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राष्ट्रसंघ : परिचय

राष्ट्रसंघ : परिचय

नवम्बर 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् जो परिणाम निकले, मानवता के लिए विनाशकारी थे। युद्धों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों के नियमन के लिए ‘राष्ट्रसंघ’ नामक संगठन की 10 जनवरी, 1920 को स्थापना एक महत्त्वपूर्ण घटना तथा पेरिस शांति (1919 ई.) की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। राष्ट्रसंघ की स्थापना का श्रेय अमेरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन को दिया जाता है।

राष्ट्रसंघ के संविधान में एक भूमिका के अतिरिक्त 26 धाराएँ थीं। भूमिका या प्रस्तावना में राष्ट्रसंघ के
निर्माण के उद्देश्य को स्पष्ट किया गया है। इसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति-सद्भाव को बढ़ाने के साथ-साथ
कायम रखना, युद्ध की परिस्थितियों का समाधान करके शांति स्थापित करना था।

राष्ट्रसंघ का जो समझौता हुआ उसकी प्रथम सात धाराएँ उसके सांविधानिक प्रारूप से सम्बन्ध रखती हैं। प्रथम धारा में सदस्यता तथा उससे पृथक् होने के नियमों का विधान है । प्रारम्भिक सदस्य देशों में वसर्साय संधि वार्ता पर हस्ताक्षर करने वाले 32 मित्र-राष्ट्र एवं 14 तटस्थ राष्ट्र हैं। राष्ट्रसंघ के नये सदस्य असेंबली के 2/3 बहुमत से बनाए जा सकते हैं। सदस्यता से पृथक् करने से पूर्व सदस्य राष्ट्र को 2 दो वर्ष पूर्व नोटिस देकर अवगत कराना पड़ता था। 2 से 5 तक की धारा असेंबली एवं परिषद् के संगठन तथा अधिकारों से सम्बन्धित हैं। 6 एवं 7 धारा में स्टाफ की नियुक्ति के साथ-साथ महासचिव की नियुक्ति के प्रावधान के अलावा जेनेवा में कार्यालय स्थापित करने की व्यवस्था है। नि:शस्त्रीकरण का उल्लेख धारा 8 व 9 में किया गया है। धारा 10 एवं 17 अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे और 18 भविष्य में की जाने वाली संधियों की रजिस्ट्री एवं उनके प्रकाशन की व्यवस्था से सम्बंधित है। धारा 19 पेरिस शांति सम्मेलन की अव्यवहारिक संधि व्यवस्थाओं को संशोधित करने की अनुमति प्रदान करती है। धारा 20 में राष्ट्रसंघ समझौते से साम्य नहीं रखने त्राली की गई संधियों को रद्द करने का निर्णय किया गया है। धारा 21 में राष्ट्र संघ के समझौते से मुनरो सिद्धांत की वैधता अप्रभावित रहे, को स्वीकार किया गया है। धारा 22 का सम्बंध मैंडेट व्यवस्था से है। धारा 23 राष्ट्रसंघ के सदस्य राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा राष्ट्रसंघ के माध्यम से सुलझाये तथा मानव कल्याण के दायित्वों का निर्वहन करे, को रेखांकित करती है। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व अस्तित्व में आये संगठनों के दायित्वों के निर्वहन का उल्लेख धारा 24 में मिलता है । रेडक्रॉस संगठनों के कार्यों को प्रोत्साहित करने के वायदे का प्रावधान धारा 25 में मिलता है और धारा 26 राष्ट्रसंघ के संविधान में संशोधन का अधिकार देती है।

अधिदेश प्रणाली (Mandate System) से आशय है कि प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत पेरिस शांति सम्मेलन के माध्यम से जर्मनी के उपनिवेश तथा तुर्की के अनेक क्षेत्र राष्ट्रसंघ के अधीन रख दिए गए थे राष्ट्र संघ ने अपने मैंडेट द्वारा इन प्रदेशों के प्रशासन को संचालित करने का दायित्व मित्र राष्ट्रों को सौंप दिया था।

राष्ट्रसंघ का संगठन

राष्ट्रसंघ के निम्नलिखित अंग थे-(i) साधारण सभा (Assembly), (ii) परिषद् ( Council) (iii)
सचिवालय (Secretariat) (iv) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ( World Court) (v) अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ
(International Labour Organization) e
इनमें से प्रथम तीन प्रधान अंग थे तथा दो स्वायत्त अंग थे।

