आर्य राज्य-व्यवस्था
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आर्य राज्य-व्यवस्था

आर्य राज्य-व्यवस्था

आयों में राजा और राज्य-व्यवस्था प्रणाली आरम्भ होने से पूर्व भारत में तात्कालिक सामाजिक दशा अनेकों क्षेत्रों में व्यवस्था ग्रहण कर चुकी थी। संस्कृति का आरम्भिक रूप पर्याप्त ज्वलंत है। जिन सिद्धान्तों का उल्लेख उन काल-ग्रन्थों में आरोपित है, वे आज भी अक्षुण्ण बने हैं । इस संस्कृति के मध्यकालीन परिवर्तन इसके मूल रूप को नहीं बदल पाए। अनेकों आघात सहन करने के पश्चात् भी वह अस्थिर और अविचलित खड़ी है। इन आघातों से इसका रूप कुछ बिगड़ा अवश्य है परन्तु मूल नष्ट नहीं हो पाया।

ऋग्वेद एक सभ्य तथा व्यवस्थित समाज की सूचना देता है। आरम्भ में बहुविवाह की प्रथा नहीं थी, जिसे कुछ राजवंशों ने खण्डित किया, बहुविवाह प्रणाली अपनाई, परिणाम कष्टप्रद ही सामने आए। विवाह को पवित्र बन्धन माना गया था निस्सन्तान विधवाओं को पुनर्विवाह की छूट थी। विवाह इत्यादि पर कुछ देन-लेन की प्रथा थी परन्तु वह वर्तमान दहेज-प्रथा से भिन्न थी। पुत्रियों के लिए विवाह अनिवार्य था। वे अपने पितृ-गृह में ही रहती थीं। विवाह पशचात् वे अपने पति के घर चली जाती थीं। धार्मिक अनुष्ठानों में पति-पत्नी समान सहयोगी होते थे। बाल-विवाह की प्रथा नहीं थी। पत्नी-पति की अर्धांगिनी होती थी लड़की के लिए पति की खोज करना पिता का धर्म तथा दायित्व था। इस विषय में लड़की को भी अपना
वर चुनने की स्वतन्त्रता थी।

पिता कुटुम्ब का मुख्य व्यक्ति होता था। परिवार के दायित्व-पालन और संचालन पर उसका पूर्ण अधिकार था। अपने बच्चों के विवाह इत्यादि वही कराता था। वही कुटुम्ब की सम्पत्ति का स्वामी माना जाता था। बच्चे को गोद लेने की भी प्रथा थी। पुत्रहीन पिता अपनी सम्पत्ति अपनी पुत्री के नाम न करके दौहित्र के नाम करता जाति-पांति के बन्धन नगण्य थे। वर्ण शब्द का प्रयोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के ही लिए किया गया है। इन तीनों में अन्तर्जातीय विवाहों की व्यवस्था थी।

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व्यवसाय-कर्म के आधार पर द्रविड़ों में जाति-प्रथा आरम्भ हुई। ऋग्वेद-काल में ब्राह्मण पठन-पाठन, चिन्तन, अध्ययन तथा धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त रहते, क्षत्रियों का काम युद्ध करना था वैश्य-कृषि-वाणिज्य को देखते। आयों का मुख्य कार्य खेती तथा पशु-पालन था इसी से इनके भोजन की व्यवस्था होती थी। दूध तथा दूध से बने भोजन, दलिया, चावल इत्यादि का सेवन करते, घी लगी रोटियां इन्हें प्रिय थीं। बलि किए गए पशुओं के मांस का भी भक्षण करते। गाय पवित्र मानी जाती थी सोम और सुरा का भी सेवन होता था। सुरा पीने का निषेध भी किया गया है।

