प्राचीन भारत में वास्तु विद्या की परम्पराये

प्राचीन भारत में वास्तु विद्या की परम्पराये

प्राचीन भारत में वास्तु विद्या की परम्पराये

परम्परायें एवं प्रवर्तक

समराङ्गण सूत्रधार मध्यकालीन कृति है। इस ग्रंथ में जिस वास्तुविद्या के दर्शन होते हैं वह अत्यन्त प्रौढ़ एवं समुन्नत है। भारतीय वास्तु शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथों का निर्माण भी इस काल के पूर्व हो चुका था। इन विभिन्न ग्रंथों के अवलोकन से वास्तु-विद्या की जो परम्परायें पनपीं, उनपर और उनके प्रवर्तक श्राचार्यों एवं उनकी कृतियों पर एक विहंगम दृष्टि डालना आवश्यक है।

यहाँ पर इतना ध्यान रहे कि जिन विभिन्न वास्तु शास्त्र प्रतिपादक ग्रंथों का आगे हम वर्णन करेंगे, उनमें सभी के काल निर्णय अभी नहीं हो पाये हैं। तिथिक्रम भारतीय विशान (इन्डोलाजी) की एक कठिन समस्या है।

वास्तु-विद्या के जन्म एवं विकास का इतिहास लिखने में श्रीयुत् तारापद भट्टाचार्य ने एक सराहनीय प्रयत्न किया है ; परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि जिन निष्कर्षों पर भट्टाचार्य जी पहुँचे हैं, वे सिद्धान्त रूप में मान्य हैं। इस दृष्टिकोण से भारतीय वास्तु विद्या का व्यापक क्षेत्र अब भी अनुसन्धान के लिये काफी सामग्री प्रदान कर सकता है। वैदिक वाङ्मय, पुराण, एवं महाकाब्य तथा बृहत्संहिता (ज्योतिष) एवं मानसार आदि शिल्प-शात्रों तथा अन्य विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के परिशीलन से वास्तु-विद्या के अनेक आचार्यों के नामोल्लेख एवं उनके सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है। अतः यह निर्विवाद है कि इन विद्या के मूल प्रवर्तकों का जन्म इस देश में अत्यन्त प्राचीनकाल में हुआ था। भारतीय परम्परा के अनुसार प्रत्येक विद्या का अपना-अपना अलग जन्मदाता है। विभिन्न दर्शनों के संस्थापक एवं प्रवर्तक हम जानते हैं। विभिन्न धार्मिक, नीति-सम्बद्ध एवं आर्थिक तथा राजनैतिक परम्पराओं के प्रवर्तक भी हम जानते हैं। अतः वास्तुविद्या के मूल प्रवर्तकों में हमें दो नाम विशेष उल्लेखनीय मिलते हैं। वे हैं विश्वकर्मा तथा मय ।

विश्वकर्मा की कल्पना देवतात्रों के स्थपति के रूप में सनातन से इस देश में चली आई है। अतः देवभूमि इस भारत के उत्तरापथ भूभाग पर विश्वकर्मा का अवतार हुआ-ऐसे बहुत संकेत प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। अत: इस भूभाग से सम्बन्ध रखनेवाली वास्तु-कला तथा उस कला की विद्या के विभिन्न शास्त्र ग्रंथों में विश्वकर्मा को वास्तुविद्या का प्रथम प्रवर्तक एवं प्राचार्य माना गया है। श्रीयुत् तारापद भट्टाचार्य ने यह भी प्रतिपादित किया है कि जहां विश्वकर्मा एक देवताओं का स्थपति था और उसको वसुयों (देव विशेषों में) परिगणित लिया गया है, वहाँ विश्वकर्मा नामक एक मनुष्य भी था जो वास्तु-विद्या का प्रवर्तक हुआ और कालान्तर में स्थापत्य-शास्त्र एवं कला में विश्वकर्मा-स्कूल (परम्परा) का जन्म तथा बिकास हुया (इस सम्बन्ध में विशेष ज्ञातव्य के लिये श्री तारापद की पुस्तक देखिये)। दैवी संस्कृति के साथ-साथ सनातन से इस देश में आसुरी संस्कृति का समानान्तर रूप में निर्देश किया गया है। यही नहीं संस्कृति के भौतिक रूप में असुरों ने देवों की अपेक्षा विशेष उन्नति की थी—यह हमारे पुरातन ग्रंथों से स्पष्ट है। ये असुर कौन थे? विद्वानों ने एतद्देशीय अनार्य जाति के प्रति ब्राह्मण आदि ग्रंथों में जो असुर आदि शब्दों का प्रयोग पाया है उनसे इस देश के आर्येतर निवासियों का बोध माना है। वास्तव में जिसको हम आसुरी सभ्यता कहते हैं वह भी इसी देश के मूल निवासियों की सभ्यता है। इस सभ्यता की वास्तु-कला में अत्यन्त प्राचीन नाम जो आर्य अन्थों में मिलता है वह है मय ।