साधारण सभा

साधारण सभा राष्ट्रसंघ की प्रतिनिधि सभा थी। राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य राष्ट्र इसके सदस्य होते थे। इसका मुख्य कार्य व्यवस्थापिका सम्बंधी था। प्रत्येक देश का एक मत माना जाता था निर्णय सवसम्मति से लिया जाता था। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र साधारण सभा में कम से कम एक एवं अधिक से अधिक तीन सदस्य भेज सकता था। सभा का अधिवेशन वर्ष में कम से कम एक बार सितम्बर माह में जेनेक (स्विट्जरलैंड) में होता था सभा की समस्त कार्यवाही प्रेंच अथवा अंग्रेजी भाषा में होती थी। यह सभा
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय से न्यायाधीशों का 9 वर्ष के लिए निर्वाचन करती है।

साधारण सभा स्वतंत्र निकाय नहीं होकर परामर्शदात्री संगठन था इसके अधिवेशन में आम नागरिक दर्शक के रूप में भागीदारी कर सकता था । इसके कार्य राष्ट्र संघ का बजट पास करना, परिषद् के अस्थायी सदस्यों की नियुक्ति एवं उसके कार्यों की जाँच करना था। ‘वास्तव में सभा केवल वाद-विवाद का मंच न होकर राष्ट्रसंघ का एक प्रभावशाली अंग थी।

परिषद्

राष्ट्रसंघ की कार्यकारिणी सभा, के स्थायी और अस्थायी दो प्रकार के सदस्य होते थे। फ्रांस, इटली, जर्मनी एवं इंग्लैण्ड इसके स्थायी सदस्य थे। राष्ट्रसंघ के अन्य सदस्य चार प्रतिनिधियों को चुनते थे जो अस्थायी होते थे। इसका अधिवेशन वर्ष में अनेक बार सम्पन्न होता था। 1922 ई, के पश्चात् यह तय किया गया कि परिषद् की बैठकें जनवरी, मई और सितम्बर में ही हुआ करेंगी।


इसके किसी भी सदस्य को निषेधाधिकार (Veto-Power) प्राप्त नहीं था इसका कार्यक्षेत्र काफी
विस्तृत था। सचिवालय को निर्देशित करना, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के आयोजनों की व्यवस्था करना, अस्त्र-
शस्त्रों पर प्रतिबंध लगाना, संघ के सदस्यों के आर्थिक मसलों का निपटारा करना, शासनादेश का निर्धारण,
बाह्य आक्रमणों के खतरों से सदस्य राष्ट्रों की अखण्डता की रक्षा करना आदि इसके मुख्य कार्य थे। हार्वर्ड एलिस ने कहा है, ‘विश्व-शान्ति की विशा में यह ( परिषद्) एक प्रोत्साहित करने वाला कदम था जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान युद्ध के अतिरिक्त अन्य उपायों से भी किया जा सकता है।’

सचिवालय

यह राष्ट्रसंघ का महत्त्वपूर्ण अंग था। इसके प्रमुख को महासचिव (Secretary General) कहते थे। उसके निर्देशन में दो उपसचिव (Deputy Secretary General), दो अवसर सचिव (Under Secretaries) तथा 750 अत्य कर्मचारी कार्यरत थे सचिवालय का कार्यालय जेनेवा में स्थित था यह सभा और परिषद् दोनों के लिए कार्य करता था सभा एवं परिषद् के विचारणीय प्रश्नों की सूची बनाना, बैठकों की कार्यवाही का ब्यौरा रखना, प्रारूप तैयार करना, शोध-कार्य की व्यवस्था के साथ-साथ रिकार्ड संधारण जैसे अनेक कार्य सचिवालय करता था।

अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति स्थापित करने के अलावा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों को सुलझाने के लिए इसकी स्थापना 20 दिसम्बर, 1920 को हेग (नीदरलैंड) में की गई। शुरूआत में 11 न्यायाधीश नियुक्त किये जाते थे, परन्तु कालान्तर में 15 जज नियुक्त होने लगे। इनका कार्यकाल 9 वर्ष निर्धारित होता था अन्तर्राष्ट्रिय य न्यायालय राष्ट्रसंघ के संविधान की व्याख्या करना, अन्तराष्ट्रीय संधियों पर विचार करने के साथ-साथ क्षतिपूर्ति निर्धारित करने का कार्य करता था।

अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ

इसका प्रधान कार्यालय जेनेवा में स्थित है । श्रमिकों की स्थिति में सुधार लाने को ध्यान में रखते हुए इसकी स्थापना की गई। साधारण श्रमिक सभा, शासन परिषद् और अन्तरार्ष्ट्रीय श्रम कार्यालय इसके प्रमुख विभाग थे। श्रमिक सभा के 4 तथा शासन परिषद् के 24 सदस्य होते थे। श्रमिको के लिए श्रम एवं उनके अधिकारों का संरक्षण सम्बन्धी कार्य ILO करता था तदनुसार श्रमिकों से एक सप्ताह में 48 घंटे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता था 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को कार्य पर नहीं लगाने का प्रावधान किया गया इसके साथ ही महिला मजदूरों की सुविधा के लिए नियम बनाये गये।

राष्ट्रसंघ के कार्य

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व शांति कायम रखना इसका मुख्य उद्देश्य था। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उसके कार्यों का विभाजन निम्न प्रकार से किया गया है-
(I) प्रशासन सम्बन्धी कार्य

(1) वस्साय संधि के अनुसार सार बेसिन (जर्मनी) को 15 वर्ष के लिए राष्ट्रसंघ को सुपुर्द कर दिया गया था, परन्तु अव्यवस्थाओं के चलते 1935 में राष्ट्रसंघ परिषद ने सार बेसिन में जनमत संग्रह करवाया जिसके अनुसार वहाँ के लोगों ने जर्मनी के साथ मिलने का निर्णय किया। इस प्रकार 1 मार्च, 1935 को सार का प्रशासन जर्मनी को दे दिया गया। (2) पेरिस शांति सम्मेलन (वर्साय संधि) में इैजिग के जर्मन बन्दरगाह को स्वतंत्र नगर का दर्जा देते हुए राष्ट्रसंघ के संरक्षण में दे दिया। राष्ट्रसंघ ने वहाँ
का शासन चलाने के लिए कॉमश्नर की नियुक्ति कर दो, परन्तु यह व्यवस्था सफल नहीं हो पाई। अन्ततः शासन चलाने के लिए कमिश्नर की नियुक्ति कर दी, परन्तु यह व्यवस्था सफल नहीं हो पाई। अन्ततः 1939 में डैजिंग और पोलिश गलियारे की समस्या ही द्वितीय विश्वयुद्ध का आधार बन गई ।
(II) अधिदेशीय या आदेश व्यवस्था (Mandate System) इस व्यवस्था को समादेश- प्रथा और
संरक्षण प्रथा नाम से भी पुकारा जाता है इस व्यवस्था में यह प्रावधान किया गया था कि जर्मन साम्राज्य के
उपनिवेशों और टर्की के खलीफा के साम्राजन्य के अरब उपनिवेशों के कल्याण और विकास की जिम्मेदारी का निर्वहन राष्ट्रसंघ करेगा राष्ट्रसंघ द्वारा इस उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए उपर्युक्त प्रदेशों एवं उपनिवेशों का शासनाधिकार अलग- अलग देशों को सुपुर्द किया गया, जो संरक्षक राज्य (Mandatory States) कहलाये। संरक्षक राज्य राष्ट्रसंघ के समझौते के अनुसार अपने दायित्वों का निर्वाहन करते रहे। उन्हें शासन प्रबंध की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रसंघ की परिषद् को देनी होती थी राष्ट्रसंघ का ‘स्थायी संरक्षण आयोग’ रिपोर्ट की जाँच- पड़ताल करता था।

अधिदेशीय व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ ब्रिटेन और फ्रांस को मिला। लेकिन यह व्यवस्था व्यवहार एवं सिद्धांत के स्तर पर अलग थी इस व्यवस्था के तहत संरक्षक शक्तियों ने अपने हितों को साधते हुए संरक्षित प्रदेशों का शोषण किया। इस व्यवस्था से ट्रस्टीशिप संरक्षण जैसे नवीन दृष्टिकोण का उदय हुआ।

