Posted in: आधुनिक विश्व का इतिहास

All about प्रतिवादी धर्मसुधार

All about प्रतिवादी धर्मसुधार

प्रोटेस्टेण्ट धर्मसुधार आन्दोलन की सफलता के बाद सन् 1540 ई. के आस-पास ऐसा प्रतीत होने लगा था कि पारस्परिक कैथोलिक ईसाईवाद अपनी आखिरी साँसे गिनने की कगार पर आ गया है। उत्तरी एवंकेन्द्रीय जर्मनी, लूथरवाद के प्रभाव में कैथोलिक धर्म को अस्वीकार कर चुका था। स्कैन्डिनेविया पूरी तरह से लूधरवादी हो चुका था। हंगरी, पोलैंड एवं लिथ्युनिया में भी प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार आन्दोलन का स्वागत हो रहा था स्विट्जरलैंड के अधिकांश क्षेत्रों में ज्विगली एवं काल्विन के सिद्धान्तों को स्वीकार किया जा चुका था।


फ्रांस में भी काल्विनवादियों को सफलता मिल रही थी। इटली एवं स्पेन के कुछ क्षेत्रों में भी धर्मसुधार आन्दोलन की लहर चल रही थी। कुल मिलाकर यूरोप के परिदृश्य पर स्थिति यह थी कि कैथोलिकवाद के सीने में गहरा घाव किए हुए, प्रोटेस्टेण्ट धर्म की विजय-पताका ग्वोन्नत होकर लहरा रही थी।

प्रोटेस्टेण्ट ईसाई मत की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखकर कैथोलिक धर्माधिकारियों के खेमे में
घबराहट फैल गई, और अपने अस्तित्व को संकट से बचाने के लिए, उन्होंने कैथोलिक ईसाई धर्म में एक
गम्भीर सुधार का कार्यक्रम चलाया कैथोलिक ईसाई धर्माधिकारियों द्वारा प्रोटेस्टेण्टवाद की चुनौती का मुकाबला करने के लिए, अपनाए गये धर्मसुधार कार्यक्रम को ‘प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन’ (Counter Reformation) या ‘कैथोलिक धर्मसुधार आन्दोलन’ कहा जाता है । यह ‘प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन’ दो रूपों में व्यक्त हुआ-रक्षात्मक एवं आक्रामक। इसके रक्षात्मक पथ के अन्तर्गत कैथालिक चर्च की आधारभूत मान्यताओं को त्यागे बिना, उसके स्वरूप में शुद्धता तथा नैतिकता लाने का प्रयास किया गया। इसके आक्रामक स्वरूप में कैथोलिक अनुयायियों ने प्रोटेस्टेंट धर्मप्रचारकों का दमन करने का प्रयास किया एवं प्रोटेस्टेण्ट धर्म के अधिकार में चले गये भू-क्षेत्रों को पुनः अपने अधिकार क्षेत्र में लेने का प्रयास किया। कैथोलिक धर्मसुधार का रक्षात्मक रूप पोप पॉल तृतीय के प्रयासों तथा ट्रैण्ट की काउंसिल के निर्णयों के रूप में अभिव्यक्त हुआ, तथा इसका आक्रामक रूप जेसुइट संघ की गतिविधियों एवं ‘इन्क्वीजिशन’ तथा ‘इण्डैक्स’ की दमनात्मक कार्यवाहियों के रूप में प्रतिवादी सुधार आन्दोलन की इस दुनाली या दुधारी प्रक्रिया के फलस्वरूप, पारम्परिक कैथोलिक ईसाई धर्म ने, अपने को पुनर्स्थापित करने में, अनेक क्षेत्रों में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली । इटली, दक्षिण जर्मनी, स्पेन, फ्रांस तथा कुछ अन्य देशों में कैथोलिक धर्माधिकारी पुनः अपनी जड़ें जमाने में कामयाब हो गये।

कैथोलिक धर्मसुधार/प्रतिवादी धर्मसुधार की प्रेरक परिरिथितियाँ

यह मानना ठीक नहीं है कि कैथोलिक धर्मसुधार के मूल में एकमात्र प्रोटेस्टेण्ट धर्म द्वारा प्रस्तुत चुनौती थी। प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन की सफलता ने कैथोलिक धर्म सुधार की तात्कालिक आवश्यकता को अवश्य रेखांकित किया तथा प्रतिवादी धर्मसुधार की प्रक्रिया को गतिवंत तथा तीव्रतर बनाया, लेकिन कैथोलिक धर्मसुधार की पृष्ठभूमि में अनेक अन्य पूर्ववर्ती परिस्थितियाँ भी विद्यमान थीं जैसा कि ल्यूकस (रिनेसा एंड दि रेफमेशन) धर्मसुधार आंदोलन एवं प्रतिवादी धर्मसुधार ने लिखा है कि, ‘प्रोटेस्टेण्टवाद का उदय कैथोलिक धर्मसुधार का एक कारण था, लेकिन एकमात्र या अत्यधिक नहीं।’ इसे ही एकमात्र महत्त्वपूर्ण कारण मान लेना अतिशयोक्तिपूर्ण कथन होगा। कैथोलिक धर्म सुधार के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों को उत्तरदायी माना जा सकता है :

