भारत की वास्तु विद्या

भारत की वास्तु विद्या

भारत की वास्तु विद्या

महाराज भोजदेव की जीवन-गाथा ‘भारतीय इतिहास में इने गिने राजर्षियों की गाथा में एक है। प्राप्त एवं अर्ध-प्राप्त भारतीय ऐतिहासिक सामग्री में राजर्षि ‘प्रियदर्शि’ अशोक, महाप्रतापी महाराज विक्रमादित्य के बाद भारतीय जन-समाज में अतिप्रसिद्ध राजा भोज ही हुआ है। महाराज व क्रमादित्य का यदि न्याय प्रसिद्ध है तो महाराज अशोक का धर्म- प्रचार और महाराज भोजदेव की साहित्यिक गरिमा । भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विकास-परम्परा में धर्म एवं दर्शन के बाद ही साहित्य का स्थान आता है। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, सूत्रग्रन्थ, पुराण एवं स्मृतियों के बाद ही, अर्थात् अति एवं स्मृति के उपरान्त ही लौकिक साहित्य-काव्य, नाटक, अलंकार, ध्वनि, कथा तथा आख्यायिका आदि का विकास पाया गया है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति के व्यापक बिजृम्भण में भोजदेव सांस्कृतिक विकास की पराकाष्ठा के प्रतीक है। उनके राज्यकाल में संस्कृत-साहित्य के।चरमोत्कर्ष से इस तथ्य की पुष्टि होती है ।


  इस देश में संस्कृति के समभ्युत्थान में जहाँ पारदर्शी मंत्रष्टा महर्षियों ने पथ प्रदर्शन किया वेद-विद् ब्राह्मणों ने धर्म और दर्शन के अत्तुराण रक्षण में एवं परमार्थ-चिन्तन में तपस्या एवं साधना का श्राश्रय लेकर संस्कृति के जीवन में जीवन फूंका। और इस प्रकार इन लोगों ने भारतीय संस्कृति के प्राभ्यन्त रिक कलेवर अर्थात् आध्यात्मिक जीवन के विकास को पराकाष्ठा तक पहुँचाया; वहाँ अशोक, विक्रम और भोज ऐसे राजर्षियों ने भारतीय संस्कृति के बाह्य कलेवर अर्थात् भौतिक जीवन के समभ्युत्थान में महान् योगदान दिया।

  भारतीय जीवन सदैव राजसत्ता एवं राजतन्त्र से अनुमाणित एवं प्रभावित रहा—यथा राजा तथा प्रजा-की कहावत सर्वथा इस देश में चरितार्थ रहीं । देश के सामाजिक जीवन, आर्थिक जीवन एवं कलात्मक जीवन का आश्रय राजा ही तो रहा । भारतीय जीवन की विभिन्न भौतिक परम्परायें-नृत्य, गीत, वाद्य, काव्य, साहित्य, नाट्य’ नादि ललित कलायें एवं वास्तु तथा स्थापत्य एवं चित्रकर्म आदि उपयोगी कलायें-राजाश्रय पाकर ही तो पनपी। लेखक की तो रगा है कि भारतीय संस्कृति के वाह्य फलेवर-भौतिक-पक्ष की पुष्टि राजाश्रय पाकर ही सम्पन्न हुई। पुराणों की रचना धर्मप्रचारक वाहाणों ने की।    शिवपूजा, विष्णुपूजा की माहात्म्म मन्दाकिनी के प्रवहण का श्रेय ब्राहाणों को है परन्तु कालान्तर में पुराण-प्रतिपादित शिवपूजा और विष्णुपूजा के उपासना-स्थल प्रसिद्ध  तीर्थ स्थानी, बृहद एवं विशाल मन्दिरों की स्थापना तथा निर्माण का श्रेय तत्कालीन राजानों को ही है। बिना राजाश्रय पाये सम्भवतः ही किसी स्थापत्यकला एवं वास्तु-कला निदर्शक प्रासादनिर्माण एवं प्रतिमा निर्माण सम्पन्न हुन्ना हो ।


