India and prehistoric times
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भारत और प्रागैतिहासिक काल

भारत और प्रागैतिहासिक काल

निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति कितने वर्ष पूर्व हुई होगी और उसका आरम्भिक रूप कैंसा और किस प्रकार का रहा होगा इस विषय में, विभिन्न विद्वानों ने अपने जो मत प्रकट किए हैं, उनमें कल्पना और अनुमान का ही अधिक आश्रय लिया गया है। जन्म लेने वाले विभिन्न जीवधारियों में एक प्राणी मनुष्य भी था। आरम्भ में मनुष्य भी अन्य जीवधारियों-समान पशुओं की तरह हो जोवन व्यतीत करता होगा। उसने यही जीवन लाखों वर्ष तक व्यतीत किया। वह छोटे-छोटे जन-समूहों में रहता था और अपने जीवन-यापन के लिए भोजन की खोज में कभी इस स्थान पर रहता और कभी दूसरे स्थान पर चला जाता। उस समय वस्त्र इत्यादि को निर्माण-व्यवस्था न रहने के कारण वह नग्न रहता और कन्द- मूल-फल का आहार करता।

धीरे-धीरे मनुष्य में बुद्धि का विकास होने पर उसने पाषाण का प्रयोग करना सीखा। उसने नुकीले और धारदार पत्थरों से प्रहार कर पशुओं का संहार कर, उनके मांस को अपने भोजन की वस्तु बनाया। पत्थर के प्रयोग में गति आई और कई प्रकार के हथियार बनाकर उनसे पशुओं का शिकार किया जाने लगा। पुरातत्व विभाग की आधुनिकतम खोजों में, इस प्रकार के, कई किस्म के हथियार प्राप्त हुए भोजन को समस्या का कुछ समाधान खोजने के पश्चात् मनुष्य ने पशुओ के चर्म का उपयोग अपना शरीर ढांपने के लिए करना आरम्भ किया। इससे मनुष्य ने अपने शरीर की शीत तथा गर्मी से रक्षा की । यह युग पाषाण-प्रयोग के कारण पाषाण-युग के नाम से विख्यात हुआ। इतिहासकार इसे अपने ग्रन्थों में पाषाण-युग नाम से हो मान्यता देते हैं।

मनुष्य ने भोजन और वस्त्रों की आवश्यकतापूर्ति के परचात् अपनी आवागमन को सुविधाओं पर विचार किया। यात्रा करते-करते वह इतना थक जाता था कि श्रम करने को शक्ति शेष न रहतो थी। उसने पशुओं का उपयोग सवारी के साथ- साथ कृषि को उन्नति हुई तथा मानव जीवन को विशेष उपलब्धि का आभास मिला। मानव श्रम के साथ पशु-श्रम के मिलने से जीवन अधिक गतिशील बनता गया। उसके लिए भी करना आरम्भ कर दिया। इससे कृषि में उन्नति कृषि की उन्नति के लिए धातु के औजारों का उपयोग किया गया इससे कृषि के क्षेत्र में विशेष सफलता मिली। अब पशु पालन और कृषि मनुष्य का मुख्य कार्य-क्षेत्र बन गया। प्रस्तर के साथ धातु का प्रयोग होने से मानव विकास की दिशा में अग्रसर हुआ और धातु से कई प्रकार के अस्त्र शस्त्र तथा उपयोगी औजार बनाए जाने लगे, जैसे हथौड़ा, कुदाली, दरांती, हल, आरी, तवा धातु-प्रयोग का यह काल ताम्र-युग नाम से पुकारा गया। विद्वानों का विचार हे कि यह युग आज से लगभग दस-पन्द्रह हजार वर्ष पूर्व था। यह युग कितनी आयु तक रहा, इस विषय में निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। अनुमान है इसको आयु हजारों वर्ष की रही होगी। इस प्रकार हमने मनुष्य के आदिकाल पर संक्षेप में विचार किया। अब हम सभ्यता पर विचार करेंगे। ज़िस प्रकार मानव-सभ्यता का विकासनभारत-भूमि पर हो रहा था, उसी प्रकार विश्व में अन्य सभ्यताओं का भी विकास हुआ। मानव और उसकी सभ्यता के इतिहास बनते जा रहे थे। इन सभ्यताओं के पारस्परिक कुछ सम्बन्ध भी होने निश्चित थे। ये सम्बन्ध किस प्रकार के थे, किन- किन सभ्यताओं के थे, इस पर भी संक्षेप में विचार कर लेना आवश्यक है।

