्ध, 1810 तक, पूर्णतः असफल रहा।’ स्वयं फ्रांस के लिये कतिपय ब्रिटिश उत्पादित वस्तुओं के अभाव को झेल पाना बड़ा मुश्किल था, अतः विशेष परमिटों द्वारा उनका आयात किया जाता रहा। नेपोलियन के सैनिकों के लिये गरम कपड़ा एवं चमड़ा, इंग्लैण्ड से मंगाया जाता रहा। एक अवसर पर फ्रांस के सैंनिकों के लिए ब्रिटेन से मंगाकर 50,000 ओवरकोटों की व्यवस्था की गई, क्योंकि स्वयं फ्रांस एवं उसके सहयोगी देशों द्वारा इतनी भारी मात्रा में ओवरकोटों की आपूर्ति कर पाना सम्भव नहीं था। उपर्युक्त रियायतों ने ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ की आन्तरिक कमजोरियों को स्पष्ट कर दिया और इस प्रकार के अन्तर्विरोध इस व्यवसथा की निष्फलता के कारण बन गये।ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता एवं औपनिवेशिक सम्पन्नता : ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता एवं सर्वोच्चता को देखते हुये, फ्रांस के लिये उसके सामुद्रिक व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा पाना बड़ा दुष्कर कार्य था।।फ्रांस के पास ऐसी समर्थ नौसैनिक शक्ति नहीं थी जो यूरोप के विस्तृत समुद्री तट पर ब्रिटिश जहाजों के।अनौपचारिक आगमन को रोक सकती। दूसरी ओर, यूरोपीय महाद्वीप से बाहर ब्रिटेन के अनेक उपनिवेश ऐसे।थे जिनके साथ उसका सामुद्रिक व्यापार निर्बंध गति से चल रहा था। इन उपनिवेशों आता रहा और ब्रिटेन में तैयार किया गया माल इन उपनिवेशों में जाता रहा। ‘महाद्वीपीय प्रतिबन्ध’ के द्वारा ब्रिटेन के वाणिज्यिक विनाश की जो योजना नेपोलियन ने बनाई थी, वह ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता एवं औपनिवेशिक सम्पन्नता के कारण निष्परभावी हो गयी जेम्स टामसन (नेपोलियन बोनापार्ट : हिज राइज एण्ड फाल) के शब्दों में, ‘यह सत्य है कि इंग्लैण्ड अपने निर्यात व्यापार पर जीवित था। नेपोलियन द्वारा इसके विनाश की योजना स्पष्टत: असफल रही। यह कहा जा सकता है कि ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि उन वर्षों में जबकि महाद्वीपीय बन्दरगाहों को बढ़ती हुई संख्या में ब्रिटिश जहाजों के लिये बंद किया जा रहा था, इंग्लैण्ड ने समुद्रपार नये बाजारों को अपने लिये विकसित कर लिया था। यह एक ऐसा बिन्दु था जिसकी नेपोलियन ने अपनी पूर्व योजना में उपेक्षा कर दी थी।

02 एक उच्चाकांक्षी एवं अव्यावहारिक व्यवस्था

महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन की एक उच्चाकांक्षी एवं अव्यावहारिक व्यवस्था थी और इस कारण वह असफलता के लिये अभिशस्त थी। उच्चाकांक्षी इस अर्थ में कच्चा माल ब्रिटेन में कि नेपोलियन इस व्यवस्था के माध्यम से इतना अधिक प्राप्त करने की आकांक्षा कर रहा था जो तात्कालिक परिस्थितियों में सम्भव नहीं था। ब्रिटेन का वाणिज्यिक विनाश मात्र ‘महाद्वीपीय प्रतिबन्ध’ से सम्भव नहीं था, उसके लिये अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध’ की आवश्यकता थी जिसके अनुसार यूरोप के बाहर के उपनिवेशों एवं देशों से भी ब्रिटेन के व्यापार को प्रतिबन्धित किया जा सकता। नेपोलियन यूरोपीय महाद्वीप का विजेता था, विश्व- विजेता नहीं। दूसरी ओर ब्रिटेन के व्यापारिक-सम्बन्ध यूरोपीय ही नहीं थे, अन्तर्राष्ट्रीय थे इसी कारण वह महाद्वीपीय प्रतिबन्ध के प्रभाव से बच गया।

द्वितीय, ‘महाद्वीपीय व्यवस्था’ को लागू करते समय नेपोलियन ने अनेक व्यावहारिक तध्यों को अनदेखा
कर दिया। यूरोपीय राष्ट्रों (फ्रांस सहित) के लिये ब्रिटिश उत्पादित वस्तुओं का परित्याग आर्थिक दृष्टि से
आत्मघाती था, क्योंकि उन वस्तुओं की किसी अन्य स्रोत से उपलब्धि की व्यवस्था नेपोलियन ने नहीं की थी। स्वयं फ्रांस के उद्योग-धन्धे अभी इतने विकसित नहीं थे यही कारण है कि यूरोपीय महाद्वीप की व्यावहारिक समस्याओं के कारण ब्रिटिश वस्तुओं का आगमन चोरी-छिपे या विशेष परमिटों के द्वारा जारी रहा। दूसरी ओर नेपोलियन सैनिक दबाव से यूरोप के राष्ट्रों को महाद्वीपीय व्यवस्था बनाये रखने के लिए विवश करता रहा, जबकि उन देशों में राष्ट्रीय असंतोष या जन असंतोष नेपोलियन के विरुद्ध घनीभूत होता रहा। व्यावहारिक।यथार्थ के प्रति नेपोलियन का शुतुरमुर्गी दृष्टिकोण या उसकी सैद्धान्तिक हठधर्मिता, उसके साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी। नेपोलियन ने पफ्रांस के मध्यम वर्ग को भी नाखुश कर दिया । एफ.एम.एच. मरखम (नेपोलियन यूरोप के लोगों को अपने साम्राज्य के विरुद्ध कर लिया बल्कि उसने फ्रांस के मध्यम वर्ग के विश्वास को भी खो दिया, जो कि क्रान्ति का मुख्य लाभ पाने वाला वर्ग था और जिस वर्ग ने उसे सत्ता प्रदान की थी। फ्रांस में होने वाली 1810-11 की दीर्घ आर्थिक मंदी को महाद्वीपीय व्यवस्था का परिणाम माना जाता है, और इसी समय से फ्रांस का मध्यम वर्ग नेपोलियन के साम्राज्य के भाग्य के प्रति उदासीन हो गया ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *