वास्तु विद्या १६ परिभाषाये

वास्तु विद्या १६ परिभाषाये

वास्तु विद्या १६ परिभाषाये

01 वैदिक वास्तु-विद्या

सर्वप्रथम वैदिक-कालीन वास्तु-विद्या के दर्शन करना चाहिए । ऋग्वेद-कालीन वास्तु- कला का कुछ आभास पूर्व ही दिया जा चुका है। उस समय वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का भी प्रचार था जो प्रायः लोग नहीं मानते हैं। ऋग्वेद के काल में गृह-निर्माण के अवसर पर जो प्रतिष्ठा-संस्कार या समारोह किया जाता था, जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता था।वे सब आज भी होते हैं अतः आगे के प्रत्येक वास्तु-शास्त्रीय ग्रन्थों में जिस वास्तु-पूजा को वास्तु-निर्माण का श्रावश्यक अंग माना गया है वह ऋग्वेद काल में था ऐसा ऋग्वेद के मन्त्रों को देखने से पता लगता है। ऋग्वेद में असुर सम्बन्धित सामग्री के परिशीलन से नग्नजित् तथा त्वष्ट्रा (जो आगे चलकर द्राविड वास्तु-विद्या के प्राचार्य माने गये हैं)
अादि अाचार्यों के संकेत भी मिलते हैं। संक्षेप में वास्तु-गूजा, वास्तु-भूमिचयन स्तम्भपूजा, द्वार-पूजा आदि वास्तु-विद्या के प्रारम्भिक सिद्धान्त ऋग्वेद-काल में प्रचलित थे, जिससे तत्कालीन वास्तु-विद्या सिद्ध है। माह अथर्ववेद में तो वास्तु-विद्या एवं कला का और अधिक विकास पाया जाता है।

गृह-निर्माण के सम्बन्ध में विशेष सामग्री द्रष्टव्य है। अथर्ववेद के शाला-सूक्त में।’द्विपक्षा’, ‘चतुष्पक्षा’, ‘पटपक्षा’, ‘अष्टपक्षा’ तथा ‘दशपक्षा’ शालाओं का वर्णन है (६,३, २१,) और ये कक्षा-भवन आगे के शाल भवन के ही सदृश हैं। इसके अतिरिक्त और बहुत से वास्तु-विवरण ( स्तम्भ आदि पर ) इस वेद में मिलते हैं।

02 ब्राह्मण ग्रन्थों की वास्तु-विद्या

ब्राह्मणों में वास्तु-विद्या के बहुल संकेत मिलते हैं। शिल्प’ शब्द की प्राप्ति एवं उसका प्रयोग प्रस्तर-कला ( मूर्तिकला ) तथा संगीत-कला में किया गया है। भूग्वेद-कालीन द्राविड वास्तु-विद्या के अचार्य नग्नजित् का उल्लेख ऊपर किया गया है और वह शतपथ ब्राह्मण (८.१.४.१०) में पुष्ट होता है जहाँ पर राजन्य नग्नजित् के वास्तु-सिद्धान्तों का खण्डन मिलता है। साथ ही साथ उसे नारद का शिष्य बताया गया है। यह नारद आगे द्राविड वास्तु-विद्या का प्राचार्य माना गया है। श० बा० में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है जिससे श्मशान विरचन सम्बन्धी आर्य एवं श्रासुर (अनार्य) परम्पराओं पर संकेत है।

03 सूत्रकालीन वास्तु-विद्या

वास्तु-विद्या के प्रारम्भिक स्वरूप का विकास सूत्र-काल में प्रारम्भ होता है यह पहले ही कहा जा चुका है। इस काल में भारतीय वास्तु-विद्या का स्वरूप प्रायः स्थिर हो चला था । गृह्यसूत्रों को देखने से यह निष्कर्ष पुष्ट होता है। वास्तु-कर्म, वास्तु-संगल, वास्तु-होस, पास्तु-परीक्षा, भूमि-चयन, (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श मेद से) द्वार एवं स्तम्भ-नियम,।पृक्षारोपण, दारु-श्राहरण, पद-विन्यास, वास्तु-विद्या तथा ज्योतिष, वास्तु-फल आदि वास्तु विद्या के सिद्धान्त, आश्वलायन, गोभिल, खादिर, शाखायन, पारस्कर तथा हिरण्यान के गृह्य-सूत्रों में पद-पद पर प्रचुर परिमाण में प्राप्त होते हैं। शुल्व-सूत्रों का ( जो कल्प-सूत्रों में ही परिगणित किये जाते हैं ) वेदि-निर्माण बड़ा ही पारिभाषिक, वैज्ञानिक एवं रोचक है। बड़े-बड़े यशों में प्रावश्यक वेदियों की निर्माण व्यवस्था में बड़ा ही समय एवं संभार अपेक्षित होता था। वेदि-निर्माण के वास्तु-शास्त्रीय ये सिद्धान्त आगे प्रासाद-निर्माण में आधारभूत सिद्धान्त हुए।