निम्न वर्गों में पारम्परिक कैथोलिक धर्मनिष्ठा की दृढ़ता : यूरोप में ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी पारम्परिक कैथोलिक ईसाई धर्म के प्रति निष्ठावान बने रहे। नगरों एवं कस्बों में जहाँ प्रोटेस्टेण्टवाद की लहर चल रही थी, ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी उससे अधिक प्रभावित नहीं रहे और अपने पीढ़ीगत विश्वासों के प्रति आस्थावान बने रहे। अनेक क्षेत्रों में प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन मूलतः एक बुर्जुआ आन्दोलन बना रहा।

स्पेन के राजाओं एवं अन्य राजकीय परिवारों का कैथोलिक धर्मोत्साह : कैथौलिक धर्मसुधार सक्रिय रूप में सबसे पहले स्पेन में आरम्भ हुआ स्पेन, ईसाई रहस्यवादी चिनतन का गढ़ रहा था यहाँ के प्रमुख ईसाई रहस्यतादी थे फ्रेन्सेस्को डि ओसुना (मृत्यु 1540 ), सेन पेड्रो डे अलकेन्टरा ( 1499 1562 ), जुआन डे अविला (1500-1569), क्रास के सेंट जॉन (1542-91), एवं लुई डे लिओन (1528-91) । इन ईसाई रहस्यवादियों ने कैथोलिक ईसाई धर्म के सिद्धान्तों को सरल एवं व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत कर उन्हें जनमानस में दृढ़ बना दिया। स्पेन के कई राजा कट्टर कैथोलिक धर्मावलम्बी थे, और कैथोलिक ईसाई धर्म के प्रति निष्ठा स्पेन के राष्ट्रवाद का एक प्रमुख तत्व था। इस सम्बन्ध में स्पेन की रानी ईसाबेला का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिसने स्पेनवासियों को, कैथोलिक ईसाई धर्म को ही एकमात्र धर्म के रूप में स्वीकार करने के प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पुनर्जागरणयुगीन इटली के बुद्धिजीवियों की कैथोलिक धर्मनिष्ठा : यह मानना एक सामान्य भूल होगी कि पुनर्जागरणकालीन सभी मानववादी चिन्तकों ने कैंथोलिक धर्म से नाता तोड़़ लिया । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इटली में मानववाद कैथोलिक परिवेश में ही उदित हुआ एवं इसके समर्थक, औपचारिक तौर पर, कैथोलिक चर्च के प्रति निष्ठावान बने रहे।

नवीन धार्मिक संघ : प्रोटेस्टेण्ट क्रान्ति के काल में कैथोलिक ईसाई धर्म को नये धार्मिक संघों से बड़ा सम्बल मिला। इनमें से कुछ नये धार्मिंक संघ सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए बनाये गये थे, कुछ अन्य संघ प्रोटेस्टेण्ट धर्म का मुकाबला करने के लिए। इन नवीन धार्मिक संघों में उल्लेखनीय हैं-

(1) इटली में सेंट जेरोम एमिलियन द्वारा स्थापित धार्मिक संघ ‘ सोमश्ची’ ; (2) मिलान, इटली में एण्टोनियो
जकारिया (1502-39) द्वारा बनाया गया धार्मिक संगठन ‘ बनाबाइट्स’; (3) महिला एंजेला मेरिसी (1469- 1540) द्वारा स्थापित संगठन ‘उसुलाइन्स’; (4) सेंट केजेतान ( 1480-1547) एवं पिएत्रो करफा (1476- 1559) द्वारा स्थापित संगठन ‘थिएटाइन्स’ ने इटली में कैथोलिक धर्मसुधार के क्षेत्र में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई; (5) सेंट फिलिप नेरी ( 1515-95) द्वारा बनाया गया संघ ‘ओरेटोरियन्स’; (6) सेंट केमिलस डे लेलिस (1550-1614) का संगठन ‘ फादर्स ऑफ ए गुड डेथ; (7) सेंट टेरेसा (मृत्यु 1582) का संघ ‘काम्मेलाइट्स’ तथा (8) इग्नेशियस लोयोला द्वारा संस्थापित ‘जैसुझ्ट संघ’ ।

उपर्युक्त सभी धार्मिक संघों ने कैथोलिक ईसाई धर्म को जनमानस में लोकप्रिय बनाने में सहयोग दिया।
उपर्युक्त अधिकांश संघ समाज सेवा एवं परोपकार के कार्यों से भी जुड़े हुए थे।

पोप पाल तृतीय के नेतृत्व में पोपतंत्र का सुधारात्मक रुख : सन् 1534 ई, में पोप पाल तृतीय के आने के बाद पोपतंत्र ने कैथोलिक धर्म में आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया को बड़े जोशोखरोश के साध प्रारम्भ किया। पोप पाप तृतीय का मानना था कि चर्च के संगठन में अनेक दोष हैं और इन दोषों को दूर करने का निर्णय एक सामान्य सभा के माध्यम से किया जाना चाहिए इसी उद्देश्य से ट्रैण्ट की काउंसिल (1545-63) बुलाई गई, जो कैथोलिक धर्मसुधार की प्रक्रिया में मील का पत्थर साबित हुई।

प्रतिवादी धर्मसुधार/केथोलिक धर्मसुधार रक्षात्मक रूप

जैसा कि हमने ऊपर लिखा है, कैथोलिक धर्मसुधार दो रूपों में व्यक्त हुआ रक्षात्मक एवं आक्रामक। अपने रक्षात्मक रूप में कैथोलिक धर्माधिकारियों ने अपने धर्म के सिद्धान्तों एवं उसकी आचार- पद्धति का पुनर्मूल्यांकन किया, तथा अपने धर्म को अनैतिकता एवं अनाचार के उन दोषों से मुक्त करने का प्रयास किया जिनके कारण कैथोलिक ईसाई धर्म बदनाम हो चुका था । कैथोलिक ईसाई धर्म द्वारा चलाया गया यह आन्तरिक शुद्धिकरण का अभियान स्पष्टत: प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नयी चकाचौंध के समक्ष, अपने धर्म को सुरक्षित बनाए रखने के लिए चलाया गया था, यद्यपि आन्तरिक सुधार की माँग पहले भी की जाती थी। लेकिन इस दिशा में कोई गम्भीर प्रयास नहीं किया गया था इससे पूर्व कैथोलिक ईसाई धर्माधिकारी अपने एकछत्र धार्मिक साम्राज्य के नशे में चूर थे, वे अपने आचरण को नैतिकता की परिभाषाओं से मुक्त मानने लगे थे। प्रोटेस्टेण्ट धर्म का बिगुल बजते ही उनकी तन्द्रा टूटी।

पोप पॉल तृतीय के प्रयास: कैथोलिक चर्च के आन्तरिक सुधार की दिशा में प्रथम सकारात्मक प्रयास पोष पॉल तृतीय ह्वारा किये गये नवम्बर, 1534 में उसने पादरी वर्ग की नैतिकता की जाँच करने के लिए एक कमीशन नियुक्त किया। दिसम्बर, 1536 में उसने चर्च के महत्त्वपूर्ण पदों पर योग्य एवं प्रतिभावान
व्यक्तियों को नियुक्त किया चर्च में सुधार की सही दिशा एवं प्रक्रिया को निर्धारित करने के लिए पोप पॉल तृतीय ने नौ ‘कार्डिनल्स’ का एक कमीशन नियुक्त किया जिसने मार्च, 1537 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसका शीर्षक था : ‘ए रिपोर्ट ऑफ दि कार्डनिल्स एण्ड अदर प्रिलेट्स आन दि रिफार्म ऑफ दि चर्च (A Report of the Cardinals and Other Prelates on the Reform of the Church) I में, ‘यह प्रतिवेदन कैथौलिक धर्मसुधार के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है।’ इस प्रतिवेदन के प्राक्कथन में कहा गया है कि चर्च में अधिकांश दोषों का आगमन इस कारण से हुआ क्योंकि चाटुकारों के कहने पर पूर्ववर्ती अधिकांश पोपों ने यह मान लिया कि पोप की शक्ति निरंकुश एवं अन्तिम है । प्राक्कथन के बाद इस प्रतिवेदन के 26 भागों के अन्तर्गत चर्च की ठउन बुराइयों का उल्लेख किया गया जिनके तत्काल निर्मूलन की आवश्यकता थी। इनमें से प्रमुख बुराइयाँ हैं-चर्च की नियुक्तियों में पक्षपात एवं भाई-भर्तीजावाद, सांसारिक मन:स्थिति वाले व्यक्तियों का बिशप एवं पादरी बन जाना, धर्मांधिकारियों की लापरवाही, चर्च की सम्पत्ति से जुड़ा लोभ, भ्रष्ट आचरण, चर्च की अदालतों में घूस देकर अपराधियों का छूट जाना आदि । अप्रैल, 1540 में पोप पॉल तृतीय ने आदेश दिया कि उपर्युक्त प्रतिवेदन द्वारा प्रस्तावित सभी सुधारों को अविलम्ब क्रियान्वित कर दिया जाये, यद्यपि अनेक धर्माधिकारियों ने इसके प्रति अपनी असहमति एवं विरोध प्रदर्शित किया जो भी हो, कैथोलिक धर्मसुधार के क्षेत्र में पोप पॉल तृतीय के प्रयास बहुत सार्थक रहे, यद्यपि अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष था ल्यूकस के शब्दों में, ‘पोप पॉल तृतीय के कार्यों का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि उसने ट्रैण्ट की काउंसिल के कार्यों को अनुप्रेरित किया सभी दोषपूर्ण प्रथाओं का निर्मूलन एक बहुत उग्र कदम हो जाता; पॉल की कुशलता उसके संयम तथा दृढ़ निश्चय के सुन्दर संयोग में निहित थी, तथा उसकी इस योग्यता में कि उसने ऐसे सही व्यक्तियों का चयन किया जिन्हें सुधार के कार्यों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी का अहसास था । पॉल का विश्वास था कि चर्च के सुधार की प्रक्रिया को एक साधारण सभा द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। अन्य धर्माधिकारी किसी साधारण सभा द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें भय था कि ऐसी स्थिति में उनकी शक्ति एवं आमदनी में कटौती हो सकती है। काफी बहस-मुबाहिसे के बाद पॉल ने एक साधारण सभा को आहूत करने का निर्णय लिया। इस साधारण सभा का स्थल जर्मनी और इटली के सीमावर्ती क्षेत्र ट्रैण्ट में रखा गया, जहाँ दिसम्बर, 1545 में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ।

ट्रैण्ट की सभायें (1545-1563) : उन्नीस वर्षों के अन्तराल में (1545-1563 ) ट्रैण्ट में चर्च की साधारण सभा के तीन बड़े अधिवेशन हुए, जिनमें कैथोलिक चर्च में सुधार से सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए और उन्हें क्रियान्वित भी किया गया। ये तीन बड़े अधिवेशन इस प्रकार थे -( 1) प्रथम अधिवेशन (दिसम्बर, 1545 से सितम्बर, 1547); (2) द्वितीय अधिवेशन (मई, 1551 से अप्रैल, 1552 ); तथा (3) तृतीय अधिवेशन (ईस्टर, 1562 से दिसम्बर, 1563) । कैथोलिक चर्च की उपर्युक्त साधारण सभा की बैठकों में प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों को भी आमन्त्रित किया गया था, उन्हें बहस में भाग लेने का अधिकार दिया गया, मतदान का नहीं। प्रोटेस्टेण्टों ने इस निमन्त्रण को स्वीकार नहीं किया। बहरहाल, ट्रैण्ट में आयोजित सभाएँ धर्मसुधार के काल की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है और इसने प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन की सफलता के सम्मुख, पतनोन्मुख कैथोलिक धर्म के पुनर्जागरण की दिशा में मील के पत्थर का कार्य किया।

सन् 1563 (ट्रैण्ट में आयोजित अन्तिम अधिवेशन की समाप्ति की तिथि) वस्तुत: कैथोलिक धर्म के इतिहास


अब यह रक एक महत्त्वपूर्ण तिथि है। ट्रैण्ट की सभाओं में कैथोलिक ईसाई धर्म के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों की, प्रोटेस्टेण्ट धर्म द्वारा प्रस्तुत चुनौतीपूर्ण बिन्दुओं के विशेष संदर्भ में, प्रामाणिक पुनर्व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई तथा ‘कैथोलिक धर्म की आचार-पद्धति को नीतिसंगत, पवित्र तथा दोषमुक्त बनाने का प्रयास किया गया।धर्मसुधार सैद्धान्तिक या धर्मशास्त्रीय स्तर पर, टैण्ट की सभाओं में, कैथोलिक धर्म की परम्परागत एवं आधारभूत मान्यताओं में ही निष्ठा पुनः व्यक्त की गई संत टॉमस एक्विनाज एवं अन्य स्कालिस्टिक विचारकों द्वारा व्याख्यायित कैथोलिक धर्म के सिद्धान्तों को बाइबिल की भांति ही मूलभूत एवं अनिवार्य माना गया आस्था एवं सत्कर्मों से मुक्ति’ (Justification by Faith and g0od works) के कैथोलिक सिद्धान्त को सही घोषित किया गया, और प्रोटेस्टेण्ट धर्म के
‘आस्था से मुक्ति’ (Justification by Faith alone) के सिद्धान्त को अपूर्ण। धर्मग्रंथों की व्याख्या करने के अधिकार को चर्च के लिए आरक्षित माना गया और इस प्रोटेस्टेण्ट मान्यता को सही नहीं माना कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना पादरी हो सकता है। मनुष्य की मुक्ति के लिए, कैथोलिक परम्परा द्वाराननिर्धारित सात संस्कारों को आवश्यक माना गया ।

शुद्धिकरण (purgation), दण्डमोचन (indulgences) तथा मूर्तिपूजा के सिद्धान्तों का महत्त्व भी यथावत् स्वीकार किया गया इस प्रकार ट्रैण्ट की सभाओं ने कैथोलिकनचर्च की परम्परागत धर्मशास्त्रीय सैद्धान्तिकी के आधार को नहीं छोड़ा, और प्रोटेस्टेण्ट धर्म के सिद्धान्तों से अपना स्पष्ट विभेद बनाये रखा। सर्वोच्च धर्माधिकारी के रूप में पोप की प्रतिष्ठा को भी स्वीकार किया गया, यद्यपि सभा के स्पेनवासी बिशप पोप की सत्ता को सभा के अधीन करना चाहते थे। ट्रैण्ट की परिषद् ने यह प्रस्ताव पारित किया कि पोप चर्च का प्रधान है और सभी सिद्धान्तों का अन्तिम व्याख्याता है। धर्मग्रन्थों का अर्थ लगाने का अधिकार सिर्फ चर्च को ही है। लेकिन दूसरी ओर व्यावहारिक स्तर पर, ट्रैण्ट की सभाओं ने कैथोलिक ईसाई धर्म के संगठन एवं अनुशासन-पद्धति के क्षेत्र में अनेक गम्भीर सुधारों की अनुशंसा की, विशेषतः उन दोषों के संदर्भ में जिनके।कारण कैथोलिक धर्म आलोचनाओं का शिकार बना था । ट्रैण्ट की सभाओं में इस दिशा में लिए गये महत्त्वपूर्ण।निर्णय इस प्रकार हैं
(1) ईसाई मठों की जीवनशैली में आमूलचूल सुधार किया जाये । विलासिता एवं अकर्मण्यता के स्थान पर सादगी एवं कठोरता हो।
(2) ऊँचे धार्मिक पदों पर अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्तियाँ बन्द की जाएं।
(3) चर्च के पदों का क्रय-विक्रय समाप्त किया जाये
(4) एक ही व्यक्ति को अनेक धार्मिक पदों पर
नहीं रखा जाये।
(5) चर्च की नियुक्तियों एवं कार्यशैली में भाई-भर्तीजावाद से दूर रहा जाये ।
(6) दण्डमोचन पद्धति (indulgences) के लिए धन नहीं स्वीकार किया जाये
(7) धर्मशास्त्रीय गुरुकुलों की स्थापना की जाये जहाँ पादरियों को सुशिक्षित एवं सुप्रशिक्षित बनाया जाये
(8) जनता की भाषा में भी जब – तब धर्मोपदेश दिए जाने चाहिए। इस प्रकार ट्रैण्ट की सभाओं के निर्णय बड़े ठोस एवं साहसिक थे।

प्रतिवादी धर्मसुधार/कैथोलिक धर्मसुधार : आक्रामक रूप

प्रतिवादी धर्मसुधारकों अर्थात् कैथोलिक धर्मसुधारकों ने जहाँ अपने धार्मिक संगठन को नैतिक शुद्धिकरण
द्वारा रक्षात्मक दृष्टि से सुदृढ़ बना लिया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने प्रोटेस्टेण्ट धर्म के प्रचार-प्रसार को रोकने के
लिए आक्रामक शैली भी अपनाई। अपने इस आक्रामक तेवर के अन्तर्गत कैथोलिक धर्मसुधारकों ने, राजनीतिक सत्ता एवं धार्मिक संगठनों की शक्ति के बलबूते पर, प्रोटेस्टेण्ट प्रचारकों एवं अनुयायियों को निरुत्साहित,।दमित तथा आतंकित करने का प्रयास किया। कैथोलिक धर्मसुधारकों का आक्रामक रूप तीन प्रकार के प्रयासों में व्यक्त हुआ-(1) इग्नेशियसम लोयोला द्वारा स्थापित ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ या ‘जैसुइट संघ’। (2)।धर्मपरीक्षण (‘इन्क्वीजिशन’) तथा, (3) प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची (‘दि इण्डेक्स’) ।

इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्थापित ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ या ‘जैसुइट संघ’ : कैथोलिक धर्मसुधार के क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली तथा वस्तुत: सैनिक पद्धति पर गठित संगठन ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ (Socicty of Jesus) या ‘जैसुइट संघ’ (Order of the Jesuits) था जिसकी स्थपना स्पेन के एक युवा सैनिक, इग्नेशियस लोयोला (Ignatius Loyola : 14911556) ने की थी इग्नेशियस लोयोला का जन्म स्पेन के नवारे राज्य में सन्, 1491 में हुआ था। वह एक सामान्य कुलीन परिवार का था, और उच्च कुलीन परिवार में स्थान बनाने के लिए महत्त्वाकांक्षी था । इस दृष्टि से उसने एक सैनिक के रूप में विशिष्ट व्यक्तित्व विकसित करने का प्रयास किया। स्पेन के चाल्ल्स प्रथम की ओर से फ्रांस के फ्रांसिस प्रथम के विरुद्ध हुए युद्ध में उसने जोशोखरोश से भाग लिया था उसके जीवन में परिवर्तनकारी मोड़ तब आया जब सन् 1521 में, तोप के एक गोले से, उसका दायां पॉव जख्मी हो गया। आपरेशन के समय जख्मी हिस्से से मांस को हटाकर, उसकी टूटी हड्डियों को जोड़ दिया गया, लेकिन अब उसका दायां पाँव बायें पाँव से छोटा रह गया । इस शारीरिक विरूपना से इग्नेशियस बहुत निरुत्साहित हुआ था, और सेना में उच्च स्थान प्राप्त कर प्रतिष्ठित अभिजात वर्ग में शामिल होने की उसकी महत्त्वाकांक्षा अधूरी रह गयी । इस अन्तराल में इग्नेशियस लोयोला ईसा मसीह एवं अन्य संतों की जीवनियों के अध्ययन की ओर आकर्षित हुआ। एक रात, जब वह ईसा मसीह की जीवन का अध्ययन कर रहा था, उसे दिव्य अनुभूति हुईं। उसे अपने विगत जीवन की गतिविधियों से वितुष्णा हो गई, और वह संत बनने की दिशा में प्रवृतित हो गया। उसने अपने कीमती वस्त्र एक भिखारी को दे दिये और मॉन्तेसरात मठ (बार्सिलोना) के निकट मेनरेसा की गुफ में धार्मिक साधना में लग गया। साधना के इस क्रम में, इग्नेशियस लोयोला का एक कट्टर कैथोलिक संत के रूप में रूपान्तरण हुआ जिसके बाद वह अपने साथी मानवों की मुक्ति और उद्धार के लिए प्रयासरत हुआ। लैटिन भाषा तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन के लिए यह सात वर्ष पेरिस विश्वविद्यालय में भी रहा। इग्नेशियस लोयोला की पुस्तक ‘आध्यात्मिक अभ्यास’ (Spiritual Exercises) एक श्रेष्ठ धार्मिक
कृति मानी जाती है। यह पुस्तक ‘ईसा मसीह, मदर मेरी तथा परम्परागत कैथोलिक चर्च’ को समर्पित की गई।है। इस पुस्तक में इग्नेशियस ने अपनी धार्मिक अनुभूतियों का तो विवरण दिया ही है, साथ ही पाठकों के लिए एक व्यावहारिक साधना-मार्ग भी प्रस्तुत किया गया है जिसका अनुकरण केरके वे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।

इग्नेशियस लोयोला के अनुसार इस साधना मार्ग के चार चारण हैं। पहले चरण के अन्तर्गत साधकमंनुष्य,
पाष, मृत्यु, ईश्वरीय निर्णय एवं नरक -इन प्रश्नों पर चिन्तन करता है । द्वितीय चरण में वह ईसा मसीह की
जीवन एवं ईश्वर के साम्राज्य पर चिन्तन करता है। तीसरे चरण में साधक ईसा मसीह की वेदना तथा मृत्यु
तथा चतुर्थ चरण में पुनरुज्जोवन (The Resurrection) पर अनुशीलन करता है। प्रकारांतर से उपर्युक्त चार चरण रहस्यवादियों द्वारा सत्य तक पहुँचने के लिए सुझाये गये चार स्तरों के समान ही हैं, ये चार चरण हैं-

