वास्तु-विद्या विस्तार व विषय

वास्तु-विद्या विस्तार व विषय

वास्तु-विद्या विस्तार एवं विषय

समराङ्गण वास्तु-शास्त्रीय पुराण है। समराङ्गण के प्रथम सात अध्यायों में वास्तु- विद्या के व्यापक स्वरूप, विस्तार एवं विषयों की पौराणिक शैली में बड़ी सुन्दर अवतारणा की गई है। तीसरे अध्याय के उपोद्घात में महासमागमन’ तथा विश्वकर्मा और उसके पुत्रों का सम्वाद’ इन दो अध्यायों में प्रतिपादित वास्तु-प्रयोजन एवं वास्तु-सृष्टि की ओर संकेत किया ही जा चुका है। साथ ही साथ भारतीय वास्तु-विद्या के व्यापक स्वरूप पर भी संकेत किया जा चुका है। इस अध्याय में समराङ्गण के प्रश्न’ नामक तीसरे अध्याय की विशेष सामग्री का विशेष उपयोग करना है, जिसमें वास्तु-विषयों की जानकारी के लिये विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय ने महाजिज्ञासा की है। शास्त्र-प्रतिपादन एवं तत्व-विवेचन में प्रश्नोत्तर की प्रणाली इस देश के शास्त्रकारों एवं साहित्यकारों की एक पुरातन पद्धति है। समराङ्गण में भी—जैसा चौथे अध्याय ( समराङ्गण का स्थान ) में कहा गया है- पितामह ब्रह्म से प्राप्त वास्तु-विद्या के प्रथम प्रवक्ता एवं आचार्य विश्वकर्मा के द्वारा वास्तु- विषयों के (अ० ३) की जय-जिज्ञासा के समाधान एवं उत्तरों में ही समराङ्गण की वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। यहाँ पर वास्तु-विस्तार के विवेचन में समराङ्गण की सामग्री के सम्बन्ध में इतना संकेत और आवश्यक है कि ‘महदादिसर्ग’ नामक चौथे अध्याय, ‘भुवन कोश’ नामक ५ वें अध्याय तथा वर्णाश्रम-प्रविभाग’ नामक ७ वें अध्याय में प्रतिपादित सृष्टि-वर्णन, भूगोल एवं वर्णाश्रम-व्यवस्था से वास्तु-विद्या के विस्तार पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

अतः क्रमश: वास्तु-विस्तार में सार्वभौमिक, दार्शनिक खगोलीय, भौगोलिक तथा स्वातन्त्रिक इन प्रमुख पाँच दृष्टिकोणों से वास्तु-विस्तार का विवेचन किया जा सकता है । भूगल पर स्वर्गीय देव का प्रतिष्ठापक यह प्रासाद अपने प्रत्येक अवयवों से, संस्थान, मान, निवेश आदि विभिन्न प्रक्रियाओं से इस तथ्य का एक जीता जागता तथ्य है। अस्तु, वास्तु के सार्वभौमिक स्वरूप को समीक्षा में वास्तु-ब्रह्मवाद की ओर ऊपर संकेत किया गया है । इसका क्या मर्म है ? वास्तु शब्द का मर्म योजना (प्लनिंग ) है। किसी भी रचना, निर्माण, अथवा सृष्टि के पूर्व योजना आवश्यक है। योजना और सृष्टि दोनों सहोदर बहनें हैं । समराङ्गण (अ० २.४ ) में साफ लिखा है कि ब्रह्मा ने इस जगत् की सृष्टि के पहले वास्तु की सृष्टि की। अतः विश्वव्यापी दृष्टिकोण से विश्व की यह सृष्टि एक सयोजना रचना है। योजना सृष्टि एवं संसार दोनों का मर्म है । सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में भी बिना योजना के काम नहीं चल सकता। राजा और राज्य की कल्पना देश के शासन की योजना है। वर्णाश्रमव्यवस्था समाज एवं व्यक्ति दोनों के जीवनों की योजना है। इसी योजना के द्वारा सुनियन्त्रित राष्ट्र, सुसंगठित समाज एवं सुसंस्कृत व्यक्ति का निर्माण होता है। अतः विश्व के एक छोटे भाग इस महासमा (पृथ्वी ) के निवेश के लिये समराङ्गण में एक संरक्षक शासक ( राजा पृथु ) निवेशकर्ता ( प्लानर ) अर्थात् स्थपति ( विश्वकर्मा ) तथा योजना का आधार खयं महासमा इस वास्तु-त्रयी ( देखिये स.सू.प्रथम अ०) की अवतारणा का यही व्यापक मम है। पुराणों में प्राप्त महाराज पृथु का गोदोहन अथवा भू- समीकरण का भी यही मर्म है। ऊबड़-खाबड़, ऊँची-नीची भूमियों, सरिताओं और पर्वतों, वनों और झाड़ियों से अाक्रान्त भूमिको निवेशयोग्य बनाने के लिये पृथु ऐसे महान् और कठोर शासक (पृथु को यम का प्रतिनिधि माना गया है) चाहिये। महाराज पृथु के इसी समीकरण ने पृथ्वी को पृथ्वी बनाया (पृथोः इयं पृथ्वी)।

