भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म, विकास एवं विशेषता

भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म, विकास एवं विशेषता

भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म, विकास एवं विशेषता

भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म वेदाङ्ग-घटक (विशेषत: ज्योतिष एवं कल्प) से हुआ । यतः भारतीय वास्तु-कला का प्राश्रय धर्म रहा है, अतः धार्मिक संस्कारों, यज्ञों एवं पूजाश्रों के सम्बन्ध में आवश्यक भूमिचयन, भू-संस्कार, भूमि के मान और उन्मान (नाप-जोख) एवं वेदि-रचना आदि-आदि आवश्यकीय अंगों के सम्बन्ध में जो निर्देश तथा विवरण इन सूत्र-ग्रंथों में मिलते हैं वे ही कालान्तर में वास्तु-विद्या के सूत्रपात करने में सहायक हुये।

हमारे देश की प्राचीन परम्परा में जिन-जिन विद्याओं का एक साथ उल्लेख हुआ है उनमें वास्तु-विद्या का समुल्लेख नहीं देख पड़ता। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि वास्तु-विद्या विद्या-स्थान को ही नहीं प्रास थी। आवश्यकता आविष्कारों की जननी कही गई है । और भवन सम्बन्धी आवश्यकता (निवास) मानवता एवं मानव सभ्यता के साथ- साथ सनातन से सर्वत्र रही है । ऋग्वेद में ही वास्तु सम्बन्धी बहुल संकेत हैं जिनसे तत्कालीन वास्तु-विद्या एवं वास्तु-कला का सुदृढ़ अनुमान किया जा सकता है। यही नहीं सिन्धु नदी की सभ्यता में तो वास्तु-कला के विकास की सुन्दर उन्नति के सुदृढ़ निदर्शन प्राप्त हुये हैं। अतः वास्तु-विद्या का मानव-सभ्यता में एक अत्यन्त आवश्यक ज्ञान सनातन से सर्वत्र रहा है।

प्रत्येक काल की अपनी अपनी प्रमुख विशेषतायें होती हैं । वैदिक काल या गोपासना का काल था। उस समय प्रतिमा-पूजा का प्रचार नहीं हो पाया था । अतः पूजा-वास्तु-वेदि. निर्माण तथा यज्ञ-शाला-रचना तक ही वास्तु-विद्या का विकास पनप सका ( कालान्तर में न केवल वैदिक याग के प्रति ही याभ्यन्तारिक विद्रोह (आरण्यकों एवं उपनिषदों में जैसा प्रत्यक्ष है) उठ खड़ा हुश्रा, वरन् एक विपुल बाह्य विद्रोह, बौद्धों एवं जैनों के नवीन धर्म-संघ से वैदिक धर्म के प्रति भी प्रारम्भ हुया और सारे देश में व्यापक हो गया । उस समय वैदिक ब्राह्मण-धर्म की कैसे रक्षा हो ? नास्तिक बौद्धों के बृहद् धर्म-संघ में सम्मिलित इस देश की जनता को ब्राह्मण धर्म के प्रति कैसे पुनः आकर्षित किया जावे ? धर्म के स्वरूप में एक नवीन सुधार की आवश्यकता का अनुभव हुश्रा । हिंसा-समन्वित’ ‘बहुद्रव्य-सापेक्ष’ यश-कर्मकाण्ड के स्थान पर शिव-पूजा तथा विष्णु-पूजा, त्रिदेवोपासना ब्रह्मा-विष्णु-महेश ) की एक उद्दाम गंगा का प्रवाह इस देश पर प्रवाहित हुन्या । पुराणों की और आगमों की उपासना परम्परा पल्लवित हुई। शिवपूजा और विष्णुपूजा की प्रबल धारा हिमाद्रि उत्तर से दक्षिण सेतुबन्ध रामेश्वर तक बहने लगी । एक शब्द में शैव एवं वैष्णव धर्म की इस उपासना-गंगा में भारतीय जनसमाज नाबाल-वृद्ध-वनिता-अवगाहन कर मानो धर्म-चैमुख्य-जन्य पातक का प्रक्षालन कर पुनः वैदिक धर्म के परिष्कृत रूप में पल्लवित पौराणिक धर्म की पुण्य-भूमि पर विचरण करने लगी।

शिवभक्ति और विष्णुभक्ति, इन दो धार्मिक प्रगतियों के प्रसार से प्रतिमा-सापेक्ष इस नवीन पौराणिक धर्म के बृहद् विजुम्भण में देश के कोने-कोने में तीर्थ-स्थानों, शिव- मन्दिरों एवं विष्णु-मन्दिरों की स्थापना तथा उनका निर्माण प्रारम्भ हुअा । परिणामतः इस पौराणिक धर्म के प्रचार ने वास्तु-कला को चरम उन्नति पर पहुँचा दिया और इस देश के विशाल भू-भाग पर दक्षिणापथ तथा उत्तरापथ इन दोनों प्राचीन भू-खण्डों पर वास्तु-कला के चरमोत्कर्ष के अप्रतिम एवं प्रोज्वल निदर्शन देखने को मिलते हैं । इस प्रकार भारतीय वास्तु-विद्या तथा वास्तु-कला का श्राश्रय धर्म रहा है यह तथ्य हृदयङ्गम हो सकता है।

भारतीय जीवन सनातन से अध्यात्म से प्रभावित रहा । धर्म एवं जीवन की पारस्परिक घनिष्टता देश की सर्वप्रमुख विशेषता रही। भारतीय जीवन का कोई भी क्षेत्र धार्मिक प्रेरणा एवं चेतना से अछूता नहीं रहा । धारणा तो यह रही है कि बिना धार्मिक उपचेतना के वह जीवन क्षेत्र ही निष्प्राण है। सच भी है, भारतीय धर्म का कलेवर ही इतना विशाल रहा है कि मानव जीवन के सभी क्षेत्र भौतिक एवं पारमार्थिक उसके क्रोड में कवलित हो जाते हैं।


“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म:’-धर्म की इस परिभाषा में अभ्युदय

अर्थात् ऐहिक उन्नति–सांसारिक ऐश्वर्य तथा निःश्रेयस अर्थात् मोन—पारमार्थिक चरम उन्नति-दोनों ही तो सम्मिलित हैं। अतः विना धर्म से अनुप्राणित एवं प्रभावित कोई भी जोवन अंग यहां कैसे विकास को प्राप्त होता ?


भारतीय जीवन को यह धर्मप्रियता भारतीय सभ्यता की उच्चता का प्रतीक है । रहन- सहन, खान-पान, भोजन-भजन, प्राचार-विचार, निवास एवं परिधान की कहानी ही तो सभ्यता की कहानी है। मानव जीवन की ये आवश्यकतायें जब नियंत्रित, सुव्यवस्थि एवं सुसंचालित होकर एक अदृश्य अध्यात्म का सहारा ले लेती हैं, तभी मानव अपनी असभ्यता किंवा अर्ध-सभ्यता की कोटि से उठकर सभ्य मानव के रूप में पर्दापण करता है। और विकास के मार्ग में बढ़कर कालान्तर में इसी जीवन-दर्शन से अनुमाणित होकर वही मानव, मानवता की कोटि से उठकर देवत्व की क्रोड में किलोले करने लगता है

भारतीय सभ्यता की प्राप्त सामग्री में भारतीय सभ्यता के शैशव-काल के दर्शन दुर्लभ हैं। क्या धर्म, क्या दर्शन, क्या याचार, क्या विचार, और क्या निवास, क्या परिधान आदि के बहुल संकेत जो पुरातन भारतीय साहित्य एवं पूरातन संभारों में प्राप्त होते हैं, उनसे सभ्यता के शैशव का केवल अनुमान हो सकता है-दर्शन नहीं। ऋगवेद न केवल भारत का ही प्राचीनतम साहित्यक स्मारक है, वरन् विद्वानों के मत में संसार के प्राप्त साहित्य स्मारकों में वह प्राचीनतम है। ऋग्वेद में वास्तुकला संबन्धी जो संकेत हैं उनसे इस कला के शैशव का केवल अनुमान लगाया जा सकता है। ऋग्वेद की वास्तु-कला एक अवस्था में पायी जाती है। ऋगवेद में वशिष्ठ जी-त्रिधातुशरणम्”-