    भारत के प्राचीन विभिन्न-कालीन स्मारकों की (अजन्ता, एलौरा के गुहामन्दिर, दक्षिण के विमानाकृति प्रासाद, उत्तर के उत्तुंग शिवालय एवं विभिन्न बौद्ध विहार, चैत्य तथा सूप आदि तथा जैनो के जाज्वल्यमान जिनालय आदि-देखिये पर्सी ब्राउन श्रादि-वा तुकला विषयक लेखकों के ग्रन्थ ) निर्माण-गाथा में तत्तत्कालीन मण्डलेश्वरों की वदान्यता, दानशीलता, वास्तुकला-प्रियता एवं अपूर्त (वापी, कूप, तडाग, प्रपा, पुण्यशाला, धर्मशाला, मन्दिर आदि निर्माण कार्य ) के संचय के तेजस्वी प्रमाण प्रत्यक्ष है।   महाराज भोजदेव का अवतरण मालब राजमंच पर उस समय हुआ था जब हिन्दू राज्य-सत्ता का सूर्य अस्त हो रहा था । ११वीं शताब्दी के पूर्व ही देश में मुस्लिम सत्ता ने जड़ पकड़ ली थी। दीपक जब बुझने लगता है तो एक बार पुन: चकाचौंध करने वाला प्रकाश करता है । 
भोजराज का राज्यकाल इसी कहावत की अतिरंजना है। काव्य-साधना, ग्रन्थरचना, कविगोष्ठी, विदग्ध-वैदग्ध्य श्रादि तभी शोभित होते हैं, पनपते हैं और जागरूक होते हैं जब जीवन सुखद एवं शान्त होता है। वैभव एवं ऐश्वर्य की कमी नहीं हेती है। भोजदेव के राज्यकाल का साहित्यक वैभव तत्कालीन सुखद जीवन के।दिना कैसे सम्भव था। कहा भी जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। सामाजिक जीवन की छाप तत्कालीन निर्मित साहित्य पर अवश्य पड़ती है। महाराज भोज के सम्बन्ध में जो किम्बदन्तियाँ एवं जनश्रुतियाँ जन-समाज मेंज तक परम्परा से प्रचलित हैं ; भोज के सम्बन्ध में जो विभिन्न उल्लेख परखी ग्रन्थकारों के ग्रन्थों में पाये जाते हैं ; अथच भोज से सम्बन्धित जिन प्रशस्तियों एवं दान-पत्रों की उपलब्धया  है—इन सभी से इतना तो असन्दिग्ध रूप में कहा जा सकता है कि भोज काराज्यकाल संस्कृत साहित्य का एक स्वर्ण युग था। भोज की अतिरंजित शैली और उसका ऐश्वर्य उसकी सभी स.हित्यिक कृतिय में एवं कार्य-कलापों में पाया जाता है।


भोज के समय की इस सर्वाङ्गीण समृद्धि एवं शाति तथा सुख के कारण ही उसके समय में संस्कृत-साहित्य के चरमोत्कर्ष के दर्शन होते हैं। अत: भोज के समय को हम यदि संस्कृत-साहित्य के समभ्युत्थान का चरम कल कहें तो अत्युक्ति न होगी। भारत के सांस्कृतिक विकास के बाल्यकाल में साहित्य को अकृत्रिमता, सरलता एवं स्वच्छन्दता तथा शुद्धता के दर्शन वेदों-उपनिषदों के काल में हम पाते हैं। महाकाव्य- रामायण एवं महाभारत तथा पुराणों के युग में उसके कैशोर-जीवन के चाबल्य एवं उद्दाम प्रवाह का दर्शन करते हैं। कालिदास आदि कवि-गंगवों के काव्य में उसके स्थैर्य एवं सौन्दर्य का साक्षात्कार पाते हैं । क्रमशः भोज के काल में साहित्य-पुरुष अपने प्रौढत्व को प्राप्त कर सजावट और बनावट, शृङ्गार एवं विलास की सभी सप्रयत्न चेष्टाओं के लिये और ठाट-बाट बनाने के लिये जीता ज.गता जागरूक प्रतीत होता है । एक शब्द में भोजदेव के समय में जीवन एवं साहित्य के सभी क्षेत्रों में हम एक अतिरजित महान शैली- का साक्षात्कार करते हैं । यह भोज-विनिर्मित विभिन्न अन्यों के परिशीलन से पद-गद पर प्रतीत होता है।