(i) शिक्षात्मक, जिसके अन्तर्गत साधक को आवश्यक धार्मिक तथ्यों की शिक्षा दी जाती है; (ii) शुद्धिपरक या शोधक, जिसके अन्तर्गत ईसा मसीह के सांसारिक जीवन-लक्ष्य पर अनुशीलन के माध्यम से आत्मा को सभी बाह्य इच्छाओं से शुद्ध करने का प्रयास किया जाता है;
(iii) प्रबोधक या प्रदीपक, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति आत्मिक दृष्टि से सत्य के रहस्य को जान लेता है; तथा (iv) एकात्मक, जिसके अन्तर्गत मनुष्य शांतचित्त आनन्द के साथ ईश्वर की अनुभूति को महसूस करता है। इग्नेशियस लोयोजा की पुस्तक ‘स्पिरिच्युअल एक्सरसाइजिस” , जैसा कि ल्यूकस (रिनेसा एंड रेफर्मेंशन) ने लिखा है, धार्मिक साहित्य का ग्रन्थरत्न है, एवं इसे आसानी से लूथर या काल्विन की किसी भी कृति के समकक्ष माना जा सकता है। यह युद्धकारी कैथोलिकवाद को पाठ्यपुस्तक बन गयी।

सन् 1534 में इग्नेशियस ने अपने छ: साथियों के साथ पेरिस में सेंट डेनिस के छोटे से प्रार्थनालय में शपथ ग्रहण करते हुए, एक अनौपचारिक संगठन ‘कम्पनी ऑफ जीसस’ या ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ का गठन किया। इन छः साथियों में फ्रांसिस जेवियर भो थे जो बाद में ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ या ‘जैसुइट संघ के सबसे प्रसिद्ध धर्मप्रचारक बने। सन् 1540 में ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ को तत्कालीन पोप पोल पा तृतीय से आधिकारिक स्वीकृति मिल गई, यद्यपि चर्च के अनेक पदाधिकारी इस प्रकार की स्वीकृति के खिलाफ थे।

इसके बाद ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ या ‘जैसुइट संघ’ ईसा मसीह के नाम पर, कैथोलिक ईसाई धर्म के
प्रचार-प्रसार के लिए, युद्धस्तर पर प्रयासरत धार्मिक सिपाहियों का एक सैनिक संगठन बन गया । ‘सोसाइटी आफ जीसस’ का उद्देश्य था-‘कैथोलिक ईसाइयत के जीवन एवं सिद्धान्तों की दीक्षा द्वारा मानवीय आत्माओं।का उत्कर्ष। यह कार्य सार्वजनिक उपदेशों, आध्यात्मिक अभ्यासों तथा परोपकारिता के कार्यों द्वारा किया जायेगा।और विशेषत: ईसाइयत से अनभिज्ञ युवा व्यक्तियों के प्रशिक्षण द्वारा । ‘

‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ का अनुशासन किसी सैनिक संगठन की भांति, कठोर था। संघ के सभी सदस्यों को संघ के प्रधान व्यक्ति के प्रति आज्ञाकारिता तथा पोप के प्रति विशेष स्वामिभक्ति का वचन लेना होता था इसके अतिरिक्त उन्हें निर्धनता एवं ब्रह्मचर्य का संकल्प भी लेना पड़ता था, यद्यपि संन्यस्त जीवन की एकांतिक कठोरताओं से उन्हें मुक्त रखा गया, ताकि वे समाज में धर्मप्रचारकों एवं शिक्षकों का कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न कर सकें । ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ के सदस्यों का चयन बड़ी सावधानीपूर्वक किया जाता था, और उसके बाद उन्हें दीर्घ एवं कठोर धार्मिक प्रशिक्षण दिया जाता था। जैसुइट संघ (सोसाइटी ऑफ जीसस) के सदस्यों को मठों में बन्द नहीं रखा गया, उन्हें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में कैथोलिक ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए भेजा गया। उनका उद्देश्य था-धर्मविजय ।।

इसके माध्यम थे-शिक्षण संस्थाएँ, दरिद्रों के प्रति परोपकारिता के कार्य, राजनेताओं का धार्मिक परिवर्तन,
सार्वजनिक धार्मिक उपदेश आदि। शिक्षा उनके प्रचार का सबसे सशक्त माध्यम था और उनके द्वारा स्थापित विद्यालय यूरोप के श्रेष्ठतम विद्यालय बन गए जिनकी प्रशंसा प्रोटेस्टेण्ट अंग्रेजी लेखक फ्रांसिस बेकन ने भी की।जेसुइट संघ के सदस्यों को कैथोलिक ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में बहुत सफलता प्राप्त हुई, न केवल यूरोप में बल्कि एशिया एवं अमेरिका में भी वे ईसाइयत को चीन, भारत, उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका तक ले गये। यूरोप में प्रोटेस्टेण्ट धर्म के तेजी से बढ़ते हुए प्रसार की गति रुक गई जेसुइट संघ के सदस्यों ने कैथोलिक चर्च में एक नवीन आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया। जैसा कि सिण्डर (दि मेकिंग ऑफ मॉडर्न मेन) ने लिखा है, पोलैण्ड, हंगरी, तथा बोहेमिया जैसे संदेहास्पद क्षेत्रों में कैथोलिक धर्म की रक्षा एवं पुनर्जीवन के लिए मूलतः वे ही जिम्मेदार थे, इसके अतिरिक्त उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका, चीन, भारत, ईस्ट इण्डीज, तथा अफ्रीका के क्षेत्रों में मिशनरी कार्य द्वारा उन्होंने बहुत से नये रंगरूट भर्ती कर लिए।

