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यूरोप में पूँजीवाद के उद्भव के 07 कारण

यूरोप में पूँजीवाद के उद्भव के 07 कारण

यूरोप में पूँजीवाद का अभ्युदय 15वीं शताब्दी में हो गया था इसका बीजारोपण ब्रिटिश पूँजीवादी क्रान्ति से माना जाता है (इंग्लैण्ड का गृह युद्ध, 1639 48) । जब इंग्लैण्ड के तानाशाही राजा चाल्ल्स प्रथम का सिर काट कर बांस पर टांग कर उसका अन्त कर दिया था इस घटना को पूँजीवाद के बीजांकुरण के मूल में माना जाता है।

पूँजीवाद, सामंतप्रथा के ध्वंसावशेषों में अंकुरित व्यवस्था है। इस प्रक्रिया को संयोग नहीं माना जा सकता है, क्योंकि सामंती तंत्र और पूँजीवाद दोनों में एक समानता है कि दोनों ही उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व तथा मानव द्वारा मानव के शोषण एवं उत्पीड़न पर आधारित है।

सामंतवाद मुख्य रूप से भू-सम्पत्ति पर अवलम्बित था, परन्तु व्यापार एवं व्यावसायिक समृद्धि के परिणामस्वरूप एक नये व्यापारी वर्ग का उदय हुआ जो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न था। समाज में आर्थिक खुशहाली के पश्चात् लोगों का ध्यान नयी-नयी तकनीकों की ओर आकृष्ट हुआ इससे प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों की आवश्यकता महसूस हुई। फलत: मुद्रा का लेन-देन, व्यापारिक केन्द्रों का विकास, कारखानों का विकास, किसानों का नगरों की ओर पलायन, उत्पादन में अतिरेक वृद्धि आदि सामंती अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया। इसके परिणामस्वरूप पूँजीवाद फलीभूत होने लगा औद्योगिक क्रान्ति ने पूँजीवाद को यूरोप में फैला दिया। 19वीं शताब्दी के अन्त तक पूँजीवाद अपने विकास की चरम अवस्था पर पहुँच कर साम्राज्यवाद में परिवर्तित हो गया।

पूँजीवाद से आशय एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था से लिया जाता है जिसमें उत्पादन के साधनों पर निजी – स्वामित्व होता है तथा जिसमें निजी स्वार्थ को दृष्टिगत रखते हुए प्रतियोगिता के आधार पर संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। लॉक्स एवं हूट्स के शब्दों में, “पूँजीवाद आर्थिक संगठन की ऐसी व्यवस्था है जिसमें निजी
सम्पत्ति पाई जाती है तथा मानव-निर्मित और प्रकृति प्रदत्त पूँजी का प्रयोग निजी लाभ के लिए किया जाता
है।”

प्रश्न है कि सामंतवाद से पूँजीवाद की ओर यूरोपीय समाज कैसे अग्रसर हुआ ? इस प्रश्न के जवाब
को लेकर इतिहासकार एक राय नहीं हैं। पॉल स्वीजी, ताकाशाही, रॉडनी हिल्टन, क्रिस्टोफर हिल, पेरी
एंडरसन, गाई बुआ, मॉरिस डॉब आदि विद्वानों ने इस विषय पर काफी शोध कार्य किया। हेनरी पिरेन ने कहा कि पूँजीवाद के उदय में व्यापारिक पूँजीपति अथवा मध्ययुगीन स्वशासित नगरों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

पूँजीवाद की विशेषताएँ :

01 पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत अधिकार होता है।

02 निजी सम्पत्ति का स्वामी अपनी मृत्यु के बाद सम्पत्ति को किसी भी उत्तराधिकारी को सौंपने का
अधिकार रखता है।

03 पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति को उद्यम चुनने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।

04 पूँजीवादी व्यवस्था में उद्यमक्ता उत्पादन के साधनों को इस प्रकार से संगठित करते हैं कि उनकी
सहायता से उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं द्वारा उन्हें अधिकतम लाभ अर्जित हो।

05 उपभोक्ता की सार्वभौमिकता पूँजीवाद की मुख्य विशेषता है अर्थात् इस व्यवस्था में उत्पादक उन्हों
वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिन्हें उपभोक्ता अधिक चाहते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनका लाभ अधिक होता ।

06 क्रेता एवं विक्रेता दोनों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पाई जाती है।

यूरोप में पूँजीवाद के उदय के 07 कारण

1453 ई. में कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों ने अधिकार कर लिया। इससे यूरोपीय देशों का व्यापार चौपट हो
गया। उन्होंने अपने व्यापार को संचालित करने के लिए नये देशों की खोज की यूरोपीय नये देशों के सम्पर्क
में आये। नये विचारों ने पुनर्जागरण एवं धर्म सुधार आन्दोलन को जन्म दिया| इसके पश्चात् औद्योगिक क्रान्ति हुई। औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप पूँजीवाद का उदय हुआ जिसके अग्रलिखित कारण थे ।