  भोज के शृङ्गार-प्रकाश, सरस्वतीकण्ठाभरण तथा राजमार्तण्ड आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ पंडित-परम्परा में बड़े गौरव से गिने ही जाते हैं, समराङ्गण-सूत्रधार की उपलब्धि से महाराज भोज की वास्तुशास्त्रीय देन से भोज की स्थिर कीर्ति में चार चांद लग गये हैं। राजा भोज स्वयं बड़ा विद्वान् था। वह विद्वानों का बड़ा आश्रयदाता था। उसका राज्य-दरवार जहाँ शासन और न्याय के लिये प्रसिद्ध था वहाँ उसकी धवल कीर्ति का कारण उसका संस्कृत-विद्यानुराग था। भोज के दरवार के सम्बन्ध में तो उसे यदि एक विद्यापीठ नाथवा अनुसन्धानशाला या गवेषण-पीठ के नाम से पुकारा जाय तो अत्युक्ति न होगी। काव्य-स्वाद का दैनिक मनोरंजन की सामग्री में एक अत्यन्त उच्चस्थान था; विभिन्न कवियों को काव्य-रचना का प्रोत्साहन तो इसी से अनुमित है कि एक-एक श्लोक पर एक-एक लक्ष पुरस्कार की बात तो आज तक लोगों में प्रसिद्ध है। परन्तु भले ही इनमें ऐतिहासिक सत्यता न हो परन्तु भोज के नाम से लगभग ३ दर्जन ग्रन्थों की जोउपलब्धि हुई है उससे तो विद्वान् यह निष्कर्ष निकाल ही सकते हैं कि भोज ने स्वयं अथवा विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा संस्कृत-वाङमय के विभिन्न कलेवरों पर ग्रन्थ लिखकर अथवा लिखवाकर संस्कृत-साहित्य के भण्डार को अमूल्य ग्रंथरत्नों से भरा । साहित्य के प्रायः सभी मुख्य अंगों पर निष्णात ग्रन्थों की रचना विना अनुसन्धान, गवेषण एवं मनन के नहीं हो सकती। अतः स्पष्ट है कि भोज ने साहित्य-रचना में बड़ा योग दिया। भोज के नाम से ज्योतिष, अलंकार, योगशास्त्र, राजनीति, धर्म-शास्त्र, शिल्प, नाटक, काव्य, व्याकरण, बैद्यक, शैवमत, संस्कृत-कोष आदि निम्नलिखित ३४ ग्रंथों की उपलब्धि हुई है:- ग्रन्थ विषय ज्योतिष”गलकार”

राज-मृगाङ्क, राज-मार्तण्ड विद्वजनबल्लभ , प्रश्न ज्ञान , आदित्य प्रताप सिद्धान्त , भुजबल-निबन्ध६. सरस्वती कण्ठाभरण , शृङ्गार प्रकाश , राजमार्तण्ड-योगसूत्र-वृत्ति-पातञ्जल योगसूत्र-टीका, पूर्तमार्तण्ड , चाणक्य राजनीति शास्त्र , व्यवहार समुच्चय , चारु-चर्या , विविध विद्या-विचार चनुरा सिद्धान्तसार-पद्धति , समराङ्गण-सूत्रधा युक्ति-कल्पतरुयोगराजनीति और धर्मशास्त्र शिल्पनाटक और काव्य व्याकरण भोजचम्पू (चम्पूरामायण) पांचकाण्ड , महाकाली-विजय, विद्या-विनोद , शृङ्गारमंजरी (गद्यकाव्य), कूर्मशतक ( प्राकृत), प्राकृत-व्याकरण, सरस्वती-कराठाभरण”, विश्रान्तविद्या विनोदवचक, श्रायुर्वेद-सर्वस्व , राजमार्तण्ड-सार-संग्रह , तत्वप्रकाशशेवमत२ , शिवतत्व-रत्न-कलिका, सिद्धान्त-संग्रह (विवृतिः) , नाम मालिकाकोष , शब्दानुशासन, शालिहोत्रविभिन्न विशव , सुभाषित प्रबन्ध , राजमार्तण्ड ( वेदान्त )-ज्योतिष से भिन्न

  इस विभिन्न-विषयक ग्रंथ-तालिका से भोज के उद्भट ग्रंथकार होने में तो किसी प्रकारसंदेह हो ही नहीं सकता क्योंकि विभिन्न परवर्ती ग्रंथकारों ने भी भोज का विभिन्न-विषयक आचार्यत्व स्वीकार किया है। विशेषकर धर्मशास्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, कोष, व्याकरण आदि के अनेक लेखकों ने अपने अपने ग्रंथों में इस तथ्य का निर्देश किया है।