04 महाकाव्य कालीन वास्तु-विद्या

का सूत्र-साहित्य के इस संस्कृत एवं कर्मकाण्डु-पथ से आगे बढ़ अब रामायण एवं महा-।भारत के काव्य कानन में विचरण करना है, जहाँ वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों के सौरभ-सम्पन्न।पुष्पों एवं फलों का आस्वादन करके तत्कालीन वास्तु-विद्या के प्रोज्ज्वल रूप का अनुभव किया जा सकता है। आज उत्तरापथ तथा दक्षिणापथ की वास्तु-विद्या के प्रवर्तक विश्वकर्मा और मय के निर्देश तो मिलते ही हैं, साथ ही साथ गृह्य-सूत्रों में प्रतिपादित बास्तु-विद्या के भी दर्शन होते हैं। परन्तु विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि वास्तु-विद्या एवं कला के वैज्ञानिक पक्ष का पूर्ण आभास भी प्राप्त होता है। रामायण में स्थपतियों के भेद, गृह-प्रभेद (प्रासाद, सौध, विमान, हर्म्य, सभा आदि) भूमि-वर्गीकरण गृह-वर्ग जैसे ‘पद्म’, ‘स्वस्तिक’, ‘वर्धमान’ तथा ‘नन्द्यावर्त ( महाभारतीय ) तथा विमान, राजवेश्म, सभा आदि के जो वर्णन आगे के शिल्प-शास्त्रों में प्रतिपादित हैं उनके भी दर्शन इनमें होते हैं । ‘पुर-निवेश’ की रूपरेखा जो आगे विकसित हुई है, उसके बहुत से संकेत यहां द्रष्टव्य हैं । रामायण का अयोध्या वर्णन इस तथ्य का साक्षी है। द्वार आदि की परम्परा के विकसित बीज भी यहाँ मिलते हैं। इन सब संकेतों से महाकाव्य-कालीन उन्नत वास्तु-विद्या के विषय में दो राय नहीं हो सकतीं।

05 बौद्ध-कालीन वास्तु-विद्या

पाली जातकों के परिशीलन से बौद्धकालीन वास्तु-विद्या की बड़ी सुन्दर झाँकी देखने।को मिलती है । बौद्ध-साहित्य में वास्तु-विद्या एवं कला के बहुल निर्देश यत्र तत्र सर्वत्र इतने अधिक फैले हैं कि ऐसा मालूम पड़ता है कि ये ग्रंथ वास्तु-विद्या का ही प्रवचन कर रहे हैं । स्वयं बुद्ध भगवान के प्रवचनों में वास्तु-विद्या के प्रवचन प्राप्त होते हैं, जैसा कि पालि-पिटकों से प्रतीत होता है। ‘चुल्ल वग्ग’ विनय पिटक’, ‘महावग्ग’ आदि पाली ग्रन्थों के परिशीलन से इस कथन की सत्यता प्रमाणित हो सकती है। श्रीयुत् तारापद भट्टाचार्य (प० ११६) ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि बौद्धकालीन भारत में वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का पर्याप्त विकास हो चुका था। वास्तु-निर्माण सम्बन्धी मांगलिक विधान (पासादमंगलम्—जातकों में ) दार-चयन, भूमिचयन आदि सिद्धान्तों पर निर्देश मिलते ही हैं, परन्तु विशेषता यह है कि वास्तु-कला-निदर्शक वैज्ञानिक कौशल के सम्बन्ध में कम निर्देश नहीं है। भवनों का वर्गीकरण-प्रासाद, हर्म्य, गुहा, विहार, मण्डप अध्यायोग के रूप में तथा प्रासादों की भूमियों के विषय में भी उल्लेख मिलते हैं। साथ ही साथ आगे के वास्तु-ग्रंथों के सदृश मार्गों एवं प्रासादों की नामावली का भी निर्देश द्रष्टव्य है। वास्तु-विद्या के कला-पक्ष के अन्य सिद्धान्तों का स्थिरीकरण भी देखने को मिलता है । इस प्रकार महात्मा बुद्ध के समय वास्तु-विद्या पूर्ण विकास को प्राप्त हो चुकी थी।

06 अर्थशास्त्र की वास्तु-विद्या

पुराणों, आगमों, तन्त्रों एवं शिल्पशास्त्रों की वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का हम आगे उल्लेख करेंगे। ईसवीय पूर्वकालीन कौटिल्य के अर्थशास्त्र की वास्तु-विद्या पर थोड़ा सा संकेत यहीं पर आवश्यक है। इससे ईसा की प्रथम शताब्दी के पूर्व की बास्तु-विद्या के साधारण सिद्धान्तों के स्थिरीकरण में सहायता मिल सकेगी। ईसवीय शतक से लगभग चारसौ वर्ष पूर्व यह ग्रंथ लिखा गया था। इसमें वा० वि० के सिद्धान्तों का सुन्दर विकास प्राप्त होता है। कौटलीय अर्थशास्त्र में वास्तु-विद्या बोधक सूत्रों से स्पष्ट है कि यह ग्रन्थ परम्परागत वास्तु-विद्या का सूत्र-रूप में संक्षिप्त कर, राजनीति के ग्रन्थ में विषयानुषङ्ग से उद्धृत कर इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि उस काल में वा० वि० के मौलिक ग्रन्थ होंगे । अन्यथा, वास्तु-हृदय’, ‘नवभाग’, ‘वास्तु-देवता’, ‘कोष्ठक’ आदि शब्द कैसे लोग समझ सकते। अर्थ-शास्त्र में विभिन्न प्रकार के भवन-द्वारों की देव-नामावली जैसे ईन्द्र, वारुण, याम्य आदि तथा पारिभाषिक शब्द यथा कपिशीर्ष इन्द्रकोष हस्तिनख, तल कपाठयोग सन्धि बीज एवं अन्य अनेक ऐसे ही शब्द यथा गोपुर, तोरण, प्रतोली विष्कम्भ, अायाम, उच्छय, अश्रि आदि श्रादि से तत्कालीन वास्तु-विद्या की प्रोन्नतावस्था की प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है।