(III) अल्पसंख्यक संरक्षण सम्बन्धी कार्य : प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् अल्पसंख्यकों के
संरक्षण सम्बंधी गम्भीर समस्या थी। इसका समाधान पेरिस शांति सम्मेलन की संधियों में किया था इसके
लिए राष्ट्रसंघ एवं विभिन्न राज्यों के मध्य समझौते हुए जिनका उद्देश्य निम्नलिखित था :
जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना
धर्म एवं विचारों का सम्मान करना
नागरिक अधिकार प्रदान करना
(iv) विधि के समक्ष समान व्यवहार, समान सुविधाएँ तथा नौकरी के समान अवसर प्रदान करना
व्यापारिक और धार्मिक मामलों तथा प्रेस एवं अदालत में अल्पसंख्यकों को किसी भाषा के
(A)
प्रयोग की स्वतंत्रता देना
(vi) मातृभाषा में अल्पसंख्यकों की शिक्षा की व्यवस्था की गई।
(IV) मानव-कल्याण के कार्य : राष्ट्रसंघ की विशेष

राजनीतिक उपलब्धियाँ नहीं रही हों परन्तु गैर- राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रसंघ द्वारा किये गये कार्य सराहनीय हैं राष्ट्रसंघ के माध्यम से आर्थक रूप से कमजोर राज्यों-ऑस्ट्रिया, हंगरी, यूनान, बुल्गारिया, डेन्जिंग और सारघाटी- को ॠण उपलब्ध कराये गये राष्ट्रसंघ ने शरणार्थियों के लिए सहायता कार्यक्रम चलाकर बेघर लोगों को बसाने का कार्य किया। बौद्धिक क्षेत्र में प्रगति के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, स्मारकों एवं कला-कृतियों का संरक्षण किया। युवकों के लिए प्रौढ़ शिक्षा एवं श्रमिकों की शिक्षा की व्यवस्था की । उच्चस्तरीय साहित्य के प्रकाशन की व्यवस्था की। यातायात एवं परिवहन, स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये। युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अनेक रोगों टायफस, हैजा, मलेरिया, चेचक, तपेदिक का खतरा बढ़ गया, उनकी रोकथाम के उपाय किये। महिला कल्याण और बाल कल्याण के लिए भी सराहनीय कार्य किये, जैसे- महिलाओं के अनैतिक व्यापार पर प्रतिबंध, अश्लील प्रकाशनों पर रोक के अलावा वेश्यावृत्ति को समाप्त करने के लिए प्रयत्न किये विवाह की आयु से सम्बन्धित कानूनों में सुधार किया गया। इसी प्रकार, युद्धबंदियों को मुक्त करवाकर उन्हें घर वापस पहुँचाने की दिशा में पहल करते हुए राष्ट्रसंघ ने उल्लेखनीय कार्य किये।

शांति एवं सुरक्षा व्यवस्था सम्बन्धी कार्य

राष्ट्रसंघ के संविधान की धारा 8 में अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा व्यवस्था को बनाये रखने का प्रावधान है। राष्ट्रसंघ की ‘परिषद्’ ने सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने एवं शांति कायम करने के लिए 1920 में ‘अस्थायी मिश्रित आयोग’ (Temporary Mixed Commission) का गठन किया जिसका मुख्य उद्देश्य निरस्त्रीकरण (Disamament) को सहायता पहुँचाना था । इस आयोग में परिषद् के सदस्यों के स्थल, जल एवं वायु सेना।के एक-एक विशेषज्ञ होते थे। दिसम्बर, 1925 में राष्ट्रसंघ की परिषद ने ‘अस्थायी मिश्रित आयोग’ को समाप्त कर “निरस्त्रीकरण सम्मेलन तैयारी आयोग” की नियुक्ति की। अनेक प्रयास करने के बावजूद इस दिशा में विशेष सफलता प्राप्त हुई। हिटलर द्वारा जर्मनी में सत्ता काबिज होने पर शस्त्रों की कटौती का विचार स्वत: ही ठण्डे बस्ते में चला गया अनेक राज्यों के विवादों को सुलझाने का राष्ट्रसंघ द्वारा प्रयास किया गया जिनमें प्रमुख विवाद इस प्रकार हैं :-