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आर्य सभ्यता

आर्य का मूल स्थान कौन सा भू-भाग था, इस पर विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ पुरातत्ववेत्ता आयों का मूलस्थान मध्य एशिया मानते हैं, कुछ कास्पियन सागर-प्रदेश, दक्षिणी रूस अथवा ईरान मानते हैं भारतीय आर्यों का प्राचीनतम युग वैदिक युग कहा जाएगा। आयों के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद हैं। वेदों के व्यापक अध्ययन से हमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वेदों में प्राप्त सूक्तों में ऋषियों के विचार तथा चिन्तन शैलियों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदव्यास ने वैदिक सूक्तों का संहिता के रूप में पृथक संग्रह किया। ये संहिताएं चार हैं, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। वैदिक सभ्यता बहुत व्यापक तथा विस्तृत है। इसमें मानव जीवन को आत्मसात किया गया है। ऋग्वेद संसार का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसके रचना-काल का निश्चित अनुमान लगाना कठिन है। मैक्समूलर ने इसे 2500 वर्ष ई० पूर्व रचित माना है। कुछ पुरातत्ववेत्ता इसे 8000 वर्ष ई॰ पूर्व रचित मानते हैं इस ग्रन्थ की प्राचीनता वैदिक सभ्यता की प्राचीनता प्रमाणित करती है। वेदव्यास ने जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में आयों के धर्म और सभ्यता का दर्पण प्रस्तुत किया है, उसी प्रकार पुराणों में आर्य राजवंशों के साथ-साथ उनसे
सम्बन्धित अनुश्रुतियों का संग्रह किया है । इनकी प्राचीनतम ऐतिहासिक अनुश्रुति- सूत चारण मागधों में चली आ रही थी। वेदव्यास ने राजवंशों की इस अनुश्रुति का भी संग्रह किया है । ये संग्रह अठारह पुराण हैं। वेदव्यास पुराणों के रचयिता नहीं, संकलनकर्ता थे।