दार्शनिक एवं पौराणिक दृष्टिकोण को हम न भी मानें तो भी इस तथ्य से किसका वैमत्य हो सकता है कि जब हम अपने घर के निर्माण की योजना बनाते हैं तो अपने पड़ोस, पद के चतुर्दिक वातावरण तथा वसती आदि का अवश्य विचार करते हैं। इसी प्रकार जब हम किसी पुर की स्थापना करने जाते हैं तो उसकी प्राकृतिक स्थिति-भूमि, जल, वायु, अन्न, वृन श्रादि जीवनोपयोगी साधनों के साथ-साथ देशविशेष अथवा जन-पद विशेष की विशिष्टताओं पर भी ध्यान देते हैं। पुर-निवेश में देश-विशेष एवं जन-पद-विशेष की यह परीक्षा जब और आगे बढ़ती है तब पुरसमूह राष्ट्र के सम्पूर्ण भूगोल-नदियाँ,
पर्वत, समुद्र, वन अादि पर विचार आवश्यक हो जाता है। परन्तु कोई भी देश कितना ही सुसंगठिा हो, मुनियोजित हो अथवा सुशासित हो वह अपने पड़ोसी देशों के प्रभाव से नहीं बच सकता। अत: एक देश की योजना में दूसरे देशों की योजना सुतरां समापतित हो जाती हैं। पुर से जब बढ़े तो राष्ट्रों एवं देशों में आये। देश की ओर दृष्टि डाली तो दूसरे देशों तक चली गई। इससे यह सिद्ध हुआ कि देश-योजना में दूसरे देशों की योजना का प्रभाव अवश्व पड़ता है। अन्तर्देशीय अथवा अन्तराष्ट्रीय योजना आगे बढ़ती हुई महासमा योजना की महायोजना का एक अभिन्न अंग बन जाती है। कहानी यहीं नहीं समाप्त होती। महासमा (पृथ्वी,भूलोक ) इस बृहद् विश्व का एक अति लघु भाग है। सौरमण्डल में पृथ्वी के परिमाण को हम जानते ही हैं । भूवासियों का जीवन दूसरे ग्रहों से अनिवार्य रूप से प्रभावित रहता है। ज्योतिर्विद्या इस तथ्य का साक्ष्य प्रदान करती है

सार्व-भौमिक दृष्टिकोण

भारत के सभी विज्ञान अध्यात्म से सदैव प्रभावित रहे। वास्तु-ब्रह्म-वाद के दार्शनिक दृटिकोण में वास्तु की विश्वव्यापकता अन्तर्हित है। हिन्दुओं के शब्द-ब्रह्म-बाद, नाद-ब्रह्म-वाद एवं रस-ब्रह्म-वाद की कल्पना के समान ही वास्तु-ब्रह्म-वाद की कल्पना भी संगत है। सच तो यह है कि भारत के विज्ञान को दर्शन से अलग नहीं किया जा सकता है। बिना दार्शनिक दृष्टिकोण के विज्ञान अर्ध-विज्ञान ही है। बिना धार्मिक एवं दार्शनिक उपचेतना के विज्ञान शुष्क-काष्ठ के समाम केवल जलाने योग्य है। बिना अध्यात्म से अनुप्राणित शुष्क विज्ञान जीवन का सहायक न होकर संहारक बन जाता है । हिन्दुओं की वास्तु-कला की प्रतिनिधि एवं प्रमुख कृति प्रासाद है। प्रसाद-कला के सिद्धांत, धर्म और दर्शन की महाभावना से नीचे से उपर तक अनुप्राणित हैं। प्रासाद स्वयं देव-प्रतिमा है।

अतः अन्तर्देशीय अन्योन्याश्रय

( Inter-dependence ) की भाँति अन्तर्ग्रहीय ( Inter-planet) अन्योन्याश्रय भी सुतरांम् संगत है। इसी महादृष्टि ने भारतीय वैज्ञानिकों को सनातन से प्रभावित किया है। समराङ्गण में प्रतिपादित प्रथम सात अध्याया में भूलोक के निवासी महाराज पृथु और देवलोक के देवस्थपति विश्वकर्मा का सङ्गम (अ० १), साङ्गोपांग सृष्टिवर्णन की अवतारणा ( अ० ४ ), महाद्वीपों, द्वीपों, पर्वतों आदि का भूगोलवर्णन, सूर्य आदि नक्षत्रों की स्थितियों एवं गतियों का खगोल-वर्णन (श्र०५), युगारम्भ में मानवता एवं देवत्व का सहवास (अ०६) एवं वर्णाश्रम व्यवस्था के शाश्वत आधारशिलानों पर निर्मित भारतीय आर्यसंस्कृति के मानव धर्मों की अभिव्यञ्जना एवं सभ्य नागरिक जीवन की सफलता में पुरनिवेश, खेटनिवेशे तथा ग्रामादि एवं जनपद-विभाग की योजना (अ०७) का यही मर्म है। वास्तु-शास्त्र की इसी दिव्य दृष्टि को सार्वभौमिक दृष्टिकोण हमने माना है।