व्यवसाय की दृष्टि से कृषि और गौ-पालन के अतिरिक्त बढ़ईगीरी, सुनारगीरी, शिल्पकारी, चर्मकारी, जुलाहागीरी का भी प्रचलन था इन कामों के नामों के उल्लेख से इनकी विद्यमानता का आभास स्पष्ट है। आर्य दासों को अपनी सेवा में रखकर अनेकों व्यवसाय करते-कराते थे। उस समय अनेक धातुओं का न्यूनाधिक प्रयोग होने लगा था। स्वर्ण और रजत के आभूषण बनते, पात्रों और यंत्रों के लिए अयस् धातु का प्रयोग किया जाता। संस्कृत में अयस् लोहे को कहते हैं। आर्य यंत्र और पात्र-निर्माण कला से भिज्ञ थे। निवास के लिए सुन्दर शालाओं का निर्माण होता। उनका निर्माण लकड़ी से किया जाता था। वेदों में भवन-निर्माण का सुन्दर वर्णन है।

इस काल तक आते-आते वस्त्र-निर्माण कला में भी दक्षता प्राप्त कर ली गई थी। ये लोग सूत कातने और वस्त्र बुनने में भी प्रवीण हो गए थे वस्त्रों के लिए ऊन और रेशम दोनों का प्रयोग किया जाता था स्त्री-पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। व्यापार में वस्तु-विनिमय का प्रयोग होता था। सिक्कों का प्रचलन नहीं था। व्यापार के लिए लोग जल और स्थल, दोनों मार्गों का प्रयोग करते थे। मनोरंजन के साधनों में रथों की दौड़ प्रमुख थी। गायन, नृत्य और द्यूत-क्रीडा मनोरंजन के अन्य साधन थे।

इस काल में आकर इन्द्र, मित्र, वरुण और यम इत्यादि देवताओं की पूजा होने लगी थी। इन्हें सन्तुष्ट करने के अनेकों विधान थे। ईश्वर की एकता के तथ्य से भी वे परिचित थे। वे इन सब देवताओं में एक ही ईश्वर का रूप देखते। संसार को पैदा करने वाला, पालन करने वाला और संहार करने वाला वे ईश्वर को ही मानते।

आर्य राज्य-व्यवस्था

अनुश्रुति के अनुसार मनु और उसके वंशजों ने हजारों वर्ष पूर्व भारत में एक राज्य- व्यवस्था आरम्भ की। यह प्रथम राज्य-संस्था बनी, जिससे पूर्व इस भूमि पर न कोई राजा था और न कोई शासन-प्रणाली। कोई समुचित व्यवस्था भी यहां विद्यमान न थी। पुराणों के अनुसार छह मन्वन्तरों का संक्षिप्त इतिहास लिखा जा चुका था। स्वायम्भुव मनु से ताक्षुष तक छह मनुष्यों के पश्चात् मनु ने जन्म लिया। उनके पिता का नाम विवस्वान् था। उनको दक्ष प्रजापति और अदिति ने जन्म दिया। विवस्वान् के पुत्र होने के कारण मनु को वैवस्वत मनु भी पुकारा जाता है।

मनु के दस पुत्र हुए, जिनके नाम इक्ष्वाकु, नृग, घृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, नाभाग, दिष्ट, करुष और प्रषध्न थे मनु और उनके इन पुत्रों ने, पुराणों में कहा गया है, समस्त विश्व पर राज्य स्थापित कर उसे सुसंचालित किया। इन मनु-सन्तानों ने स्थान-स्थान पर जा-जाकर अपनी विजयों से अपार ख्याति-यश अर्जित किया।

मनु की वंश परम्परागत बहुत सी सन्तानें विश्व में फैलीं, उनके भिन्न-भिन्न नामों से अनेक राजवंश विश्व में फैले। अयोध्या में जिस राजवंश का प्रभुत्व स्थापित हुआ वह सूर्यवंश कहलाया।

