भारत पर यूनानी आक्रमण
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भारत पर यूनानी आक्रमण

भारत पर यूनानी आक्रमण

ग्रीक लोग स्वयं को मैसिपोटामिया निवासियों से अधिक सभ्य और सुसंस्कृत समझते थे। जब ईरान ने ग्रीकों पर चढाई का विचार किया तो ग्रीकों ने उनका मजाक उड़ाया और जंगली तथा असभ्य कहकर सम्बोधित किया। 338 ई० पू० फिलिप्स ने ग्रीकों पर आक्रमण कर दिया और साधारण से युद्ध के पश्चात् थेबीज़ और एथेन्स पर अधिकार कर लिया। इस स्थिति में ग्रीकों ने फिलिप्स को अपना नेता मान लिया। फिलिप्स ने भी उनके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार कर, उन्हें स्वतन्त्र कर जीता हुआ भाग लौटा दिया। इसके पश्चात् उसने ईरान पर आक्रमण करने की योजना बनाई। उसी समय 336 ई० पू० उसके अपने ही किसी अधिकारी ने उसकी हत्या कर दी। जिस समय उसकी हत्या की गई, उसके पुत्र सिकन्दर की आयु केवल 20 वर्ष थी। उसने इसी अल्प आयु में उत्तरदायित्व ग्रहण किया।

भारत पर यूनानी आक्रमण
भारत पर यूनानी आक्रमण

सिकन्दर का आक्रमण

336 ई० पू० राज्यारोहण के पश्चात् सिकन्दर ने 20 वर्ष की आयु में राज्य तथा सेना का भार वहन कर अपनी प्रशासन व्यवस्था को संभालकर जल और थल सेनाओं को पुनर्गठित किया। यह सब व्यवस्था पूरी कर उसने 334 ई० पू० ईरान पर आक्रमण किया। जब यह आक्रमण किया गया, ईरान का शासक डेरियस तृतीय था। वह निर्बल, विलासप्रिय शासक था। उसका ईसस में सिकन्दर से युद्ध हुआ। उस युद्ध में डेरियस अपने अन्त:पुर (हरम) की स्त्रियों को भी लेकर गया था युद्ध में सिकन्दर विजयी हुआ और डेरियस अपनी मां, स्त्रियों, और पुत्रियों सभी को शत्रु की दया पर छोड़कर भागा। ये सब स्त्रियां मेसिडोनियनो के अधिकार में रहीं। ईसस के युद्ध के पश्चात् सिकन्दर ने ईरान के समर्थकों की शक्ति को कम करना आरम्भ किया। क्योंकि उनसे उसे विरोध की आशंका थी। उसने उन्हें समाप्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। इस कार्य में उसे सबसे बड़ा विरोध थिनीशियनों का सहन करना पड़ा। उसमें उनके दो प्रमुख किले टायर और सिडीन पर आक्रमण कर उन्हें अपने अधिकार में ले लिया। इन किलों पर अधिकार होने के पश्चात् उनका प्रतिरोध समाप्त हो गया।

थिनीशियनों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् वह शान्त न बैठा और उसने।मिस्र को अपने आक्रमण का लक्ष्य बनाया। मिस्रवासी कई पीढ़ियां से ईरान की दासता का कष्ट सहन करते-करते नितान्त शतृ बने थे उन्होंने समझा कि विधाता ने सिकन्दर के रूप में उन्हें उनका मुक्तिदाता भेज दिया उन्होंने ठसका शानदार स्वागत किया। जब सिकन्दर ने मिस्र के देवता एमन और यूनानी देवता ज्यूसnको एक ही बताया तो उनके पुजारियों ने उसी समय अपने देवता को ज्यूस- एमन कहकर पुकारना आरम्म कर दिया। उन्होंने सिकन्दर को ज्यूस का पुत्र देवता कहकर सम्बोधित किया। सिकन्दर उसी समय से स्वयं को देवता की श्रेणी में रखने लगा। उसकी अहमन्यता में अलौकिक वृद्धि सम्पन्न हुई। बह मनुष्य से देवता बन गया उसने अपने नाम से एलैक्जैन्ड्रिस्या नामक नगरी की स्थापना की।