वेदव्यास द्वारा संग्रहीत अठारह पुराणों से हमें प्राचीन भारत की अमूल्य ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है इन ग्रन्थों की वर्णनशैली बहुत मनोरंजक है। मनोरंजक होने के साथ-साथ ये पांडित्यपूर्ण भी हैं इन ग्रन्थों में भारतीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री संग्रहीत है। यह मानना होगा कि ये वर्णन अतिरजित हैं और कालान्तर में कुछ असंगत तथा काल्पनिक बातों का समावेश हो गया है। इतने प्राचीन ग्र्थों में कुछ प्रक्षिप्त अंशों का समावेश स्वाभाविक है, जबकि उन्हें सुरक्षित रखने के उपयुक्त साधन उपलब्ध नहीं थे। फिर भी यदि विद्वान व्यक्ति काल्पनिक वातों के समावेश को मूल से पृथक करने में सफल बुद्धि का प्रयोग करे तो लेखक के वास्तविक तथ्य को समझने में सफल हो सकता है और इतिहास की वह सूक्ष्म जानकारी प्राप्त कर सकता है जो अन्यत्र प्राप्त होनी असम्भव है। इतिहास के अतिरिक्त पुराणों में सृष्टि को उत्पत्ति का व्यापक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। उनके अध्ययन से विश्व के इतिहास पर भी विहंगम दृष्टि जाती है। ये ग्रन्थ प्रागैतिहासिक काल का ऐतिहासिक काल से सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इनमें बहुत सी ऐसी सामग्री प्राप्त होती है जिस का चलन ऐतिहासि क काल में उपलब्ध है। भारतीय साहित्य के कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मात्र साहित्यिक उपलब्धि ही नहीं प्राचीन इतिहास पर भी प्रकाश डालते हैं। इन ग्रन्थों से हमें प्राचीन भारतीय इतिहास का आधार प्राप्त है। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद्, पुराण आदि ग्रन्थां में भारत का प्राचीन इतिहास आद्योपान्त भरा पड़ा है। महाभारत और रामायण आरयं सभ्यता के मूलभूत ढांचे के आधार स्तम्भ हैं। इनमें धर्म, परिवार और समाज तथा राजनीतिक और नैतिक पहलुओं का क्रमबद्ध समावेश मिलता है। उपलब्ध ग्रन्थों में घटना-क्रम के आधार पर तिथि-वार कुछ न लिखा जाने के कारण जो कुछ उपलब्ध है, भ्रामक सा प्रतीत होता है। इसका यह निष्कर्ष निकालना कि भारत में कोई इतिहास लेखन की दिशा में कार्य नहीं हुआ, गलत है। भारतोय ग्रन्थों में इतिहास की कल्पना बहुत व्यापक प्राप्त होती है। ब्राह्मणों को तो कहा ही इतिहास, पुराण, कल्प इत्यादि जाता था।छांदोग्योपनिषद में नारद-संवाद के

अन्तर्गत इतिहास का महत्त्व दर्शाया गया है। भारतीय सभ्यता और साहित्य में इतिहास का महत्त्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। संस्कृत वाङमय में अनेकों स्थानों पर इतिहास का महत्त्व दर्शाया है। ‘राजतरोंगिणी’ के लेखक कल्हण कहते हैं कि उन्होंने ग्यारह इतिहासों के आधार पर अपना इतिहास लिखा। अठारह पुराणों में से पांच ऐसे पुराण हैं. जिनमें भारतीय ऐतिहासिक लोककथाओं का क्रम राज्य वंशावलियों के साथ वर्णित है। इन पुराणों के नाम-वायु, मत्स्य, विष्णु, ब्राह्मण और भागवत हैं विष्णु पुराण में मौर्यवंश के इतिहास का विस्तृत वर्णन है, जो शोघार्थियों के लिए नितान्त उपयोगो सिद्ध हो सकता है। भारतीय राज्यों में नील पत्री लिखने का उल्लेख मिलता है। इस पत्री में सभी घटनाओं का महत्त्वपूर्ण वर्णन होता था जो इतना महत्त्व रखता था कि उसी के आधार पर राजपुत्र नियुक्त किया जाता था चीनी यात्रियों ने इसका उल्लेख अपनी वर्णन- पत्रिकाओं में किया है। उनकी यात्रा के इतिहास में इसे विशेष महत्त्व दिया गया ‘हर्षचरित’ में महाराजा जब उदास होते थे तो ऐतिहासिक कथा सुनते थे। वह इतिहास-ग्रन्थ ही था जिसे सुनकर वह अपनी उदासी से भाग पाते थे यह सब इतिहास ही था, जो साधनाभाव के कारण बहुत कुछ लुप्त हो गया और कुछ परिवर्तित। खोजकर्ताओं को खोजकर आधार-तत्व निकालने की आवश्यकता
12 अनेकों यवन-शासनकाल में बहुत से भारतीय साहित्य का नाश हुआ।

ग्रन्थ नष्ट हुए संग्रहालयों में आग लगा दी गई। इन अग्निकाण्डों में राष्ट्र कीनअमूल्य पाण्डुलिपियां समाप्त हो गई। युद्ध-काल में जो लूट होती थी उसमें मूल्यवान वस्तुओं को लूट लिया जाता था और जिन्हें निरर्थक समझा जाता, उन्हें समाप्त।कर दिया जाता था। उनकी हिफाजत कीन करता और किसलिए? इस प्रकार राष्ट्र की ऐतिहासिक धरोहर, असंख्य पाण्डुलिपियों के रूप में, सर्वदा के लिए समाप्त हो गई और उनके साथ विद्वानों का अर्जित बहुमूल्य ज्ञान भी अंधकार के गतं में सो गया।