मनु के एक पुत्री थी, जिसका नाम इला था। उसका चन्द्रमा-पुत्र बुध से प्रणय- सम्बन्ध बना। उसके गर्भ से पुरुरवा पुत्र ने जन्म लिया। पुरुरवा से जो वंश चला गौरवशाली और विशाल शक्ति-सम्पन्न था मनु के वंशज मानव और इला के वंशज ऐल कहलाए। मानवों और ऐलों से सम्बन्धित एक तीसरे कुल ने जन्म लिया। उसके संस्थापक सुद्युम्त थे, जिनके उत्कल, गय और विनत तीन पुत्र जन्मे। इस प्रकार तीनों का विस्तार आरम्भ हुआ। इक्ष्वाकु वंश के उत्तराधिकारी थे। पश्चात् विकुक्षि अयोध्या राजसिंहासन इक्ष्वाकु मनु के उत्तराधिकारी थे। इस बीच दण्डक ने विंध्याचल के दक्षिण में दण्डकारण्य नाम से अपना राज्य स्थापित कर लिया था।

इक्ष्वाकु ने एकत्रित कर लाने का आदेश दिया। पूरा दिन कार्यालग्न रहने के कारण विकुक्षि लगी। उसने जो बहुत से पशु-पक्षियों का मांस एकत्रित किया था, उसमेंसे एक खरगोश का मांस खा लिया और शेष सब मांस लाकर अपने पिता को दे दिया। बीच में मांस खाने की बात किसी प्रकार ब्राह्मणों को मालूम हो गई। उन्होंने क्रुद्ध होकर राजा से कहा, ‘श्राद्ध-कर्म में उच्छिष्ट मांस अभक्ष्य है।” राजा को जब तथ्य की सूचना प्राप्त हुई तो उन्होंने विकुक्षि को अपने घर से निकाल दिया। निर्वासन दण्ड देते समय राजा ने विकुक्षि से कहा, ‘तुम ब्राह्मणों को उच्छिष्ट के दोषी होने के कारण राज्य-कर्म के अयोग्य हो’ और तभी वशिष्ठ ने विकृक्षि का नाम शशाद रख दिया, क्योंकि उसने खरगोश का मांस खा लिया इक्ष्वाकु ने युवराज विकुक्षि को वन-प्रदेश से कुछ मांस, श्राद्ध के लिए, इक्ष्वाकु पर्याप्त समय राज्य करने के पश्चात् मृत्यु को प्राप्त हो गए। उनकी मृत्यु-पश्चात् विकुक्षि वन से लौट आए। उसके पश्चात् उन्होंने नीतिपूर्ण सुराज्य किया। विकुक्षि के विषय में अन्य भी कई कथाएं हैं। ये कथाएं विष्णु-पुराण में वर्णित हैं जो मनोरंजक और रोचक हैं। विकुक्षि के बाद अयोध्या के राजसिंहासन पर उसका परमप्रतापी राजा परंजय बैठा। उस समय उत्तर भारत में देव जाति का राज्य था। उन पर दक्षिण दिशा में कृष्णवर्ग के राक्षस आक्रमण करते रहते थे। इससे देव जाति के लोग परेशान थे।

आक्रमण करने वाले राक्षसों का सामना करने के लिए देवों ने परंजय के नेतृत्व में योजना बनाई तथा सेना संगठित की। उन्होंने परंजय से विनय की कि वह राक्षसों का संहार कर देवों की रक्षा करें। परंजय ने देवताओं की रक्षा के लिए युद्ध करना स्वीकार कर लिया। देवताओं ने उन्हें हर्षोल्लासपूर्वक अपने कंधों पर उठा लिया।परंजय की वीरता के कारण देवों को युद्ध में विजय प्राप्त हुई। इसके पश्चात कुकुत्सय की देवराज से घनिष्ट मित्रता हो गई। वैसे देवों की अयोध्या-नरेशों से मैत्री परम्परागत है।