आलैण्ड विवाद

यह स्वीडन एवं फिनलैण्ड के मध्य 300 आलैण्ड द्वीपों का समूह था, जिसकी 1920 में 27,000 की जनसंख्या थी। प्रारम्भ में इस पर स्वीडन का अधिकार था। कालान्तर में नेपोलियन के युद्धों (1809) के समान फिनलैण्ड एवं रूसी साम्राज्य का आधिपत्य स्थापित हो गया 1917 में फिनलैण्ड स्वतंत्र हो गया। आलैण्ड के लोग मूलत: स्वीडिश थे इसलिए उनकी इच्छा स्वीडन के अधीन रहने की थी। फिनलैण्ड यह नहीं चाहता था अत: फिनलेण्ड एवं स्वीडन के मध्य युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। ऐसा स्थिति में ब्रिटेन ने राष्ट्रंसंघ की धारा 11 के अन्तर्गत इस ओर ध्यान आकृष्ट कराया और जुलाई, 1920 को यह मामेला राष्ट्रसंघ की परिषद् में पहुँच गया। परिषद् ने कानून विशेषज्ञों में राय मशविरा करके विवाद को निपटाने के लिए एक समिति का गठन कर दिया समिति ने 24 जून, 1921 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया था । इसके अनुसार आलैण्ड द्वीप पर फिनलैण्ड का प्रभुत्व रहेगा आलैण्ड के नागरिकों को स्वायत्तता एव
राजनीतिक अधिकारों की गारण्टी दी जाएगी।

विलना विवाद

पोलैण्ड एवं लिथुआनिया के मध्य स्थित नगर पर वर्साय संधि के अनुसार लिथुआनिया का अधिकार था। लेकिन पोलैण्ड ने अनैतिक रूप से इस पर अधिकार कर लिया। राष्ट्रसंघ ने इस विवाद को सुलझाने में 2 वर्ष से अधिक समय लिया और अन्ततः 3 फरवरी, 1923 को विलना पर पौलेण्ड का आधिपत्य स्वीकार कर लिया गया परन्तु यह लिथुआनिया के साथ न्याय नहीं था।

मेमेल विवाद

वस्साय संधि की शर्तों के अनुसार यह प्रदेश पोलैण्ड के संरक्षण में था, परन्तु जनवरी, 1930 में लिथुआनिया की सेना ने मेमेल में प्रवेश करके अस्थायी सरकार का गठन कर लिया। इसके उपरांत यह मसला राष्ट्रसंघ में पहुँच गया। नार्मन डेविस के नेतृत्व में इस विवाद के निपटारे के लिए समिति का गठन किया। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मेमेल पर लिथुआनिया का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।

अल्बानिया विवाद

यूगोस्लाविया और यूनान के पश्चिम में स्थित अल्वानिया का दोनों देश विभाजन कर लेना चाहते थे। राष्ट्रसंघ ने इसे स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देकर 1920 में सदस्य बना लिया, परन्तु इसकी सीमा का निर्धारण नहीं किया। यूगोस्लाविया अल्बानिया में घुसपैठ करता रहा, अन्ततः उसने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर राष्ट्रसंघ ने हस्तक्षेप करते हुए राजदूतों की परिषद् बनाई जिसने अल्बानिया की सीमा निर्धारित की और यूगोस्लाविया को सेना हटाने के लिए निर्देशित किया।

इटली-अबीसीनिया युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् इटली में मुसोलिनी के नेतृत्व में तानाशाही का उदय हुआ। इस समय यूरोप अनेक समस्याओं से ग्रस्त था। मुसोलिनी ने इन परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए अबीसीनिया पर आक्रमण कर दिया और राष्ट्रसंघ को यह सूचित किया कि अवीसीनिया ने इटली पर आक्रमण किया था, इसलिए उसने सुरक्षात्मक कदम उठाया है। राष्ट्रसंघ की परिषद् ने इन आरोपों का खंडन करते हुए इटली को दोषी मानते हुए उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। ब्रिटेन एवं फ्रांस की ढुल-मुल नीति के चलते इटली के हौसले बुलंद हो गये और उसने 1936 में अबीसीनिया पर अधिकार कर लिया। 30 जून, 1936 को साधारण सभा की बैठक में सोवियत रूस के अलावा किसी ने भी अबीसीनिया का समर्थन नहीं किया। अंतत: 15 जुलाई, 1936 को इटली पर लगे आर्थिक प्रतिबंध वापस हटाने पड़े। इससे राष्ट्रसंघ का खोखलापन जग जाहिर हो गया।

