Vedic literature and society
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वेदकालीन साहित्य और समाज

वेदकालीन साहित्य और समाज

वैवस्वत परम्परानुसार राजवंशों की 95 पीढ़ियों का उल्लेख प्राप्त होता है। इन राजवंशों की 36 पीढ़ियों के समाप्त होने पर वैदिक मन्त्रों का निर्माण- कार्य आरम्भ हुआ। यह कार्य ऋषियों की एक परम्परा को सौंपा गया। जो मन्त्र-श्रुति द्वारा चले आ रहे थे, उनका संकलन कर वेदों का रूप दिया गया । वैदिक मन्त्रों के संकलन का नाम संहिता है। ये संहिताएं आज भी अपने पूर्व रूप में ही विद्यमान हैं। वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद के प्रधान ऋषि गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वशिष्ठ हैं । ये ऋषि सात मण्डलों से सम्बन्धित हैं। आठवें मण्डल के कण्व और आंगिरस हैं। सूत्रों के निर्माता वैवस्वत मनु, शिव औषीनर, पतर्दन, मधुछन्दा और देवापि हैं।

ऋग्वेद में मानव-जीवन को आनन्द और अल्हादपूर्ण कहा गया है। इसके रचना- काल के विषय में विद्वानों के पृथक-पृथक विचार हैं। लोकमान्य तिलक ने इसे 8000 वर्ष पूर्व रचित माना है। ग्रन्थ की भाषा सुन्दर एवं सुसंस्कृत है। ग्रन्थ में जिस सभ्यता का वर्णन उपलब्ध है वह उसके वर्णित निर्माण-काल से बहुत पुरानी है। उस उच्च कोटि की सभ्यता को विकसित होने में अनेक शताब्दियां व्यतीत हुई होंगी।

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ऋग्वेद

ऋग्वेद में लिखा है कि आर्य लोग भारत के उत्तर में आकर गंगा-जमुना के दुआबे में बस गए। इसमें यमुना नदी के तटव्ती वनों, पक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों के सौन्दर्यं का वर्णन है। इन मन्त्रों में वितस्ता, अस्किनिी, परुष्णी नदियों का अनेकों बार उल्लेख है। ये नदियां पंजाब की वर्तमान झेलम, चिनांव, रावी, सतलज और
व्यास नदियां हैं। ऋग्वेद में प्रकृति के अन्य वर्णन भी उपलब्ध हैं। इसमें आर्य तथा अनार्य दोनों की सभ्यता का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसमें आयों के युद्धों और उनकी विजयों का भी वर्णन है। आयों के उत्कृष्ट जीवन पर भी प्रकाश डाला गया है। आयों और अनायों के पारस्परिक संघर्ष का भी अनेकों स्थानों पर वर्णन मिलता है। अनायोँ की निम्न वर्ण की जातियों का भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि आर्य कई जनों में विभक्त थे। गन्धार और उशीनर ऐसे ही जन थे, जिनका उल्लेख ऋचाओं में आता है। ऋग्वेद की ऋचाओं में आर्यों तथा अनायों के विभिन्न सम्पर्कों के भी कुछ अनायों का जीवन भी उच्च स्तर का था, परन्तु उसे आयों की वृत्तान्त उच्चता के समान नहीं माना जा सकता। आयों का जीवन-दर्शन अनायों के जीवन- दर्शन से सर्वथा भिन्न प्रकार का था।