दार्शनिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टिकोण

किसी भी वास्टु-निर्माण के पूर्व वास्तु-पद एवं उसके अधिष्ठातृ देव वास्तु-पुरुष का प्रकल्पन वास्तु-शास्त्र का एक अनिवार्य सिद्धान्त है और भारतीय वास्तु-कला की यह एक अविच्छिन्न परम्परा है। पुर, प्रासाद, अथवा भवन के निवेश-नियमों में वास्तु-पद-विन्यास स्थपति की प्रथम योग्यता एवं स्थापत्य का प्रथम श्रङ्ग है। वास्तु-पद-विन्यास का सविस्तर विवेचन आगे किया जायेगा। यहां पर वास्तु-पद के अधिष्ठातृ देव “पुरुष” की अवतारणा का मर्म यह है कि वास्तु-मण्डल के रेखाचित्र में, वास्तु-पुरुष प्रकल्पन उपलक्षण-मात्र (Symbolic) है। इसका रहस्य बिना दर्शन के समझ में नहीं आ सकता। वास्तु-विद्या और दर्शन इन दो ज्ञान-धाराओं का यहाँ संगम होता है और ब्रह्म-समुद्र की ओर द्रुतगति से दोनों का प्रवाह । हरिवंश (अ०१) का यह प्रबचन इसी रहस्य का उद्घाटन करता है—“निवेश्य वास्तु में ‘पुरुष’ की प्रकल्पना से, उस पदविशेष की सत्ता का विश्व की सत्ता के साथ एकात्म्य स्थापित करना अभिप्रेत है।” डा० श्रीमती स्टेलाक्र मिश ने अपने ‘हिन्दू-टेम्पिल’ में वास्तु-पुरुष-मण्डल के दार्शनिक दृष्टि-कोण की अति विशाद अभिव्यञ्जना की है।

सर्व व्यापी ‘विराट पुरुष’ अथवा (पुरुष) निवेश्य पद के साथ एकाकार ही नहीं तदात्मक भी है। स० सू० के प्रथम श्लोक में भी इसी रहस्य की अभिव्यंजना है।

ज्योतिष-दृष्टिकोण

वास्तु-शास्त्र का ज्योतिर्विज्ञान एवं गणित से घनिष्ठ संबंध है। भारत के प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् वराहमिहिर ने अपनी बृहत्संहिता में ज्योतिषियों के ज्तोतिर्विज्ञान के लिए वास्तु-ज्ञान को एक अनिवार्य अंग माना है वास्तु-पुरुष-मण्डल के प्राध्यात्मिक (Metaphysical ) महत्व का जो संकेत अभी किया गया है उसी में विश्वजनीन एवं ज्योतिर्मण्डलीय (Cosmological & Astronomical) बीज भी बिखरे पड़े हैं।


वास्तु-मण्डल पर विभिन्न अधिपति देवों के साथ-साथ नक्षत्रमण्डल के प्रमुख नक्षत्र एक आदर्श नगर की स्थापना के लिये जिस जनपद अथवा देश में वह नगर स्थित है उस देश की भौगोलिक स्थितियों एवं भौगर्भिक विशेषताओं की समीक्षा परम आवश्यक सूर्य, चन्द्र आदि का भी प्रकल्पन होता है । सूर्य-चन्द्र श्रादि ग्रहों की गतियों में ही विश्व की गति एवं स्थिति, समय, ( वर्ष, मास, पक्ष, तिथि, वार श्रादि ) तथा ऋतुयें ( वर्षा, ग्रीष्म, शीत आदि) निर्भर है। अतः विश्व कार इस वास्तुमण्डल पर विश्वनियन्ता नक्षत्रों की स्थिति-गति में किसी प्रकार का अवरोध या विरोध उचित नहीं है । इस दृष्टि कोण से वास्तु-शास्त्र ज्योतिष शास्त्र का एक अंग है । क्योंकि वास्तु-शास्त्र में भी तो भवन- कार्य किस नक्षत्र में, किस मास, तिथि एवं वार में प्रारम्भ करना चाहिए ? निवेश्य वास्तु का दिक्-सामुख्य आदि कैसा होना चाहिए ? इन सभी प्रश्नों का वास्तु-मण्डल में ध्यान रक्खा जाता है । संसार की नश्वरता एवं अपूर्णता ही ज्योतिर्गणनाओं ( Astronomical calculations) तथा भविष्यवाणियों ( Astrological forecasts) का कारण है । इन सभी में कुछ न कुछ “शेष” अवश्य विद्यमान है। विकास-क्रम के लिये ‘शेष’ श्रावश्यक है ? वर्तमान का विकास भूत का ‘शेष’ है।