उत्तर-पश्चिम की ओर से भारत पर यवन आक्रमण हुए। उनमें देश की विभिन्न सम्पदाओं के साथ जो विध्वंस हुआ, उनमें साहित्य की रचनात्मक उपलब्धियों को उसी प्रकार नष्ट किया गया, जिस प्रकार कलात्मक भवनों तथा मन्दिरों को। आक्रमणकारियों के पास उनकी उपयोगिता समझने की न बुद्धि थी, न जिज्ञासा।
इस प्रकार हासोन्मुख स्थिति को ऐसे इतिहास ग्रन्थ भी प्राप्त हुए जिनके विषय में ‘हर्षचरित’ में उल्लेख मिलता है। यहां हम आगामी ध्वंस -लीलाओं का उल्लेख नहीं कर रहे। हमारा तात्पर्य केवल उन ध्वंसों से है जिनमें हमारी प्राचीन संस्कृति और इतिहास को क्षति पहुंची।

इस विनाश-काल में यह शंका उत्पन्न हुई कि इस भयंकर विनाश से तो वेद इत्यादि ग्रन्थों का तथा आर्य संस्कृति का पूर्ण विनाश हो जाएगा उस समय कतिपय विद्वानों ने सोचा कि यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन आदि शास्त्रों का समूल विनाश हो जाएगा और वैदिक संस्कृति के साथ- साथ आत्मिक, मानसिक तथा सामाजिक उन्नति में भी बाधा उपस्थित होगी। इसलिए विद्वानों ने इन ग्रन्थों को कण्ठस्थ करने की प्रणाली का आविष्कार किया, जिससे उनका समूल विनाश न हो पाए और अस्तित्व बना रहे। अनेक रक्षा-प्रबन्ध करने पर भी सहस्रों ग्रन्थों को विनाश से न बचाया जा सका।धनुर्वेद, आयुर्वेद, शिल्पविद्या इत्यादि के ग्रन्थों का भयंकर नाश हुआ । कर्नल टॉड ने अपने ग्रन्थ ‘टांड का राजस्थान’ में उत्त समस्या पर विस्तार से प्रकाश डाला है। टॉड ने स्पष्ट लिखा है कि भारत में प्राचीन इतिहास-ग्रन्थों की कमी का मूल कारण वह विनाश है जो महमूद गजनवी इत्यादि की लूटों के फलस्वरूप हुआ। जो मन्दिर तोड़े गए, उनमें मूर्तियों के अतिरिक्त धर्म तथा इतिहास माना जाता है। वर्तमान पुरातत्ववेत्ता इस ग्रन्थ को ईसा से 8000 वर्ष पूर्व का मानते हैं। ऋग्वेद के काल से भारतीय सभ्यता को पुनर्जीवित और पुनर्गठित माना जाता है। कुछ विद्वान ताओ मार्ग को इससे भी प्राचीन मानते हैं। परन्तु उन्होंने योग और प्राणायाम को वैदिक ज्ञान की ही देन माना है। हमारा मत है कि ‘ताओ मार्ग’ अधिक – से-अधिक 1000 वर्ष ईसा से पूर्व का है। जब ऋग्वेद ईसा से दस हजार वर्ष पुराना है तो ताओ मार्ग में वर्णित योग विधियां भारतीय शास्त्रों में दिए योगदान से पर्याप्त निम्न कोटि की ठहरती हैं। उपनिषदों में वर्णित ब्रह्मविद्या ताओ मार्ग के ब्रह्मज्ञान की माता (जननी) है। मनुस्मृति के अनुसार चीन देश को आबाद करने और वहां संस्कृति का दीपक प्रज्ज्वलित करने का श्रेय प्राचीन भारतीयों को ही जाता है। मान्यता है कि प्रातचीन क्षत्रिय ही चीनी लोगों के आदि पुरुष थे। इस प्रकार भारत प्राचीन चीन की मातृभूमि माना जा सकता है। चीन में सर्वप्रथम जो लोग जाकर बसे वे भारतीय थे। इस तथ्य का उद्घाटन करने वाले रायल ऐशियाटिक सोसायटी के प्रधान सर विलियम जोन्स हैं। वह लिखते हैं, ‘हमें अत्यन्त प्राचीन चीनी लोगों में ऐसे विश्वास और धार्मिक कृत्य प्राप्त होते हैं जिनकी प्राचीनतम भारतीय धार्मिक आस्थाओं और विश्वासों के साथ साम्यता है। ब्राह्मण और चीनी धर्म -ग्रन्थों के विधानों में साम्यता मिलती है। प्राचीन भारतीयों के मृत-संस्कार, श्राद्ध इत्यादि भी इसी रूप में चीनियों में पाए जाते हैं। बहुत सी प्राचीन भारतीय कथाएं और ऐतिहासिकनघटनाएं, कुछ साधारण परिवर्तनों के साथ, चीनी साहित्य में मिलती हैं। ये प्रमाण सिद्ध करते हैं कि प्राचीन भारतीय और चीनियों का जातिगत सम्बन्ध था। चीन बहुत बड़ा देश है। जब इनमें से कुछ लोग सुदूर भू-भागों में जाकर बस गए तो वे अपनी हजारों वर्ष पुरानी भाषा और बोलचाल को भूल गए। उनकी सभ्यता और संस्कृति अपने परिवर्तित रूप में, भिन्न दिखाई देने लगी। उनका अपनी मूल भूमि से विच्छेद इस परिवर्तन को प्रगाढ करता गया और आज ये दो पृथक- पृथक सभ्यताओं के रूप में हमारे समक्ष हैं।’