संक्षेप में ईसवीय पूर्व वास्तु-विद्या की रूपरेखा का निम्न प्रकार से स्थिरीकरण किया जा सकता है:-
१. वास्तु-पुरुष-विकल्पन
२. भूमिचयन एवं भूपरीक्षण
३. द्वार-संस्थान
४. वृक्षारोपण
५. दारू-ग्राहरण
६. वास्तु-पद (पद-विन्यास)
७. वास्तु-विद्या तथा ज्योतिष
८. वास्तु-फल
६. स्थपति
१०. पाषाणकला तथा मूर्ति-निर्माण-कला
११. शाल-भवन
१२. शंकुस्थापन
१३, हस्त के विभिन्न माप
१४. स्तम्भादि-माप-व्यवस्था
१५, गृह द्रव्य (पाषाण, इष्टका श्रादि)
१६. भवन-भूवा
१७. प्रासाद-रचना
१८. वास्तु-विद्या की परम्परायें (शैलियाँ श्रादि)

ईसचीय पूर्व-कालीन वास्तु-विद्या की इस रूपरेखा के विवेचन करने के उपरांत श्रव हम समराङ्गण–पूर्वकालीन वास्तु-विद्या को दो कालों में विभाजित कर सकते हैं पहली से छठी और सातवीं से दशवीं शताब्दी तक । प्रथम काल में प्राप्त वास्तु-अन्थों में वृहत्- संहिता, मत्स्यपुराण और विश्वकर्म-प्रकाश विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें से वृहत्संहिता ज्योतिष का ग्रन्थ है और विश्वकर्म-प्रकाश ही एक मात्र वास्तु-विद्या का ग्रन्थ है जिस पर हम भागे विचार करेंगे, बृहत्संहिता एक प्रकार से अर्धपुराण मानी जा सकती है। अतः पौराणिक वास्तु-विद्या में इसका स्थान असंगत न होगा।

07 बृहद संहिता

इस अन्धरत्न में वास्तु-विद्या पर बड़ा ही सुन्दर एवं वैज्ञानिक विवेचन है । वराहमिहिर इसके लेखक हैं, जो महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों ( कालिदास श्रादि) में से एक थे- ऐसी पुरानी परम्परा है। इस ग्रन्थ में यद्यपि वास्तु-विद्य पर केवल थोड़े ही अध्याय मिलते हैं परन्तु उनका विवेचन बड़ा ही मार्मिक है।

५३ वें अध्याय ( वास्तु-विद्या ) में प्रारभिक प्रवचनों-वास्तु-चयन, भूमि-परीक्षा, वृक्षारोपण, दारु-बाहरण, पद-विन्यास आदि पर विवेचन मिलता है। ‘प्रासाद लक्षण’ (५६) में बीस प्रकार के प्रासादों का वर्णन है, जो डा० श्राचार्य के अनुसार मत्स्यपुराण से मिलता जुलता है, साथ ही वास्तु-कला सम्बन्धी इसके वैज्ञानिक विवरण विशेष उल्लेख्य हैं। मन्दिर की भूमि, द्वार, गर्भ-द्वार, चित्रण, प्रतिमा-माप, पीठ-माप, भूमिका-उच्छ्रय आदि पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है । ‘वज्रलेप-लक्षण’ (५७) में सीमेंट का निर्माण तथा अन्य भवन- द्रव्यों पर विवेचन है। इसी प्रकार शयनासन-लक्षण’ (७६) में जैसा नाम से स्पष्ट है भवन- फीचर, आसन शय्या पर्यंक श्रादि पर विवेचन किया गया है। प्रतिमा-लकण’ (45) में वराहमिहिर ने पाषाणकला पर विवेचन किया है वह बड़ा ही वैज्ञानिक है जो आगे के पटलों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बृहत्संहिता की एक विशेषता यह है कि इस ग्रन्थ में विश्वकर्मा, नग्नजित् तथा मय । लगभग ७ वास्तु-विद्या के प्राचार्यों का उल्लेख मिलता है– गर्ग, मनु, वशिष्ठ, पराशर,