‘शतपथ-ब्राह्मण’ (१.७.३. १८-१६ ) का यही मर्म है । ‘वास्तु’ शब्द ‘वस्तु’ से निष्पन्न हुअा है। अतः वास्तु में सत्ता के विकास ( निवास आदि ) एवं शेष दोनों का मर्म छिपा है। इसके अतिरिक्त वास्तु-शास्त्र के सभी ग्रन्थों में “आयादि-निर्णय” वास्तु-विद्या का एक अनिवार्य अंग माना गया है । आयादि-निर्णय का अर्थ ज्योतिषशास्त्र में प्रति- पादित तारा, नक्षत्र, तिथि, वार आदि के साथ-साथ आय, व्यय, अंश, आदि षड्वर्ग का विचार भवन निर्माण में आवश्यक है। “षड्वर्ग’ के ये ६ सिद्धान्त वास्तु विद्या के 6 सिद्धांत माने गये हैं। इनकी विशेष चर्चा पीछे की जा चुकी है।

इसके अतिरिक्त वास्तु-विद्या, और ज्योतिष-विद्या के घनिष्ठ सम्बन्ध की स्थापना, और भी दूसरे प्रकारों से की जा सकती है । स्थापत्य-लक्षण’ (अ० ४४ ) में समराङ्गण ने गणित एवं ज्योतिष तथा सामुद्रिकशास्त्र को स्थापत्य के अष्टाङ्ग में परिगणित किया है। स० सू० के दसवें अध्याय का निम्न प्रबचन- चतुःप्रकारं स्थापत्यमष्टधा च चिकित्सितम् । धनुर्वेदश्च सप्ताङ्गो ज्योतिष कमलालयात ॥ ७७ ॥

अर्थात् चतुर्विध स्थापत्य, अष्टविध आयुर्वेद, सप्तविध धनुर्वेद, तथा ज्योतिष—इन सभी शास्त्रों के मूल-प्रवर्तक ब्रह्मा हैं। इस प्रकार ज्योतिष एवं वास्तुविद्या की शास्त्र- परम्परा भी इन दोनों के घनिष्ठ औरस सम्बन्ध का द्योतन करती हैं। अथच, रूप, अंक एवं प्रमाण का शान किसी भी वास्तु-निवेश के लिये अत्यावश्यक है । यह ज्ञान गणित से मिलता है । गणित (फलित एवं सामुद्रिक ) ज्योतिष-विद्या का ही अंग है । कल्प-सूत्रों के शुल्ब-सूत्रों में प्रतिपादित वेदि-रचना के प्रमाण एवं रूप आदि
वास्तु विद्या के श्रादि सिद्धान्त माने गये हैं । वेदि-रचना ही भारतीय वास्तु-कला की प्रथम
वेदी है। महाबीर नामक पूर्व मध्यकाल के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी ने अपने “गणितसार” में
वास्तु-विद्या और गणित के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला है ।

भौगोलिक एवं भौगर्भिक दृष्टिकोण



है। नगर-निवेश में आधुनिक देश-मापन (Regional planning) का यही मर्म है । निवेश्य नगर की भौगोलिक स्थितियों के ज्ञान से ही पुर-विशेष की निवेश-योजना बनाई जा सकती है। मानवावास के लिये जल-साधन ऊर्वरा भूमि, हरे-भरे बन, विस्तृत चराऊ मैदान आवश्यक हैं। पुनश्च समतल भूमि तथा पर्वतीय प्रदेश दोनों स्थानों के नगरों की विशेषतायें अलग-अलग होंगी। समुद्र-तट पर विकसित नगर की विशेषता अपनी निराली होगी। प्रचीन नगरों के विभिन्न भेदों-पुर (राजधानी नगर ) पत्तन, पुट भेदन (व्याव- सायिक नगर ) आदि की आत्मकहानी में भौगोलिक मर्म छिपा है । इसी दृष्टिकोण से समराङ्गण ने ‘भुवनकोश’ नामक चौथे अध्याय में जय की भौगोलिक जिज्ञासा का उत्तर दिया है। पुरनिवेश के लिये देश-विशेष के भूगोल का ज्ञान आवश्यक है जिससे एक देश अथवा राष्ट्र के लिये आवश्यक विभिन्न वर्गीय पुरों की यथा- स्थान निवेश-योजना बनाई जा सके।