आयों और अनारयों में जो संघर्ष हुआ, उसमें अनायों को प्रत्येक क्षेत्र में पराजय का मुख देखना पड़ा। यह संघर्ष चिरस्थायी न रह सका। अनायों को पराजय स्वीकार करनी पड़ी। वे अधिक समय तक पारस्परिक संघर्ष की स्थिति में बने नहीं रह सकते थे। वे धीरे-धीरे आयों के दास बनते गए, विश्वास किया जाता है कि जो आज निम्नवर्ग की जातियां मिलती हैं, वे उन्हीं अनायोँ की सन्तानें हैं। कुछ समय बाद दोनों जातियां नित्य के जीवन-यापन में घुलमिल कर एक हो गई क्योंकि दोनों को अपना’ जीवन-यापन एक ही भूमि पर रहकर करना अभीष्ट था। उनका पारस्परिक ऊंच-नीच का भाव भी धीरे-धीरे कम होता गया। दोनों की संस्कृति भी एक रूप में विकसित होने लगी आर्य सभ्यता ने अनार्य-सभ्यता को आत्मसात कर लिया। वैदिक ऋचाओं में कुछ तत्व तो ऐसे अवश्य मिलते हैं, जिनसे ऐतिहासिक ज्ञान प्राप्त होता है, परन्तु वह पर्याप्त नहीं है, फिर भी जो साधन. उपलब्ध हैं, उनसे स्पष्ट है कि जीवन-निर्वाह के दो प्रमुख साधन थे, एक कृषि और दूसरा पशुपालन। यहां का मौसम सुहावना था, न बहुत गर्म, न बहुत ठण्डा। आर्य क्योंकि
ठण्डे प्रदेश से यहां आए थे, इसलिए उन्हें यह रुचिकर लगा उनके लिए यह सर्वथा अनुकूल था। न यहां रेगिस्तान थे, न अधिक घने जंगल। समय-समय पर वर्षा होती थी, डाक्टर बेनीप्रसाद ने लिखा है, ऋग्वेद-काल में जैसा आनन्द और उल्लास-भाव जन-जीवन में था वैसा भारत में फिर कभी नहीं देखा गया। आर्य लोग प्रेम और प्रसन्नता से अपना जीवन व्यतीत करते थे । न किसी को परलोक की चिन्ता थी, जप-तप का विचार भी किसी के मन में नहीं आता था। सब अपने-अपने वर्तमान से सन्तुष्ट थे खान-पान की उपलब्धि में कोई बाधा न होने के कारण सब मग्न थे। मांस खाने की प्रथा आम लोगों में फैल चुकी थी। सुरा और सोमरस का सेवन किया जाता था। समाज में कुरीतियों का भी दौर था। सुरा-पान के साथ जुआ खेलने की भी बहुतायत थी आम घरों में, चौपालों पर जुआ खेला जाता था नाच-गानों की भी मंडलियां थीं। उनसे मनोरंजन किया जाता था। स्त्री-पुरुष खुले मैदानों में नाच-गानों का आयोजन करते थे। सब एक साथ मिलकर आनन्द-लाभ करते। संगीत के क्षेत्र में समाज पर्याप्त उन्नति कर चुका था। विविध प्रकार के संगीत-आयोजन सम्पन्न होते। गायन-विद्या ने प्रमुख कला का रूप ले लिया था। वाद्य यन्त्रों में सितार, बांसुरी, ढोल इत्यादि का प्रयोग प्रचलित था रथों की दौड़ भी हुआ करती थी और इसमें अच्छे बैल पालने वाले भाग लेते थे।

यजुर्वेद

यजुर्वेद दो प्रकार का है, शुक्ल यजु्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है। इसकी दो शाखाएं हैं कण्व और माध्यंदिनी , कृष्ण यजु्वेद को चार शाखाओं में विभाजित किया गया है। वाजसनेयी संहिता को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। आचार्यगण वास्तव में उसे ही यजुर्वेद की संज्ञा देने लगे हैं। वही सबसे वृहद भी है और अन्य अंशों का सारांश भी उसमें आ जाता है।

सामवेद

सामवेद की तीन शाखाएं हैं। इनमें कौथुम शाखा सबसे महत्त्वपूर्ण है, और उसी का अधिक प्रचलन भी है। सामवेद में बहुत से ऐसे मन्त्र भी हैं जो ऋग्वेद में भी मिलते हैं। सामवेद के मन्त्र गाये गए हैं। उन्हें गीतों के रूप में गाया जा सकता है ।

अथर्ववेद

अथर्ववेद की दो शाखाएं हैं। इसकी शौनक शाखा अधिक प्रामाणिक है।

वेदों में ऐतिहासिकता

वेदों के रचना-काल के विषय में निश्चत प्रमाणयुक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। धर्म के क्षेत्र में इन्हें अनादि कहा गया है, जिसे भावनात्मक मान्यता ही कहा जाएगा। फिर भी वेदों की प्राचीनता असंदिग्ध है ये आयों के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। इनमें दिए गए विवरण इनकी प्राचीनता को सिद्ध करते हैं। उन्हीं से इनके निर्माण काल के विषय में अनुमान लगाया जा सकता है। कुछ मन्त्र ऐसे भी हैं जिनमें कुछ दृष्टयन्त निर्माण-काल की सूचना उपलब्ध कराते हैं। दृष्टान्तों के विवरणों के संकेत लगभग स्पष्ट हैं। चारों वेदों में 20,379 मन्त्र हैं। कुछ वैदिक ऋचाओं में कुछ मनुष्यों और कुछ घटनाओं का विवरण है। यदि वेद अनादि काल के होते तो उनके अन्दर इन सब विवरणों का होना असम्भव था। यह तथ्य वेदों के अनादिकालीन होने की कल्पना को निरस करता है। यह काल-क्रम स्पष्ट प्रमाणित करता है कि वेदों की रचना का कोई काल है, जिसका निश्चित संकेत न मिलने के कारण वास्तविकता पर पहुंचना कठिन हो गया है।