331 ई० पू. सिकन्दर का परशिया (ईरान) से अरबेला में अन्तिम निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें डेरियस मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ उसका दुर्भाग्य रहा कि मार्ग में उसी के किसी सैनिक अधिकारी ने उसकी हत्या कर दी। डेरियस की मृत्यु के पश्चात् सम्पूर्ण ईरानी साम्राज्य सिकन्दर के अधीन हो गया यह सिकन्दर की बड़ी विजय धी। ईरान की शान- ओ-शौकत का अधिकारी बनकर वह बहुत प्रभावित हुआ कि इसने उसके मन पर अलौकिक प्रभाव डाला। उसे वहां की एक कुमारी रौक्सानो ने अपने अपार रूप से प्रभावित किया और उसने उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। उसने अपने सरदारों और सामन्तों को भी पर्शियन सुन्दरियों से विवाह करने की अनुमति दी परन्तु उन्होंने सिकन्दर की यह बात पसंद नहीं की। ईरान की विजय के पश्चात् वे सैनिक वापस लौट जाना चाहते थे। इससे सिकन्दर की महत्त्वाकांक्षा को ठेस लगी। वह विश्वविजयी बनकर अपना डंका बजाना चाहता था उसकी अपार आशाओं का किला अभी बहुत दूर था।


सिकन्दर अपनी हठ का बहुत पक्का था। उसने सैनिक-विद्रोह का अपने लौह-दमन चक्र से दमन किया। जिन्होंने उसकी महत्त्वाकांक्षा का विरोध करने का साहस किया उन्हें मृत्यु के घाट उतरवा दिया। उसने अपने एक अत्यन्त विश्वस्त सरदार क्लीटस की, जिसने एक बार उसके प्राणों की रक्षा की थी, हत्या करा दी। वह अब अत्यन्त क्रूर तथा निरंकुश होता जा रहा था उसकी ऐसी धारणा बनती जा रही थी कि वह कभी कोई भूल नहीं कर सकता। वह स्वयं को देवता समझने लगा। विश्वविजय के स्वप्न देखते हुए उसने अपनी सेना को भारत की ओर प्रस्थान का आदेश दे दिया।

सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत का पश्चिमोत्तर भू-भाग अनेक गणराज्यों में बंटा हुआ था, एक शासक द्वारा प्रशासित राज्य नहीं था। उन छोटे-छोटे राज्यों में कोई पारस्परिक सौहार्दपूर्ण मैत्री-सम्बन्ध न था। इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह था कि वे आपस में संघर्षरत रहते थे यह सिकन्दर का सौभाग्य रहा कि उसे सामूहिक शक्ति का सामना न करना पड़ा। यहीं तक नहीं, ऐसा भी हुआ कि कुछ स्वार्थी देशद्रोही राज्यों ने सिकन्दर को भारत पर आक्रमण के लिए आमन्त्रित कर सहयोग का निमन्त्रण भी दिया हिन्दूकुश के उ्तर में एक राज्य का अधिपति शशिगुप्त था। उसने ईरानी साम्राज्य के साथ सिकन्दर से युद्ध लढ़ा था। वह पराजित होने के बाद सिकन्दर का मित्र बन गया था उसी शकशिगुप्त ने सिकन्दर को भारत के विरुद्ध सहायता देने का आश्वासन दिया। इसी प्रकार तक्षशिला के राजकुमार आम्भि ने पहले ही भारत आने का निमन्त्रण भेज दिया था इसका कारण यह था कि आम्भि की पुरु से पुरानी शत्रुता थी। वह पुरु को नीचा दिखाना चाहता था इन कारणों से सिकन्दर को आक्रमण के लिए प्रेरणा मिली।

