ब्राह्मणकाल व्यवस्था (1500 ई० पू० से 500 ई० पू०)
Posted in: इतिहास

ब्राह्मणकालीन व्यवस्था

ब्राह्मणकाल व्यवस्था (1500 ई० पू० से 500 ई० पू०)

जिस समय महाभारत का महायुद्ध लड़ा गया, उस समय सम्पूर्ण देश विभिन्न राज्यों में विभाजित था और सबकी अपनी-अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं थीं, परन्तु राजनीतिक दृष्टि से स्पष्ट है कि सत्ता केन्द्रित थी । हस्तिनापुर का सम्राट सर्वशक्तिसम्पन्न समझा जाता था, जिसकी ध्वजा के नीचे अन्य राजे एकत्रित होकर
अपने-अपने समूह बनाते और सम्पूर्ण राजनीतिक शक्ति दो भागों में विभाजित होकर विशाल रूप धारण करती। महाभारत में देश के लगभग सभी राजाओं ने अपनी-अपनी सेनाओं के साथ भाग लिया और महाभारत को निर्णायक युद्ध की संज्ञा दी। इस युद्ध में दोनों महाशक्तियों का भयंकर विनाश हुआ। लगभग सभी वीर योद्धा और प्रमुख सेनापति रणभूमि में खेत रहे, युद्ध-सामग्री का पूर्णरूपेण विनाश हुआ, यश-वैभव अपमानजनक स्थिति को पहुंचा। दोनों पक्षों के शेष बचे प्राणियों के मन आत्मग्लानि से भरे थे। विनाश के ऐसे काले बादल मंडराए कि भारतीय भू-मण्डल से द्वारिकापुरी तक रक्तपात दिखाई दिया और अर्जुन जैसे धनुर्धर भी लटेरों से अपने परिवारों की रक्षा न कर पाए। इस युद्ध के पश्चात् हस्तिनापुर की सार्वभौम सत्ता का अन्त स्वाभाविक था।

ब्राह्मणकाल व्यवस्था (1500 ई० पू० से 500 ई० पू०)
ब्राह्मणकाल व्यवस्था (1500 ई० पू० से 500 ई० पू०)

युधिष्ठिर के पश्चात् साम्राज्य बिखरा और बिखरता ही चला गया। बहुत से राजवंश छोटे-छोटे राज्यों पर राज करने लगे। बहुत से नए छोटे-छोटे राज्यों ने जन्म लिया। महाभारत के भयंकर विनाश का जो प्रभाव भारत पर पड़ा, उसे देशवासियों ने सदियों तक भोगा। इसका प्रभाव इतिहास-लेखकों पर भी इतना भयंकर हुआ कि उन्होंने महाभारत-युद्ध की समाप्ति से लेकर विक्रम- पूर्व तक की भारतीय घटनाओं को अपनी रचनाओं में स्थान ही नहीं दिया बल्कि उन्होंने इस सम्पूर्ण काल को अंधकारपूर्ण मान लिया। उनका ऐसा करना भारतीय इतिहास-रचना पर कुठाराघात हुआ। और हम इस काल के अपने प्रामाणिक इतिहास से वंचित रह गए। प्रामाणिक इतिहास होने पर इतिहास की क्रमबद्धता खण्डित न होती।

क्रमबद्धता और नियामकता का प्रभाव होने पर भी यह मान बैठना कि इस काल का इतिहास पूर्णतः अंधकार में है, गलत धारणा होगी। यदि पुराणों का विस्तार से विवेचन करके उनका एुक्ष्म अध्ययन किया जाए तो अनुपलब्धता की गुल्यी सुलझष जाती है और हमें राजवंशों की सूची मिल जाती है। इस काल के इतिहास जान- पूर्ति में पुराणों का बहुत महत्त्वपूर्ण योग रहा है। अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की क्रम सूची ।