भारत और चीन के पारस्परिक जातिंगत सम्बन्धों के विषय में महाभारत का एक प्रसंग देखिए जब शांति पर्व में महाराजा युधिष्ठिर भीष्म पितामह से प्रश्न करते हैं, ‘यवन, किरात, गान्धार, चीनी, बर्बर आंध्र, शक, पल्लव, भद्रक, पौण्डू, पुलिन्द, अरट्ट, काच और म्लेच्छ जातियां जो कि चार वर्षों के संकरत्व से उत्पन्न हुई हैं, किस प्रकार धर्माचरण करेंगी? इन्हें किस प्रकार नियन्त्रण में रखा जा सकता है।’ स्पष्ट है। इन सब देशों को भारतीयों ने ही बसाया और कालान्तर में उनकी पृथक स्थिति बनती गई। संस्कृत-साहित्य में चीन शब्द का प्रयोग अनेकों स्थानों पर उपलब्ध है।

महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘शाकुन्तल’ में चीन देश से आए वस्त्रों का जहाजों के पालों के रूप में उपयोग का वर्णन किया है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि उन दिनों चीन से वस्त्र-व्यापारिक सम्बन्ध था। महाकवि रघुनन्दन के भी अपने ग्रन्थ ‘यात्रातत्व’ में ऐसे सन्दर्भ प्राप्त हैं ।