सिकन्दर भारत-भूमि में प्रवेश कर तक्षशिला का अतिथि तव तक बनने को उद्यत न था जब तक वह कपिशा और तक्षशिला के बीच बसी जातियों को अपने आधीन न कर ले। इन जातियों पर उसने आक्रमण किया और उन्होंने सिकन्दर का जमकर विरोध किया। सर्वप्रथम उसे अश्वकों और फौरों से युद्ध करना पड़ा।
इन दोनों को परास्त करने के पश्चात् नीसा नाम की जाति के लोगों ने सिकन्दर का कड़ा विरोध किया परन्तु बाद में उसकी आधीनता स्वीकार कर ली। इससे आगे बढ़कर सिकन्दर को मसग राज के अश्वाहकों का कड़ा विरोध सहन करना पड़ा। इस भीषण संघर्ष में जब तक एक भी मसग सैनिक जीवित रहा, सिकन्दर से युद्ध करता रहा। भयंकर नर-संहार हुआ। इसके पश्चात् पश्चिमी गांधार के हस्ति नामक राजा ने एक महीने तक सिकन्दर का सामना किया सिकन्दर की सेना एक महीना आगे न बढ़ सकी। शशिगुप्त और राजकुमार आम्भि की सहायता से सिकन्दर ने सिन्ध नदी पार की और तक्षशिला पहुंचा। अपने जीते हुए भू- भाग का उसने शशिगुप्त को क्षत्रप नियुक्त किया। इस प्रकार उसने दक्षशिला तक अपने कदम बढ़ा दिये।

पुरु से युद्ध

तक्षशिला जाकर सिकन्दर राजकुमार आम्भ का अतिथि बना। उसने फिर कैकेय- राज पुरु के पास अपना दूत भेजकर उसे अपनी आधीनता स्वीकार करने को कहा। पुरु ने सिकन्दर के पत्र का उत्तर देकर कहा कि वह सिकन्दर का रणभूमि में स्वागत करेगा जब वह यहां तक आ ही गए हैं उन्हें रणभूमि पर उतरने में संकोच क्यों? पुरु का उत्तर सिकन्दर को मिला। वह पहले ही जानता था कि पुरु का क्या उत्तर होगा। उसने अपनी सेना को आगे बढ़ाकर झेलम नदी के तट पर युद्ध का मोर्चा बना लिया। झेलम के दोनों किनारों पर दोनों ओर की सेनाएं जमी खड़ी थीं। महीनों बीत गए। दोनों में से किसी ने आक्रमण न किया। दोनों को स्वयं से शत्रु अधिक शक्तिशाली प्रतीत हो रहा था इतिहासज्ञों ने इस युद्ध के विषय में कई प्रकार के मत प्रकट किए हैं। यदुनाथ सरकार ने इसका रोम- रोम हिला देने वाला वर्णन किया है। सिकन्दर युद्धों के दौरान कुछ ऐसे दु:साहसपूर्ण कार्य करता था कि शत्रु चकित रह जाए। ऐसा ही उसने यहां भी किया। एक दिन आंधी और वर्षा का प्रकोप प्रबल था। इसकी चिन्ता न कर वह अपनी सेना के अग्रिम भाग को बीस मील दूर किनारे पर ऐसे ले गया कि शत्रु को उसकी गतिविधि का आभास न हो और वह ससैन्य सिन्धु नदी को पार कर जाए। सिकन्दर की सेना नदी पार कर पुरु की सेना के समक्ष जा खड़ी हुई तो पुरु आश्चर्यचकित रह गया। उसे विश्वास न था कि शत्रु इतना दुःसाहसपूर्ण कार्य कर उस पर आक्रमण के लिए मौजूद होगा।