  1. वृहद्दल, 2. वृहद्रण, 3, उरूक्रिय, 4, वल्सवृद्ध, 5, प्रतिव्योग, 6, भानु, 7. दिवाकर 8, सहदेव, 9, वीर, 10, वृहदश्य, 11, मानुमान 12. प्रतीकाश्व, 13, सुप्रतीक ,
    14, महदेव, 15, सुनक्षत्र, 16, पुष्कर इत्यादि।
    मगध के राजाओं की सूची : 1. जरासन्ध, 2, सहदेव, 3, सोमापि, 4, श्रुतश्रवा, 5, अयुतायु, 6, निरमित्र 7, सुकृत,
  2. वृहत्कर्मा, 9 सेनाचित, 10, श्रुतम्जय, 11, नृप, 12 शुचि, 13, श्रेम, 14 भुक्त, 15, धर्मनेत्र, 16, नृपति, 17. सुद्रत इत्यादि।

युधिष्ठिर की वंश-परम्परा :

  1. अर्जुन, 2. अभिमन्यु, 3, परीक्षित, 4, जनमेजय 5, शतानीक, 6, अश्वमेध, 7.सहस्रानीक, 8, अधिसीमकृष्ण, 9, नेमिचन्द्र, 10 उप्त, 11. चित्ररथ, 12 शुचिरथ,
    13; वृष्णिमान्, 14. सुषेण, 15. सुचक्षु इत्यादि।

महाभारत के युद्ध से गौतम-बुद्ध काल तक के शासकों की इन सृचियों में शासकों की संख्या-गणना लगभग समान है। यह सिद्ध करता है कि यह संख्या सत्य पर आधारित है कपोल-कल्पित नहीं यदि यह कल्पित होती तो इन संख्याओं में कुछ न कुछ अन्तर आना स्वाभाविक था। वेदों की रचना के पश्चात् ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना हुई। इनके रचनाकाल के समय का साधारण ज्ञान इनसे प्राप्त होता है। यह रचनाकाल महाभारत-युद्ध समाप्ति के पश्चात् से बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार काल तक चलता है। ब्राह्मण ग्रन्थ विशेष रूप से वैदिक साहित्य के ही आधार पर चुने हुए कुछ विशेष अंश है इनका रचनाकाल वेदों से पर्याप्त समय पश्चात् का है इनकी रचना वेदों के कुछ कठिन सूत्रों का अर्थ समझाने निमित्त की गई। इन्हें वैदिक साहित्य की ही एक रूप में व्याख्या माना जा सकता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों का अध्ययन स्पष्ट करता है कि इन्द्र की उपासना करने वाले आयों और अहुर मन्जदा की उपासना करने वाले ईसाइयों में निरन्तर मतभेद उत्पन्न होना स्वाभाविक था। वे असुर को अहर, पंच को पंज, मातर को मादर इत्यादि कहते थे। इनका स्वर स्पष्ट तो था परन्तु शुद्ध नहीं। इसी कारण इन्हें असुर कहकर पुकारा जाता था समाज में भी इनके प्रति आदर- भाव नहीं, घृणा भाव ही था शतपथनब्राह्मण में तो यहां तक लिखा है कि असुरों की पराजय का कारण ठनका अशुद्ध उच्चारण ही था। यह पराकाष्ठा थी आयों के घृणा-भाव की।

