Posted in: आधुनिक विश्व का इतिहास

विश्व युद्व के 07 परिणाम

विश्व युद्व के 07 परिणाम

1914 से 1918 ई. अर्थात् 4 वर्ष 6 माह तक चलने वाला विश्व का प्रथम युद्ध बड़े पैमाने पर लड़ा
गया था। इस युद्ध में लगभग 36 देशों ने भाग लिया था। दोनों पक्षों की ओर से लगभग छः करोड़ पचास लाख सैनिकों ने भाग लिया। यह प्रथम युद्ध था, जिसमें टैंक, हवाई जहाज, हवाई बम, पनडुब्बी, जहरीली गैस के अलावा आधुनिक हथियारों का प्रयोग किया था । इस युद्ध के दूरगामी परिणामों ने विभिन्न देशों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। प्रथम विश्वयुद्ध के परिणामों का आकलन इस प्रकार किया जा सकता है-

01 राजवंशों के शासन का अंत

यूरोपीय महाद्वीप के साथ-साथ अन्य राष्ट्रों के राजवंशों के लिए प्रथम विश्वयुद्ध विनाशकारी साबित हुआ। इस युद्ध के परिणामस्वरूप (1) रूस, (2) जर्मनी, एवं (3) ऑस्ट्रिया के राजवंशों का तो पतन हुआ ही, साथ ही 1923 ई. में टर्की के सुल्तान (उस्मानी वंश) को भी पदच्युत होना पडा। पोलैण्ड, बुल्गेरिया, चैकोस्लोवाकिया एवं फिनलैण्ड की निरंकुश सरकारों के परखच्चे उड़ गये।

02 लोकतांत्रिक भावना का उदय

इंग्लैण्ड ने विश्वयुद्ध के प्रारम्भ होने से पूर्व ही यह कहा था कि उसका उद्देश्य प्रजातंत्र.की रक्षा करना है। इसी प्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने भी युद्ध में भाग लेने से पूर्व निरंकुश एवं प्रतिक्रियावादी सरकारों को उखाड़कर प्रजातंत्र का पौधा लगाने का प्रण किया था मित्र राष्ट्रं द्वारा इस प्रकार की घोषणा से लोगों में प्रजातंत्र की भावना पैदा हुई।


जर्मनी के ‘होहेनजोलर्न वंश’ के सम्राट कैसर विलियम द्वितीय को पद छोड़कर हॉलैण्ड भागना पड़ा। जर्मनी के एकीकरण के पश्चात् लोकतंत्रीय सरकार की स्थापना हुई। रूस, पोलैण्ड, ऑस्ट्रिया, लिथुआनिया, लैंटिविया, चेकोस्लोवाकिया, फिनलैण्ड,युक्रेनिया आदि देशों में लोकतंत्र का बीजांकुरण हुआ।

03 राष्ट्रवाद का अभ्युदय

प्रथम विश्व युद्ध ने यूरोप में राष्ट्रीय भावना का बीजारोपण कर दिया। किसी भी देश की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करते समय उस देश की भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, परम्पराओं का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी भावना का सम्मान करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन ने चौदह सूत्री सिद्धांतों का निर्माण पेरिस शांति सम्मेलन में किया जिसके आधार पर अनेक राष्ट्रों, जैसे एस्टोनिया, हंगरी, लैटेविया, चैकोस्लोवाकिया आदि का गठन हुआ।

कुछ राष्ट्र ऐसे भी थे, जहाँ पर अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की दशा पर छोड़ दिया गया। इन अल्पसंख्यकों ने, राष्ट्रीयता के विकास से प्रेरणा लेकर बहुसंख्यकों के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा लिया। इस अकार प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त राष्ट्रीय भावना चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई।

04 अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का मार्ग प्रशस्त

प्रथम विश्व युद्ध के दूरगामी विनाशकारी परिणामों ने राजनीतिज्ञों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति कायम रखते हुए भाईचारा स्थापित करने के लिए मजबूर कर दिया। इसी युद्ध का प्रतिफल 1919 का पेरिस शांति सम्मेलन था, जिसमें एक ऐसे अन्तर्राष्ट्ीय संगठन के गठन की बात की गई, जो विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का हल बातचीत के माध्यम से निकाल कर सभी देशों के हितों की सुरक्षा रख सके। वह संगठन राष्ट्रसंघ नाम से अस्तित्व में आया।