पुरु सैन्य-शक्ति में सिकन्दर से कम नहीं था। उसके पास हाथियों और रथों की सुसज्जित सेना थी। उसके सैनिक धनुष-बाणों से युद्ध करने में अत्यन्त प्रवीण थे, परन्तु दुर्भाग्यवश मूसलाधार वर्षा के कारण संपूर्ण जंगल कीचड़ से आच्छादित हो गया और हाथियों तथा रथों का मार्ग अवरुद्ध हो गया। भूमि पर कीचड़ हो जाने से रथ और हाथी धंस गए। पुरु किंकर्तव्यपूर्ण स्थिति में निराधार खड़ा रह गया। उसे अपने मार्ग में बाधा पर बाधा का सामना करना पड़ा। न कीचढ़ में हाथी आगे बढ़कर शत्रु पर आक्रमण कर पाए न पुरु के धनुर्धर अपनी युद्ध-कला में सफल हुए दूसरी ओर से सिकन्दर के बल्लम-चालकों ने घोड़ों पर सवार होकर पुरु की सेना को बेधना आरम्भ कर दिया।

दोनों ओर से भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ था दोपहर तक टक्कर का युद्ध चलता रहा। भारतीय सैनिकों ने सिकन्दर की सेना के होश उड़ा दिए। प्रतीत होने लगा कि पुरु की विजय अवश्यंभावी है। सिकन्दर किसी भी समय मैदान छोड़कर भागने पर बाध्य होगा। परन्तु हुआ इसके विपरीत। पुरु के हाथी भालों से घायल होकर उन्मत्त हो गए। हाथी उन्मत्तता में सिकन्दर की सेना की दिशा में न दौड़कर वापस भागे और अपनी ही सेना को कुचलना आरम्भ कर दिया। यह दुर्घटना विनाशकारी परिणाम-द्योतक सिद्ध हुई। भारतीय सैनिकों में भगदड़ मच गई परन्तु पुरु ने इस भयंकर विपत्ति के सामने घुटने नहीं टेके और न ही अपने प्राणों की रक्षार्थ पीठ दिखाई। वह अपनी सेना को विपत्तिग्रस्त देखकर भी अपने हाथी से नीचे न उतरा और शत्रु का जमकर सामना करता रहा पुरु की शक्ति क्षीण होती गई। वह पूर्ण साहस से युद्ध करता रहा और इसी स्थिति में बन्दी बना लिया गया। उसे बन्दी बनाकर सिकन्दर के सामने लाकर सैनिकों ने उपस्थित किया तो सिकन्दर ने पुरु से प्रश्न किया, ‘अब तुम हमारे बन्दी हो पुरु तुम युद्ध में पराजित हुए बताओ अब हम तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करें।

पुरु सिकन्दर के समक्ष निर्भीक खड़ा था । उसने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘आपको हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा विजयी राजा विजित राजा के साथ करता है। जब हमने आपके आक्रमण का सामना करने में संकोच नही बरता, तो आपको भी अपने व्यवहार में किसी प्रकार का संकोच क्यों करना चाहिए?’

सिकन्दर पुरु के स्वाभिमानपूर्ण निर्भय होकर दिए उत्तर से बहुत प्रभावित हुआ। उसने के साथ सम्मानपूर्ण संधि की। उसका राज्य उसे लौटाकर उसकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया। पुरु ने भी सिकन्दर का हाथ अपने हाथ में थामा और उसके भावी अभियान में उसका साथ दिया। पुरु से संधि के पश्चात् सिकन्दर का मार्ग कुछ सरल बना। उसने अपनी विजय के उपलक्ष्य में दो नगर बसाए। उसका एक घोड़ा ‘वाउकेफला’ युद्ध के दौरान खेत रहा था। एक नगर उस अश्व के नाम पर और दूसरा अपनी प्रथम विजय के उपलक्ष्य में। सिकन्दर के मस्तिष्क में भारत-विजय की धुन सवार थी। इसलिए उसने पुरु-विजय के पश्चात् ग्लुचकायन, अद्रिज और कठ जातियों के गणराज्यों से युद्ध छेड़ दिया। ग्लुचकायन जन – जाति के सरदारों को सिकन्दर ने पराजित किया।