श्रावस्त

परंजय से छठी पीढ़ी में श्रावस्त नामक राजा गद्दी पर बैठा। उसने एक नगरी बसाई, जिसका नाम श्रावस्ती पड़ा। यह रावी नदी के किनारे पर अयोध्या से 58 मील की दूरी पर स्थित है। आजकल इसे सहेत-मनेत कहकर पुकारते है। कुछ समय पश्चात् अयोध्या के राजा, अयोध्या छोड़कर, श्रावस्ती आकर बस गए थे और वहीं राज्य करने लगे थे। गौतम बुद्ध बहुत दिनों तक श्रावस्ती में रहे थे वहां ही उन्होंने तत्कालीन राजा प्रसेनजित को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। श्रावस्त का पौत्र भी एक बलशाली राजा हुआ है। उसने उच्छङू ऋषि को तृस्त करने वाले धुन्ध राक्षस का वध किया था इसी से उसे धुंधमार कहने लगे मान्धाता कुवलयाश्व से सातवीं पीढ़ी में यौवनाश्व एक प्रतापी राजा हुआ। चन्द्रवंशी राजा मलिनार उसका सम सामयिक था। उसकी पुत्री गौरा का विवाह यौवनाश्व से हुआ। गौरा से जिस पुत्र ने जन्म लिया, उसका नाम मान्धाता था। मान्धाता सूर्यवंशी राजाओं में महान प्रतापी और ख्याति प्राप्त हुए हैं। उन्होंने अनेकों विजय प्राप्त की और चक्रवर्ती राजा बने। उन्होंने विशाल साम्राज्य स्थापित किया। मान्धाती को त्रसदस्यु भी कहा जाता है। वह इसलिए कि उन्होंने अपने राज्य से दस्युओं को पूरी तरह जड़-मूल से ट करा दिया था। उन्होंने नर्मदा और यमुना किनारे के भू-भाग पर विजय प्राप्त की और अपने राज्य में मिला लिया। मान्धाता ने पश्चमी प्रदेश में दस्यु के वंशज अरुद्ध को युद्ध-भूमि में पछाड़ कर मार डाला था। परिणामस्वरूप पश्चिमी प्रदेश भी इनके प्रशासन के अन्तर्गत आ गया। मान्धाता के प्रशासन-काल में अयोध्या धन- धान्यपूर्ण था और इसका प्रभुत्व चतुर्दिक हो गया था उसने अपने बल-वैभव से महान ख्याति प्राप्त की। उसकी समृद्धि चरम सीमा पर थी।

मान्धाता ने इतनी महान सफलताएं अपने श्वसुर के सहयोग से प्राप्त की थीं। नर्मदा के तट तक साम्राज्य विस्तार में उनका विशेष योग रहा। राजस्थान में हिन्ता और दुन्दिया में मान्धाता का नाम आज भी विशेष आदर से लिया जाता है। उनका बसाया तीर्थ ओंकार मान्धाता अभी भी मौजूद है। प्रतापगढ़ जिले में मान्धाता नाम का एक ग्राम है। उसे सम्भव है मान्धाता ने बसाया होगा। महाराजा मान्धाता का ऋग्वेद में भी उल्लेख मिलता है ।
मान्धाता ने एक बार देव राज्यों पर आक्रमण की तैयारी की तो देवराज ने उनसे पहले राक्षसों पर ही विजय प्राप्त करने की बात कही। राक्षसों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के पश्चात् वह देवराज पर भी आक्रमण कर सकते हैं। मान्धाता देवराज की बातों के चक्कर में आकर भ्रमित हो गए। उन्होंने यमुना किनारे बसे राक्षसों पर धावा बोल दिया।

राक्षस बड़े बलवान थे वे शत्रु पर लोहे की छड़ों से वार करते थे। राक्षसराज ने मान्धाता पर लौह त्रिशूल का प्रहार किया। इस युद्ध में महाराज मान्धता वीरगति को पहुंचे मान्धाता की बहुत सी पुत्रियां थीं, जो सौमरि ऋषि को ब्याही थीं । इस विवाह के विषय में पुराणों में लोमहर्षक तथा अतिरंजनापूर्ण कथाएं हैं। मान्धाता के तीनू पुत्र थे, पुरुकुत्स, अम्बरीश और मुधकुन्द। पुरुकुत्स अपने पिता के स्थान पर आसौंने हुए। वह मान्धाता के समान ही पराक्रमी तथा बलशाली थे। मान्धाता की अचानक मृत्यु के कारण पुरुकुत्स को दुर्बल समझ, गन्धर्व जाति के लोगों ने मध्यभारत के नागवंशियों पर विजय प्राप्त कर ली। उनका प्रदेश अपने अधिकार में ले लिया। इस स्थिति में नागवंशियों ने महाराज पुरुकुत्स की शरण ली। पुरुकुत्स ने गन्धर्वो को परास्त कर नागर्वशियों का राज्य उन्हें लौटा दिया। नागवंशियों ने अपनी कन्या नर्मदा का विवाह पुरुकुत्स से कर दिया, जिसके गर्भ.से पौरा कन्या ने जन्म लिया। जिसका युवती होने पर पुरुकुत्स ने कान्यकुब्ज से विवाह कर दिया।