05 आर्थिक परिणाम

इस युद्ध की भीषणता का आकलन इसमें भाग लेने वाले देशों की संख्या से कर सकते हैं। 32 राष्ट्र मित्राष्ट्रों की ओर से तथा चार जर्मनी की ओर से इस युद्ध में लड़ रहे थे, 14 राष्ट्र तटस्थ थे। इस महायुद्ध का औसत दैनिक व्यय 40 करोड़ रुपये आंका गया है जो अंतिम दिनों में 84 करोड़ रुपये तक बढ़ गया। युद्ध समाप्ति के उपरान्त सभी देश आर्थिक संकट में डूब गये थे। ऐसा आकलन है कि फ्रांस पर 14,74,720 फ्रेंक तथा जर्मनी पर 16,06,000 मार्क राष्ट्रीय ऋण था। इसके अलावा अनेक राष्ट्र, जैसे-उत्तरी फ्रांस, बेल्जियम, उत्तरी इटली, रूस, पौलैण्ड, सर्बिया, ऑस्टियन, गेलेशिया आदि बर्बाद हो गये।

इस भारी विनाश के परिणामस्वरूप उद्योग, व्यापार, कृषि एवं वाणिज्य के विकास का रथ रुक गया।
उत्पादन क्षमता घटने से जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं का आयात किया जाने लगा।
जिससे महंगाई सुरसा के मुंह की भांति बढ़ने लगी। राष्ट्रीय ऋण भार भी बढ़ गया। इन परिस्थितियों में जनता का मनोबल गिरने लगा । सरकारी प्रयास आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए किये गये, परन्तु जनता का असंतोष चौथे आसमान पर होने के कारण असफल रहे।

06 सामाजिक परिणाम

युद्ध में भारी जनसंहार के चलते सैनिकों, युद्ध सामग्री निर्मित करने वाले उद्योगों के लिए श्रमिकों की माँग बढ़ने से पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी चारदीवारी से बाहर निकलकर बढ़-चढ़ कर अनेक क्षेत्रों में कार्य करने लगी। पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा मिलने से महिलाओं का समाज में स्तर सुधरने लगा।

1914 से पूर्व अनेक राष्ट्र जातीय श्रेष्ठता के कारण अपने-आपको पृथक् बनाए हुए थे, परन्तु प्रथम
विश्वयुद्ध के खतरे ने उन सभी को एकजुट होकर भाईचारे के साथ रहते हुए मिलकर मुकाबला करने के लिए प्रेरित कर दिया। जातीय बंधन ढीले पड़ने लगे। श्रमिकों की स्थिति में सुधार के लिए माँग बलवती होने लगी।

अनेक संगठनों के निर्माण के कारण श्रमिकों में भी अपने हितों के प्रति चेतना का संचार हुआ। युद्धकाल में
सैनिकों एवं श्रमिकों की आवश्यकता बढ़ने के कारण लोग सेना के साथ-साथ कारखानों में कार्य करने के
लिए आगे आये, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षण-संस्थानों में विद्यार्थियों की संख्या घट जाने के कारण वे बंद होने के कगार पर पहुँच गये। समाजवाद का उदय हुआ।

07 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का विकास

प्रथम विश्व युद्ध में हुए भारी जनसंहार के परिणामस्वरूप प्रत्येक क्षेत्र में चिन्तन होने लगा। अत्याधुनिक हथियारों के साथ-साथ रसायनों का प्रयोग किया गया था। घायल सैनिकों के अलावा आम जनता के उपचार के लिए दवाईयों के साथ-साथ उपचार की विभिन्न पद्धतियों पर गहरा मंथन शुरू हुआ। परिणामस्वरूप चिकित्सा जगत में अनेक खोजें हुईं।

समीक्षा

प्रथम विश्व युद्ध एक कारण का परिणाम नहीं अपितु अनेक कारणों के समन्वित रूप का प्रतिफल था। इतिहासकार बेन्स का मत है कि, “राष्ट्रीयता, सत्तावादिता, सैनिकवाद तथा सन्धियों की गुत्थियों
ने तनाव को बढ़ाने में योग दिया और ऑस्ट्रियाई राजकुमार की हत्या ने इस युद्ध को अवश्यम्भावी बना
दिया।” वास्तव में यह युद्ध किसी ने किसी पर थोपा नहीं था इतिहासकार स्लोसन का मानना है कि यह युद्ध
संकल्प का नहीं, विक्षोभ का परिणाम था। ऐसा नहीं है कि कोई देश युद्ध का अभिलाषी था। पारस्परिक
अविश्वास के कारण उनमें इतना तनाव बढ़ गया था कि प्रत्येक देश को शांति से अधिक अपनी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की फिक्र थी और उस प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए ही उन्होंने यह विनाशकारी युद्ध लड़ा। मित्र राष्ट्री ने प्रथम विश्वयुद्ध के लिए जर्मनी को हो जिम्मेदार ठहराया है, यह न्यायसम्मत नहीं कहा जा सकता है।

इसीलिए इतिहासकार ‘फे’ लिखता है कि, “केवल जर्मनी एवं उसके मित्रों को युद्ध के लिए उत्तरदायी ठहराना ऐतिहासिक दृष्टि से युक्तिसंगत नहीं हैं। इसके लिए सभी राष्ट्र कुछ हद तक उत्तरदायी हैं।”

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