उसने उनके 39 नगरों पर अपना आधिपत्य कायम किया। दूसरी जनजाति अद्रिजों की राजधानी पिम्प्रात्मा थी, उस पर भी सिकन्दर ने अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् सिकन्दर को कठों का सामना करना पड़ा। जो सबसे अधिक कष्टप्रद कार्य था। कठों ने अपनी राजधानी सांकल के चारों ओर रथों का ऐसा घेरा बनाया कि उसे भेदकर अन्दर पहुंच पाना सिकन्दर के लिए असंभव हो गया| जब सिकन्दर ने देखा कि कठों नर विजय प्राप्त करना सरल नहीं, तो उसने पुरु की सहायता से यह कार्य सम्पन्न किया। सिकन्दर ने कठों की राजधानी को उजाड़ कर खण्ड- खण्ड कर दिया। उसकी ईंट से ईंट बजा दी। गत युद्धों के पश्चात् सिकन्दर ने भारत के कुछ भू-भाग पर अधिकार तो प्राप्त कर लिया। परन्तु उसका पर्याप्त मूल्य चुकाना पड़ा। यह सौदा उसे सस्ता नहीं पड़ा। पहले युद्धों के फलस्वरूप उसने जो मिस्र, ईरान और बलख पर विजय प्राप्त की थी, उसमें उसे न कोई विशेष हानि ही सहन करनी पड़ी थी और न इतनी धन-जन की हानि हुई। पश्चिमी एशिया से भारत का सौदा पर्याप्त मंहगा पड़ता नजर आ रहा था। भारतवासी अपनी एक-एक इंच भूमि के लिए प्राणपण से युद्ध कर रहे थे। अश्वकों का विरोध, एक महीने तक, हस्ति द्वारा युद्ध-भूमि में, उसके ससैन्य होकर रोककर रखना, पुरु के साथ भयंकरतम युद्ध करना और फिर कठों का लोमहर्षक संग्राम, सब दिल दहलाने वाली घटनाएं थीं। इन घटनाओं के कारण सिकन्दर के सैनिक तिलमिला उठे थे उन्हें भारत में प्राप्त विजय-उपलब्धि नगण्य दिख रही थी सब लोग क्षुब्ध था वे अपने घर, पलक मारते, वापस लौट जाना चाहते थे। उनके लिए आगे बढ़कर भारत-भूमि में प्रवेश कर पाना स्वप्नतुल्य होता जा रहा था। सम्राट नन्द की सैन्य- शक्ति का वृत्तान्त वे सुन चुके थे सिकन्दर की सेना अब व्यास नदी के तट तक पहुंच गई थी और आगे बढ़ने से कतरा रही थी। नन्द की सेना के अस्त्र- शस्त्रों और उनके चालकों के पराक्रमों ने उन्हें हतोत्साहित किया हुआ था ऐसी दशा में भयंकर स्थिति तब उत्पन्न हुई जब सैनिकों ने हथियार डाल दिए और आगे बढ़ने से स्पष्ट मना कर दिया।

सिकन्दर ने सैनिकों को उत्साहित करने हेतु ओजपूर्ण भाषण दिए, उन्हें उनकी वीरता का स्मरण कराया। विजय के पश्चात् अनेकों प्रकार के प्रलोभनों का आश्वासन थे। उन्हें अपने-अपने घरों का मोह सता रहा
दिया, परन्तु सैनिक किसी भी प्रलोभन से प्रभावित न हुए। व किसी भी लालचनके वशीभूत होकर रुकने और आगे बढ़कर युद्ध करने को सहमत न हुए। सिकन्दर ने अपार आत्मग्लानि अनुभव की। वह इतना हताश हुआ कि तीन दिन अपने शिविर से बाहर न निकला। सैनिकों पर सिकन्दर की इस निराशा का कोई प्रभाव न हुआ।