मय असुर था। अतः आसुरी वास्लु-विद्या के मूल प्रर्वतक के रूप में इसे माना गया है और इस प्रकार भारतीय वास्लु-विद्या की वह दूसरी परम्परा मय-स्कूल के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर वह संकेत करना आवश्यक है कि जिस प्रकार भारतीय आर्य सभ्यता में आयंतर एतद्देशीय तथा विदेशीय बहुसंख्यक घटक पद-पद पर प्राप्त होते हैं उसी प्रकार बास्तु-विद्या के सिद्धान्तों में भी कालान्तर पाकर पारस्परिक सम्मिश्रण हुआ। एक परम्परा की विद्या में दूसरी परम्परा के प्राचार्यों के मतों का सम्मानपूर्वक उल्लेख हुआ और पुन: इस महादेश के एक कोने से दूसरे कोने तक स्थापत्य-कौशल का जो प्रोनबल रूप देखने को मिलता है उसमें देश भेद होते हुए भी सम्मिश्रण की इस आधारभूत रेन्बा के सर्वत्र समान रूप से दर्शन होते हैं। दक्षिण की द्राविड़-शैली और उत्तर की नागरगीली दोनों शैलियों के अपने-अपने सुन्दर निदर्शन होते हुए भी एक दूसरे पर पार- त्सरिक प्रभाव भी कम प्रत्यक्ष नहीं है।

अस्तु, बास्लु-परम्पराओं और प्रवर्तकों पर इस किचित्कर उपोद्घात के अनन्तर एक तथ्य की ओर और मी ध्यान यह देन है कि यद्यपि यहाँ पर दो ही परम्पराओं दक्षिणी तथा उत्तरी का संकेत किया गया, फिर भी इस विशाल देश में कालान्तर में विभिन्न महाजनपदों में अपने-अपने क्षेत्रों की विशेषताओं को लेकर और भी बहुत सी परम्परायें पल्लवित हुई, जिनको रैलियों के नाम से पुकारा जाता है। नागर ( उत्तरी ) द्राविड़ ( दक्षिणी ) शैली का संकेत हो ही चुका है। इन दो शैलियों के अतिरिक्त तीसरी शैली बेसर के नाम से प्रसिद्ध है। ‘समराङ्गण’ में तो नागर, द्राविड़, बेसर की त्रयी के स्थान पर नागर, द्राविड़, वावाट, भूमिज, लाट (लतिन) आदि बहुसंख्यक वास्तु-शैलियों का विवेचन है। इन शैलियों के सम्बन्ध में हम आगे प्रासाद-वास्तु की समीक्षा में विचार करेंगे। इतना तो निर्विवाद है कि शैलियाँ कितनी ही क्यों न हों प्रधान रूप से भारतीय वास्तु-विद्या की दो ही परम्परायें हैं जो ऊपर उत्तरी तथा दक्षिणी परम्परा के नाम से पुकारी गयीं हैं।

दक्षिणी परम्परा

इस परम्परा के प्रवर्तक प्राचार्यों में निम्नलिखित नाम विशेष उल्लेखनीय है :-


ब्रह्मा
काश्यप
नारद
त्वष्टा
अगस्त्य
प्रहाद
मय
शुक्र
शक
मातङ्ग
पराशर
वृहस्पति तथा
नग्न जित्
मानसार

इन नामों का निर्देश मात्र यहाँ अभिलषित है । विशेष छानबीन ( इन श्राचार्यों के संकेत आदि एवं सिद्धांत आदि) तारापद ने अपने ग्रंथ में की है। अत: विस्तारभय से उसकी अवतारणा यहाँ समीचीन नहीं। मत्स्य-पुराण एवं बृहत्संहिता में जिन २५ आचार्यों का निर्देश मिलता है उनमें से बहुसंख्यक नाचार्य द्राविड-परम्परा के प्रर्वतक माने जाते हैं, और शेष नागर-परम्परा के। मत्स्य पुराण की निम्न नामतालिका निभालनीय है:-