ईरानी लोगों के मन में इन्द्र के लिए कोई आदर-भाव नहीं था और वे इन्द्र की पूंजा नहीं करते थे। ईरानी लोगं मुख्य रूप से अग्नि की पूजा करते थे। अग्नि ही उनका मुख्य इष्टदेव था और उसकी पूंजा-उपासना उनका धर्म। अग्नि को मुख्य देवंता मानने पर भी वे अग्नि को पशुओं की भेंट देने के विरुद्ध थे। पशु-बलि का विधान उनके धर्म-ग्रंथों में नहीं था। वे बलि देने से मानते थे कि पूजा- स्थल अपवित्र होता है। अग्नि की पवित्र गरिमा नष्ट हो जाती है आयों और अनायों के युद्धों के विषय में जो उल्लेख उपलब्ध है उसका आशय आयों और अनायोँ का युद्ध माना गया है। आर्य ईरानियों को स्पष्ट रूप में अनार्य कहते और मानते थे। ऐतरेय में आयों और असुरों में युद्ध-सम्बन्धी एक रोचक कथा मिलती है। कथा में असुरों ने देवताओं के भूगोल, अन्तरिक्ष और द्युलोक में प्रवेश करने देने पर विचार किया और इसे कार्यान्वित करने-निमित्त तीन 1. लौह, 2. रजत, 3. स्वर्ण भित्तियां बनाईं, परन्तु देवताओं ने उपसदा नाम के यज्ञ द्वारा उनकी एक बात न मानी। तीन दिन की याज्ञिक क्रिया समाप्त होने पर असुरों को तीनों लोक त्यागने पर बाध्य कर दिया। उन्हें वहां बने रहने की अनुमति प्राप्त न हुई। यह कथा स्पष्ट करती है कि प्राचीन ईरानी लोग आयों की अपेक्षा कहीं अधिक धनाढ्य और ऐश्वर्यशाली थे वे स्वयं को आर्यों से श्रेष्ठ भी गिनते थे आर्य लोग अपनी आध्यात्मिक सफलताओं में श्रेष्ठ अवश्य थे, धन-वैभव में उनसे पीछे थे। उनके पारस्परिक व्यवहार में समानता का भाव नहीं था।

ब्राह्मण काल के राजा

महाराजा परीक्षित कुरु राज्य का प्रमुख था। उसका विवाह मद्र देश की राजपुत्री से हुआ। महाराजा परीक्षित को शाप मिला था कि उसकी मृत्यु तक्षक सर्प के डसने
से होगी और वैसा ही हुआ भी ।

जनमेजय

जनमेजय परीक्षित का पुत्र था। वह बहुत बड़ा प्रतापी राजा था, कुरुवंश में सबसे महान। इसकी कीर्ति का वर्णन पुराणों, महाभारत और ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है। जनमेजय ने दो अश्वमेष यज्ञ किए थे और दूसरे में इन्द्रोत शोलक। जनमेजय के पश्चात् शतानीक कुरु राज्याधिकारी बना। महाभारत से पता चलता है कि उसका वास्तविक नाम उग्रसेन था। शतपथ ब्राह्मण में भी उसके पुत्र का कुछ इससे मिलता- जुलता नाम है।
राजा जनक विद्वान था और विद्वानों का आदर करता था। उन्हें अपनी शरण में यज्ञ के पुरोहित तुरकावशेय नामक ऋषि रखता था। उसकी सभा में कई विद्वान और विदुषियां थीं। राजा जनक के विषय में अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं। उन्होंने एक बार एक यज्ञ किया जिसमें कुरु और पांचाल जनपदों के कई ब्राह्मण पधारे। यज्ञ में ब्राह्मणों के विशेष रूप से सम्मानित करने को अनेकों गायें एकत्रित करा के राजा जनक ने कहा कि जो ब्राह्मण बढ़ा ब्रह्मवेत्ता हो वह इन्हें दान स्वरूप ग्रहण करे। यह पोषणा सुनकर याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य से कहा, ‘इन गायों को ले चलो।

यह सुनकर सर्वत्र रोष छा गया जनक के पुरोहित अश्वल ने कहा, ‘क्या तुम स्वयं को हम सबसे बड़ा ब्रह्मवेता मानते हो?’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘हम प्रत्येक ब्रह्मवेत्ता को नमस्कार करते हैं, परन्तु इन गायों को ले जाने की हमारी इच्छा है अब इन्हें ले जाने का हमारा अधिकार है या नहीं?’