वे अपने निश्चय से टस-से-मस न हुए, अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि अब वे एक इंच आगे न बढेंगे। यह स्थिति देख सिकन्दर ने अपने आगे बढ़ते पैर वापस खींचे और अग्रिम यात्रा स्थगित कर वापस लौटने का आदेश दिया। सिकन्दर के वापस लौटने का दूसरा कारण भी उसके सैनिकों द्वारा आगे न बढ़ने के निर्णय से कम महत्त्वपूर्ण नहीं था। सिकन्दर ने भारत आकर जिन भृ- भागों पर विजय प्राप्त की, वहां की जनता ने उसकी प्रशासनिक व्यवस्था से विद्रोह करना आरम्भ कर दिया। उसके दो क्षत्रपों निकेनार और शशिगुप्त की हत्या कर दी गई। पंजाब के अन्य गणराज्य उससे युद्ध करने की तैयारी में संलग्न थे। ठंडे देश से आने वाले यूनानियों को भारत का उष्ण वातावरण रास नहीं आ रहा था। वे सब परेशान थे, यहां के जलवायु के प्रकोप के कारण।


सिकन्दर की वापसी सिकन्दर की अपनी विजय अभियान की यात्रा से प्रस्थान यात्रा अधिक कष्टप्रद रही। उसे इस यात्रा के दौरान पग-पग पर संकट बना रहा और अनेक गणराज्यों के प्रतिनिधियों से रक्तरंजित टक्करें लेनी पड़ीं । व्यास नदी के किनारे-किनारे सिकन्दर अपने मित्र पुरु के राज्य झेलम की ओर बढ़ा। वहां जाकर उसने अपने विजित प्रदेश की प्रशासन व्यवस्था देखी और नावों का एक बड़ा बेड़ा लेकर नौका द्वारा दक्षिण- दिशा में प्रस्थान किया अपनी वापसी में उसे सर्वप्रथम नमक की खानों के प्रदेश में राजा सौभूति से टक्कर लेनी आवश्यक हुई। राज्य के निवासी जिस साहस के साथ सिकन्दर का सामना करने आए, वह स्थायी न रह पाया। उन्होंने सिकन्दर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। यह विजय प्राप्त कर सिकन्दर झेलम और चिनाब के निकट पहुंचा। वहां सिकन्दर को शिवि गणराज्य की सेना का सामना करना पड़ा।

उसकी सेना में 30,000 सैनिक थे परन्तु वह सिकन्दर का सामना कर पाने में असमर्थ रहे। उसे पराजय का मुख देखना पड़ा। इस युद्ध के पश्चात् सिकन्दर आगे बढ़ा तो उसकी मुठभेड़ आग्रेय गणराज्य के लोगों से हुई। आग्रेय हिसार जिले में था। अग्रेयकों ने सिकन्दर के साथ भयंकर युद्ध किया। इनका मुकाबला साधारण न था परन्तु शक्ति सिकन्दर की ही सेना की अधिक थो। जब उन लोगों ने देखा कि सिकन्दर पर विजय पानी कठिन है तो उन्होंने अपने भू-भाग में इधर-से-उधर तक आग लगा दी। उन्होंने अपनी स्त्री-बच्चों को आग में झोंका ओर युद्ध-भूमि में निकल पड़े। उन सबने युद्ध में वीरगति प्राप्त की। इस शौर्यपूर्ण कृत्य को देखकर सिकन्दर स्तब्ध रह गया| रेसा शौर्यपूर्ण समर्पण-कृत्य उसने देखा तो क्या, कभी पहले सना भी न था।

अब सिकन्दर रावी नदी के तट पर पहुंच गया था। उसके दोनों ओर मालवों का गणराज्य था। उन्हें सिकन्दर के आने का पता चला तो उन्होंने उसका मार्ग रोकने की व्यवस्था की । उनके पड़ोसी क्षुद्रकों का राज्य पूर्व दिशा में ही व्यास के किनारे पर था। ये राज्य आपस में सर्वदा संघर्षरत रहते थे। परन्तु विदेशी आक्रमण का सामना करने के लिए दोनों संधि के बन्धन में बंध गए। एक यूनानी लेखक ने लिखा है कि संधि को सुदृढ़ बनाने के लिए मालवों ने अपनी सब अविवाहित युवतियों के विवाह क्षुद्रक कुमारों से कर दिए। क्षुद्रकों ने भी मालवों के अनुसार अपनी अविवाहित लड़कियों के विवाह मालवों से कर दिए। इसके पश्चात् एक युद्धकुशल क्षुद्रक के नेतृत्व में एक संघ बनाया गया, जिसमें दोनों जातियां सम्मिलित थीं। इन गणों कीनकोई सुगठित सेना नहीं होती थी उनका प्रत्येक व्यक्ति एक सैनिक होता था जब सिकन्दर के सैनिकों को यह स्थिति ज्ञात हुई कि इतने भयंकर युद्धों के पश्चात् भी उन्हें अभी दो अत्यन्त वीर जातियों से लड़ना होगा तो वे भयभीत हुए और उन्होंने फिर सिकन्दर के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। सिकन्दर ने यह स्थिति देख भयभीत होकर कहा, ‘वापस तो हम लोग जा ही रहे हैं सैनिकों! अब यदि मार्ग में कोई शत्रु-शक्ति हमें लड़ने पर बाध्य करे तो बताओ क्या करें?’
सैनिकों को मौन धारण करना पड़ा।