हरिश्चन्द्र

कुछ पीढ़ी पश्चात् इसी वंश के राजा हरिश्चन्द्र ने महान ख्याति प्राप्त की। यह महाराज त्रिशंकु के पुत्र थे। उनकी रानी का नाम शैव्या था । पर्याप्त समय राज्य करने के पश्चात् भी उनके पुत्र ने जन्म न लिया तो उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठ के परामर्श से वरुण देवता की पूजा की और प्रण किया कि यदि उनके सन्तान हुई तो वह अपने पहले पुत्र को वरुणदेव के अर्पण कर देंगे। भाग्यवश रानी गर्भवती हुई और उनके गर्भ से पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम रोहिताश्च रखा गया। जब पुत्र बड़ा हुआ तो पिता ने उसे वरुण देवता को भेंट देना चाहा। जब पुत्र को यह सूचना मिली तो वह घर से भाग गया । उसके कुछ दिन पश्चात् पिता के पेट में भयंकर दर्द हुआ। तब फिर बलि देने की बात आई और पुरोहित ने कहा कि किसी ब्राह्मण- पुत्र की बलि दी जाए।

एक नृशंस ऋषि अजीगर्त ने अपने पुत्र शुन:शेफ को कुछ धन लेकर बलि देना स्वीकार कर लिया। उसके पुत्र को एक खम्भे से बांधा गया। बालक मृत्यु के भय से भयभीत हो कर जोर-जोर से चिल्लाया। उस भयंकर चीत्कार को विश्वामित्र द्रवित हुए और कहा कि उसे वरुणदेव की प्रार्थना करनी चाहिए। उसकी प्रार्थना करने से राजा की पीड़ा शान्त हो गई। परिणामस्वरूप यज्ञ में बलि देना स्थगित प्रभाव से रोहिताश्व भी लौट आया।


उसके पश्चात् चिरकाल तक राजा हरिश्चन्द्र अपनी अपार दानशीलता के लिए प्रसिद्धि पाते रहे। उन्होंने अपने कुलगुरु वशिष्ठ को अपार दान-दक्षिणा दी, उन्हें सन्तुष्ट किया। उन्हें राजा ने इतना धन दिया कि वह अपार वैभवशाली बन गए। विश्वामित्र ने वशिष्ठ की यह समृद्धि देखी तो उनके मन में ईष्ष्या उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने मन में निश्चय कर लिया कि वह महाराज हरिश्चन्द्र से उनका समस्त राज-पाट दान में मांगेंगे। दान लेने के पश्चात् वह ऊपर से दक्षिणा भी मांगेंगे। उन्होंने इस प्रकार राजा हरिश्चन्द्र की गहन परीक्षा लेने का निश्चय कर लिया। महाराजा हरिश्चन्द्र को विश्वामित्र के इस निर्णय के विषय में कोई ज्ञान न था। कुछ दिन पश्चात् राजा हरिश्चन्द्र आरखेटाथ वन में गए। वन बहुत भयानक था।