त्रिभूमिक-प्रासाद की इच्छा करते हैं। इसी प्रकार एक राजा के विषय में उल्लेख है जो “सहस्त्रस्तम्भ’ एवं “सहस्रद्वार वाले विशाल हाल में बैठता है; इसी प्रकार भित्र तथा वरुण-इन दो वैदिक देवों के विषय में उल्लेख है कि उनके आवास सहस्रस्तम्भ एवं सहस्रद्वार है-विशेष विवरण तारापद जी की पुस्तक में देखिये । इसी प्रकार ‘पुर’ एवं ‘भवन’, ‘प्रासाद’ तथा श्रावास’-विषयक शतशः वास्तु संकेत ऋग्वेद में भरे हैं। भले ही ये संकेत क्रान्तदर्शी मनीषी कवियों की कल्पना के कोरे निदर्शन हों—परन्तु कवि कल्पना का कोई आधार तो होना ही चाहिये । कवि अपनी प्रतिभा से साधारण से साधारण भावपट्टों’ पर असाधारण रागरंजन करता है, परन्तु श्राधार चाहिये ही। अतः इन प्राचीन वास्तु संकेतों के अन्तरतम में प्राचीन भारतीय वास्तुकला के विकास के बीज स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।

वैसे तो वास्तु-विद्या और वास्तु-कला दोनों का प्रवाह एक ही स्रोत से निःसृत हुआ है, दोनों ही का सनातन से इस देश में समन्वय रहा है। परन्तु प्रकृत में हम वास्तु-विद्या पर ही विचार करेंगे। भारतीय वास्तु-कला की विशेषता पर केवल थोड़ा सा सूचित करना अप्रासंगिक न होगा।


वास्तु-कला के मर्मश विद्वान डा० कुमार स्वामी के शब्दों में भारत की सभी देने उसके दर्शन से अनुप्राणित हैं। जहाँ तक भारतीय कला की उद्भावना का सम्बन्ध है, उसमें कलाकार के मानसिक योग एवं प्रारम्भिक धार्मिक संस्कारों का होना अनिवार्य है।” इस कथन से हमारे कथन की सत्यता स्वतः सिद्ध है कि भारतीय धर्म के कलेवर में भारतीय दर्शन की आत्मा का निवास है। बिना पाल्मा के शरीर निष्प्राण । बिना शरीर के आत्मा का अस्तित्व केवल अनुमेय है प्रत्यक्ष नहीं ।अतः धर्म और दर्शन का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है । यही कारण है कि भारतीय विचारकों ने जहाँ शब्द-ब्रह्मवाद अथवा रस-बहावाद एवं नाद-ब्रहावाद की कल्पना की है, वहाँ उन लोगों ने वास्तु में भी वास्तु-ब्रह्मवाद की कल्पना करके भारतीय वास्तु-कला में जीवन संचार किया है। जड़ में चैतन्य की कल्पना ही तो दर्शन का मर्म है। भारतीय वास्तु-कला की इस मौलिक-विशेषता को प्रायः सभी उद्भट वास्तु-शास्त्रियों ने स्वीकार किया है । भोजदेव ने भी अपने समराङ्गण-सूत्रधार के प्रथम ही पद्य
में वास्तु-ब्रहा को लोकत्रय शिल्पी के रूप में उद्भावना करके इस कथन की पुष्टि की है-
देवः पातु भुवननयसूत्रधार – स्त्वा वालच दकलि काङ्कितजूटकोटिः ।


एतव समग्रमपि कारणमन्तरेण कास्न्यावसूनितमसूध्यत येन विश्वम् ॥ ‘भुवनत्रय-सूत्रधारः लोकत्रय-शिल्पी । शिल्पवैचित्र्यमुत्रराधैं प्रतिपाद्यते। समग्रं कारणमन्तरेणापि समवाय्यसमवायिनिमित्तात्मना त्रिप्रकारमन्योन्यविलक्षणस्वरूपं लोकप्रतीतं कारण कलापं कार्यमाचसाधारणं विनापीत्यर्थः, जगन्द्र पस्य कार्यस्यैक एवेश्वर- उपादानं च निमित्तं चाम्नात इति । असून्यत श्राकारोल्लेखपूर्वमसूज्यत ।