Aufrecht की पुस्तक सूची में लिखा है कि शूलपाण ने अपने बनाये प्रायश्चित्त-विवेक में, बौद्ध लेखक दशबल ने, अल्लाडनाथ ने और रघुनन्दन ने अपने-अपने अन्थों में भोज का।धर्म-शास्त्र के लेखक के नाम से उल्लेख किया है। भावप्रकाश और माधवकृत रूगविनिश्चय में भोज को आयुर्वेद के ग्रन्थों का लेखक कहा गया है। केशवार्क ने भोज को ज्योतिष सम्बन्धी ग्रंथों का लेखक माना है। क्षीरस्वामी, सायण और महीप ने भोज को वैयाकरण और कोषकार की उपाधियों से विभूषित किया है। कवि चित्तप, दिवेश्वर, विनायक- शङ्कर सरस्वती और कुटुम्बदुहित ने भोज की काव्य-शक्ति की प्रशंसा की है। इसी प्रकार अन्य कई लेखकों ने भी इनकी प्रशंसा में अनेक श्लोक लिखे हैं। संक्षेप में उनका थोड़ा सा उल्लेख करना यहाँ असंगत न होगा।


  महामहोपाध्याय कुप्पुस्वामी द्वारा सम्पादित, गवर्नमेंट ओरिन्टल मैन्युस्क्रिप्ट लायब्ररी, मद्रास की संस्कृत पुस्तकों की सूची भा. ३ खण्ड १ वी. पृ. ३३६२-६४ में सूचित “शब्द साम्राज्यम्” नामक व्याकरण ग्रन्थ में भोजीय व्याकरण के सूत्रों के अनुसार शब्द-सिद्धि दोगयी है । साथ ही इसमें अन्य व्याकरणचायों के मतों का भी उल्लेख है । अतः भोज का व्याकरण-वैदुष्प एवं तद्विषयक ग्रंथ-निर्माण असन्दिग्ध है।,  इसी प्रकार पूर्व निर्दिष्ट श्रो. मै, ला०, मद्रास की संस्कृत-पुस्तक सूची में ‘गिरिराजीय-टीका’ नामक एक पुस्तक की प्रति की सूचना है जो काटयवेम द्वारा लिखित ‘अभिज्ञान-शाकुन्तलम्’ की टीका है। उसमें लिखा है:-

मुनीनां भरतादीनां भोजादीनां च भूभृताम् ।शास्त्राणि सम्बगालोच्य नाट्य वेदार्थवेदिनाम् ।।


इस उद्धरण से प्रकट है कि भरत मुनि के समान ही राजा भोज भी नाट्यशास्त्र का आचार्य माना जाता था। इसी प्रकार ओर, मै. ला०, मद्रास की संस्कृत सूची में ‘स्मृतिरत्नम्’ नामक ग्रंथ में ग्रंथ-कार लिखता है:- भोजराजेन यत्प्रोक्त स्मार्तमन्यन्त्र चोदितम् ।न्यायसिद्धं च संग्रह्य वचनानि पुरातनः ॥अनुष्ठानप्रकाशार्थ स्मृतिरत्न मयोच्चते।


   इसी अवतरण से मतद्वैविध्य नहीं कि भोजराज धर्मशास्त्र के भी प्राचाय माने जाते थे।
इस हस्तलिखित सूची में ‘कन्दर्प-चूड़ामणिः’ नामक कामशास्त्र विषयक ग्रन्थ का उल्लेख है। इसके रचयिता श्री वीरभद्र राजा ने अपने ग्रन्थ में लिखा है:-


भोज इवायं निरतो नानाविद्यानिबन्धनिर्माणेसमयोच्छिन्ननाये सोद्योगः कामशास्त्रेऽपि।
अर्थात् इससे भोज का अनेक ग्रन्थ-रचना-पाटव एवं उसकी प्रसिद्धि सुतरांसिद्ध ही है।
इसी प्रकार ‘सङ्गीत रत्नाकर:’ नामक पुस्तक में शाङ्ग देव जी लिखते हैं:-


उद्धटोऽनग्निभूपालो भोजभूवल्लभस्तथा ।परमार्दी च सोमेशो जगदेकमहीपतिः ॥
व्याख्यातार इस उल्लेख से राजा भोज का संगीत शास्त्र का प्राचार्य होना पाया जाता है इसी प्रकार ‘संगीत-समय-सारः’ नामक ग्रन्थ में ( देखिये कु० स्वा० द्वारा सम्पादित संस्कृत हस्तलिखित पुस्तक-सूची ) ग्रन्थकार पार्श्वदेव लिखते हैं:-


