Posted in: आधुनिक विश्व का इतिहास

यूरोप में पूंजीवाद का उद्भव

यूरोप में पूँजीवाद का उद्भव

यूरोपीय संदर्भ में इतिहासकार जे.ई. स्वेन ने लिखा है कि, “मध्य युग सामान्यतः उस काल के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जो कि पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य के पतन से पुनर्जागरण और धर्म सुधार आन्दोलन के प्रारम्भ तक चलता है।” इस प्रकार अतीत की घटनाओं के आधार पर यूरोपीय इतिहास को तीन भागों में विभाजित किया गया है-प्राचीन, मध्य और आधुनिक। ।

सामंतवाद, मध्यकाल एवं पूँजीवाद, आधुनिक युग की विशेषता मानी जाती है। 500 ई. से 1500 ई. तक के काल को मध्यकाल एवं इसके बाद से आधुनिक युग की शुरुआत मानी जाती है। पाश्चात्य इतिहासकार मध्यकालीन यूरोप को अंधकार युग (500 ई. से 1000 ई. ) एवं विकसित युग (1000 ई. से 1500 ई.) में
विभाजित करते हैं। अंधकार युग (500 ई. से 1000 ई.) में शिक्षा का विकास अवरुद्ध होकर धर्म तक सीमित हो गया, कबीलों के सरदारों के मध्य संघर्ष हुआ, ईसाई धर्म की सर्वोच्चता यूरोप में मानी जाने लगी रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई, किसान और दासों पर सामंतों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। यह स्थिति 1000 ई. तक रही। इसके पश्चात् ग्यारहवीं शताब्दी में यूरोप में नये युग का सूत्रपात हुआ। नगरों का विकास, कृषि क्षेत्र में प्रगति, गिल्ड प्रणाली का उदय, शिक्षा का उत्कर्ष, शक्तिशाली राज्यों का अभ्युदय, पोप व सम्राटों के मध्य सर्वोच्चता के लिए संघर्ष आदि विकसित युग की विशेषताएँ मानी गई हैं।

सामंतवाद का अर्थ : सामंतवाद मध्ययुगीन यूरोप की प्रमुख विशेषता है । इसे अंग्रेजी में ‘ फ्यूडेलिज्म’ कहते हैं।’फ्यूडल’ शब्द की उत्पत्ति ‘फ्यूडम’ नामक शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है ‘जागीरदार’। सामंतवाद के उदय के मूल में मध्ययुगीन यूरोप में अराजकता एवं अशान्ति रही है। रोमन साम्राज्य के अवसान के पश्चात् बर्बर जातियों ने सिर उठाया और एक के बाद एक हमले रोम पर किये, तो बर्बर जातियों के हमलों से रोम को मुक्ति दिलाने के लिए कुछ वीर पुरुषों ने जिम्मेदारी ली। रोम की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाले इन वीर पुरुषों ने ग्रामों एवं नगरों में दुर्गों का निर्माण करवाकर उनमें सशस्त्र सैनिक रखे। इन वीर पुरुषों की सैन्य सेवाओं के बदले उन्हें जागीर के रूप में भूमि दी जाती थी। जागीर का प्रमुख जागीरदार अथवा सामंत कहा जाता था वेबस्टर के अनुसार, “सामंतवाद एक ऐसी प्रणाली है. जिसमें स्थानीय शासक उन शक्तियों का प्रयोग करते हैं जो सम्राट अथवा किसी केन्द्रीय शक्ति को प्राप्त होती है। इस प्रणाली के अन्तर्गत राजा अपने अधीनस्थ भूमि को अपने वीर सैनिकों एवं अन्य राजभक्ति प्रदर्शित करने वाले सरदारों को बाँट देता था उस भू- भाग के स्वामी कृषकों से खेती करवाने के साथ-साथ अपनी इच्छानुसार कर वसूल करते थे।”

छठी शताब्दी से 15वीं शताब्दी के मध्य यूरोप में सामंतवाद फला-फूला। सामंतवादी प्रणाली में राजा
के समस्त अधिकार एवं शक्तियाँ स्थानीय शासक (सामंत) में निहित थी यूरोपीय देशों में सामंतवाद का
स्वरूप अलग-अलग था।