स्पेन का गृहयुद्ध

फासीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर स्पेन के जनरल फ्रांको ने स्पेन की गणतंत्रीय सरकार के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इसने गृह-युद्ध (1935-39) का रूप धारण कर लिया। इटली एवं जर्मनी ने जनरल फ्रांको की मदद की, तब स्पेन की सरकार ने राष्ट्रसंघ से मदद की गुहार को। इसके बाद 2 अक्टूबर, 1937 को साधारण सभा ने हस्तक्षेप करते हुए इटली एवं जर्मनी को आदेशित किया कि वे अपनी सेनाओं को स्पेन की भूमि से हटाये, परन्तु उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। भारी खून-खराबे के पश्चात् फ्रांकों को विजय मिल गई । इस घटना से भी राष्ट्रसंघ की शांति स्थापित करने की मुहिम की पोल खुल गई ।

मंचूरिया का संकट

1931-32 के मंचूरिया समस्या को सुलझाने में राष्ट्रसंघ असहाय रहा। रूस की सीमा से लगे हुए चीनी प्रांत मंचूरिया में जापानी उद्योगपतियों ने पूँजो निवेश किया था। इसलिए जापान की सरकार इस पर नियंत्रण रखना चाहती थी। 17 सितम्बर, 1931 को चीन पर जापानी रेल सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाकर जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया। राष्ट्रसंघ का सदस्य होने के कारण चीन ने इस विवाद को 21 सितम्बर, 1931 को परिषद् में रख दिया। जापानी प्रतिनिधि ने राष्ट्रसंघ की परिषद् में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस समस्या का हल आपसी विचार-विमर्श से निकाला जा सकता है। मामला नहीं सुलझने पर जापान ने एक आयोग के गठन की माँग कर समस्या को सुलझाने का प्रस्ताव रखा। इसको स्वीकारते हुए ब्रिटेन के लॉर्ड लिटन के नेतृत्व में लिटन आयोग गठित किया गया 2 अक्टूबर, 1932 को लिटन आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में कहा गया कि कि मंचूरिया में चीनी प्रभुसत्ता के अन्तर्गत स्वायत्त शासन स्थापित किया जाना चाहिए। लिटन आयोग के निर्णय को नकारते हुए जापान ने 1 जनवरी, 1933 को मंचूरिया पर पुनः आक्रमण कर दिया। 20 मार्च, 1933 को जापान ने राष्ट्रसंघ की सदस्यता से त्यागपत्र भी दे दिया। इस प्रकार जापान की सदस्यता को खुली चुनौती देने से उसकी धज्जियाँ उड़ गईं।

राष्ट्रसंघ और उसकी असफलता

विश्व-शांति के पुजारी अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने विश्वयुद्ध की त्रासदी के उपरान्त शांति स्थापित करने के उद्देश्य से 10 जनवरी, 1920 को राष्ट्रसंघ की नींव रखी। परन्तु परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं होने के कारण राष्ट्रसंघ अपना महत्व खोता गया राष्ट्रसंघ की असफलता के निम्नलिखित कारण थे-

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका का सहयोग नहीं मिलना :

किसी भी संगठन या संस्था की सफलता उसके सदस्यों के सहयोग पर निर्भर करती है । दूसरी बात यह भी है कि शक्तिशाली व्यक्ति ही अपनी बातों को दूसरो से मनवा सकता है। अमेरिका राष्ट्रसंघ का सदस्य नहीं था, उसने राष्ट्रसंघ के निर्णयों की अवहेलना की। अन्तत: जापान भी राष्ट्रसंघ से पृथक् हो गया। तानाशाह शासकों ने विश्व को युद्ध के मुँह में धकेल दिया।