संधि

युद्ध की स्थिति बन गई। सिकन्दर राजनीतिज्ञ भी था उसने क्षुद्रकों की सेना के मालवों की सहायतार्थ आने से पूर्व मालवों पर आक्रमण कर दिया। मालव इस अचानक आक्रमण का सामना करने को व्यवस्थित नहीं थे सिकन्दर के सैनिकों द्वारा उनकी अपार निर्दयतापूर्वक हत्या की गई। फिर भी मालवों ने बड़ी वीरता से युद्ध किया और यही वह युद्ध था, जिसमें सिकन्दर घायल हुआ। उसकी छाती पर गहरा घाव बन गया। अन्त में यही घाव सिकन्दर का प्राणलेवा साबित हुआ। यह चोट खाकर सिकन्दर अपार क्रोध से भर उठा और उसने मालव स्त्री-पुरुषों का ‘निर्दयतापूर्वक वध करने का आदेश दिया। जब यह अपार नर-संहार चल रहा था, तभी क्षुद्रकों की अपार सुगठित सेना मालवों की सहायता के लिए आ पहुंची और घमासान युद्ध आरम्भ हो गया। सिकन्दर मालवों से लड़ते-लड़ते थक गया था उसने इसी को अपनी प्राणरक्षा के लिए उचित समझा कि वह सोधि कर दोनों पक्षों में संधि सम्पन्न हुई। मालवों और क्षुद्रकों के सौ प्रतिनिधि सिकन्दर- समक्ष आए। सिकन्दर ने विराट संधि आयोजन सम्पन्न किया प्रतिनिधियों को सोने की कुर्सियों पर ससम्मान बिठाया गया शानदार भोज की भी व्यवस्था थी। इस सभा में मालवों और क्षुद्रकों ने कहा, ‘आज हमने सिकन्दर की आधीनता स्वीकार की। सिकन्दर लोकोत्तर पुरुष हैं।’

भारतीय अनुभूति के आधार पर डा० जायसवाल लिखते हैं कि संस्कृत के प्राचीन व्याकरण ग्रंथों के अनुसार क्षुद्रकों ने सिकन्दर को परास्त किया था महाभाष्य फलस्वरूप में लिखा है कि अकेले क्षुद्रकों द्वारा ही सिकन्दर को पराजित किया गया क्षद्रकों ने सिकन्दर से बहुत सम्मानपूर्ण संधि सम्पन्न की।

सिकन्दर अपनी भारत से प्रस्थान यात्रा सम्पन्न करने हेतु दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब के अम्बष्ट, क्षतृ और वसाति नायकगणों का सिकन्दर को सामना करना पड़ा। अम्बष्ट भी मालव क्षुदकों के समान वीर और तेजस्वी थे। उनकी सेना में 60.000 पैदल, 6000 अश्वारोही और 500 रथ थे। भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में फिर सिकन्दर को सफलता प्राप्त हुई। अम्बष्ट, क्षतृ और वसातिगण परास्त हुए। गणों की धन- जन-सम्पत्ति सभी का विनाश हुआ।