यूरोप में सामंत प्रथा

मध्यकालीन यूरोप में सामंत प्रथा के दो स्वरूप मुख्य थे – (i) राजनीतिक, (ii) आर्थिक।

(1) राजनीतिक स्वरूप सामन्तवादी यूरोप में राजपरिवार के लोगों के पास बड़ी-बड़ी पुश्तैनी जमंदारियाँ थीं। राजा भूमि का एक भाग अपने पास रख कर शेष भाग को सामंतों को बाँट देता था। सामंत को ‘लार्ड तथा उसकी भूमि को ‘फीफ’ कहा जाता था जिनके पास बड़े भू-खण्ड होते थे उन्हें ही ‘लार्ड’ कहते थे। लॉर्ड अपनी फीफ को छोटे सामंतों को वितरित कर देते थे छोटे सामंत बड़े सामंतों (लॉर्ड) के वासाल (आसामी) होते थे उन्हें ड्यूक, काउन्ट और बैरन ( नाइट) की उपाधि प्रदान की जाती थी।

काउण्ट की नियुक्ति राजा या सम्राट करता था और वह अपने कार्यों के लिए सप्राट के प्रति उत्तरदायी होता था काउण्ट की नियुक्ति स्थायी होती थी। उसे सिर्फ राजा ही अपदस्थ कर सकता था क्रेन ब्रिन्टल ने लिखा है कि, “काउण्ट आर्थिक, न्यायिक और सैन्य प्रबंधन शासक के प्रतिनिधि के रूप में करता था।” ड्यूक काउण्ट से उच्य पदस्थ और शक्तिशाली होता था ड्यूक लैटिन भाषा में ड्यूक्स कहलाता था जिसका आशय ‘विशाल भू-भाग का स्वामी’ होता है। जो व्यक्ति युद्ध हेतु ली जाने वाली परीक्षा में उत्तीर्ण होता था, वह नाइट (शूरवीर) कहलाता था। नाइट भी अपनी भूमि का एक हिस्सा दूसरे को देकर अपना सेवक बना सकते थे। चर्च के पदाधिकारियों को भी भूमिपति (लार्ड) या अनुचर (वासाल) बनाने का अधिकार था। इस प्रणाली में सबसे निम्न स्थान ‘सर्फ’ (कृषक दास) का होता था ।

(ii) आर्थिक स्वरूप-सामंती प्रथा में सामंतों द्वारा भूमि से अर्जित की जाने वाली आय एवं सामंतों और कृषक दासों (सर्फ) के मध्य सम्बन्ध को निर्धारित किया जाता था बड़े सामंत लार्ड तथा छोटे सामंत मैनर कहलाते थे। छोटे सामंत ग्रामों में दुर्ग बनाकर रहते थे दुर्गों के समीपस्थ भूमि पर उनका अधिकार होता एक शक्तिशाली सामंत के अधीन अनेक मैनर होते थे इस प्रकार मैनर के अधीन कृषक दासों ( सर्फ) का स्वामी बदल जाता था अब इन्हें उनकी चाकरी करनी पड़ती थी सामंतों द्वारा कृषक दासों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था।
राजा अपने बड़े सामंतों को एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों (मैनर) को भूमि का अनुदान एक भव्य समारोह में प्रदान करते थे। इस दौरान कृषक दास नि:शस्त्र और नंगे सिर मस्तक को टेक कर उसके हाथ को चूमते हुए यह प्रतिज्ञा करता था कि वह ताउम्र अपने स्वामी के प्रति ईमानदारी से वफादार रहते हुए सेवा करेगा इस शपथ को ‘फिडेल्टी’ कहते थे । मध्यकालीन सामंतों का रहन-सहन वैभव सम्पन्न होता था। उन्हों के द्वारा प्रशासन नियमित और नियन्त्रित किया जाता था।

सामंतों के कार्य

बड़े सामंत बाहरी आक्रमणों के अलावा प्राकृतिक आपदाओं से भी जनता को सुरक्षा प्रदान करते थे।