शास्त्र’ भोजमतङ्ग कश्यपमुखा व्यातेनिरे ते पुराजिससे मुतरां सिद्ध है भोज ने संगीत शास्त्र पर प्रसिद्ध रचना की। अथच “भेषज-कल्पसार संग्रह” (मद्रास संस्कृत हस्तलिखित पुस्तक-सूची) में ग्रंथकार ने ग्रंथ के प्रारम्भ में लिखा है:-


वाहटे चटके भोजे वृद्धोजे च हारिते । 
इस उल्लेख से भोज के आयुर्वेदाचार्यत्व पर  शंका नहीं हो सकती। इसी प्रकार अनेक परवर्ती ग्रन्थकारों ने भोज के ग्रंथों पर तथा उसके प्राचार्यत्व एवं अनेक- शास्त्र-पांडित्य पर प्रकाश डाला है । साथ ही साथ भोज के काव्यानुराग एवं कवियों को आश्रय-दान तथा उनकी दान-महिमा आदि विभिन्न बरेण्य गरिमानों पर प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है । यही नहीं भोज के समकालीन कवि, उसके दरबार की छटा, उसका राज्य विस्तार, उसके समय प्रादि पर भी यत्र तत्र बहुल सामग्री प्राप्त होती है ।    अतः इस सब सामग्री को एकत्रित कर भोज के सम्बन्ध में अनुसंधान-कार्य का एकमहत्वपूर्ण क्षेत्र विद्वानों के सम्मुख है। भोज के सम्बन्ध में अविकल रूप से ग्रंथ प्रणयन का श्रेय श्री विश्वेश्वरनाथ रेऊ को है जिन्होंने अपने राजा भोज’ नामक हिन्दी ग्रंथ में भोज से सम्बन्धित यत्र तत्र प्राप्त, श्रुत एवं पारम्परित सामग्री का उल्लेख करके राजा भोज के वंश, समय, तिथि तथा जीवन एवं कार्य के साथ-साथ उनकी साहित्यिक कृतियों कीसूची एवं दरवारी कवियों के विवरण पर लगभग ४५० पन्नों की एक किताब लिखी है।


इस लेख में  भोज के सम्बन्ध में एकत्रित सामग्री हमारा मनोरंजन कर सकती है एवं ऐतिहासिक ज्ञानवृद्धि में भी योग दे सकती है। परन्तु मोज की साहित्यक समीक्षा अर्थात् उनके ग्रंथों का गवेषण या अनुसंधान हमको इसमें नहीं मिलेगा । अतः भोज ऐसे साहित्यिक महारथी की कृतियों के एक अनुसन्धानात्मक ग्रंथ की अत्यन्त श्रावश्यकता देखकर इस पर एक लेख लिखनी की इच्छा हो ही जाती है ।


अतएव इस साहित्यिक महारथी एवं महान् नृप के सन बन्ध में, अनुसन्धान करने के लिये लेखक ने राजा भोज-उसका जीवन एवं उसकी कृतियाँ’ शीर्षक विषय लेकर सन् १६४० ई० में (जब लेखक एम. ए. परीक्षा में लखनऊ विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण हुआ था ) अनुसंधान कार्य करने की ठानी थी परन्तु विभिन्न जीवन जटिलताओं एवं समयाभाव के कारण यह अनुसंधान कार्य लगभग ७ वर्ष तक यों ही पड़ा रहा। इधर जब से लेखक को लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन का अवसर ( संस्कृत-विभाग में अध्यापक के रूप में) प्राप्त हुना तो इस अनुसंधान के संबंध में नवीन स्फूर्ति, एक नव चेतना एवं प्रेरणा की प्राप्ति हुई। परन्तु यह इतना विशाल विषय था कि एक मात्र भोज की जीवनी–समय-निर्धारण, वंश परिचय, कला-वैभव, समकालीन कवि आदि-आदि जीवन संबन्धी प्रश्नों एवं समस्यानों-पर पूर्ण प्रकाश डालने के लिये एक सुन्दर एवं भोजपूर्ण थीसिस लिखी जा सकती है क्योंकि प्राप्त एवं अर्धप्राप्त सामग्री पर जो निष्कर्ष विद्वानों ने भोज की तिथि एवं समय पर निकाले है बे सवथा सर्वाश में सुनिर्णीत नहीं हो पाये हैं।