ऋग्वेद

वेदों में ऋग्वेद सबसे पुराना है। उसी में वेदों का विस्तार से वर्णन है। ऋग्वेद में दस मण्डल हैं। विस्तार में प्रथम और दसवें मण्डल अन्य सबसे बड़े हैं। इनमें से प्रत्येक मण्डल में बहुत से सूक्त तथा प्रत्येक सूक्त में बहुत सी ऋचाएं हैं। ये सूक्त छोटे और बड़े, दोनों प्रकार के हैं । इनमेंअधिक-से-अधिक चौदह ऋचाएं हैं परन्तु एक सूक्त ऐसा भी है जिसमें 52 ऋचाएं हैं। ये सभी सूक्त छन्दों में लिखे गए हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में 191 सूक्त हैं। इन सूक्तों के 25 कवि ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में ऋषियों के अतिरिक्त निम्नलिखित मनुष्यों केभी नाम आते हैं। जैसे मनु, नहुष, इला, ययाति, पुरुरवा, दिवोदास, रस, उग्रदेव, यदु, वशिष्ठ, वसु, कलि, विश्वक इत्यादि परन्तु विशेष रूप से देवताओं का ही वर्णन है। इन वर्णनों में पुनरावृति बहुत अधिक मिलती है। उक्त नामों में अनेकों पौराणिक कथाओं के पात्रों के नाम भी आ जाते हैं। ये नाम ऐतिहासिक खोज की दृष्टि से विशेष उपयोगी हैं। कुछ मनुष्यों के नाम ऐसे भी में कोई कथा नहीं है।

ऋग्वेद में कुछ ऐसे अनायोँं के नामों का भी उल्लेख है, जिनसे आयों को युद्ध करना पड़ा। इन नामों का पौराणिक साहित्य में भी उपयोग मिलता है। ऋग्वेद के मन्त्रों से तत्कालीन सामाजिक स्थिति का भी ज्ञान प्राप्त होता है। उनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर किया गया है। इस मण्डल में आयों के पांच मुख्य दलों का भी उल्लेख मिलता है, ये दल थे : यदु, तुर्वसु, अनु, द्रुह्य और पुरु। ऋग्वेद में अनायोँ के लिए कटु भाषा का प्रयोग मिलता है क्योंकि आयों को अनायों से कटु प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। आदिवासियों ने एक- एक इंच भूमि के लिए कटु संघर्ष किया था ये आदिवासी वेदों को नहीं मानते थे, परन्तु सभ्यता इनकी पर्याप्त उन्नत थी । इनके पास अपने किले भी थे इन्हें दास, दस्यु आदि नामों से पुकारा जाता था। वेदों में हर स्थान पर इनकी पराजय का ही वर्णन है। अनायोँ पर आयों के किए गए अत्याचार भी इनमें दिखाए गए जिनके विषय ऋग्वेद काल में जंगल अधिक थे। जमीन को कृषि-योग्य बनाने के लिए जंगलों को जला दिया जाता था। खेती ही मुख्य रूप से जीवन-चालन का साधन था। रथों का उपयोग सवारी के लिए किया जाने लगा था। रथों पर बैठकर सैनिक वीर युद्ध करने जाते थे सेनाओं का वर्णन किया गया है, उनके हथियारों का भी। यज्ञों की प्रथा थी। अश्वमेष यज्ञ का भी जिक्र आता है। जहां नदियों का वर्णन किया गया है। उसमें सतलुज, व्यास, रावी, चिनाव, झेलम के नाम आते हैं। सिंधु नदी का भी उल्लेख मिलता है। यह स्पष्ट करता है कि उस समय आर्य लोगों का विस्तार मात्र पंजाब तक सीमित था। गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा इत्यादि के नाम का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। ऋग्वेद का प्रथम मण्डल पर्याप्त विस्तृत है। उसमें वर्णों के रूप में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि का उल्लेख नहीं मिलता। आर्य और दस्यु, दो ही नाम का प्रयोग मिलता है। सुर शब्द देवताओं के लिए आता है।

ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में प्रधान रूप से इन्द्र की विजयों का वर्णन है। इसके रचना-काल में आयों के राक्षसों, असुरों और दस्युओं से निरन्तर युद्ध होते रहते थे। इसमें अनेक दुर्गो के ध्वस्त होने के वृत्तान्त हैं। तीसरा मण्डल विश्वामित्र का है उनके साथ कुछ अन्य ऋषियों का भी। विश्वामित्र और वशिष्ठ की शत्रुता, जमदग्नि का विश्वामित्र की सहायता करना, विश्वामित्र का सुदास के साथ रहना इत्यादि प्रसंग इसमें हैं। इसके अन्दर विश्वामित्र और जमदग्नि सम्बन्धी उल्लेखों से पौराणिक कथाओं की पुष्टि होती है। चौथे मण्डल के ऋषि गौतम-पुत्र वामदेव हैं। इसमें 58 सूक्त हैं। इसमें अग्नि और इन्द्र की स्तुति है। इन्द्र ने मृगय और विप्र के 50,000 सहायकों को मौत के घाट उतार दिया था। सरयू के किनारे भयंकर युद्ध में अर्म और चित्रथ का भी संहार किया। इसमें राजा पुरु का भी उल्लेख मिलता है। पांचवें मण्डल में 87 सूक्त हैं। इसके सूक्तकार अत्रिवंशी ऋषि लोग हैं। इसमें अग्नि, इन्द्र, विश्वेदेवस, मरुत, मित्रावरुण और आश्विन का वर्णन किया गया है। अग्नि ने शुन:शेफ की रक्षा की। पुरांणों में सूर्यवंशी राजा हरिश्चन्द्र के काल में शुन:शेफ के विषय में लिखा है। इसमें रावी नदी के किनारे रहने वाले कुछ लोगों का वर्णन है।

छठे मण्डल में मुख्यतया भरद्वाज ऋषि का ही वृत्तान्तं है। इसमें 75 सूक्त हैं। इनमें से 46 अकेले भरद्वाज ने गाये हैं इसमें इन्द्र, अग्नि इत्यादि की स्तुति है। इसमें ऐतिहासिक सामग्री की प्रचुरता है। इसके एक सूक्त में मात्र गौओं का ही वर्णन है। इसमें सरस्वती और पंजाब की अन्य नदियों का भी वर्णन है। सातवें मण्डल में 104 सूक्त हैं। इसमें कुछ लोगों में एका करके सुदास से युद्ध ठाना परन्तु पराजित हुए और पीठ दिखाकर भागना पड़ा। नहन निकालने के प्रयास में सुदास के शत्रु नदी में डूब गए। डूबने वालों में द्रुह्यवंशी थे। सुदास की आयों ने मदद की थी। उसने अनु वो हराकर उसका राज्य वस्यु को दिया। इसमें वृहद युद्ध का वर्णन है जिसमें अनेकों वीरों ने वीरगति प्राप्त की। सुदास के युद्ध के समय पुरुवंशी सरस्वती के दोनों तटों पर रहते थे। सदास अयोध्या के राजा थे। उनके पिता का नाम दिवोदास था। पुराणों में सुदास के पिता का नाम सर्वकाय लिखा है। सम्भवत: सर्वकाय दिवोदास का उपनाम आठवें मण्डल में 92 सूक्त हैं। इसके बहुत से ऋषि हैं। इनमें 11 सूक्त और मिलाकर 103 बन जाते हैं । इसमें गाय को निष्पापिनी कहा गया है। कहा गया है कि गाय को कभी भी क्िसी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहिए। इसमें श्रुतुवर्ण आदि की उदारता का वृहद वर्णन है। जिन भार्गव लोगों का सदास से युद्ध हुआ वे इन्हीं भृगुवंशी राजाओं में से थे। इसमें 33 देवताओं के नाम का उल्लेख है। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता का नाम भी इसमें आया है। वेदों में परशुराम का नाम नहीं मिलता। राजा कुरुंग का नाम मिलता है। नहुष वंशियों के विषय में लिखा है कि उनके पास बहुत अच्छे प्रकार के घोड़े थे। प्रदाकु साम यज्ञ का कर्ता था। श्रुतर्वण ने रावी नदी के किनारे पर यज्ञ किया। इसमें गोमती नदी का नाम भी आया है।