भूमि-परीक्षा में भौगोलिक ज्ञान के अतिरिक्त भौगर्मिक ज्ञान भी परमोपादेय है। भूमि की भौगर्भिक परीक्षा की विस्तृत विवेचना ‘पुर-निवेश’ पटल में द्रष्टव्य है। यहां पर इतना ही संकेत पर्याप्त होगा कि यह पृथ्वी वसुन्धरा कहलाती है। इसीलिये इसका नाम रत्नगर्भा है। किस भूमि में कौन से खनिज पदार्थ पाये जाते हैं ? कौन सी भूमि किस कार्य के लिये विशेष उपयुक्त है ? इन सभी के समाधान के लिये भूमि की भौगर्भिक-परीक्षा का वास्तु-शास्त्र में एक महत्वपूर्ण स्थान है। भूमि के गन्ध, वर्ण, रस ( स्वाद) एवं स्पर्श से प्राचीन स्थपति भौगर्भिक परीक्षा कर लेते थे। इस प्रकार वास्तु-विद्या का भूगोल एवं भूगर्भ-विद्या (Geology ) के साथ एक घनिष्ठ सम्बन्ध है यह सिद्ध होता है। गोदोहन, भू-समीकरण के पौराणिक एवं वास्तु-शास्त्रीय ( स० सू० अ० १,७) उपाख्यान सृष्टि के आदि में हमारे पूर्वजों के द्वारा भूपरीक्षा के इस भौगोलिक एवं भौगर्भिक महा अनुष्ठानों की सूचना देते हैं।

स्वातन्त्रिक (Architectural itself)

अन्त में वास्तु शास्त्र के व्यापक क्षेत्र के समुद्घाटन में “वास्तु” शब्द की जो व्याख्या प्राचीन प्राचार्यों ने की है वह भी इस सम्बन्ध में बड़ी सहायक है। मानसार के अनुसार धरा, हर्म्य भवन आदि ) यान एवं पर्यक इन चारों का ही वास्तु शब्द से बोध होता है। वास्तु की इस चतुर्मयी व्यापकता की सोदाहरण व्याख्या करते हुये डा. प्राचार्य अपने वास्तु-विश्व-कोश (पृ० ४५६) में लिखते हैं-हर्य में प्रासाद, मण्डप, सभा, शाला, प्रपा तथा रङ्ग-ये सभी सम्मिलित हैं। यान-श्रादिक, स्यन्दन, शिविका एवं रथ का बोधक है। पर्यंक में पञ्जर, मञ्चली, मञ्च, फलकासन तथा बाल-पर्यत सम्मिलित हैं । वास्तु शब्द ग्रामों, पुरों, दुर्गों, पत्तनों, पुटभेदनों, आवास-भवनों एवं निवेश्य-भूमि में भी गतार्थ है । अथच मूर्तिकला अथवा पाषाणकला वास्तुकला की सहचरी कही जा सकती है।”

अग्निपुराण (अध्याय १०६-५-१ ) तथा गरुड़ पुराण (अ०४६) वास्तु शब्द के इस मर्म का समर्थन करते हैं । कौटिल्य के अर्थशास्त्र ( अ० ६५ ) में भी वास्तु शब्द की व्यापकता का समर्थन प्राप्त है ।। तत्तच्छ यस्कर समराङ्गण-सूत्रधार के प्रथम ही अध्याय में शास्त्रारम्भ के समर्थन में मंगलमयी भावना के निदर्शन में वास्तु शास्त्र की उपादेयता की अवतारण करते हुये ग्रन्थकार का निम्न प्रवचन द्रष्टव्य है।

‘देशः पुरं निवासश्च सभा वेश्मासनानि च ।

यद्यदीदशमन्यञ्च मतम् ॥४॥

वास्तुशास्त्राहते तस्य न स्याल्लक्षणनिश्चयः ।
तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमेतदुदीर्यते ॥१॥

इन श्लोकों में वास्तुशास्त्र के व्यापक क्षेत्र का पूर्ण आभास प्राप्त होता है। ‘देश’ जनपद, राष्ट्र, देश के विभिन्न भेद एवं विभिन्न देशभूमियों का बोधक है। अतः पुर- निवेश में देशमापन एवं भूपरीक्षण आदि प्रारम्भिक कार्य भी गतार्थ हैं । ‘पुर’ से-नगर के विभिन्न प्रकार जैसे राजधानी, शाखानगर, पत्तन पुटभेदन, आदि सभी बोधव्य हैं । ‘निवास’ विभिन्न कोटिक नगरेतर शाखानगर, खेट, ग्राम, पल्ली एवं पल्लिकाओं आदि बसतियों का बोधक है। ‘सभा’ में विशिष्ट भवन, मन्त्रशाला, धारापरिषद् आदि गतार्थ हैं। वेश्म में विभिन्न वर्गीय भवन जैसे देवावास (प्रासाद) नृपावास राज-प्रासाद एवं जनावास तथा इनके बहुसंख्यक प्रभेद परिगणित हो सकते हैं । अथचं, ‘श्रासन में विभिन्न प्रकार के आसन, वाहन (देखिये प्रतिमा’ पटल ) शथ्या श्रादि सम्मिलित हैं ।