08 मत्स्य पुराण

पुराणों में, विशेषकर जिन-जिन महापुराणों में वा० वि० के विवरण मिलते हैं उनका हम पहले ही संकेत कर चुके हैं। यहाँ पर सर्वप्रथम हम मत्स्य को लेते हैं। इस पुराण
वास्तु विद्या पर लगभग साठ अध्याय हैं। २५२वें अध्याय में वास्तु-बिया के प्रसिद्ध प्राचीन अठारह प्राचार्यों पर प्रकाश डाला गया है। स्तंभमान-विनिर्णयः-२५५वे श्र० में स्तंभों पर विवेचन किया गया है। मत्स्य के अनुसार भवन-निर्माण का प्रारंभ स्तंभ रचना से प्रारंभ होना चाहिये । स्तंभ सम्पूर्ण भवन की योजना एवं रचना का आधार है। स्तंभों को ५ प्रकार के वर्गों में वर्गीकृत किया गया है:-रूचक, बज्र, द्विवज्र, प्रलीनक तथा वृत्त । इस वर्गीकरण का आधार वास्तु-सौंदर्य एवं उपयोगिता है। नवताल-लक्षण ( २५८ ) पीठिका लक्षण ( २६२), लिङ्ग लक्षण (२६३) इन तीनों अध्यायों में प्रस्तर-कला तथा मूर्ति-निर्माण पर विवेचन है। प्रासाद-वर्णन (२६६ ) मण्डप लक्षण ( २७०)-इन दो अध्यायों में प्रासाद बास्तु के विवरण मिलते हैं जो आगे ‘प्रासाद’ पटल में द्रष्टव्य हैं।

09 स्कन्दपुराण

इस पुराण के माहेश्वर-खण्ड (द्वितीय भाग) तथा वैष्णवखण्ड (द्वितीय भाग) में।बास्तु-विद्या के वर्णन प्राप्त होते हैं। मत्स्य के अनन्तर स्कन्द अधिक प्राचीन है-ऐसा डा. आचार्य ने माना है। महानगर-स्थापन, स्वर्णशाला, रथनिर्माण, स्थपति-निर्देश, विवाह-मण्डप, चित्र-कर्म श्रादि के जो विवरण मिलते हैं, उनसे वास्तु-विद्या के व्यापक विस्तार पर प्रकाश पड़ता है। वास्तु-कर्म, शिल्प-कर्म का पर्याय होगया है अन्यथा रथ-निर्माण आदि तक्षक-कला से सम्बन्धित कर्म, वास्तु-कला (भवन-निर्माण-कला) में कैसे संचालित होते । प्राचीन परम्परा में वास्तु कला एवं पाषाण-कला (मूर्ति-निर्माण-कला का) घनिष्ठ सम्बन्ध है, परन्तु चित्रकला के साथ सम्बन्ध यहीं पर सर्वप्रथम देखने को मिला।

10 गरुडपुराण

इस पुराण की वास्तु-विद्या के चार अध्यायों में से दो अध्यायों में (४६-४७, सभी प्रकार के भवनों (मानव एवं दैव ) तथा दुर्ग-निवेश एवं पुर-निवेश पर बड़ा ही सुन्दर विवेचन मिलता है। गरुडपुराण की अपनी विशेषता है-पुर-निवेश तथा उद्यान-भवन (गार्डेन सिटीज़) । साथ ही परम्परा के अनुरूप प्रासाद एवं प्रतिमा (४५ तथा ४८) पर भी सुन्दर विवेचन है।

11 अग्निपुराण

इस पुराण में वा० वि० का बड़ा ही विस्तृत विवेचन है जैसा कि अन्य पुराणों में अप्राप्य है। इस पुराण में वा० वि० पर सोलह (४२, ४३, ४४, ४५, ४६, ४६, ५०, ५१, ५२, ५३, ५४, ५५, ६०, ६२, १०४ तथा १०६) अध्यायों में वा० वि के प्रायः सभी अंगों पर प्रकाश डाला गया है । इस पुराण में प्रधानता पाषाणकला (मूर्ति-निर्माण) की है, वास्तु-कला पर केवल तीन अध्याय तथा मूर्ति-निर्माण कला पर तेरह हैं । डा. आचार्य के मत में अग्निपुराण का पुर-निवेश (अध्याय १०६) वास्तु-शास्त्रीय एक विशिष्ट देन है। इसी प्रकार से अन्य पुराणों में भी वा० वि० की प्रचुर सामग्री भरी है, जिसका स्थाना- भाव से विशेष विवरण नहीं दिया जा सकता है । संक्षेपतः पुराणों की वास्तु विद्या की निम्न रूपरेखा अङ्कित की जा सकती है जो पूर्ण विकसित कही जा सकती है।

१. वास्तु-विद्या के प्राचार्य
२. वास्तु-शैलियां
३. भवन-निवेश
४, पुर-निवेश
५, दुर्ग-निवेश
६. ताल-मान
६. प्रासाद-सन्निवेश
७. भवन-द्रव्य-
दाहरण
८. स्तम्भ-मान
१०. प्रतिमा-लक्षण
११. दशावतार
१२. लिङ्ग
१३. पीठिका
१४. सभा
१५. मण्डप
१६. उद्यान-भवन
१७. वापी-निर्माण
१८. कूप-निर्माण
१९. शैल-मन्दिर
२०. चित्रकला