छोटे सामंतों को लार्ड के लिए वर्ष में 40 दिन युद्ध करना पड़ता था।

क्षेत्र में शान्ति एवं अनुशासन बनाये रखना।

किसानों से लगान वसूली करना।

जनता के पारस्परिक विवादों का निपटारा करना।

राज्य में जनहित के कार्य करवाना ।

कृषि, वाणिज्य, व्यापार और उद्योगों को प्रोत्साहित करना।
देश पर खतरे के समय राजा की सैन्य मदद करना।


सामंतों के प्रमुख अधिकार राजा और सामन्त दोनों पारस्परिक उत्तरदायित्व के सूत्रों में बँधे होते थे दोनों के मध्य एक समझौता होता था, जिसके अनुसार राजा को सैन्य सेवा पाने का अधिकार था, तो सामन्त को भी जागीर पाने का अधिकार था जीवनपर्यन्त सामन्त के परिवार की समस्त जिम्मेदारी राजा की होती थी।

किसानों की दशा

किसानों की स्थिति अद्द्धदास की भाँति होती थी किसानों को सामंतों की जमीर (मैनर) पर बेगार करनी पड़ती थी। बेगार की अतिरिक्त पैदावार से जिनिस अथवा नकदी रूप में कुछ भुगतान करना पड़ता था। किसान अपने बच्चों का विवाह बिना सामंत की अनुमति के दूसरी जागीर में नहीं कर सकता था। किसान का बेटा न तो स्कूल जा सकता था और न ही चर्च में पादरी बन सकता था। किसान का यह प्रमुख कर्त्तव्य माना जाता था कि यदि अपने ‘मैनर’ का सामंत निरीक्षण या शिकार खेलने आए तो वे उसका आदर-सत्कार करें। इस प्रकार किसानों की स्थिति को अच्छा नहीं कहा जा सकता है।

सामंत प्रथा के लाभ


मध्य युग के अन्धकार में जब यूरोप बर्बर जर्मन कबीलों, नोर्थमेनों और मुसलमानों के आक्रमण से पदाक्रान्त हो रहा था. तब सामंतवाद ने पश्चिमी यूरोप के पूर्ण विनाश को रोके रखा रमिन साम्राज्य के अवसान होने के पश्चात सामंतों ने राज्य एवं जनता को सुरक्षा प्रदान करते हुए शान्ति को बहाल किया।

सामत प्रथा ने शासकों को स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश बनने से रोका। इस प्रथा से पूर्व सम्राट सर्वोपरि होता था इस व्यवस्था ने शासन की शक्तयों का विकेन्द्रीकरण कर दिया। परिणामस्वरूप शासकों ने जनहित में रुचि दिखाना शुरू कर दिया। रोमन नियमों के लुप्त हो जाने पर सामंतों द्वारा अपनी न्याय प्रणाली दिव्य परक्षा’ (आर्डियल) द्वारा ही विवादों का निपटारा किया जाता था सामंतों ने कानून में एकरूपता लान का
प्रयास किया। इस प्रधा ने नगरीकरण को बढ़ावा दिया। आर्थिक उन्नति में सामंत प्रथा का अतुलनीय योगदान रहा है। सामंत पैदावार को बढ़ाने के लिए भूमि के एक हिस्से को खाली छोड़ देता था, ताकि भूमि की उर्वरकता बनी रहें। कृषि पैदावार को बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाएँ बढ़ाई गई व्यापार-वाणिज्य पर लो जाने वाली चुँगी सामंतों की आय का प्रमुख स्रोत थी। इसलिए उन्होंने व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहित किया।