वास्तु-शास्त्र के व्यापक विस्तार के सम्बन्ध में समराङ्गण का यह प्रवचन दिग्दर्शन मात्र है। स० सू० के ‘प्रश्न’ नामक तृतीय अध्याय की एतद्विषयक सामग्री की समीक्षा का शीघ्र ही अवसर पा रहा है।

‘मयमत’ के अनुसार वास्तु शब्द का अभिप्राय भूमि, प्रसाद, यान एवं शयन से है। ये ही विषय सभी वास्तु-शास्त्रीय ग्रन्थों के प्रधान विषय है। समराङ्गण में यान का तात्पर्य वायुयान से है ( देखिये यन्त्र’ पटल)। अथच यहाँ पर एक तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान और आकर्षित करना है। वास्तु-विद्या कला और विज्ञान दोनों ही है । अतः वास्तु-शास्त्र का विषय एक मात्र सिद्धान्तों
का प्रतिपादन ही नहीं है वरन् उन सिद्धांतों के अनुरूप वास्तु-कृतियों की रचना भी है और वे रचनायें ऐसी होनी चाहिये जिनको देखसर मानव की हत्तन्त्री में उसी प्रकार का स्पन्दन होने लगे जैसा कि काव्य के रसास्वाद से होता है । मनमयूर उसी प्रकार से नाचने लगे जिस प्रकार एक विदग्ध गायक के सुन्दर गीत से नाचता है । काव्य एवं संगीत के रसास्वाद की यह तन्मयता विमुग्धकारिणी वास्तुकला में भी अवश्य पानी चाहिये । एलौरा के कैलाश, अजन्ता के गुहा-मन्दिर एवं चित्र प्राचीन वास्तु-स्मारकों को हम जब देखते हैं तो हम विमुग्ध होकर उनको मानवकृति नहीं कहते-देवकृति समझते हैं।

पितामह ब्रह्मा ने विश्व की रचना तो की लेकिन उसकी सुन्दर निवेशयोजना का भार विश्वकर्मा को सौंपा
गया। कथा है ( स० सू० महासमागमन अ० १) सृष्टि के उपरान्त संसार की योजना का भार महाराज पृथु को सौंपा गया। पृथु राजा था । राजा कलाकार विश्वकर्मा का कार्य नहीं कर सका । अतः अपनी इस असफलता का रोना लेकर पृथु पुनः पितामह के पास पहुंचे। महासमा पृथ्वी भी अपनी करुण कहानी लेकर पहुँची। दोनों की दुर्दशा देखकर ब्रह्मा ने विश्वकर्मा को बुलाया और विश्व के निवेश ( विशेषकर भूतल के निवेश ) का भार सौंपा।


विश्वकर्मा ने अभी तक देवपुरियों का निर्माण किया था। ब्रह्मा के इस महानियोग में पूर्ण सफलता के लिये उसे सहायकों की आवश्यकता हुई। स्थपतियों की परम्परा अभी पल्लवित नहीं हुई । अतः पिता के इस अनुष्ठान में पुत्रों ने हाथ बटाया। विश्वकर्मा ने अपने मानसपुत्रों—जय, विजय, सिद्धार्थ एवं अपराजित को बुलाया और ब्रह्मा के इस नियोग की सूचना दी (देखिये स०सू० अ० २) और भूतल की निवेश योजना-राजा की राजधानी, देश एवं जनपदों के रक्षार्थ विभिन्न प्रकार के दुर्गों, जनावासों (पुर, नगर, ग्राम, खेटादि) तथा जाति एवं वर्णानुरूप आवासभवनों और देवप्रतिष्ठा के लिये देवभवनों आदि में सहायता की याचना की।

यह संवाद हिमाद्रि के स्वर्गीय उत्तुंग शिखरों पर हो रहा था। स्वर्ग से भूमि पर उतरने की अवतारणा में विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय ने अपने पिता से इस अनुष्ठान-यज्ञ में आहुति देने के अनुष्ठान की सांगोपांग जिज्ञासा में प्रश्नों की झड़ी लगा दी। इन्हीं प्रश्नों का प्रवचन स० सू० के ‘प्रश्न’ नामक तीसरे अध्याय का वास्तु-शास्त्र के व्यापक विस्तार का प्रवचन है। इस प्रश्न-तालिका को हम अपने अध्ययन के अनुरूप निम्न समूहों में विभाजित कर सकते है:-