भूगु
नग्नजित्
मनु
विशालाक्ष
गर्ग
पराशर
वसिष्ठ
पुरन्दर या शक
वासुदेव
काश्यप
विश्वकर्मा
ब्रह्मा
अनुरुद्ध
कुमार
शुक्र
नारद
नंदीश (शम्भु)
बृहस्पति
अगस्त्य

मार्कण्डेय

शौनक
अत्रि
भरद्वाज
मय
गर्ग

प्रथम १६ नाम मत्स्यपुराण में तथा बाद के ३ नाम (२०, २१, २२) व्हत्संहिता में तथा अंतिम तीन अन्य साहित्य सन्दर्मों में उल्लिखित पाये जाते हैं। इनमें बहुतों के ग्रंथ भी पाये जाते हैं जिनका हम वास्तु वाङ्मय’ के आगे के स्तम्भ में उल्लेख करेंगे।

उत्तरी परम्परा

आर्य वास्तु-परम्परा के प्रथम श्राचार्य विश्वकर्मा ने यह विया स्वयं पितामह ब्रह्मा से प्राप्त की ( देखिये आगे का अध्याय ‘समराङ्गण का स्थान’) विश्वकर्मा देवों का स्थपति था। उसकी गणना वसुन्नों में थी। परन्तु कालान्तर में देश के विभिन्न कुशल एवं प्रसिद्ध स्थपतियों ने अपने नाम विश्वकर्मा के नाम से प्रचलित किये। अतएव जहाँ देवों का विश्वकर्मा वास्तु-विद्या का प्रथम प्रतिष्ठापक है, वहाँ कालान्तर में इस देश में अन्य कई विश्वकर्मा हुये जिन्होंने स्थापत्य-कौशल की परम्परा में योग दिया तथा स्थापत्य-शास्त्र पर ग्रंथ निर्मित किये।

मास विश्वकर्म-प्रकाश में विश्वकर्मा उत्तरापथ की वास्तु-परम्परा का प्रथम आचार्य न माना जाकर चौथा या पांचवाँ या इससे भी अर्वाचीन माना गया है-शम्भु का शिष्य गर्ग, गर्ग का शिष्य पराशर, पराशर का शिष्य बृहद्रथ तथा बृहद्रथ का शिष्य विश्व-कर्मा और विश्वकर्मा के शिष्य वासुदेव ने यह ग्रंथ संकलित किया—ऐसा इसमें निर्दिष्ट है। अतः देव-स्थपति विश्वकर्मा के अतिरिक्त कम से कम दो विश्वकर्मा और हुये जो वास्तु- विद्या के प्राचार्य के रूप में प्रख्यात हुए तथा ग्रंथ लिखे। उनमें एक है उत्तरापथ का और दूसरा है दक्षिणापथ का । विश्वकर्म-प्रकाश उत्तरापथ की वास्तु-विद्या का वर्णन करता है तथा विश्वकर्मीय-शिल्प दक्षिणापथ की वास्तुविद्या का वर्णन करता है। अस्तु, उत्तरी परम्परा
नागर शैली) के प्रवर्तक आचार्यों में निम्नलिखित नाम विशेष उल्लेखनीय हैं-


१. शम्भु
३. अत्रि
५. पराशर ७. विश्वकर्मा तथा
४. वसिष्ठ
८. वासुदेव

इन नामों की सूचक सामग्री का यहाँ पर उल्लेख नहीं किया गया, क्योंकि यह इस ग्रंथ का प्रतिपाद्य विषय नहीं है। स्वल्प में निर्देशमात्र ही यहाँ पर संगत है।

वास्तु-वाङ्मय

दोनों परम्पराओं के प्रवर्तक श्राचार्यों के ग्रंथों एवं सिद्धान्तों के उल्लेख के प्रथम एक ज्ञातव्य तथ्य यह है कि वास्तु शास्त्र के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनेवाला भारतीय साहित्य मुख्यतया दो प्रकार का है। डा. आचार्य के शब्दों में पाकीटेक्चरल वर्क्स अर्थात् वास्तु- शास्त्रीय ग्रन्थ तथा नान-नाकीटेक्चरल वर्क्स अर्थात् अ-वास्तु-शास्त्रीय अन्य । पहिली कोटि में उन ग्रंथों का समावेश होता है जिनमें अविकल रूप से वास्तु-शास्त्र पर विवेचन किया गया है और दूसरी कोटि के वे ग्रंथ हैं जो मुख्यतया यातो धार्मिक ग्रंथ है जैसे वेद, वेदाङ्ग (कल्प तथा ज्योतिष) पुराण, आगम तथा धार्मिक-संस्कार-पद्धतियों पूजा-पद्धतियों, प्रतिष्ठा-पद्धतियों के ग्रंथ या कुछ नीति-विषयक ग्रंथ जैसे शुक्र-नीति और कौटलीय अर्थशास्त्र आदि ।