इस श्लोक का भावार्थ यह है कि ग्रंथकार ने मंगलाचरग के व्याज से ले कत्रय-शिल्पी भगवान् भूतभावन चन्द्रशेखर शिव में उस ग्रादि सूत्रधार का शारोपण किया है जिन्होंने।सम्पूर्ण कारणों के बिना भी इस सम्पूर्ण विश्व की रचना की है। वैसे तो मानव संस्कृति अविच्छिन्न है । वह सार्वभौमिक है सार्वकालिक भी। परन्तु स्थान, काल एवं जाति विशेष के संसर्ग से उसमें अपनी विशिष्टता की छापें अवश्य प्रस्फुटित हो जाती हैं । वास्तु-कला का मानव सभ्यता की कहानी में एक महत्वपूर्ण स्थान है। प्रायः सभी देशों में यह कला पनपी। अपने-अपने देशों में उन देशों के देशवासियों ने जैसा इस कला की साधना में, विकास एवं अभ्युदय में योगदान दिया वैसा ही स्थान, काल एवं जाति विशेष की विशेषताओं से उसमें अवश्य वैशिट्य उत्पन्न हो गया है। पर्सी ब्राउन के शब्दों में इंडियन आर्कीटेक्चर प० १-“यूनानियों की वास्तु-कला की विशेषता उनकी प्रोजबल-पूर्णता थी। रोमन भवन (निर्माण) अपनी वैज्ञानिक-रचना के लिये प्रसिद्ध हैं।


कच-गोथिक कला में हमें एक भावुक बुद्धि एवं उद्भावना के दर्शन होते है। इटली की सर्वतोन्मुखी उन्नति ( वास्तु-कला जिसमें एक थी ) में तत्कालीन वैनुष्य की छाप प्रकट रूप में प्रत्यक्ष है। इसी प्रकार भारतीय वास्तु-कला की सर्वप्रमुख विशेषता उसकी अध्यात्म-निष्ठा है। यह प्रकट है कि भारतीय भवन निर्माण कला का अाधारभूत अध्यवसाय-प्रयोजन भारतीय जनसमाज की धार्मिक चेतना एवं विश्वास को मूर्त स्वरूप प्रदान कर उनके प्रतीकल्व का कल्पन है। प्रस्तर, पाषाण एवं इष्टका में भारतीय आत्मा का साक्षात्कार करना ही भारतीय वास्तु-कला की सर्वप्रमुख विशेषता कही गयी है।” यहाँ पर एक प्रश्न यह है कि भारतीय वास्तु-कला पर जो अनुसन्धानात्मक एवं गवेषणात्मक ग्रंथ पाश्चात्य एवं पूर्वीय विद्वानों ने लिखे हैं, उनमें भारतीय वास्तु कला का प्रारम्भिक विकास मौर्यकाल से मानते हैं तथा महाराज अशोक के ही राज्यकाल से वास्तु-कला एवं प्रस्तर-कला का विकास बताते हैं। इस सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है कि महाराज अशोक ने जिन विभिन्न ला, स्तूप, चैत्य तथा शिला लेख इत्यादि का निर्माण कराया, उनका एकमात्र उद्देश्य बौद्ध धर्म का प्रचार एवं संरक्षण था। अतः अशोक-कालीन भारतीय वास्तु-कला एवं प्रस्तर-कला के विकास में धर्माश्रय ही प्रत्यक्ष था। दूसरा प्रश्न यह है, जो उपर्युक्त कथन में काल भेद का वषम्य उपस्थित करता है वह यह कि पुराणों की रचना अथवा सम्पादन तो आधुनिक विद्वान गुप्तकालीन मानते हैं, अतः पुराणों अथवा अागमों की भक्ति परम्परा से ही यदि भारतीय वास्तु-विद्या एवं वास्तु-कला का विकास माने तो फिर बौद्ध-कला के प्रारम्भ में यह कैसे संगत हो सकती है ? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि बहुत से पुराण ईसवीय पूर्व कृतियाँ हैं। गुप्त काल में उनका सम्पादन हुआ होगा, यही मानना विशेष संगत है। रामायण तथा महाभारत की रचना ईसा से छठी शताब्दी में मानी गयी है। पुराण, वैदिक एवं लौकिक साहित्य के बीच की कृतियाँ मानी जानी चाहिये ।