धर्मपरीक्षण (इन्ववीजिशन) : प्रोटेस्टेण्ट धर्म के प्रसार का दमन करने के लिये कैथोलिक धर्माधिकारियों ने ‘धर्मपरीक्षण’ (Inquisition) की मध्यकालीन पद्धति को पुनः अपना लिया इस पद्धति का प्रयोग पहले परम्परागत कैथोलिक धर्म के प्रति किसी भी प्रकार की अवमानना करने वालों को दण्डित किये जाने के लिए किया गया था, अब उसका प्रयोग मूलत: विधर्मियों (अर्थात् प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों) को ढूँढ़कर उन्हें दण्डित करने के लिए किया जाने लगा तद्नुसार सम्भावित विधर्मियों को पकड़कर, उन्हें यातनाएँ देकर, उनसे विधर्मी होने का अपराध कबूल करवाया जाता था और उसके बाद ‘ धर्मपरीक्षण अदालतों (Inquisitional Courts) द्वारा उन्हें सजा सुनाई जाती थी। धर्मपरीक्षण अदालतों’ के माध्यम से प्रोटेस्टेण्ट धर्म के प्रसार को।रोकने का अभियान विशेषकर इटली एवं स्पेन में अपनाया गया। इटली में पोप पाल चतुर्थ (1555-1559 ई.) ने धर्मपरीक्षण पद्धति पर विशेष ध्यान दिया और इसके माध्यम से विधर्मियों (प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों) को निर्ममतापूर्वक कुचलने का प्रयास किया। उसने रोम के ‘पवित्र कार्यालय’ को दमन का एक वीभत्स तंत्र बना।दिया, अभियुक्तों को निर्दयतापूर्वक यातनाएँ दी गईं एवं विधर्मियों को जिन्दा जला दिया गया। इस प्रकार की।गतिविधियों के कारण इटली में प्रोटेस्टेण्टवाद बड़ी तेजी से शिथिल हो गया। स्पेन में चार्ल्स प्रथम ( 1515- 56) ने भी धर्मपरीक्षण पद्धति के प्रयोग से, बड़ी क्रूरता के साथ, प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों का दमन किया उसने स्पेन की नागरिकता के लिए कैथोलिक धर्मानुयायी होने की शर्त को अनिवार्य बना दिया। अक्टूबर, 1559 में वल्लडोलिड की सेंट मार्टिन चर्च के बाहर खुले मैदान में बड़े भारी जनसमूह के सामने, बारह विधर्मियों (प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों) को जिनका अंग-प्रत्यंग धर्मपरीक्षण अधिकारियों की क्रूरता के कारण विरूप हो चुका था, जिन्दा जला दिया गया।

प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची ( दि इण्डेक्स ) : सन् 1557 में रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा ‘प्रतिबन्धित
पुस्तकों की एक सूची’ (The Index librorum prohibitorum) प्रकाशित को गई जिसके द्वारा प्रोटेस्टेण्ट विचारकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के अध्ययन पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। ऐसी पुस्तकों को इकट्ठा करके उन्हें जला दिया गया।

प्रतिवादी धर्मसुधारकों या कैथोलिक धर्मसुधारकों के उपर्युक्त प्रयासों-रक्षात्मक एवं आक्रामक-दोनों के परिणामस्वरूप प्रोटेस्टेण्ट धर्म के प्रचार-प्रसार की तीव्र गति रुक गई तथा मृतप्राय: कैथोलिक ईसाई धर्म में नवजीवन का संचार हुआ। कैथोलिक ईसाई धर्म ने बहुत से क्षेत्रों में पुनः अपनी जड़ें जमा लौं। जैसा कि इतिहासकार स्वेन ने लिखा है- ‘प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन की सफलता इस बात से मापी जा सकती है।
कि प्रोटेस्टेण्टवाद का त्वरित प्रसार अवरुद्ध हो गया दक्षिणी जर्मनी, फ्रांस, पोलैण्ड, कुछ स्विस क्षेत्र, एवं
सेवॉय-इन्हें पुन: कैथोलिक धर्म के अन्तर्गत ले लिया गया, जबकि इटली एवं स्पेन से प्रोटेस्टेण्टवाद को
भगा दिया गया। आज भी रोमन कैथोलिक चर्च विश्व के महान् धार्मिक संगठनों में से एक है।”

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