01 खनिज धातुओं का दोहन

लोहा, कृषि और उद्योग दोनों के लिए अधिक उपयोगी था। इसके अलावा सोना, चाँदी, ताँबा, टिन और सीसा जैसी मूल्यवान धातुओं का उत्पादन बढ़ने लगा। खनन प्रक्रियाओं में सुधार हुआ। गहरी खानों से पानी को बाहर निकालने एवं वातायन बनाये रखने की विधियाँ खोजी। धातुओं के अधिकाधिक दोहन से सिक्कों का प्रयोग वस्तु-विनियम में बढ़ने लगा जिससे व्यापारिक गतिविधियों में प्रगति आयी।

02 जल-परिवहन में सुधार के साथ नये क्षेत्रों की तलाश

कुतुबनुमा की जानकारी के पश्चात् जलमार्ग से यात्रा करना आसान हो गया जिसके परिणामस्वरूप नये देशों की खोज हुई और वहाँ उपनिवेश स्थापित करके व्यापारिक हितों को साधने के प्रयास किये गये इसने पूँजीवाद को जन्म दिया।

03 क्षीण श्रेणियों (guilds) के स्थान पर मजबूत वणिक वर्ग का उदय

मध्यकालीन यूरोप में वाणिज्यिक गतिविधियों का संचालन श्रेणियों द्वारा किया जाता था औद्योगिक क्रान्ति ने यूरोप में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दे दिया| इसके पश्चात् व्यापारी सस्ते दामों पर कच्चा माल खरीद कर सस्ते में तैयार करके अधिक दामों पर बेचना चाहते थे इसलिए व्यापारियों ने उत्पादन कार्यों को हस्तगत कर लिया। कालान्तर में इसने व्यापक रूप धारण करके यूरोप में पूँजीवाद की नींव रखी।

04 नवीनतम औजार एवं उपकरण

पुरातन औजारों एवं उपकरणों के स्थान पर उन्नत औजारों एवं उपकरणों के प्रयोग ने भी पूँजीवाद की राह आसान की जेश्रोटल ने ‘सीड ड्रील’, जस्टिस बॉन लीविग ने उत्पादन बढ़ाने हेतु रसायनों का प्रयोग, जॉन के ने पफ्लाइंग शटल’, जेम्स हारग्रीव्ज ने ‘स्पिनिंग जैनी’,
आर्कराइट ने ‘वाटर फ्रेम’, सेम्युअल क्राम्पटन ने ‘फ्यूल’, जेम्सवाट ने ‘वाष्प इंजन’ की खोज की। इन आविष्कारों ने यूरोप में विनिर्माणशालाओं का विकास किया जिसके परिणामस्वरूप व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो उठी।

05 बैकिंग व्यवस्था

व्यवसायियों के लिए बैंकिंग व्यवस्था से अनेक सुविधाएँ प्राप्त होने लगीं, जैसे- बिलों का भुगतान, ऋण लेना, अतिरिक्त पूँजी का जमा करवाना आदि। 15वीं शताब्दी में फ्लोरेंस के मेडेसी परिवार ने सर्वप्रथम बैंकिंग प्रणाली की शुरुआत की। कालान्तर में यूरोप के अनेक शहरों में मेडिसी बैंकों की स्थापना हो गई। व्यवसाय करने के लिए न्यूनतम ब्याज दर पर पैसा मिलने से व्यवसायी को व्यापार करने में आसानी हो गई। इसलिए लोग पूँजी निवेश करके लाभ कमाने लगे। इस प्रकार बैंकिंग प्रणाली ने पूँजीवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त किया

06 जीवन बीमा प्रणाली

जोखिम को कम करने के लिए बीमा तंत्र ने प्रारम्भिक पूँजीतंत्र का पोषण किया। सामान्यतः व्यक्ति मेहनत से कमाई हुई पूँजी को व्यापार में जोखिम की वजह से नहीं लगाता है। उसे आशंका होती है कि अगर घाटा हो गया तो आर्थिक स्थिति खराब हो जायेगी। इसलिए वह कोई नया कार्य करने से बचता है। बीमा तंत्र के विकास के पश्चात् लोगों ने कारखाने खोलकर उनका बीमा करवा दिया। अगर कारखाने में दुर्घटना हो जाती थी तो बीमा कम्पनी आर्थिक मदद कर देती थी जिससे व्यापारी अपने
आपको सुरक्षित समझने लगा और व्यापार में पूँजी निवेश बढ़ने लगा। इस प्रकार बीमा प्रणाली ने पूँजीवाद का पोषण किया।

07 संयुक्त पूँजी कम्पनियाँ

आधुनिक काल में अनेक लोगों की करोड़पति बनने की चाहत ने व्यावसायिक संगठन की स्थापना को प्रेरित किया इनका उद्देश्य संयुक्त रूप से पूँजी कम्पनी बनाकर लाभ अर्जित करना होता था इनमें अंशधारी निश्चित धनराशि लगाकर कम्पनी में शेयर खरीदते थे उन्हें अपनी संख्या के अनुपात में लाभांश प्राप्त होता था संयुक्त पूँजी कम्पनियों में अंशधारियों का सिर्फ स्वामित्व होता था, उनका संचालन चुने हुए बोर्ड द्वारा किया जाता था ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ एक संयुक्त पूँजी कम्पनी थी। इस प्रकार की कम्पनियों में पैसा लगाकर लाभ अर्जित करके उद्योग स्थापित होने लगे। इस प्रकार संयुक्त पूँजी कम्पनियों ने पूँजीवाद रूपी पौधे को सींचने का कार्य किया।

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