अतः परम्परानुरूप इन दोनों प्रकार के वास्तु ग्रंथों का संक्षेप में समुल्लेख किया जाता है।

दक्षिणी परम्परा वास्तु-ग्रन्थ

अवास्तु-शास्त्रीय ग्रन्थ
तंत्र ग्रन्थ ( दीस-तंत्र आदि )
वैष्णव पञ्चरात्र तंत्रसमुच्चय
ईशानशिवगुरुदेवपद्धति
शैवागम
अत्रि-संहिता
वखानसागम

इनमें आगम-साहित्य अति विशाल है। इसमें वास्तु-विद्या का विवेचन बड़ा ही उत्कृष्ट है। दक्षिणापथ के ये “पुराण” पुराणों की अपेक्षा अधिक विस्तृत एवं पृथुल हैं। आगमों की संख्या भी पुराणों की संख्या से डेढ़ गुनी है। पुराण १८ हैं आगम २८ ।

आगमों में कामिकागम, सुप्रभेदागम, कांगम, वैखानसागम आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। डा० आचार्य के मत में (हि० श्रा० इ० ए०) कुछ अागमों का वास्तु-विद्या-प्रवचन बड़ा ही वैज्ञानिक एवं पारिभाषिक है, जैसा पुराणों में नहीं मिलता। किन्हीं-किन्हीं आगमों में वास्तु-विद्या का विवेचन इतना विशाल है कि उनको वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथ कहें तो अत्युक्ति न होगी। कामिकागम के ७५ पटलों में से ६० पटलों में वास्तु-विद्या का वर्णन है। इसका विवेचन भी अत्यन्त प्रौढ़ है।

ब-वास्तु-शास्त्रीय प्रन्थ

विश्वकर्मायशिल्प
काश्यप-शिल्प (अंशुमद्देद)
शिल्प-संग्रह
मयमत
अगस्त्यसकलाधिकार
शिल्प-रत्न तथा
मानसार
सनत्कुमार-वास्तुशास्त्र
चित्रलक्षण

इन वास्तु-शास्त्रीय ग्रंथों में मानसार’ का स्थान विशेष महत्वपूर्ण है। इस ग्रंथ को दक्षिणी परम्परा का अधिकृत ग्रंथ कहा जा सकता है। डा० प्रसन्नकुमार श्राचार्य ने ‘मानसार’ पर अति विशाल एवं अग्रगामी अनुसन्धान किया है। प्राचार्य महोदय को वास्तव में आधुनिक वास्तु-विद्या के अनुसन्धान एवं गवेषण करने वालों में प्रथम अक्षय कीर्ति प्राप्त है। यद्यपि इस दिशा में रामराज़ ( देखिये “एसे ऑन हिन्दू पाकीटेक्चर” ) ने सर्वप्रथम कदम उठाया था । मानसार में ७० अध्याय हैं, जिनमें ‘गृह-निर्माण, पुरनिवेश, राजप्रासाद’ तथा मन्दिर-निर्माण’ आदि वास्तु-कला के विभिन्न सिद्धान्तों (कैनन्स ) के अतिरिक्त मूर्ति- निर्माण-कला तथा भूषण-विधान’ पर भी विवेचन किया गया है। मानसार की वास्तुविद्या पर स्वल्प में आगे के स्तम्भ ( वास्तु-सिद्धान्त ) में प्रकाश डाला जायगा ।

उत्तरी परम्परा के वास्तु-ग्रन्थ-

वास्तुशास्त्रीय ग्रन्थ पुराण (मत्स्य, अग्नि, भविष्य आदि)
बृहत्संहिता (ज्योतिष ग्रन्थ, परन्तु वास्तु-सिद्धान्तों का बड़ा मार्मिक विवेचन करती है)
तन्त्र (किरणतन्त्र आदि)
यशीर्ष-पंचरात्र
विष्णुधर्मोत्तर ( चित्रकला का अधिकृत ग्रन्थ )
प्रतिष्ठा-ग्रन्थ ( हेमाद्रि तथा रघुनन्दन श्रादि के ग्रन्थ)
हरिभक्तिविलास
वास्तु-शास्त्रीय ग्रन्थ
विश्वकर्मप्रकाश
समरांगवा-सूत्रधार सूत्रधार मण्डन
वास्तु-रत्नावली वास्तु प्रदीप श्रादि