उनके कथन पर सबने विचार किया। जब गार्गी की बारी आई तो उन्होंने कहा, ‘हे ब्राह्मणो, मैं ऋषि याज्ञवल्क्य से दो प्रश्न करती हूँ। यदि यह इनका उत्तर दे पाएंगे, तो समझुंगी कि इनसे महान कोई नहीं, अन्यथा यह नतमस्तक बनेंगे।

याज्ञवल्क्य जी ने गा्गी से प्रश्न करने को कहा तो उन्होंने पूछा, ‘ऋषिवर, स्वर्ग से ऊपर, धरती से नीचे और दोनों के बीच जो कुछ है, तथा जो भी भूत, भविष्य और वर्तपान में था, है या होगा वह सब किससे ओत-प्रोत है?’
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ‘हे विदुषी, आकाश जिसमें व्याप्त है, वह स्वयं अविनाशी ब्रह्म है।

गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और ब्राह्मणों से कहा, ‘इन ब्रह्मवेता को कोई पराजित न कर पाएगा।
राजा जनक के समकालीन और कई राजा हुए। पांचाल के राजा प्रावहरण जैवलि बहुत विद्याओं के ज्ञाता थे। उनके विषय में उपनिपदों में अनेक कथाएं अंकित हैं। काशी के महान राजा अजातशत्रु भी उन्हीं के समकालीन थे यह अद्वितीय विद्याप्रेमी और विद्वानों का आदर करने वाले थे कुरु राज्य में अश्वमेघ यज्ञ-पश्चात् अभिभीम कृष्ण सिंहासनारूढ़ हुए। उसने उन राजाओं की वंशावलियों को, जो सूत्रों द्वारा रक्षित थीं, पुराणों में स्थान दिलाकर स्थायित्व प्रदान किया उन्हीं के राज्य काल में दृद्दती नदी के किनारे नैमिवराण्य में एक दीर्घकालीन सत्र सम्पन्न हुआ उनके काल के राजाओं के नाम पुराणों में हैं। उसी समय एक ऐसी बाढ़ आई कि पूरा हस्तिनापुर बाढ़ में बह गया टिड्रियों के दल ने फसलों को नष्ट कर दिया। अनेक आपदाओं का सामना करना पड़ा।

लाचर राजा को अपना राज्य छोड़कर वत्स राज्य में जाना पड़ा। इसके पश्चात् की लगभग 15 पीढ़ियों का कोई वृत्तान्त नहीं मिलता। फिर भी पुराणों में बंशाबली उपलब्ध ब्राह्मण-काल में आर्य सभ्यता का सब दिशाओं में उन्नयन हुआ अभी भी हीन जातियों में वैवाहिक सम्बन्ध मान्य थे। इस काल की कोई विशेष उल्लेखनीय घटना उपलब्ध नहीं। वैश्यों के कई अलग-अलग वर्ग बने। कुछ निम्न प्रकार के व्यवसायों के आधार पर निम्न जातियां बनीं कुछ आर्य दूर स्थानों को प्रस्थान कर
गए, जो आर्य संस्कृति से ही भिन्न माने जाने लगे। शुद्र जाति पृथक बनी, जिनका आयों से कोई पारिवारिक सम्बन्ध नहीं था। कुछ राज्यों में पृथक गणराज्य स्थापत हुए। संस्कृति से पृथक लोग, पृथक भाषा बोलने लगे।


शिक्षा आर्य युवक उपनयन पश्चात् आचार्य के पास अध्ययनार्थ जाते थे वे वहां ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते। ब्रह्मचारी अन्तेवासी-समान रहते। ब्रह्मचारियों को कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य था। उन्हें प्रत्येक कार्य में संयम से काम लेना होता। वह अपने भोजनार्थ भिक्षा मांग कर लाते और गुरुजनों की भोजन-सुंविधार्थ समिधाएं एकत्रित करके लाते। छान्दोग्य उपनिषद में उन विषयों को विस्तार से सूचीबद्ध किया गया है, जो विद्यार्थी के लिए आवश्यक नियम होते। कुछ मुख्य विषयों की सूची यहां प्रस्तुत की जाती है : इतिहास, पुराण, वेदों के अर्थविषयक ग्रंथ (वेदांग), राशि- विद्या (गणित), ब्रह्मविद्या (वेदान्त), वेदशिक्षा (वेदविषयक विद्या), क्षत्रविद्या (धनुर्वेद), नक्षत्र विद्या (ज्योतिष), तर्कशास्त्र, नीति-शास्त्र, क्षर्णविद्या, संगीतशास्त्र। कक्षा का पठन-पाठन समाप्त होने के पश्चात् आचार्यानुशासन का विधान था। इसका विस्तृत विवरण तैत्तिरीय उपनिषद में सव्याख्या उपलब्ध है पिता को देवतुल्य माना जाता था। आचार्य को भी वही आदर प्रदान किया जाता था।