नवें मण्डल में 114 सूक्त हैं। मधुच्छंदा इसके मुख्य ऋषि हैं। कुछ अन्य ऋषियों के नामों का भी उल्लेख मिलता है । ययाति, मनु और नहुष के नामों का भरद्वाज के साथ उल्लेख है। उत्तर-पश्चिम में जो अनार्य जाति रहती थी उसका नाम आरजीक था। इस मण्डल में सिंह, धनुष और सप्त ऋषि के वर्णन मिलते दसवें मण्डल में 191 सूक्त हैं। इनके इतने ही ऋषि हैं। इसमें बहुत से राजा भी सूक्तकार हैं। जिन राजाओं के नाम आए हैं, उनमें विवस्वान, गय, पुरुरवा, राम, लव इत्यादि प्रमुख हैं। ऋषियों में कई देवताओं के नाम भी दिए गए हैं। इनमें शिव और जय प्रमुख हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि इक्ष्वाकुवंशीय भगवान राम और उनके पुत्र लव के अतिरिक्त ये दोनों व्यक्ति उन्हीं के नामके अन्य ऋषि गण हैं। सम्भव है राम के समय के कुछ मन्त्र भी इसमें बाद में सम्मिलित किए गए हों। इस मण्डल में देवताओं की स्तुतियों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी सूक्त हैं। इन विषयों में तात्कालिक सामाजिक दशा का भी वर्णन आता है। जल, पितृ, मृत्यु, गाय, कृषि, जीवात्मा, पुनर्जीवन इत्यादि पर भी विचार प्रस्तुत किया गया है। इस मण्डल में दस्युओं के अस्तित्व पर भी प्रकाश डाला गया है।

विशेष इतिहास-सूक्त उपलब्ध होते हैं। दुहश्शासु एक शत्रु राजा था जिसने कुरु श्रवण को परास्त किया। दिवोदास से युद्ध में गांगव परास्त हुए। इस मण्डल में गंगा और यमुना के भी नाम आए हैं। पुरुरवा की स्त्री उर्वशी थी और राजा उससे बहुत प्रेम करते थे, यह वृत्त भी इसमें आया है। उर्वशी के विषय में कहा गया है कि उसका प्रेम राजा के प्रति उतना नहीं था। शान्तनु को वैदिक काल के शान्तनु महाभारत-काल के शान्तनु से भिन्न इस मण्डल में कुछ देवापि ने यज्ञ इस मण्डल में जल की विशेष महिमा का बखान है। उसे शक्तिदायक तथा पुत्रोत्पादक और स्वास्थ्यवर्धक कहा गया है। पानी में सब औषधियों का सार माना गया है। ऋग्वेद में वर्णित घटनाओं से जो विशेष ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है उससे कोई क्रमबद्ध इतिंहास नहीं लिखा जा सकता परन्तु पुराणों में लिखी सामग्री की पुष्टि होती है। वेदों और पुराणों की सामग्री को समन्वित करके शुद्ध इतिहास की रचना करना सम्भव है। कुछ विद्वानों ने ऐसा प्रयास किया भी है और उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। शुद्ध गवेषणा के शुभ परिणाम सामने आएंगे।

सामवेद

सामवेद के दो भाग हैं। पहले भाग के 6 काण्ड और दूसरे के 9 हैं। इनके प्रत्येक काण्ड की कई-कई कण्डिकाएं हैं। उन्हें सूक्त भी कह सकते हैं। इसमें कुल 459 सूक्त हैं। इनमें से कुछ सूक्तों को छोड़कर शेष सभी सूक्त ऋग्वेद में मिलते हैं। इस ग्रन्थ की विशेष बात यह है कि इसमें सोमपवमान का वर्णन मिलता है। इन्द्र, अग्नि, उषा, आश्विन इत्यादि का भी कुछ वर्णन मिलता है। जल, वात और वेन के विषय में भी कुछ मन्त्र हैं। इस वेद की कुछ ऋचाएं वैवस्वत मनु की स्वय लिखी हुई हैं। दधीचि की अस्थियों से वज्र बनाया गया था। उन्हें वेदों में अथर्वण ऋषि के पुत्र तथा पुराणां में एक राजा के रूप में लिया गया है। इसमें कुछ ऋचाएं नहुष, ययाति, मनु, अम्बरीष इत्यादि की भी दी गई हैं। सोमपवमान के कारण या यह कहिए कि उनकी कृपास्वरूप दिवोदास ने शम्बर, यदु और तुर्वश को पराजित किया था।

सामवेद में ईश्वर का वर्णन विश्वकर्मा, स्कन्द प्रजापति और पुरुष के नाम से वर्णित, है। इन्द्र, अग्नि और सूर्य से भी इंश्वर का रूप प्रकट होता है। इसमें मनुष्य का, जीवन-काल 100 वर्ष बताया है। कहीं-कहीं उसमें कुछ वर्षों की वृद्धि, का भी आभास मिलता है। वहां 100 के स्थान पर 120 कहा गया है।