रामायण और महाभारत तो लौकिक साहित्य के रूप में ही सनातन से परिगणित होते आये हैं। अतः भले ही पुराणों की रचना गुप्तकाल के बहुत पूर्व न हुई हो और आगमों की रचना और भी आगे हुई हो, परन्तु इस देश में वैदिक धर्म की परम्परा के उपरान्त पौराणिक धर्म की परम्परा पल्लवित हो गयी थी-भले ही उस परम्परा का सुसंस्कृत एवं लेखबद्ध अथवा साहित्यिक स्वरूप बहुत काल के बाद हुआ हो। किसी भी परम्परा के पूर्ण विकास में एक महान इतिहास छिपा होता है। परम्पराओं का जन्म जय होता है तो उनके विकास और उन्नति तथा सिद्धान्तरूप में दृढ़ीकरण में प्रचुर समय की आवश्यकता होती है। महाराज अशोक के पूर्व भी इस देश में शिव पूजा ( देखिये सिन्धु की घाटी की सभ्यता ) का पूर्ण प्रसार हो चुका था तथा उस पूजापद्धति की धार्मिक पुस्तकों में आगमों की परम्परा भी अवश्व पल्लवित हो चुकी होगी, तभी तो आगमों में प्रतिपादित शक्ति-पूजा एवं शिव-पूजा के प्रतीक मन्दिर-निर्माण-व्यवस्था और उसमें लिङ्ग-स्थापन तथा पार्वती के वाहन सिंह आदि
पशुओं की प्रतिमा संविधान पर जो संकेत हैं उनका ही प्रभाव अशोककालीन वास्तु-कला तथा प्रस्तर-कला पर प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। अशोक के स्तम्भों पर जिन चार पशुओं-सिंह, गज, वृषभ तथा अश्व की मूर्तियाँ बनी हैं, उनमें तीन पशुओं का सामान्य सम्बन्ध शिव-प्रतिमा तथा शक्ति-प्रतिमा के संविधान में आवश्यक वाहन-रूप में प्रचलित थे। अतः आगमों की वास्तु-परम्परा बहुत प्राचीन है । उसको मध्यकालीन मानना भले ही साहित्यिक रूप से सुसंगत हो परन्तु उनकी परम्परा अति प्राचीन है-ऐसा कहना असंगत न होगा।

इसी दृष्टिकोण से भारतीय वास्तुकला के विद्वानों ने जो दो रूप नागर शैली’ उत्तरी तथा ‘द्राविड़ शैली’ दक्षिणी स्थिर किये हैं वे संगत होते हैं और इसीलिये वास्तु-विश्रा का जन्म जहां वेदाङ्गषट्क के ज्योतिष एवं कल्प से हुआ वहाँ आगमों एवं पुराणों की इन दो परम्परानों से देश एवं स्थान भेद से उसके दो रूप देखने को मिलते हैं। सारांशतः वास्तु-विद्या का जन्म तो जैसा पूर्व ही संकेत किया जा चुका है वैदिककाल के ही समकालीन था परन्तु उसका स्थिर रूप वेदांगों के समय में सम्पन्न हुआ तथा पुराणों और आगमों में उसका विकास प्रारम्भ हुआ और आगे चलकर वास्तु-विद्या के प्राचार्यों ने उसको एक स्वाधीन शास्त्र के रूप में खड़ा किया और यह वास्तु-शास्त्र शुक्राचार्य के अनुसार विद्या-स्थान’ को भी प्राप्त हो गया।

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