ईरान से सम्बन्ध

चीन के अतिरिक्त ईराननहै। ईरान का पुराना नाम ‘आर्य स्थान’ था। वहां भी सर्वप्रथम आर्य लोग ही जाकर
बसे। पारसियों के ग्रन्थ ‘जिन्दावस्ता’ में आर्य शब्द का उल्लेख मिलता है। ‘जिन्दावस्ता’ पारसियों का ईश्वरीय ज्ञान -ग्रन्थ है इसके कुछ वाक्य देखिए : ‘मज्दा के द्वारा प्रांप्त आयों की ख्याति के कारण।’ ‘हम आयों की कीर्ति के प्रति आहुति प्रदान करते हैं।” ‘आयों की महिमा के कारण प्राप्त।” प्राचीन ईरानी लोग अपनी उत्पत्ति आयों से ही मानते हैं। महाभारतकाल तक भारत और ईरान के घनिष्ठ सम्बन्ध थे। ईरानियों की भी मातृभूमि भारत थी। यही कारण है उनके विश्वास, विचार और क्रियाओं का निर्माण भारतीय सभ्यता के आधार पर हुआ। पारसी धर्मग्रन्थों की बहुत सी बातें स्पष्ट रूप से वेदों से ग्रहण की गई हैं। ‘अहुर मज्दा’ असुर मेघा का अपभ्रंश नहीं तो और क्या है? ‘जेन्द’ भाषा की जननी वास्तव में संस्कृत ही है। निम्न शब्दों में देखिए कितनी समानता है। वहां पर भी प्रागैतिहासिक काल के कुछ शब्द ऐसें भी मिलते हैं जिनका प्रयोग दोनोंभाषाओं में एक ही प्रकार किया जाता है। ये शब्द हैं :- पशु, गन्धर्व, वायु, दूर, खर, वैद्य, गाथा इत्यादि।

यूनान से सम्बन्ध

ईरानी सभ्यता की ही तरह यूनानी सभ्यता का भी उद्गम वैदिक सभ्यता से ही स्थापित होता है। महाकवि होमर के काव्य ‘इलियड’ की रचना रामायण के आधार पर की गई। इस ग्रन्थ का आधार बाल्मीकि रामायण है। दोनों ग्रन्थ महाकाव्य है और दोनों में अद्भुत समानता है। इसमें राम को मैनिलस, सीता को हैलन दशरथ को आर्गस, रावण को हैक्टर के रूप में रखकर देखिए तो दोनों ग्रन्थों के कथानकों में अद्वितीय साम्यता मिलेगी। राम और लक्ष्मण का भ्रातृ- प्रेम, सीता- समान मैनिलस की पत्नी हैलन का रावण रूपी हैक्टर द्वारा चुराया जाना सिद्ध करता है कि ‘इलियड’ रामायण का यूनानी संस्करण है होमर ने रामायण की विस्तृत लोकप्रियता से प्रभावित होकर इसके आधार पर ‘इलियड’ की रचना की। यूनान के दार्शनिक विचार भारतीय दर्शन-चिन्तन से साम्यता रखते हैं। हेरोडोटस, यूसेवियस, जेनोफेन्स, अरिष्टोफेन इत्यादि दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित यूनानी दर्शन पर भारतीय दर्शन की गहरी छाप है।

मिश्र से सम्बन्ध


अनेकों यूरोपीय विद्वानों का मत है कि मिश्र की सभ्यता को आयों की सभ्यता ने प्रभावित किया। इन विद्वानों में बेसिस ब्रिज और जर्नस्ट्रंशना के नाम उल्लेखनीय हैं। मिश्र के मन्दिरों की रचना भारत के प्राचीन मन्दिरों के समान की गई। मिश्र के बहुत से देवी-देवता वैदिक सभ्यतानुसार हैं। वहां के विद्वानों का विचार है कि मिश्र का धर्म भारतीय पद्धतियों पर अग्रसर है और उसके विभिन्न रूपोंमें भारतीयता की छाप है।