यजुर्वेद

यजुर्वेद में विशेष रूपं से यज्ञों का वर्णन है और उनके विषय में व्यापक ज्ञान- विस्तार है। आरम्भ में वेद नाम से ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद ही जाने जाते थे। यजुर्वेद की रचना सम्भवत: ऋग्वेद से 100 अथवा 200 वर्ष पश्चात् की गई। इसके दो विभाग हैं, शुक्ल और कृष्ण। इस वेद के 40 अध्याय और उनमें 2000 छन्द हैं। विद्वानों का मत है कि वेदों की रचना लगभग 1500 वर्ष तक होती रही थी। यह रचना लगभग 2500 वर्ष पूर्व समाप्त हुई। आर्य लोग आरम्भ से ही यज्ञ में आस्था रखते आए हैं। इससे यजुर्वेद की प्राचीनता में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। इसमें विभिन्न प्रकार के यज्ञों और उनकी विधाओं का सविस्तार वर्णन है। इसके पहले दस अध्यायों में नवेन्दू. पूर्णेन्दु, अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, वाजिपेय, राजसूय आदि यज्ञों का वर्णन है। 11 से 18वें अध्याय तक यज्ञ की वेदियों के निर्माण का सविस्तार वर्णन किया गया है। इनमें यज्ञों के विधान पर भी प्रकाश डाला गया है। 19 से 31वें अध्याय में सोत्रामणि यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ, चान्द्र यज्ञ और नरमेध यज्ञ का विधान प्रस्तुत किया गया है। 32 से 35वें अध्याय तक सर्वमेध यज्ञ और पितृयज्ञ का वर्णन है। 36वें अध्याय में देवताओं से दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थना है। इसमें देवताओं की अनेकों प्रकार स्तुति की गई है। 39वें अध्याय में प्रवर्ग का विधान मिलता है। 40वां अध्याय एक उपनिषद् है। उसमें ईश्वर का बहुविध वर्णन किया गया है। इसकी कुछ ऋचाएं ऋग्वेद से ली गई हैं तथा कुछ अथर्ववेद से। इसके अन्तिम पांच अध्याय दधीचि द्वारा लिखित हैं तथा शेष सब अन्य देवताओं द्वारा। इनमें कुछ ऋषियों द्वारा लिखित भी हैं यज्ञों की महिमा बढ़ाने के लिए इन्हें अधिकतर मनुष्यकृत न बताकर देवोकृत कहा गया है। इस वेद में ऋक् और साम, दोनों के नाम का उल्लेख है। विष्णु की महिमा का ऋक् की अपेक्षा अधिक गुणगान, किया गया है। इसमें रुद्र की भी महिमा कां प्रावधान है। रुद्र को शिवशंकर महादेव कहा गया है। इसमें अम्बा अम्बिका और अम्बालिका के नाम भी मिलते हैं परन्तु इनको महाभारत की पात्राओं से जोड़ना भूल होगी। इनके और उनके सन्दर्भ समान नहीं हैं। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र नामों का भी उल्लेख है। इसमें मागध नाम आने से स्पष्ट है कि उस समय तक मगध का अस्तित्व कायम हो चुका था। इस काल तक आते-आते दासों के प्रति सहिष्णुता में वृद्धि हुई थी क्योंकि इसमें आरयों और दासों के विषय में लिखा है कि वे दोनों ही ईश्वर की सन्तानें हैं। ऋग्वेद-काल में हमें यह समभाव नहीं मिलता।

अथर्ववेद

अथर्ववेद में ऐतिहासिक सामग्री के साथ-साथ मन्त्रादि का भी सविस्तार वर्णन है। इससे यह भी पता चलता है कि आर्य निरन्तर विकासशील थे और उनकी सभ्यता व्यापक क्षेत्र ग्रहण करती जा रही थी। सूर्य, इन्द्र और अग्नि में ईश्वर का भाव दर्शाया गया है। इस समय तक आते-आते गाय का महत्त्व बढ़ गया था गाय की पूंछ और उसके खुरों की पूजा की जाने लगी थी। स्त्री को गृहस्वामिनी कहा गया है। उसका स्नेहाधिकार पति, पुत्र तथा पूरे परिवार पर है। उसे घर की सम्पत्ति की रक्षिका कहा गया है। वह घर की सम्पूर्ण व्यवस्था को नियन्त्रित रखती है। स्त्रियों के विषय में जो भाव उस समय था, वहआज तक ज्यों- का-त्यों हिन्दुओं में बना हुआ है। इसमें जादू, टोना, मन्त्र इत्यादि का भी उल्लेख है, जो अन्य है। अथर्वण एक ऋषि थे। उन्होंने लकड़ी को रगड़कर अग्नि प्रज्वलित की थी। ऋग्वेद में ब्राह्मणों की वह महिमा नहीं वर्णित की गई जो अथर्ववेद में है। आयुर्वेद की उत्पत्ति अथर्ववेद से ही हुई। ऋग्वेद में लिखा है कि अंगिरसवंशी मायावी में कहीं नहीं मिलता। यह अंगिरस वंशी ऋषियों द्वारा भाषित अथर्ववेद में 20 काण्ड और 160 सूक्त हैं। इसमें 6015 छन्द हैं। इसमें झाड़ने- फूंकने का भी विधान है। आ्यों की सभ्यता में द्यूत क्रीडा मनोरंजन का बहुत प्रोचीन साधन माना जाता था इसका महाराजा युधिष्ठिर और नल के प्रसंगों में जिक्र आता है। ब्राह्मणों के प्रति सम्मान-भाव और उनकी श्रेष्ठता इसी सूक्त से प्रकट होती है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी स्त्री को दस अब्राह्मण चाहें और उसी को एक ब्राह्मण चाहे तो वह ब्रांह्मण होगी इसमें इन्द्र द्वारा अनेक राक्षसों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है। उसने दधीचि की हड्डियों से बने अस्त्र से 19 वृत्तों का विनाश किया था।