पुराण-पुराणों की वास्तु-विद्या आगमों की वास्तु-विद्या के समान ही महतव पूर्ण है। पुराणों में मत्स्य और अग्नि में वास्तु-विद्या का विशेष वर्णन मिलता है। गरुक, नारद, ब्रह्माण्ड, भविष्य, लिंग, वायु तथा स्कन्द पुराणों में भी वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का निरूपण हुना है।

तन्त्र-तांत्रिक परम्परा भी पुराणों एवं श्रागमों की परम्पराओं के समान ही अति परम्परा है। हयशीर्ष-पंचरात्र में वास्तु-विद्या का प्रौढ़ विवेचन मिलता है। अग्निपुराण पुरातन में प्रतिपादित वास्तु-विद्या का प्रवचन हयग्रीव के मुख से किया गया है। अग्निपुराण एवं यशीर्ष-पंचरात्र की वास्तु-विद्या की समानता को देखकर श्रीयुत् तारापद भट्टाचार्य ने (प. १३८-६) यह निष्कर्ष निकाला है कि अग्निपुराण तथा इस पंचरात्र का एक ही स्रोत है, जहाँ से वास्तु-विया के सिद्धान्तों को लेकर इन दोनों में उनका संकलन किया गया है।

आग्निपुराण में तांत्रिक वास्तु-परम्परा के निर्देश में ( देखिये अग्नि ३६वां अ०) पंचरात्र या सप्तरात्र के जिन पंचविंशति ग्रन्थों का उल्लेख है वे निम्न प्रकार से द्रष्टव्य हैं:-


यशीर्ष
शाण्डिल्य तन्त्र
-तार्य तन्त्र
त्रैलोक्य मोहन ११-वैश्वक
नारायणिक
वैभव
सात्य
आत्रेय
पौष्कर
सौनक
नारसिंह
प्राहलाद
वासिष्ठ
श्रानन्द
गाग्य
ज्ञानसागर
श्रारुण
गलव
स्वायम्भुव वौद्धायन
नारदीय
कापिल
आर्ष
संप्रश्न

इस नामतालिका के परिशीलन से वास्तु-विद्या के विचारक विद्वानों को यह समझने में देर न लगेगी कि इनमें से बहुत सी तन्त्र-ग्रन्थ-संज्ञाओं में वास्तु-विद्या के प्राचीन प्राचार्यों की नामावली का निर्देश है जैसे यशीर्ष, प्रह्लाद, गर्ग, नारद, विश्वक (मानसार एवं शिल्प रस्न के विश्वसार, विश्वबोध, विश्वकाश्यप ) सौनक, बशिष्ठ, कपिल तथा अत्रि । इनमें हयशीर्ष तथा गर्ग उत्तरी परम्परा अर्थात् नागर-स्कूल के प्राचार्य हैं और शेष द्राविड परम्परा के । इससे यह तथ्य निकलता है कि वास्तु-विद्या की तांत्रिक परम्परा द्राविड़ शैली तथा नागर शैली इन दोनों का संमिश्रण है।

वास्तु-सिद्धान्त

वास्तु-परम्पराओं एवं उनके प्रवर्तकों के साथ-साथ वास्तु-वाङ्मय के प्रधान ग्रन्थों के निर्देश के उपरान्त यह अध्याय अधूरा ही रह जाता है, यदि हम इन ग्रन्थों में प्रतिपादित प्रमुख विषयों का स्वल्प में वर्णन न करें। परन्तु वास्तु-विद्या और वास्तु-कला भारतीय विज्ञान ( इन्डोलॉजी) का एक अत्यन्त पारिभाषिक ( टेकनिकल ) विज्ञान है । अतः यहाँ पर उन सिद्धान्तों की न तो व्याख्या करने का अवसर है और न स्थान। आगे के पटलों में समराङ्गण की वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों के समुद्घाटन के अवसर पर इस दिशा में अवश्य प्रयत्न होगा। अथच वास्तु-विद्या के इन विभिन्न कोटिक ग्रंथों में प्रायः सर्वत्र बड़े ही विस्तार से वास्तु-विवरण पाये जाते हैं। अतः सौविध्य एवं स्थानाभाव की दृष्टि से इन विभिन्न परम्पराओं पुराण, पागम, तन्त्र, शिल्पशास्त्र तथा अन्यान्य ग्रन्थ जैसे वेद, ब्राह्मण, वेदाङ्ग-ज्योतिष तथा कल्प, रामायण, महाभारत, पालि-ग्रन्थ एवं जातक, कौटलीय अर्थ- शास्त्र, शुक्र का नीतिसार तथा अन्य विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ जैसे पूजा-पद्धतियाँ एवं प्रतिष्ठा- ग्रंथ श्रादि अादि ] के प्रतिनिधि ग्रन्थों में प्रतिपादित प्रमुख सिद्धान्तों का एकमात्र संकेत ही सम्भव है।