गुरु-शिष्य को इन आदर्शों का पाठ पढ़ाता और उनका पालन कराने में पूर्ण योग देता। आचार्य विद्यार्थी
को. धर्म-पालन का आदेश देता और विद्यार्थी जीवन में पालन करना उसका कर्तव्य रहता।

अर्थ-व्यवस्था

भारतीय समाज मुख्य रूप से कृषिप्रधान था। रातपथ ब्राह्मण में जमीन जोतना, हल चलाना, खु्पा-आरी चलांना, व्यापारियों को श्रेष्ठि कहा जाता था देश का व्यापार पर्याप्त समृद्ध था। यात्रा के लिए समुद्र-पथ का भी प्रयोग किया जाता। समुद्रों के जरिये व्यापारियों के काफिले इधर-उधर जाते और व्यापारिक माल लाद ले जाते थे। शिल्प और कलाओं का स्तर भी पर्याप्त उन्नत स्थिति में पहुंच गया था। उनसे पर्याप्त उन्नति के साधन उपलब्ध होते और पारस्परिक आदान-प्रदान में बढ़ोत्तरी
होती।

राजनीतिक व्यवस्था

राजा लोग शक्ति सम्पन्न होने पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने निमित्त घरों की व्यवस्था करते थे। इन यज्ञों में विशेष रूप से शक्ति का प्रदर्शन अप्रत्यक्ष रूप में किया जाता था राजसूय यज्ञ, वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों में शक्ति का मुक्त प्रदर्शन होता और विरोध करने वालों को युद्ध करना अनिवार्य बनता। ये युद्ध विशेष रूप से शक्ति प्रदर्शनार्थ ही किए जाते और अपना प्रभाव प्रमाणित
किया जाता कि वह कितना व्यापक है, कितने लोग उनका आदर करते हैं और उनके विरुद्ध सिर उठाने का साहस तक नहीं कर पाते। यदि साहस करते हैं तो उन्हें युद्ध करना पड़ता है और विजयी न होने की स्थिति में नतमस्तक बन अपमान सहन करना होता है। राजसूय यज्ञ का मुख्य अंग रथों की दौड़ होता था। इस दौड़ में राजा अपने रथ पर सवार होकर सबसे आगे रहता था। दौड़ के पश्चात् राजा को तिलक किया जाता था। राजा शक्तिवर्धक सोमरस का पान करता।

अश्वमेध यज्ञ में पहले सेना के साथ घोड़ा छोड़ा जाता था घोड़ा विभिन्न राज्यों से होकर गुजरता और उसके साथ ऐलान होता जाता कि अमुक राजा अश्वमेध यज्ञ कर रहा है। यदि किसी व्यक्ति को यज्ञकर्ता का विरोध अभीष्ट होता तो वह यज्ञ के घोड़े को पकड़ कर बांध लेता तथा राजा को युद्ध की चुनौती देता। इसके फलस्वरूप दोनों शक्तियों के मध्य संघर्ष छिड़ता और विजयी होने पर यज्ञ करने की क्षमता प्राप्त करता। यज्ञ का घोड़ा सब स्थानों पर जाता और विजित होकर सगर्व अपनी राजधानी लौटता। प्रथा के आरम्भ में इसे सेना की सुरक्षा छोड़ा जाता था। बाद को उसे एक-दो सैनिकों के साथ छोड़ा जाता और यदि कहीं विरोध होता तो सेना को अंतिम निर्णयार्थ भेजा जाता। घोड़ा बिना विरोध वापस लौटने का अर्थ होता कि जहां-जहां घोड़ा गया, उन सभी देश-प्रदेशों केबशासकों ने यज्ञकर्ता का आधिपत्य स्वीकार किया कोई भी इससे युद्ध करने की क्षमता अथवा साहस नहीं रखता। यज्ञ के पश्चात् अभिषेक की प्रथा थी जो पुनराभिषक कहलाता। ऐन्दुमहाभिषेक उस विशेष राजा का किया जाता था जिसकी सेनाएं दूर-
दूर के भू-भागों तक विजय प्राप्त करके अपनी दुदंभी बजातीं, इस कोने से उस कोने तक चली जाती थीं।
पूर्वी प्रदेशों में राजा को सम्राट कहकर पुकारा जाता था