12 आगम वास्तु-विद्या


आगमों के सम्बन्ध में पूर्व ही निर्देश किया जा चुका है । अतः श्रागमों का एक
प्रतिनिधि ग्रन्थ लेकर एवं उसके अध्यायों का निर्देशमात्र करने से ही आगमों की वास्तु-
विद्या का अनुमान लगाया जा सकता है। कामिकागम आगमवास्तु-विद्या का प्रतिनिधि
ग्रन्थ माना जा सकता है। अतः उसकी वास्तु-विद्या पर ६० पटलों की निम्न विषय- तालिका द्रष्टव्य है।

कामिकागम

भूपरीक्षा-विधि
प्रवेशकालविधि
भूपरिग्रहविधि
भूकर्षण विधि
शंकुस्थापन-विधि
. मानोपकरण-विधि
पाद-विन्यास
सूत्र-निर्माण
वास्तुदेवकाल
ग्रामादि-लक्षण
विस्तारायाम-लक्षण
आयादि-लक्षण
दण्डकविधि
वीथी-द्वारादि-मान
ग्रामा दि-देवता-स्थापन
प्रामादि-विन्यास
ब्रह्मदेव-पदाति
प्रामादि-अंग-स्थान-निर्माण
गर्भन्यास
बालस्थापन-विधि
ग्राम-गृह-विन्यास
वास्तु-शास्त्र-विधि
शाला-लक्षण-विधि
विशेष-लक्षण-विधि
द्विशाल-लक्षण-विधि चतुश्शाल-लक्षण-विधि
वर्धमानशाला-लक्षण
नन्द्यावर्त-विधि
स्वस्तिक-विधि
पत्नशालादि-विधि
हस्तिशाला-विधि
मालिकालक्षण-विधि
लांगलमालिका-विधि
मौलिकमालिका-विधि
पद्ममालिका-विधि नागरादि-विभेद
भूमिलम्ब-विधि आद्येष्टका-विधि
उपपीठ-विधि
पादमान-विधि
प्रस्तार-विधि
अंकुरापण-विधि
प्रासादभूषण-विधि
लिंग-प्रतिष्ठा-विधि
कण्ठलक्षण-विधि
प्रतिमा-लक्षण-विधि
शिखर-लक्षण-विधि
देवता-स्थापन-विधि स्लूपिकालक्षण-विधि
प्रतिमा-प्रतिष्ठापन-विधि
नाला दिस्थापन-विधि विमान-स्थापन-विधि
एक-भूम्यादि-विधि
मण्डप-स्थापन-विधि
मूर्धनि-स्थापन-विधि प्राकार-लक्षण-विधि
लिंगलक्षण-विधि
परिवार-स्थापन-विधि


कामिकागम के अतिरिक्त कणगिम, सुप्रभेदागम वैखानसागम आदि अागम-ग्रन्थों में
भी वा० वि० का प्रौढ़ प्रतिपादन प्राप्त होता है। कांगम का तालमान बड़ा ही वैज्ञानिक
एवं पारिभाषिक विवेचन है। इसमें लग चालीस अध्याय वा०वि० हैं। सुप्रभेदागम
की विशेषता संक्षेप-प्रियता है जो वराहमिहिर की बृहत्संहिता के समान ही स्वल्प में सभी
विषयों पर वर्णन करता है। इसमें केवल १५ अध्याय हैं परन्तु विवेचन प्रौढ़ एवं मौलिक
है। ‘प्रासाद-पटल’ में सुप्रभेदागम की विशेष चर्चा द्रष्टव्य है।


श्रागमों की वास्तु-विद्या की रूपरेखा का अलग से अंकन करने की आवश्यकता नहीं।
कासिकागम के अगाध वास्तु-सागर की गहराई में प्रायः सभी वास्तु-रत्न प्रास हो सकते हैं।
विषय-तालिका से ही विषय-वर्गीकरण स्पष्ट है। आगमों की वा०वि० की समीक्षा में यह
कहा जा सकता है कि पुराणों की अपेक्षा आगमों का विवेचन न केवल अधिक वैज्ञानिक
एवं पारिभाषिक ही है वरन् सांगोपांग भी है। सम्भवतः ही कोई ऐसा विषय हो जिसकी
चर्चा इनमें न हो।

13 तान्त्रिक वास्तु-विद्या

पुराणों एवं अागमों की पुण्यभूमि पर बहुत देर तक विचरण करते रहे । तन्त्रों के
साधना-पथ पर मुड़ने के लिये इतना ही संकेत पाथेय का काम दे सकता है, कि जिन
विभिन्न तांत्रिक ग्रन्थों का निर्देश किया गया है, उनमें वा०वि० के सुन्दर विवरण मिलते
हैं। यहाँ पर विशेष चर्चा नहीं की जा सकती। इस परम्परा के प्रौढ़ एवं अधिकृत ग्रन्थ
हयशीर्ष-पञ्चरात्र पर थोड़ा सा प्रकाश डाला ही जा चुका है।