सामंतों के संरक्षण में न केवल साहित्यकारों को संरक्षण दिया गया अपितु कलाकारों को भी प्रोत्साहित करके उनकी कला को निखारा गया। सामन्त काल में रोमन एवं गोथिक शैली स्थापत्य कला की प्रमुख शीलयां थी। सामंत प्रथा की हानियाँ : सामंत प्रथा ने विस्तृत साम्राज्य को विखोंडित करके उसकी शक्ति को कमजोर बना दिया। इस प्रणाली से देश प्रेम एवं राष्ट्रीयता गौण हो गई और स्वार्थ एवं स्थानीयता की भावनाएँ प्रबल हो उठी। सम्राट की अयोग्यता एवं निर्बलता से मौका पाकर सामंत अण्ने आपको स्वतन्त्र घोषित कर देते थे। इस प्रथा के कारण गरीब एवं अमीर के मध्य खाई बढ़ती गयी। किसानों का शोषण एवं उत्पीड़न चरम पर पहुँच गया जिसके परिणामस्वरूप वर्ग संघर्ष उभरने लगा । तानाशाही का उत्थान सामंत प्रथा का परिणाम माना जाता है। सामंत अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए कोई संकोच नहीं करते थे उनके द्वारा जनता के शोषण एवं उत्पीड़न ने यूरोप में अराजकता एवं अशान्ति को जन्म दिया| कालान्तर में सामन्तों ने विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। सामंतों का नैतिक पतन हो गया ‘टाइथ’ नामक एक धार्मिक कर, सामन्तों एवं कृषक दासों द्वारा पादरियों को दिया जाता था वैभव एवं भोग-विलास ने पादरियों के चरित्र को गिरा दिया।

जनता ने सुधारों की माँग की जिसके परिणामस्वरूप धर्म सुधार आन्दोलन का उदय हुआ। सामंत प्रथा के पतन के कारण : यद्यपि सामन्तों ने विदेशी आक्रमणों से यूरोप की सुरक्षा की, तथापि उनके वर्चस्व ने जनता के सुख चैन को छीन लिया। सामंत किसानों पर निर्ममतापूर्ण अत्याचार करते थे। फलस्वरूप जनमानस सामंतों से घृणा करने लगा इसका प्रतिफल यह हुआ कि मध्ययुगीन यूरोप में सामंतों के खिलाफ विद्रोह भड़क उठे। सामंतों का प्रमुख कार्य राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को बनाये रखना होता था । बारूद के प्रयोग ने सामंत प्रथा को काफी क्षति पहुंचाई । राजाओं ने स्थायी सेना का गठन करके उसे बन्दूकों से सुसज्जित कर दिया जिससे सामंतों की उपयोगिता समाप्त हो गई। 1095 से 1453 के मध्य लड़े गये धर्म युद्धों (क्रूसेड) ने सामंतों की शक्ति को कमजोर कर दिया। सामंतों द्वारा किसानों के उत्पीड़न एवं शोषण ने उनमें भयंकर रोष उत्पन्न कर दिया। मैकनेल बन्न्स ने लिखा है कि, “किसानों के स्वतन्त्र होते ही उन्होंने (जो कि सामंतवाद की मशीन का महत्त्वपूर्ण पुर्जा था) सामंत प्रधा को जीवित रखना असम्भव बना दिया।

धर्मयुद्धों के परिणामस्वरूप यूरोप में नवीन व्यापारी वर्ग का अभ्युदय हुआ। इस वर्ग के कारण ही युरोप
में व्यापार एवं वाणिज्य फलने-फूलने लगा । यूरोपीय व्यापारियों का पश्चिमी एशिया से सम्पर्क हो गया।
व्यापारिक एवं औद्योगिक खुशहाली ने नये-नये नगरों को जन्म दिया| व्यापारियों ने मजदूरों एवं किसानों को मजदूरी का लालच देकर शहरों में बसने के लिए प्रोत्साहित किया। इससे व्यापार एवं सामंत आमने-सामने आ गये। परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए व्यापारियों ने सामंतों को कुचलने में सम्राटों की मदद की। मध्यकाल में चर्च का प्रभुत्व ढ़ीला पड़ गया इसका प्रभाव सामंतों पर भी पड़ा। उनके अधिकार सीमित हो गये। राजा के अधिकारों में वृद्धि होने लगी। राष्ट्रीयता की चेतना ने भी सामन्तवाद के पतन में कौल ठोकी।

व्यापारिक लाभों को ध्यान में रखकर यूरोप में ‘सौ वर्षीय’ युद्ध लड़ा गया, जिसका समय 1381 से 1443 ई. तक माना जाता है। इस युद्ध ने यूरोप में राष्ट्रीयता को प्रोत्साहित किया। राष्ट्रीयता की अविरल धारा ने सामंतों की शक्ति को क्षीण करते हुए 15वीं शताब्दी में सामंत प्रथा को जड़ सहित उखाड़ फेंका।

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