वेदकालीन समाज-व्यवस्था

वेदों से हमें उनके रचना-काल के समाज और इतिहास का व्यापक ज्ञान प्राप्त होता है। उनका साहित्यिक महत्त्व भी है क्योंकि उनसे हमें उस काल के जीवन इतिहास, धर्म, समाज और व्यक्ति का परिचय मिलता है। यह हमारा प्राचीनतम साहित्य, इतिहास और समाज है जो वेदों में आद्योपान्त भरा पड़ा है। ऋग्वेद में हमें प्राचीनतम पद्य और यजुर्वेद में प्राचीनतम गद्य दिखाई देता है। वेदों में प्रधान रूप से देवताओं को चित्रित किया गया है फिर भी उनमें आभास ईश्वर का ही मिलता है। सूर्य, इन्द्र और अग्नि में जो शक्ति निहित है, वह ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी में नहीं हो सकती।

आयों ने जहां आकर आवास ग्रहण किया, उसका नाम सप्तसैन्धव कहलाता था। इसकी पूर्वीय सीमा पर सरस्वती नदी बहती थी। इस प्रदेश में आता है-पंजाब की पांचों नदियों का भू-भाग तथा सिन्धु और सरस्वती का प्रदेश। वे धीरे -धीरे और आगे बढ़े तथा अवध, काशी तथा मिथिला आदि पर अपना शासन स्थापित कर लिया।

ऋग्वेद के मण्डलों में काल-क्रम निर्धारित नहीं है। उनके रचना-समय में काल-तारतम्य का अभाव है। जो सामग्री उनमें उपलब्ध है वह क्रमानुसार गठित नहीं की गई। सम्पादक ने क्रमबद्ध करते समय रचना-काल का पूरी तरह निरीक्षण नहीं किया। इसीलिए कहीं तीसरे, कहीं सातवें और कहीं दसवें मण्डल में प्राचीनतम सामग्री मिलती है। यदि सम्पादन क्रमिक होता तो दसवें मण्डल में वैवस्वत मनु और तीसरे तथा सातवें मण्डल में राजा सुदास का वर्णन न होता। राजा सुदास का स्थान मनु के पश्चात् 52वीं पीढ़ी में आना चाहिए था।

ऋग्वेद में 33 देवताओं का कथन है, जिसे विश्वामित्र ने 3339 बताया तथा पुराणों ने 33 करोड़। देवियों की महिमा वेदों में कम है। सरस्वती नदी सबसे पवित्र मानी गई। ब्राह्मण काल में देवियों की महिमा का विकास हुआ। सोम जो एक पेय का नाम था, चन्द्रमा का नाम बन गया। वेदों में आयों की कई शाखाओं का उल्लेख मिलता है। ययाति के पांच पुत्रों और उनकी शाखाओं के वर्णन वेदों में हैं इनके अतिरिक्त गान्धार, युज्युवंश, मत्स्य, उशीनर आदि का भी उल्लेख है। तुत्सु रावी नदी के पूर्व में रहते थे। पुरुवंश में राजा दुष्यन्त के पुत्र का नाम भरत था। सब आर्य जातियां उत्तर भारत के विभिन्न भागों में रहती थी शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि पांचाल देश का प्राचीन नाम क्रिव है। वेदों में लिखा है कि पौरव और यादव ययातियों के वंशज थे। ययाति के वंशजों में पौरवों की प्रधानता थी। यह बात वेदों और पुराणों में स्पष्ट बताई गई है। सुदास ने यद्यपि अनेक आर्य तथा अनार्य राजाओं पर विजय प्राप्त की वह पौरवों को पराजित नहीं कर पाया। ऋहग्वेद में इक्ष्वाकु नाम का उल्लेख है परन्तु इसकी सन्तानों का नहीं।