14 शिल्प-शात्रीय वास्तु-विद्या

शिल्प शास्त्रीय वास्तु विद्या की दोनों कोटियों ( दक्षिणी तथा उत्तरी) के ग्रंथों का
निर्देश किया ही जा चुका है। लेखक के मत में शिल्प-शास्त्रीय ग्रंथों में तीन ग्रन्थ प्रति-
निधि ग्रंथ है । पहला विश्व-कर्म-प्रकाश तथा शिल्प, दूसरा मानसार और तीसरा समराङ्गण-
सूत्रधार। समराङ्गण की वास्तु-विद्या का श्रीपोद्धातिक समीक्षण अागे के अध्याय में किया
वैसे तो यह सम्पूर्ण ग्रन्थ समराङ्गण का ही अध्ययन है। मानसार की वा. वि.
जायगा।


पर डा० प्राचार्य के ग्रन्थ विशेष द्रष्टव्य हैं । दक्षिणी परम्परा का दूसरा प्रामाणिक ग्रन्थ
मयमत है परन्तु मयमत और मानसार में अत्यधिक समानता के कारण मानसार का ही (३०)
उल्लेख विशेष संगत है। अतः यहाँ पर दोनों परम्पराओं के इन दो प्राचीन ग्रंथों (मान-
सार एवं विश्वकर्म-प्रकाश) की खल्प में समीक्षा करनी है। पहले विश्वकर्म-प्रकाश की
चर्चा ही उचित है।


15 विश्वकर्म-प्रकाश ( तथा शिल्प)

भारतीय वास्तु-विद्या के अति प्रसिद्ध प्रवक्ता विश्वकर्मा के नाम से विभिन्न हस्तलि-
खित ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। उन ग्रन्थों की एक से अधिक संज्ञाये हैं जैसे विश्वकर्म-प्रकाश अथवा
विश्वाकर्मा-वास्तु-शास्त्र तथा विश्व-कर्मीय-शिल्प, अवथा विश्वकर्मा-शिल्प-शास्त्र । विश्वकर्म-
प्रकाश अथवा विश्वकर्मा-वास्तु-शास्त्र नामक प्रथम ग्रन्थ में केवल तेरह अध्याय हैं, जो विशेष
कर भारतीय वास्तु-कला के भवन-विद्या के विवरणों तकही सीमित है। परंपरानुरूप भवन-क न।
के साथ-साथ मूर्ति-कला पर भी विवेचन अावश्यक है अत: यह पूर्ति दूसरे ग्रंथ-विश्व-कर्मीय
शिल्प अथवा विश्व-कर्मा-शिल्प-शास्त्र द्वारा की जाती है। इसमें सत्तरह अध्याय हैं जिनमें विशेष
कर मूर्ति-निर्माण-कला के विषयों का विवेचन है। डा० अाचार्य इस दूसरे ग्रंथ को संग्रह
मानते हैं, क्योंकि तांत्रिक शैली में यह लिखा गया है । भगव न् शिव इसके प्रवक्ता हैं । अस्]
इतना निर्विवाद है दोनों ही ग्रंथ मिलकर वास्तु-विद्या के प्रमुख सभी सिद्धान्तों का समुद्घाटन
करते हैं । विश्वकर्म-प्रकाश की विषय-तालिका निम्न रूप से अंकित की जा सकती है:-
विश्वकर्म-प्रकाश


मंगलाचरण
पादुका-उपानह-मञ्चादि-मानलक्षण
वास्तु-पुरुषोत्पत्तिवर्णन
शंकु-शिला-न्यास-निर्णयभूमिलक्षणाला
वास्तु-देहलक्षण, पूजन, बलिदान
गृह-प्रवेश
शिलान्यास
खनन-विधि
प्रासाद-विधान ETS
स्वप्न-विधि
शिल्प-व्यास
भूमि-फल
प्रासाद-निर्णय
गृहारम्भ में समय-विधि
पीठिका-लक्षण ध्वजा
मण्डप
आयव्ययाँशादिफल
द्वारलक्षण
गृह्मध्य-देवादिस्थापन-निर्णय २६. वापी-कूप-तडाग-उद्यान-क्रिया
ध्रुवादि-ग्रह-भेद
दारुच्छेदन-विधि
द्वारमान
गृह-प्रवेश-निर्णय
स्तम्भ-प्रमाण
गृह-प्रवेश-काल-शुद्धि
शय्यासन-दोलकादि-लक्षण
गृहारम्भ काल-निर्णय
दुर्ग-निर्णय
गृहारम्भ-लम-कुण्डलीस्थग्रह-फल
शल्यज्ञान
शय्या-मन्दिर-भवन-सुमन-सुधारादि ३६. नगर-संवन्धि-राजगृहादि-निर्णय
गृह-लक्षण गृहशाला-निर्णय