असीरिया से सम्बन्ध

लगभग i00 वर्ष पूर्व कुछ चाल्डी-साहित्य-ग्रन्थ मिले हैं। पुरातत्ववेत्ता इन ग्रन्थों को ईसा से 4000 वर्ष पुराने मानतें हैं। जिस इतिहासकार ने इन्हें 4000 वर्ष ई पूर्व माना है वह ऋग्वेद को 2500 ई० पूर्व का मानता है।. उसने कहा है कि ऋग्वेद के कुछ मन्त्र चाल्डी साहित्य पर आधारित हैं। इतिहासकार की यह धारणा भ्रामक है क्योंकि ऋग्वेद में वर्णित उपासना और प्रार्थना की पद्धतियों और प्रयुक्त शब्दों के अपभ्रंश चाल्लडी साहित्य में प्रचुरता से उपलब्ध हैं। यदि ऋग्वेद चाल्डी साहित्य से प्राचीन न होता तो उसके मन्त्रों के अपभ्रंश चाल्डी साहित्य में कैसे मिल सकते थे वास्तव में देखा जाए तो चाल्डी साहित्य का आधार भी ऋग्वेद ही है। असीरियन सभ्यता का विकास भी भारतीय शब्दों के आधार पर हुआ। उक्त स्पष्टीकरणों के आधार पर सप्रमाण कहा जाएगा कि भारत का इतिहास आरम्भ हुए हजारों वर्ष व्यतीत हो चुके, इस देश की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं से भी पुरानी है। वेद विश्व का संबसे प्राचीन साहित्य है। आर्य जाति सबसे प्राचीन सभ्य जाति है। आर्य विश्व के विभिन्न भागों में भ्रमणार्थ जाकर फैले और बस गए। उन्होंने आर्यजाति की सभ्यता को दिगदिगंत में फैलाया। इस सभ्यता ने विश्व की अन्य सभ्यताओं को प्रभावित किया, उनके रूप परिवर्तित किए और सभ्यता के नए मार्ग सुझाए। योरोप और एशिया में, विभिन्न देशों में इस सभ्यता का विस्तार हुआ। यह विस्तार होने पर समय, काल और स्थान के आधार पर उनके रूप परिवर्तित हुए।

आरम्भ में जो एक आर्य-सभ्यता थी, उसमें विभिन्न धर्म-सम्प्रदायों के फैलने से अन्तर आते गए। इस्लाम और ईसाई धर्म की जो बाढ़ें आई उनमें आर्य सभ्यता की एकरूपता बह गई। कुछ प्राचीन सभ्यताएं नष्ट होती गईं। मिश्र, असीरिया औरनबेबीलोनिया की सभ्यताओं का तो नामोनिशान भी इतिहास के पन्नों पर शेष रह गया। उनके निर्माण के कुछ चिह्न भी उपलब्ध हैं। मिश्र की सभ्यता में जिन पिरामिडों का निर्माण किया गया है, उनके अवशेष मिलते हैं और वे आज विश्व के सात आश्चरयों में से एक हैं। मिश्र के वर्तमान निवासियों का मिश्र की उस पुरानी सभ्यता से कोई नाता-सम्बन्ध नहीं है। उनके देवी-देवता भी खुदाई के अवशेषों में ही प्राप्त होते हैं। असीरिया’ और बेबीलोनिया की सभ्यता के अवशेषों का भी यही हाल है ।नउन्हें पुरातत्व विभाग की विषय-सामग्री माना जाता है। यूनान और रोम की सभ्यताएं भी विकसित होकर नष्ट हो गईं| प्रकृति की जिन शक्तियों को देवी-देवता के रूप पूजा गया, उनके प्रति आज के वैज्ञानिक युग में आस्था नगण्य है ।


प्राीन सभ्यता के विकास, ह्रास और विनाश-काल से होकर भारतीय सभ्यता भी गुजरी। भारत की प्राचीन सभ्यता ने भी अपने ये उत्थान- पतन के वर्ष गुजारे, परन्तु अपने अस्तित्व का विनाश नहीं होने दिया। विभिन्न परिवर्तनों की टक्करें खाकर भी वह प्राणवान है, स्थायी है। भारत में वैदिक धर्म और संस्कृति को सर्वजनीन मान्यता प्राप्त है। वेदों, अन्य प्राचीन ग्रन्थों, पुराणों इत्यादि को आज भी आदर और सम्मान से देखा तथा पढा जाता है। उपनिषदों और गीता में जन-जन की आस्था है। आर्य धर्म, सभ्यता और संस्कृति आदरणीय है।

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