उसके रास्ते दुर्गम थे। वहां विश्वामित्र से उनकी भेंट हुई। वहां बातों-बातों में राजा ने अपना सब राजपाट मुनि को देने का संकल्प कर लिया। संकल्प लेने के पश्चात्व ह अपनी राजधानी लौट आए। उनके राजधानी में पहुंचने पर एक दिन मुनि विश्वामित्र राजधानी में आए और उनसे प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए कहा। राजा ने अपना सब राजपाट विश्वामित्र को सौंप दिया। इसके परचात् जब दक्षिणा देने की बात आई तो उनके पास कुछ शेष न था उस समय दक्षिणापूर्ति के लिए राजा, रानी और उनके पुत्र को काशी लाया गया, जिससे उन्हें बेचकर दक्षिणा दी जा सके।

हरिश्चन्द्र की रानी को एक ब्राह्मण ने अपनी दासी बनाने के लिए खरीदा। राजा हरिश्चन्द्र को एक चाण्डाल ने मोल लिया। राजा को मुर्दघाट पर मृतकों के कफन लेने के लिए नियुक्त किया उस चाण्डाल ने। राजा हरिश्चन्द्र चाण्डाल के दास बन गए। वह मृतकों से चाण्डाल कर उघाने लगे। ये कार्य करते अधिक समय न बीता था कि एक और दुर्घटना घटी। हरिश्चन्द्र के दैवात् पुत्र रोहिताश्व को एक सर्प ने डस लिया। रानी शैव्या अपने मृतक पुत्र को दफनाने के लिए स्मशान घाट पर गई तो वहां राजा हरिश्चन्द्र ने अपनी छाती पर पत्थर रखकर शैव्या से भी श्मशानघाट-कर मांगा। रानी ने रो-रोकर अपनी करुणा गाथा चाण्डाल सुन कर दिया गया। यज्ञ को सुनाई परन्तु उस पर उसका कोई प्रभाव न हुआ। वह अपना कर छोड़ने को उद्यत न था। उसने कहा, ‘स्वामी के कर को छोड़ना अधर्म है। मैं यह अधर्म नहीं कर सकता।’ तभी दैवात् रोहिताश्व जी उठा। महाराजा और महारानी के इस साहसपूर्ण धेर्य और धर्माचरण का शोर मच गया। विश्वामित्र ने उनका राज्य- उन्हें वापस लौटा दिया। उसके पश्चात् भी कितने ही वर्ष तक महाराजा हरिश्चन्द्र ने निर्भय होकर राज्य किया।

सगर

हरिश्चन्द्र के पश्चात् पांच पीढ़ी तक अन्य कोई प्रतापी राजा नहीं हुआ। छठी पीढ़ी में बाहु नाम का बलशाली राजा हुआ। उसके शासन-काल में हैहय और तालजंघ नाम के राजाओं ने उस पर आक्रमण किया शत्रुओं के आघात को रोकने में बाहु असमर्थ रहे। वह अपनी गर्भिता पत्नी के साथ राजधानी छोड़ कर और्व मुनि के आश्रम में गए। बाहु ने अपमानित महसूस कर प्राण त्याग दिया उनकी गर्भवती पत्नी ने पुत्र सगर को जन्म दिया। ऋषि ने सगर की माता को पुत्री समान अपनेनपास रखकर वेद-शास्त्रों का ज्ञान कराया।

राजकुमार सगर एक शूरवीर योद्धा प्रमाणित हुआ। उसने अपने शत्रु हैहय और तालजंघ से भयंकर युद्ध कर उन्हें विनाश के गर्त तक पहुंचा दिया। वह उनका सपरिवार विनाश करना चाहते थे, परन्तु मुनि वशिष्ठ ने दया भाव से उन्हें संस्कारच्युत कर बन्धनमुक्त कर दिया। सगर ने अद्भुत वीरतापूर्ण कृत्य कर अपने राज्य को फिर से सुगठित कर लिया। उनकी अपार विजयों से राज्य की सीमाओं का भी विस्तार हुआ। महाराजा सगर ने दो विवाह किए उनकी रानियों के नाम केशिनी और सुमति थे। केशिनी ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। महाराजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया, जिसमें देव जाति के राजा ने अश्व को चुरा कर उत्तर दिशा में कपिल ऋषि के आश्रम में बांध दिया। सुमति- पुत्र घोड़े को खोजता- खोजता आश्रम में पहुंचा। वहां घोड़े को देखकर वह ऋषि पर क्रद्ध हुआ और उन्हें कुछ अपशब्द कहे। इस व्यवहार से कपिल ऋषि क्रुद्ध हुए। इससे दैवात अग्नि प्रज्वलित हुई और उसमें राजकुमार भस्म हो गए।