16 विश्वकर्मीय शिल्प


इसके सत्तरह अध्यायों की विषय तालिका निम्नलिखित है :-
१. विश्वकर्मा की उत्पति एवं अन्य तक्षक, वार्धिक आदि स्थपति-भेदों का वर्णन ।
२. युगानुपूर्वी नरों की ऊँचाई तथा प्रतिमा निर्माण के द्रव्य काष्ठ-पाषाण आदि ।
टिप्पणी प्रतिमाओं के मान का आधार नरमान ही प्रकल्पित हुए हैं-देखिये इस
ग्रंथ का षष्ठ पटल प्रतिमा-विज्ञान’ ।
३. तक्षक के लिये ( मूर्ति-निर्माता–काष्टादि से ) गर्भाधानादि-संस्कार-कथन तथा
गर्मोत्पत्ति-कथन ।
४. शिव-लिंग तथा अन्य देवों की प्रतिमा-प्रतिष्ठापनार्थ मन्दिर (सभा) निर्माणादि।
५. गृह-प्रतिमा-निर्माण-प्रमाण तथा लिंग-पीठ-निर्माण प्रमाणादि ।
६. रथ-निर्माण-विधि-कथन ।
७. रथ-प्रतिष्ठा-विधि।
८. ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि स्वरूप कथन ।
६. यज्ञोपवीत-लक्षण।
१०. सुवर्ण-रजत मुजादि-निर्मित यज्ञोपवीत-कथन तथा मेरुदक्षिण-स्थित हेमशिला-कथन ।
११. लक्ष्मी, ब्राह्मी, माहेश्वरी-श्रादि देवी और इन्द्र आदि दिकपाल तथा ग्रहादि मूर्ति-
निर्माण-प्रकार।
१२. व १३. मुकुट-किरीट-जटा मुकुटादि निर्माण-प्रकारादि ।
१४, स्थावर, अस्थावर सिंहासन-निर्माण-प्रकारादि । पुनर्विशेषेण किरीट, ललाट पट्टिकादि
निर्माण-प्रकार तथा देवता-मन्दिर जीर्णोद्धार-प्रकार।
१५, लिंग-मूर्ति-मन्दिर-द्वारादि-कथन ।
१६. प्रतिमा-मूर्ति-मन्दिर-द्वारादि-कथन ।
१७. विघ्नेश-मूर्ति-मन्दिर-द्वारादि-विधिः ।


विश्वकर्मा के इन दोनों ग्रन्थों के प्रतिपाद्य विषयों से प्रतीत होता है कि भारतीय
वास्तु-विद्या की यह रूपरेखा उस महाधारा के समान है जो कालान्तर में दो धाराओं में
बहने लगी और अन्ततोगत्वा समराङ्गण-समुद्र में पुनः एकाकार होकर एकात्मक हिन्दू
वास्तु-शैली (Composite Hindu Style of Architecture) को जन्म देने में
सहायक हुई।


मानसार दक्षिणी परम्परा के अग्रगामी एवं अधिकृत इस मन्थरत्न पद विद्वद्रत
डा० श्राचार्य की अमर कृतियों का हम निर्देश कर ही चुके हैं। वास्तु-विद्या के अनुसंधान
गवेषण एवं समीक्षण में सप्तग्रन्थी मानसारीय कृतियों (Manasara series सहायक पुस्तक
सूची देखिये) ने पथ-प्रदर्शन का काम किया है। समराङ्गण के समान ही यह भी एक
विशाल ग्रन्थ है (७० अध्याय, दस हज़ार पंक्तियाँ


गृह-मान-स्थान-विधान
शिल्पि-लक्षण-पूर्वक-मानोपकरण-विधान गृह-प्रवेश-विधान
वास्तु-प्रकरण
द्वार-स्थान-विधान
भूमि-संग्रह-विधान
द्वार मान-विधान
भू-परीक्षा-विधान
राज-हर्म्य-विधान
शंकु-स्थापन-लक्षण
राजांग-विधान
पद-विन्यास-लक्षण
राज-लक्षण
बलिकर्म-विधान
रथ-लक्षण
ग्राम-लक्षण
शयन-विधान
नगर-विधान
सिंहासन-लक्षण
भूभिलंब-विधान तोरण-विधान
गर्भ-विन्यास-विधान
मध्यरंग-विधान
उपपीठ-विधान
कल्पवृक्ष-विधान
अधिष्ठान-विधान मौलिलक्षण
स्तम्भ-लक्षण
भूषणलक्षण
प्रस्तरविधान
त्रिमूर्तिलक्षण
सन्धि-कर्म-विधान लिंग-विधान
विमान-लक्षण
पीठलक्षण
एक-तलविधान. शक्तिलक्षण
द्वितल-विधान
जैनलक्षण
नितल-विधान
बौद्धलक्षण
चतुस्तल-विधान
मुनिलक्षण
पञ्चतलविधान
यक्षविद्याधरलक्षण
षट्तल-विधान भक्तलक्षण
सप्ततल-विधान हंसलक्षण
गरुडलक्षण
नवतल-विधान
दशतल-विधान
सिंहलक्षण
एकादशतल-विधान प्रतिमा विधान
द्वादशतल-विधान
प्राकार-विधान
उत्तमदशताल-विधान
परिवार-विधान
मध्यम दशताल-विधान
गोपुर-विधान
पलम्बलक्षण
मण्डप-विधान
मधूच्छिष्टलक्षण
शाला-विधान
अंगदूषण-विधान
नयनोन्मीलन-लक्षण