सिन्ध के मुषिक और शम्भु गणराज्यों ने सिकन्दर का अधिक प्रतिरोध न किया। उन्होंने साधारण संघर्ष के पश्चात् ही आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने सिकन्दर से संधि सम्पन्न की इस संधि में ब्राह्मणक जनपद की संधि से सिकन्दर बहुत परेशान हुआ। उन्होंने मात्र स्वयं ही उसका विरोध नहीं किया परन्तु अन्यों में भी विद्रोह का बीज बो दिया। उन्होंने अपने प्रचार में कहा कि विदेशी यवनों की अधीनता स्वीकार करना मात्र लज्जास्पद ही नहीं, पाप भी है। ऐसा करना राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध है। जब सिकन्दर को यह रहस्य ज्ञात हुआ तो वह उन पर बहुत क्रुद्ध हुआ। उसने अधिकांश ब्राह्मणक जनपद-निवासियों को समाप्त कर दिया। इससे भी भयंकर कार्य उसने यह किया कि उनके नेताओं के शवों को जनता-समक्ष लटकवा दिया।

सिन्ध में, ठीक उसी स्थान पर जहां सिन्धु नदी दो धाराओं में विभक्त होती है, पट्टल और पातन नगर बसे हैं। वहां की सेना का नेतृत्व दो राजाओं द्वारा संचालित था। ये नगर उस क्षेत्र में थे, जहां आज हैदराबाद है। इस राज के निवासियों ने सिकन्दर की अधीनता न मानी। वे अपना नगर छोड़ कहीं अन्यत्र चले गए।

सन 325 ई० पू. सिकन्दर ने सिन्धु के मुहाने पर पहुंचकर अपने देश के लिए वापस प्रस्थान किया। उसकी सेना का कुछ भाग समुद्र मार्ग से पश्चिम दिशा में बढ़ा। दूसरा भाग थल मार्ग से मकराम होकर बैबीलोन की ओर चला। ईरान में जाकर उसे एक बार फिर वहां के वैभवों ने घेर लिया। उसने पर्शिया में बसने का निश्चय किया। वह ग्रीकों का एक महान शक्तिशाली राष्ट्र बनाना चाहता था। वह नया धर्म भी चलाने का आकांक्षी था, परन्तु भाग्य ने उसका साथ न दिया। वह युद्ध के घावों का रोगी और श्रमित था। ऐसी ही स्थिति में उसे भीषण ज्वर ने धर दबाय:। ज्वर की स्थिति में भी उसने मदिरा-पान का त्याग न किया। परिणामस्वरूप 32 वर्ष की अल्पायु में ही इस विख्यात विश्वविजेता ने प्राण त्याग दिए।

आक्रमण का प्रभाव

सिकन्दर के आक्रमण का भारत पर कोई स्थायी प्रभाव न हुआ। इस आक्रमण से केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश, पर्चमी पंजाब और सिन्ध ही आंशिक रूप में प्रभावित हुए। जो आशिक प्रभाव हुआ भी था वह सब सिकन्दर की मृत्यु-पश्चात् तिरोहित हुआ। इस आक्रमण ने यह प्रमाणित किया कि छोटे-छोटे भागों में विभक्त देश किसी भी बड़े विदेशी आक्रमण से आपनी सुरक्षा-व्यवस्था नहीं कर सकता। देश की सुरक्षा के लिए सुदृढ़ केन्द्रीय शासन की आवश्यकता है। वही शासन राष्ट्रीय सुरक्षा के कठिन दायित्व का निर्वाह करने में सक्षम होगा।

भारत और मध्य एशिया के बीच इस आक्रमण के पहले से व्यापारिक सम्बन्ध थे। इस आक्रमण के कारण उन सम्बन्धों में वृद्धि हुई। समुद्री तथा स्थानीय आवागमन पर्याप्त उन्नत हुआ। पारस्परिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई। यह आक्रमण भारतीय संस्कृति और सरलता पर कोई प्रभाव न डाल पाया। इसका मुख्य कारण यह था कि उन्हें सम्बन्ध के लिए बहुत कम समय मिला।

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