  1. राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों में स्वार्थपरकर्ता

राष्ट्रसंघ का निर्माण विश्व में शांति व्यवस्था को कायम
रखने के लिए किया गया था यह तब ही सम्भव हो पाता जबकि सदस्य देशों के हितों में विरोधाभास नहीं होता। परन्तु पेरिस शांति सम्मेलन में पराजित राष्ट्रों को दण्ड एवं विजित राष्ट्रों, विशेषकर इंग्लैण्ड एवं फ्रांस को क्षतिपूर्ति के नाम पर बड़ी धनराशि मिली। कभी भी किसी भी मुद्दे पर सदस्य देशों की एक राय बन ही नहीं पाती थी।

  1. राष्ट्रसंघ की स्वयं की सेना नहीं होना किसी भी राष्ट्र पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उस पर
    लगाम नहीं कसी जा सकती है। इटली के इथोपिया एवं जापान के चीन पर आक्रमण करने पर राष्ट्रसंय ने आक्रमक राष्ट्रों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया, परन्तु गुप्त रूप से इंग्लैण्ड उनकी मदद करता रहा। ऐसी स्थिति में सेना भेज कर आक्रामक राष्ट्रों को पराजित करके नियंत्रित किया जा सकता है कि अपनी सेना नहीं होने के कारण राष्ट्रसंघ विश्व में शांति स्थापित नहीं कर पाया।
  2. अधिनायकों का उद्भव

विश्व में शांति तब ही सम्भव हो पाती जबकि सभी राष्ट्रों के शासक जनता की भावनाओं की कद्र करते। परन्तु 20वीं शताब्दी में मुसोलिनी, हिटलर, फ्रेंको जैसे तानाशाहों का उद्भव हुआ, जो कि युद्ध को अनिवार्य समझते थे अधिनायकों ने पेरिस शांति सम्मेलन में उनके साथ हुए अन्याय का बदला लेने के लिए संघर्ष को आवश्यक समझा

  1. राष्ट्रसंघ के संविधान में दोष (i) सदस्य राष्ट्र राष्ट्रसंघ के आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं थे।
    (ii) किसी भी राष्ट्र को अपराधी घोषित करने के लिए परिषद् को सर्वसम्मति से निर्णय लेना आवश्यक था जो कि असम्भव कार्य था। (iii) संघ के संविधान में युद्ध पूर्णत: प्रतिबंध नहीं था।
  2. राष्ट्रसंघ संविधान की धारा 8 के अनुसार नि:शस्त्रीकरण नहीं करा सका।
  1. जर्मनी में नाजीवाद एवं जापान में सैंनिकवाद ने अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की नींव हिला दी।
  2. सदस्य राष्ट्रों के दृष्टिकोणों में आधारभूत अन्तर। राष्ट्रसंघ की समीक्षा

सदस्य राष्ट्रों की निष्क्रियता एवं निष्ठाहीनता के कारण राष्ट्रसंघ विश्व को युद्धों से निजात और शांति को स्थापना करने भी सफल नहीं हो सका। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि राष्ट्रसंघ के खाते में कोई भी उपलब्धि नहीं है। उसने विश्व को मानवता एवं स्नेह का पाठ पढ़ाया। इसके अलावा ऐसी प्रयोगशाला प्रदान को जहाँ विभिन्न प्रकार के अन्तर्राष्ट्रीय विचारों और कार्यों का परीक्षण किया जा सकें। हमारी सभ्यता को राष्ट्रसंघ को सबसे बड़ी देन यह थी कि उसने अन्तर्राष्ट्रीय कानून को समुचित ढंग से नियमबद्ध किया। राष्ट्रसंघ को असफलता भी मानव समुदाय के लिये हितकारी साबित हुई। उसने जो बेशकीमतो अनुभव दिये, विश्व ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के रूप में उसका पूरा लाभ उठाया। लैंगसम के शब्दों, “राष्ट्रसंघ की सबसे बड़ी उपलब्धि अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के विचार को उन्नत करना था। वस्तुत: राष्ट्रसंघ ने विश्व इतिहास में पहली बार दनिया के राजनीतिज्ञों को विचार-विमर्श करने का मंच प्रदान किया जहाँ सभी एकत्रित होकर अन्तर्राथ्टीय समस्याओं का निषटारा कर सकते हैं, परन्तु स्वार्थों ने सदस्य राष्ट्रों को एक मंच पर नहीं आने दिया जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रसंघ अपने उद्देश्य को प्राप्ति में असफल रहा ।

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