इस प्रकार इन सत्तर अध्यायों में, प्रथम आठ अध्याय वास्तुकला के श्रीपोद्घातिक
विवेचन से सम्बन्ध रखते हैं, जिनमें संग्रह ( विषय सूची ) मान, स्थपति तथा स्थपति के
लक्षण, भूमि-चयन, भू-परीक्षा, पद-विन्यास, शंकुस्थापन तथा वलिकर्म आदि पर प्रकाश
डाला गया है। पुनः श्रागे के क्यालिस अध्यायों में ( से ५० तक) विभिन्न प्रकार
के ग्राम, पुर, नगर, दुर्ग के विवरणों के साथ साथ सन्धि-कर्म, गर्भ-विन्यास, शिलान्यास
स्तम्भ एवं स्तम्भावयव, भूमितल (एक से द्वादश तक साधारण भवनों, मन्दिरों तथा राज-
भवनों में तथा एक से सत्तरह तक गोपुरों में)विमान, प्राकार, परिवार, गोपुर, मण्डप, शाला,
द्वार, प्राङ्गण, तोरण, राजवेश्म, राजप्रकोष्ठ, सिंहासन, मुकुट, रथादि यान तथा भवन-
फर्नीचर-पर्यक, शय्या, टेविल, कुर्सियाँ, अलमारियाँ, मंजूषायें, पिञ्जर श्रादि साथ ही
साथ मध्यरंग ; एवं भूषण तथा पोशाक श्रादि पर विवेचन किया गया है। अन्तिम बीस
अध्यायों में पाषाण-कला (मूर्ति-निर्माण ) पर प्रवचन है जिनमें हिन्दू , बौद्ध, जैन मूर्तियों के
निर्माण-कौशल के नियमों के साथ साथ महापुरुषों एवं पशुओं और पक्षियों (गरुड़ आदि) की
मूर्तियों की निर्माण व्यवस्था है। अतः इस ग्रन्थ में वास्तुकला पर पचास तथा पाषाण-कता
पर बीस अध्याय हैं।


मानसार की वास्तु-विद्या की इस रूपरेखा के इस निर्देश के उपरान्त इसमें प्रतिपादित
वास्तु-विद्या के जो विवरण मिलते हैं, उससे प्रौढ़ दाक्षिणात्य मन्दिर निर्माण कला के
दर्शन होते हैं । १ से १७ तक की भूमिकाओं (स्टोरीज़) वाले गोपुरों का विकास दक्षिण
में उत्तर-मध्यकालीन मन्दिर निर्माण कला की परम्परा का प्रतीक है। मानसार में गोपुरों की
इसी विशिष्टता के कारण श्रीयुत् तारापद भट्टाचार्य ने इसे मध्यकालीन (११वीं से १५वीं
शताब्दी के मध्य की) रचना माना है।


वास्तु-विद्या के इन प्रतिनिधि-ग्रन्थों की अति सूक्ष्म समीक्षा के उपरान्त यहाँ पर इतना
संकेत और करना है। कि पुराणों, अागमों एवं तंत्रों में वास्तु-विद्या का प्रतिपादन तो चल ही
रहा था, साथ ही साथ शिल्प-शास्त्र पर मौलिक ग्रंथों की रचना भी होती रही । स्थानाभाव
से उन सभी ग्रंथों की यहाँ समीक्षा नहीं हो सको। आगे के अध्यायों में प्राय: सभी प्रमुख
ग्रंथों का संकेत मिलेगा । तथापि इन प्रमुख ग्रंथों का थोड़ा सा दिग्दर्शन करके इस अध्याय
को समाप्त करना है। इन प्रमुख ग्रंथों में कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ जैसे सूत्रधार-मण्डन के ग्रन्थ,
श्रीकुमार का ‘शिल्प-रत्न’ समराङ्गण के बाद के हैं जिनमें वास्तु-विद्या का सुन्दर एवं सुसंस्कृत
प्रतिपादन है। अगस्त्य का ‘सकलाधिकार,’ प्रतिमा निर्माण पर बड़ा ही प्रौढ़ विवेचन
करता है। काश्यपीय-शिल्प अथवा ‘अंशुमभेद’ दक्षिणी वास्तु-विद्या का लोक-प्रिय ग्रंथ
है । अर्वाचीन समय में भी मूर्ति-निर्माता कारीगरों की यह हस्त पुस्तक ( हैन्डबुक ) है।
साउथ इन्डियन ब्रॉजेज़’ में श्रीयुत गंगोली जी लिखते हैं कि दक्षिण के सभी पाषाण-
कोविदों का यह सर्वसाधारण, अति प्रसिद्ध प्रामाणिक ग्रंथ है। नवीन जिज्ञासु कला-
शिष्यों को आज भी इसके श्लोक कण्ठाय कराये जाते हैं। इसमें मूर्ति-निर्माण एवं मूर्ति-
मापन आदि के नियम संग्रहीत है। ग्रंथ भी विशालकाय है । ‘समराङ्गण-सूत्रधार’ के समान
इसमें भी ८३ अध्याय (पटल ) हैं।

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