इसके अतिरिक्त भोज की जिस ग्रंथ-तालिका का निर्देश ऊपर किया गया है उसको देखकर यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि भोज के ग्रंथों पर एक व्यक्ति नहीं अनेकविद्वान् यदि विषय-वैशिष्ट्य के अनुसार अनुसन्धान करें तो संभवतः एक दर्जन से अधिक बृहद्-ग्रंथों का निर्माण हो सकता है। ‘शृङ्गार-प्रकाश’ को ही लीजिये । मद्रासविश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध, डा० राघवन ने उस पर अनुसन्धान किया जो विशालकाय है । अतः लेखक ने लखनऊ वि० वि० के संस्कृत-विभाग के अध्यक्ष अपने श्रद्धय गुरुवर्य श्रीयुत प्रोफेसर के० ए० सुब्रह्मण्य अय्यर महोदय के सत्परामर्श से पी० एच० डी० थीसिस के लिये पूर्व निर्धारित विषय के अन्तर्गत ही “भोजदेव-विरचित समराङ्गण-सूत्रधार- किया है। एक अध्ययन” इस विषय को लेकर (पूर्व विषय को सीमित कर ) इस दिशा में कार्य समगङ्गण के विषयानुक्रम से विवरणात्मक अध्ययन के पूर्व उसकी एक औपोद्घातिक समीक्षा एवं संक्षेप को हम आगे के अध्यायों में प्रस्तुत करेंगे। यहाँ इस विषय-प्रवेश के अन्त में दो विषयों-समी ज्ञा-पद्धति एवं अध्ययन-पद्धति– पर कुछ थोड़ा सा और निवेदन करना है।
 

समीक्षा-पद्धति

‘समराङ्गण’ वास्तु-शस्त्र का एक अत्यन्त प्रामाणिक, महत्वपूर्ण एवं अधिकृत अर्थ है। इसकी रचना ११वीं शताब्दी में एक अत्यन्त श्रोजस्वी राजकुल के वातावरण में सम्पन्न हुई। धाराधिप महाराज मोनदेव ऐसे विद्याप्रेमी कलाप्रेमी एवं विदग्ध विद्वान की यह कृति मध्यकालीन-वास्तु-विद्या का अधिकृत ग्रन्थ है। अथच ११वीं शताब्दी तक इस महादेश के दोनों भूखन्डो-आर्यावर्त एवं दक्षिणापथ – पर भव्य से भत्र्य प्रासादों का निर्माण हो चुका था, अतः यह प्रश्न उठता है कि प्राचीन भारत अथवा मध्य भारत के शतशः व..स्मारकों के निर्माण में प्राप्त तत्तत्कालीन ग्रन्थों में प्रतिपादित पद्धतियों, नियमों और शैलियों का अवश्य अनुगमन हुना होगा। दुर्भाग्यवश इस दिशा में अभी तक कोई भी सन्तोषप्रद प्रयत्न नहीं हुआ। भारतीय वास्तु-कला के निदर्शन प्राचीन स्मारकों पर आधुनिक विद्वानों ( हैवेल, फग्र्युसन, कुमारस्वामी, वसींब्राउन श्रादि-त्रादि ) ने प्रौढ़ ग्रन्थ लिखे तथा उनकी विस्तृत समीक्षा की है।


इसके विपरीत डा. प्राचार्य ने अपने मानसारीय सप्तग्रन्थी अध्ययन में प्राचीन वास्तु-विद्या के एक प्रोन्नत ग्रन्थ का सम्पादन, अनुवाद, रेखाचित्र, पारिभाषिक-पद-कोष आदि-आदि पर स्तुत्य एवं महान् प्रयत्न किया है। परंतु जब तक स्मारकों(monuments) तथा वास्तु-ग्रन्थों (manuals) का समन्वयात्मक पद्धति पर इन कृतियों का अध्ययन एवं विवेचन नहीं होता तब तक अनुसन्धान अधूरा ही समझना चाहिये। यद्यपि यह विषय बड़ा कठिन है। इस विषय को सामग्री भी पर्याप्त नहीं है। वास्तु विद्या की परम्परा अपढ़ कारीगरों में ही विशेषकर सीमित होने के कारण, वास्तु-ग्रन्थों की व्याख्या भी बड़ी दुरुह है तथापि इस दिशा में प्रयत्न परमावश्यक है। वास्तु ग्रन्थों में प्रतिपादित, पुर-निवेश-प्रक्रिया, भवन-निर्माण, भवनांग, भवन-वर्गीकरण, राजप्रासाद, देवतायतन ( बहु-भूमिक तथा बहु-शिखर विमान एवं प्रासाद) आदि की निर्माण पद्धतियाँ, विभिन्न शैलियाँ एवं प्राकृतियाँ कोरे वर्णन नहीं माने जा सकते। 