(१) औपोद्घातिक क) सार्व-भौमिक
(i) सृष्टि-महाभूत एवं नक्षत्र ।
(ii) ग्रहों की गतियाँ, स्थितियाँ, पारस्पारिक दूरी, श्राधार एवं कारण श्रादि ।
(iii) पृथ्वी के ऊपर और नीचे के लोक ।
(ख) सांस्कृतिक मानव-सभ्यता एवं संस्कृति तथा धर्म के विभिन्न युग एवं उनकी व्यव- स्थायें-प्रथम उत्पति, प्रथम राजा, प्रथम वर्ण और प्रथम नक्षत्र ।
(ग) भौगोलिक
(1) भूमि आकार, आधार, प्रमाण, विस्तार, परिधि तथा बाहुल्य ।
(ii) पवंत-संख्या, ऊँचाई, लम्बाई और चौड़ाई।
(iii) महाद्वीप तथा वर्ष ( देश ) उनकी सरितायें, समुद्र जन एवं जनपद तथा इन सबकी विशेषतायें।
(घ) भौगर्भिक—देश एवं देशभूमियों की परीक्षा तथा शब्द, स्पर्श, गन्ध, वर्ण तथा रस के अनुसार भूमि-परीक्षण तथा निवेश्य वास्तु (पुर, ग्राम, भवन, प्रासाद आदि ) की भूमि का चयन ।
(ङ) स्थापत्य-विषय, प्राथमिक कृत्य, इष्टकाकर्म, भूमिशोधन (अग्नि, जल तथा वायु से ) शल्योद्धार-विधि, दिग्ग्रह, सूत्रण, अधिवासन, मूलपाद, शिलान्यास आदि।
(२) पुरनिवेश विभिन्नवर्गीय पुरों तथा दुर्गों एवं ग्रामों आदि के निवेशनोचित भूमि के चयन के साथ-साथ राजधानी-निवेशन, प्राकार-विधान, गोपुर-योजना, अट्टाल-निर्माण, परिखाकर्म वप्रविधान, पक्षद्वार, अङ्गद्वार, प्रतोली, रथ्यायें, चत्वर, क्षेत्र श्रादि ।
(ii) मार्गविनिवेश-सीमाओं एवं क्षेत्रों के साथ-साथ पुर के अभ्यन्तर एवं वाह्य दोनों प्रदेशों में मार्ग-निवेश।
(iii) पदविन्यास
(iv) इन्द्रध्वज-निवेशन तथा देव-प्रतिष्टा ।
(v) जाति एवं वर्ण के अनुरूप जनावास ।
(३) भवनकला
(i) राजप्रासाद-प्रमाण, मान, संस्थान, संख्यान, उच्छाय आदि लक्षणों से लक्षित एवं प्राकारप रिखा-गुप्त; गोपुर, अम्बुवेश्म, क्रीडाराम, महानस, कोष्ठागार, श्रायुधस्थान, भाण्डागार, व्यायामशाला, नृत्यशाला, संगीतशाला, स्नानगृह, धारागृह, शय्यागृह, वासगृह, प्रेक्षा ( नाट्यशाला ), दर्पणगृह, दोलागृह, अरिष्टगृह, अन्तःपुर तथा उसके विभिन्न शोभा सम्भार—कक्षायें, अशोकवन, लतामंडप, वापी, दारूगिरि, पुष्पवीथियाँ तथा राजभवन की किस-किस दिशा में पुरोहित, सेनानी, ब्राह्मण, ज्योतिषी एवं मन्त्री के निवास ।
(ii) जनावास—शालभवन, भवनाङ्ग, भवनद्रव्य, विशिष्ट भवन, चुनाई, भूषा, दारूकर्म, इष्टकाकर्म, द्वारविधान, स्तम्भलक्षण, छाद्यस्थापन आदि आदि के साथ वास्तुपदों की विभिन्न योजनायें।
(iii) मान, भंग एवं वेध आदि ।
(४) यन्त्रघटना ( दारुक्रिया से अनुमेय )
(५) प्रासाद-वास्तु संस्थान, मान, विन्यास, प्राकृति, भूषा, शिखर, श्रादि ।
(६) प्रतिमा यान, परिवार, वर्ण, रूप, विभूषण, वस्त्र, वय, श्रायुध एवं ध्वजानों के लक्षणों से चिह्नित विभिन्न देवों एवं देवियों, यक्षों, गन्धों श्रादि की प्रतिमायें।
(७) चित्रकला


चित्रक्रिया तथा लेप्यक्रिया

विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र जय के द्वारा जिशासित इस प्रश्नमालिका में वास्तु-विद्या के सभी अङ्गों का सन्निवेश होगया है। इन्हीं प्रश्नों का उत्तर समराङ्गण की वास्तु-विद्या (Canons of Architecture) का विवेचन है। अपने पुत्र जय के इन प्रश्नों को सुन कर अति हृष्टमानस विश्वकर्मा जी कहते हैं.