जब चिरकाल तक राजकुमार घोड़ा लेकर न लौटा तो महाराजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को उसकी खोज में भेजा। वह खोजता-खोजता कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचा तो उसने सुमति पुत्र को वहां मृत पाया। वह घोड़े को लेकर महाराजा सगर के पास पहुंचा और पूर्व दुर्घटना का आद्योपांत ब्यौरा दिया। इसी शोकपूर्ण स्थिति में सगर ने यज्ञ की अन्तिम आहुति दी।

महाराज भगीरथ

महाराज भगीरथ-काल में गंगा का आविर्भाव हुआ। इन्हीं के नामाधार पर गंगा को भगीरथी भी कहा जाता है। क्योंकि गंगा के आने में भगीरथ का महत्त्वपूर्ण योगदान था। इनके अतिरिक्त भी कुछ सम्राट हैं, जिनका भगीरथी को पृथ्वी पर लाने में योग रहा। गंगा के पवित्र जल को देखकर उन महानुभावों की याद ताजा हो जाती भगीरथ से पांचवीं पीढ़ी तक कोई उल्लेखनीय राजा न हुआ। इस बीच की कोई अन्य उल्लेखनीय घटना भी नहीं है।

दिलीप

महाराजा दिलीप के वृद्धावस्था तक जब कोई सन्तान न हुई तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से गौ सेवा आरम्भ की। उनकी रानी सुदक्षिणा ने भी गौ-सेवा में भाग लिया। फलस्वरूप वह गर्भवती हुई और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम रघु रखा। जब राजकुमार युवक हुआ तो उन्होंने 99 अश्वमेघ यज्ञ किए। जब वह 100वां यज्ञ करने लगे तो यज्ञ का अश्व देवराज इन्द्र ने रोक लिया। उस अश्व के रक्षक राजकुमार रघु थे। उन्होंने अपने यज्ञ के घोड़े को इस प्रकार पकड़ते देख भयंकर युद्ध करके देवराज इन्द्रं के भी छक्के छुड़ा दिए। देवराज इन्द्र युवक की वीरता देख मुग्ध हो गए। उन्होंने अपने सैनिकों को तुरन्त युद्ध बन्द करने का आदेश दिया और अश्वमेध यज्ञ का. घोड़ा लौटा दिया। इस घटना के फलस्वरूप देवराज इन्द्र से अयोध्या-महाराजा के घनिष्ठ मैत्री-सम्बन्ध बने।

महाराजा दिलीप की मृत्यु के पश्चात् रघु सूर्यवंश के राजसिंहासनाधिकारी बने। उन्होंने अपने चारों ओर के राजाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए एक विशाल विजय- अभियान की व्यवस्था की और अजेय सेना का गठन किया। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी विशाल सेना लेकर पूर्व दिशा में प्रस्थान किया और छोटे-मोटे राज्यों को समाप्त करते हुए आगे बढ़ने लगे। उन्होंने सुह्य और बंग पर विजय प्राप्त करने में अधिक समय न लगाया। उसके पश्चात् पाण्ड्य और केरल को अपने आक्रमण का लक्ष्य बनाया। पश्चिमी अभियान में पासीक, यवन, हूण और काम्बोजों पर हमला कर उन्हें पराजित किया। उन्होंने इस प्रकार अपने राज्य का तीव्र गति से विस्तार आरम्भ किया। इसके पश्चात् हिमालय की कुछ जातियों पर आक्रमण किया और उन्हें पराजित कर अपने राज्य में मिलाया। उनका विजय-अभियान चारों दिशाओं में सफल रहा। रघु अपना विशाल साम्राज्य स्थापित कर चक्रवर्ती सम्राट बने।

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