उनका स्थापत्य में अवश्य समवन्य था। इसी का समुद्घाटन किसी भ वाडस्तु-ग्रन्थ केअध्ययन का परम आदर्श होना चाहिये। मैंने इसी दृष्टिकोण को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है। इस ग्रन्थ के ‘अययन’ में सफलता की प्राप्ति कठिन है। प्रयत्न ही नाथ हो सकता है। दिशा-सूचन से सम्भातः आगे प्रतिभा सम्पन्न विद्वान इस ओर आकृष्ट हो।


भारतीय-विज्ञान (Indology) की इस अत्यन्त रोचक एवं विस्मयकारी शाखा (वास्तु-विद्या एवं वास्तु-कला) के अनुसन्धान, अध्ययन, गवेषण एवं विवेचन में इस पद्धति के अवलम्बन से सांस्कृतिक दृष्टिकोण मी स्वतः या जाता है। संस्कृति एवं सभ्यता की ही कथा इन सभी कलाओं एवं विज्ञानों में भरी है। भारतीय वास्तु-कला सनातन से धर्माश्रया रही। अतः यहाँ की वास्तु-कला की यह धर्माश्रयता हिन्दू जीवन के सांस्कृतिक दृष्टिकोण की परिचायिका है। आगे के अध्याय में इस विषय पर विश्वचर्चा होगी।


 अध्ययन पद्धति


   समराङ्गण एक बृहद् ग्रन्थ है। ८३ अध्याय तथा लगभग दसहजार पंक्तियों में निबद्ध इस प्रौढ़ ग्रन्थ में, प्रधानतया निम्नलिखित पाँच प्रमुख विषयों पर विवेचन है :-१. पुर निवेश२. भवन-निवेश३. प्रासाद निवेश४. प्रनिमा-निर्माण५. यत्र घटना   अतएव इन पाँचों विषयों को लेकर आगे के पाँच पटल (भाग) अपने अध्यायों सहित इस ग्रन्थ का प्रधान कलेवर निर्माण करेंगे। परन्तु इन विषयों में स्थापत्य एवं स्थपति तथा अन्यान्य प्रोपोडातिक विषयों का समावेश सम्भव न पाकर प्रथम पटल प्रोपोद्धातिक है। इस प्रकार एक संख्या और बढ़ी। प्रतिमा निर्माण में चित्र-प्रतिमा- चित्रकला समराङ्गण की अपनी विशेष देन है अत: इस विषय को एक भिन्न पटल में विभाजित किया है। इस प्रकार एक संख्या और बढ़ी। समराङ्गण और समराङ्गणके इस अध्ययन को समन्वित करने के लिये एक परिशिष्ट की (लक्षण-ग्रन्थ के सन्दर्भ- अवतरण-तालिका) भी आवश्यकता है। इस प्रकार यह पञ्चमुद्री सप्तपशी में परिणत हो अष्टमंगला का आवाहन कर रही है।


अन्त में एक विशेष संकेत यह है कि डा. आचार्य महोदय ने समराङ्गण की विषयानुक्रमणिका (अध्याय योजना ) को सुसंगति एवं तर्क-पूर्णता के साथ-साथ विषय संगठन के अभाव पर भी निर्देश किया है ( देखिये हिन्दू आर्कीटेक्चर इन्डिया एन्ड एवाड पेज १७८-८१) हो सकता है अन्धकार राजा था, यह अन्याय संपादन किसी सहायक को सौपा गया हो अथवा यह बाद के प्रतिलिपिकार की भूल हो । वास्तव में विषयों का सुसम्बद्ध कम (विशेषकर १-४८ अध्यायों में) नहीं पाया जाता है। अतः दोष का निराकरण कर नवीन योजना निर्दिष्ट की है जिसकी चर्चा हम आने वाले लेखों में करेंगे ।

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