साधु वस्स त्वया सम्यकप्रज्ञयातिविशुद्ध या।
प्रश्नोऽयमीरितो वास्तुविद्याडजवनभास्करः ॥

स एवं निधाय प्रश्नानां समुदायममुं हृदि ।
वदतो मेऽवधानेन श्रण यद्ब्रह्माणोदितम् ॥

अर्थात् हे वत्स तुम ने अपनी विशुद्ध प्रज्ञा से वास्तु-विद्या रूपी कमल-वन के लिये सूर्य के समान इन प्रश्नों की उद्भावना की है। अतः इन प्रश्नों के समुदाय को हृदय में रख अब इनका जबाब सुनो जो ब्रह्मा जी ने बताया है।


इस प्रकार इस वास्तु-विद्या का प्रवर्तक स्वयं पुराण पुरुष ब्रह्मा को मान कर इस वास्तु-विद्या में भी पुरातनत्व एवं पुण्यत्व से युक्त शास्त्रत्व की प्रतिष्ठा की गयी है। डा. प्राचार्य ने वास्तु-शास्त्र के व्यापक स्वरूप की अभिव्यंजना का प्रथम पथ प्रदर्शन किया है। वास्तु-विद्या के ग्रन्थों के विहगावलोकन में हमने देखा कि बहुत से ग्रन्थों के नाम शिल्प-शास्त्र की संज्ञा से उल्लिखित किये गये हैं। ‘शिल्प’ शब्द का अर्थ सुन्दर एवं उपयोगी दोनों ‘कला’ है परन्तु शिल्प-शास्त्र’ इन ग्रन्थों में वास्तु शास्त्र के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । परम्परा से प्रचलित जिन ६४ कलाओं का इस देश में अतिप्राचीन समय से उल्लेख एवं प्रचार मिलता है, उनमें वास्तु-विद्या को एक कला में परिगणित किया गया है। सम्भवतः यह परम्परा उस सुदूर अतीत की बात है जब वास्तु-कला का पूर्ण विकास इस देश में नहीं हो पाया था। शुक्राचार्य के समय में वास्तु-विद्या का विस्तार इतना व्यापक हो गया था कि वास्तु-कला के महाकलेवर में सभी प्रधान कलायें गतार्थ होगई थीं। वैसे तो वास्तु-शास्त्र का प्रधान विषय-भवन-कला, यन्त्रकला, काष्ठकला, भूषणकला, आसन, सिंहासन आदि विधान तथा चित्रकला आदि-है। अतएव डा० प्राचार्य के शब्दों में “वास्तु-कला में सभी प्रकार के भवनो—धार्मिक, श्रावासयोग्य, सेनायोग्य तथा उनके उप-भवन एवं उपाङ्गों, प्रत्यङ्गों आदि का प्रथम स्थान है। पुरनिवेश, उद्यानरचना, पण्यस्थानों, पोतस्थानों, आदि का निर्माण; मार्गयोजना, सेतुविधान, गोपुरविधान, द्वारनिवेश, तोरणविनिवेश, परिखा-खनन, वप्रनिर्माण, प्रकारविधान, जल-भ्रम-योजना, भित्ति-रचना, सोपान निर्माण भी वास्तु शास्त्र का प्रधान अंग है। तीसरे वास्तु-कला में भवन-फर्नीचर जैसे शय्या, मंजूषा, पंजर, नीड, चटाई, यान, दीप एवं मार्ग-दीप-स्तम्भ आदि की रचना भी सम्मिलित है। चौथे वास्तु कला में भूषण-रचना एवं वस्त्र-रचना भी सम्मिलित हैं। देवभूषणों में मौलि, मुकुट, शिरस्त्रक आदि भूषण, उत्तरीय आदि वस्त्र भी सम्मिलित हैं। अथच जैसा पहले ही संकेत किया जा चुका है मूर्तिनिर्माण-कला वास्तु-कला की अभिन्न सहचरी है। अतः लिङ्ग, देव-मूर्तियाँ, ऋषि-मुनि श्रादि की प्रतिमायें तथा गरुड़, हंस आदि के चित्र का रचनाकौशल इस कला का अभिन्न अंग है । वास्तु-कला, भवन- निर्माण अथवा पुरनिवेश के प्रारम्भिक कृत्यों जैसे भूमि-चयन, भूपरीक्षा, शंकुस्थापन, दिक्- साम्मुख्य एवं आयादि-निर्णय भी वास्तु-शास्त्र के अंग हैं।”

Leave a Reply