वैदिक वास्तु-विद्या

सर्वप्रथम वैदिक-कालीन वास्तु-विद्या के दर्शन करना चाहिए । ऋग्वेद-कालीन वास्तु-
कला का कुछ अाभास पूर्व ही दिया जा चुका है। उस समय वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का
भी प्रचार था जो प्रायः लोग नहीं मानते हैं। ऋग्वेद के काल में गृह-निर्माण के अवसर पर
जो प्रतिष्ठा-संस्कार या समारोह किया जाता था, जिन मन्त्रों का उच्चारण किया जाता था
वे सब आज भी होते हैं अतः आगे के प्रत्येक वास्तु-शास्त्रीय ग्रन्थों में जिस वास्तु-पूजा को
वास्तु-निर्माण का श्रावश्यक अंग माना गया है वह ऋग्वेद काल में था ऐसा ऋग्वेद के
मन्त्रों को देखने से पता लगता है। ऋग्वेद में असुर सम्बन्धित सामग्री के परिशीलन से
नग्नजित् तथा त्वष्ट्रा (जो आगे चलकर द्राविड वास्तु-विद्या के प्राचार्य माने गये हैं)
आदि आचार्यों के संकेत भी मिलते हैं। संक्षेप में वास्तु-गूजा, वास्तु-भूमिचयन स्तम्भपूजा,
द्वार-पूजा आदि वास्तु-विद्या के प्रारम्भिक सिद्धान्त ऋग्वेद-काल में प्रचलित थे, जिससे
तत्कालीन वास्तु-विद्या सिद्ध है।


माह अथर्ववेद में तो वास्तु-विद्या एवं कला का और अधिक विकास पाया जाता है।
गृह-निर्माण के सम्बन्ध में विशेष सामग्री द्रष्टव्य है। अथर्ववेद के शाला-सूक्त में
‘द्विपक्षा’, ‘चतुष्पक्षा’, ‘पटपक्षा’, ‘अष्टपक्षा’ तथा ‘दशपक्षा’ शालाओं का वर्णन है (६,
३, २१,) और ये कक्षा-भवन आगे के शाल भवन के ही सदृश हैं। इसके अतिरिक्त
और बहुत से वास्तु-विवरण ( स्तम्भ आदि पर ) इस वेद में मिलते हैं।


ब्राह्मण ग्रन्थों की वास्तु-विद्या ब्राह्मणों में वास्तु-विद्या के बहुल संकेत मिलते हैं। शिल्प’ शब्द की प्राप्ति एवं उसका प्रयोग प्रस्तर-कला ( मूर्तिकला ) तथा संगीत-कला में किया गया है। भूग्वेद-कालीन
द्राविड वास्तु-विद्या के अचार्य नग्नजित् का उल्लेख ऊपर किया गया है और वह शतपथ ब्राह्मण (८.१.४.१०) में पुष्ट होता है जहाँ पर राजन्य नग्नजित् के वास्तु-सिद्धान्तों का खण्डन मिलता है। साथ ही साथ उसे नारद का शिष्य बताया गया है। यह नारद आगे द्राविड वास्तु-विद्या का प्राचार्य माना गया है। श० बा० में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है जिससे श्मशान विरचन सम्बन्धी आर्य एवं श्रासुर (अनार्य) परम्पराओं पर संकेत है। सूत्रकालीन वास्तु-विद्या वास्तु-विद्या के प्रारम्भिक स्वरूप का विकास सूत्र-काल में प्रारम्भ होता है यह पहले ही कहा जा चुका है। इस काल में भारतीय वास्तु-विद्या का स्वरूप प्रायः स्थिर हो गया ।

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