वेदों में आयों और अनायों के सैकड़ों नाम लिए गए हैं दनु वृत्रासुर की माता थी। उसके वंशज दानव कहलाए। वृत्र के इन्द्र ने 100 दुर्ग ध्वस्त किए। इनमें से 99 वृत्रों का वर्णन वेदों में मिलता है। दिवोदास सूर्यवंशी थे। भगवान राम का जन्म आगे चलकर इन्हीं के वंश में हुआ। सूर्यवंशियों को वेदों में तृत्सु कहा गया है। दिवोदास महान विजेता थे। सुदास के युद्धों का वेदों में वही स्थान है जो पुराणों में महाभारत का। सुदास के विरुद्ध राजाओं का एक बड़ा गठबन्धन बना। उसने अनार्य राजाओं की सहायता से सुदास को हराना चाहा। नाहुषों ने रावी नदी के दो टुकड़े करके, नहर निकालकर, नदी पार करनी चाही परन्तु सुदास ने उन पर तुरन्त धावा बोल दिया। इसके परिणामस्वरूप नाहुषों की बहुत बड़ी सेना पानी में डूब गई। भयंकर युद्ध हुआ और सुदास ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की अनु तथा द्रृह्य वंशियों के 66 सेनाध्यक्ष और 6000 सैनिक मारे गए। दानवों का सब सैन्य-सामान लूट लिया गया। वह सामान सुदास ने तृत्सु को दे दिया। सुदास ने युध्यामधि का संहार किया। राजा वंचिन के एक लाख सैनिक युद्ध में काम आए। अनेकों शत्रु राजाओं ने सुदास को कर देना स्वीकार किया। रावी नदी के किनारे का यह भयंकरतम युद्ध था जिसकी
उपमा महाभारत से की जा सकती है। वैदिक आर्य स्वच्छन्द प्रकृति के ऋषि थे। वे अपने निष्कर्ष स्वतन्त्र रूप से निकालते थे। वे अपना किसी को सहयोगी नहीं बनाते थे। वे इस बात की भी चिन्ता न करतें कि उनके निष्कर्ष अन्य ऋषियों के निष्कर्षों से भिन्न हैं। ये ऋषि केवल अपने ही शिष्यों को शिक्षा- दान देते थे। वे युद्ध-भूमि में जाकर अपने शिष्यों का सैन्य-संचालन भी करते थे। उस समय कोई जाति- भेद नहीं था इसलिए कोई किसी भी जाति का व्यक्ति अपने रुचि के अनुसार सैनिक अथवा कुछ अन्य हो सकता था। सामाजिक जीवन व्यवस्थित था। समाज की तीन संस्थाएं थीं।

  1. परिवार-गृह अथवा कुल।
  2. जन-समस्त जाति का बोधक।
  3. राष्ट्र-इसका अर्थ उस समय राज्य था। राज्य का प्रमुख राजा होता था। उसके हाथ में शासन-दण्ड रहता था। प्रजा उसे कर देती। जनता की रक्षा करना उसका दायित्व और धर्म था। उसका पद पैतृक होता था। कभी-कभी उसे निर्वाचित भी किया जाता था। राजा प्रजा के अनुकूल होता था राजा की मन्त्री परिषद् में पुरोहित, सेनानी और ग्रामीण होते थे।

सभा और समिति सार्वजनिक संस्था होती थी। राजा उसे अपने पक्ष में रखता सेना में पैदल, घोड़े और रथ होते थे रथों को घोड़े खींचते थे उन्हें सारथि संचालित करते थे। सैनिक कवच पहनते थे उनके अस्त्र शस्त्र, धनुष-वाण, असि, भाले, गुर्ज अथवा अश्नि होते थे दुर्गों को अस्त्रों से तोड़ा जाता था दुर्गों के बाहर निट्टी के अवरोध होते थे। वस्त्र कई प्रकार के पहने जाते थे। अच्छे कामदार वस्त्रों का भी चलन था। भोजन में प्रमुख रूप से चावल और जो खाया जाता था। अर्थव्यवस्था खेती और घरेलू उद्योगों पर आधारित थी। कृषि के आधार-पशु-गाय, बैल, भेंसे, घोड़े, भेड़, बकरी पाले जाते थे। अन्न के भूसे को जानवर खाते थे कुत्ते रखवाली का काम करते थे। जमीन हलों से जोती जाती थी जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए खाद की व्यवस्था थी। समुद्री व्यापार भी होता था। सौदा होने पर वचन का पालन किया जाता था। सौ-सौ पतवारों वाली नावें होती थीं।

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