पश्चिमी प्रदेश में उसे स्वराट् कहते थे। उत्तरीय प्रदेशों में उसे विराट की संज्ञा दी गई तथा दक्षिण में भोज सम्बोधन को श्रेष्ठ माना गया जो राजा चारों दिशाओं में अपनीनविजय दुंदभी बजाने में सक्षम होता था, उसे एकराट् अथवा सार्वभौम शासक कहा जाता था। आर्य राज्यों में यह पद-नामकरण संपूर्ण भारत में मान्य माना जाने लगा था। उसे पद के उच्चारण से था और स्पष्ट हो जाता था कि अमुक शासक किस भू-भाग का विशेष सम्मानित व्यक्ति है।

राजदरबार के अधिकारी रत्नी कहे जाते थे महिषी, राजम्य, ब्रह्मा ( पुरोहित), सूत (भाट), सेनानीर (सेनापति), ग्रामणी ( ग्राम-मुखिया ), संग्रहीता ( कोषाध्यक्ष), भागदुध (कर एकत्रित करने वाला), अक्षावाय ( पासों का अध्यक्ष), क्षत्ता ( कुंचुकी)। ये सभी लोग रत्नी की श्रेणियों में गण्य थे। इनमें से सब अधिकारी, पुरोहित के अतिरिक्त, वैश्य वर्ग में से थे। ग्रामणी भी वैश्य ही होता था इनका चयन वैश्यों में से ही किया जाने लगा था। दिशा-ज्ञान कर पाना भी संभव होता।

धार्मिक व्यवस्था

ब्राह्मण काल में आकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) की महत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि देखने में आती थी। त्रिमूर्ति की कल्पना का विकास इसी ब्राह्मणकाल की देन है इन्द्र की उपासना का महत्त्व क्षीण होता जा रहा था। जैसे, पहले आयों में इन्द्र को विशेष देवता माना जाता था और उसकी पूजा की जाती थी, वैसा, अब नहीं रह गया था इन्द्र की शक्तिक्षीणता के कुछ दृष्टान्त भी पुराणों में मिलते हैं। ब्राह्मण-ग्रन्थों में इन्द्र साधारण कोटि में आ गए। इस काल तक आते-आते यज्ञ का महत्त्व बहुत बढ़ गया था यज्ञ अवसर पर ऋचाएं बोलने वाला पृथक होता, सामगान करने वाला उद्गाता पृथक और युजुरस का अध्यक्ष अध्वुर्य और यज्ञ का अध्यक्ष ब्रह्मा कहलाता था। आर्य लोग अपने जीवन की सम्पूर्ण उपलब्धियों का सम्बन्ध यज्ञों से जोड़ बैठे थे। अब वे अपनी प्रत्येक उपलब्धि के लिए यज्ञ की व्यवस्था करते थे। बड़े-बड़े यज्ञों में 16 तक ऋत्विक रहते थे यज्ञों का विधि-विधान बहुत जटिल बन गया था जो यज्ञ दीर्घकाल तक चलने वाले होते थे उन्हें सत्र कहा जाता था। यज्ञ करते समय छोटी-छोटी बातों को बहुत ब्यौरेवार प्रस्तुत किया जाने लगा था क्रम ठीक न होने पर व्यवधान की सम्भावना बन जाती थी। यहां का सब कार्य बहुत नियामकता मांगता था और उसके प्रत्येक कार्य के लिए उचित व्यक्ति का चयन किया जाता था, जिससे यज्ञ का फल सही और शुभ प्राप्त हो। यज्ञ क्रम भंग होने पर यज्ञ-फल खण्डित हो जाने का भय था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *