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प्रथम विश्व युद्ध के 06 कारण

प्रथम विश्व युद्ध के 06 कारण

“मैं विश्व युद्ध को अपनी आँखों से नहीं देख सकूंगा, लेकिन आप देखेंगे और यह निकट पूर्व से
आरम्भ होगा।”-बिस्मार्क

बिस्मार्क का यह कथन स्पष्ट करता है कि प्रथम विश्व युद्ध सिर्फ 28 जून, 1914 को ऑस्ट्रिया के भावी सम्राट् फ्रेंज फर्डिनेण्ड और उसकी पत्नी सोफी की हत्या बोस्नियाई युवक गैबरीलो प्रिंसेप द्वारा ‘सेराजेवो’ शहर में कर देने मात्र का प्रतिफल नहीं था। इसकी पृष्ठभूमि इटली एवं जर्मनी के एकीकरण से भी पूर्व की मानी जा सकती है। यूरोपीय इतिहास में 1870-71 का वर्ष उन्नीसवीं शताब्दी के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ है। उस वर्ष उन्नीसवीं शताब्दी का एक विशिष्ट कार्य सम्पन्न हुआ। वियना-कांग्रेस (1815) से लेकर 1870-71 तक समय यूरोपीय इतिहास के संघर्ष का द्योतक है। यह संघर्ष नवीन सिद्धांतों एवं पुरातन व्यवस्था के मध्य था। राष्ट्रीयता और उदारवाद को फ्रांस की क्रांति ( 1789 ई.) ने स्थापित किया। वियना- कांग्रेस ने इस सिद्धांतों को जमींदोज करते हुए पुरातन व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयास ही संघर्ष की शुरूआत मानी जाती है।

सन 1815 से 1871 ई. तक अनेक राष्ट्रों का उदय हुआ जिससे यूरोप का राजनीतिक स्वरूप बदल गया ।
यूनानियों ने तुर्क साम्राज्य से संघर्ष करके स्वतंत्र राज्य का निर्माण कर लिया तथा बेल्जियम का हॉलैण्ड से
सम्बंध विच्छेद हो गया क्रीमियन युद्ध (1853 ई.) के पश्चात् पेरिस की संधि (1856 ई.) के द्वारा
मोल्डेविया तथा वालेशिया नामक प्रांतों को तुर्क साम्राज्य से स्वतंत्रता मिल गई । 1861ई. में दोनों राज्यों ने
मिलकर ‘रूमानिया’ राज्य इस प्रकार साम्राज्यवाद की भावना के चलते साम्राज्यों के बीच कटु प्रतिद्वंद्विता चल पड़ी। परिणामस्वरूप राजनीतिक सम्बंध विषाक्त हो गए। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ का यूरोप बारूद के एक बड़े ढेर पर खड़ा हो गया, उसमें सिर्फ चिंगारी की देरी थी। जिस प्रकार यूरोप में उथल-पुथल हुई उससे शांति को ग्रहण लग गया और अन्ततः विश्व युद्ध ने दस्तक दे दी। सम्पूर्ण यूरोप दो ध्रुवों में विभाजित हो गया। प्रथम गुट मित्र तथा संयुक्त राष्ट्रों का था, जिसमें इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, सर्बिया, जापान, पुर्तगाल, इटली, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूमानिया, यूनान, श्याम, साइबेरिया, क्यूबा, पनामा, ब्राजील, ग्वाटेमाला, निकारागुआ, कोस्टारिका आदि राष्ट्र थे। द्वितीय ध्रुव केन्द्रीय शक्तियों का था, जिसमें जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, बुल्गेरिया और तुर्की सम्मिलित थे।

प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व यूरोप में 6 महाशक्तियाँ विद्यमान थीं-ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इंग्लैण्ड, प्रशा, रूस और इटली। विश्व युद्ध से पूर्व सभी देशों में साम्राज्य विस्तार एवं सैन्यशक्ति को बढ़ाने की आपा-धापी मची हुई थी।

औद्योगिक क्रांति के पश्चात् इंग्लैण्ड की भूख बढ़ गई। वह शक्तिहीन राष्ट्रों में उपनिवेश स्थापित करने लगा। फ्रांस प्रशा से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता था इसलिए उसने अपने पड़ोसियों से सम्बन्ध सुधारने के प्रयास किये। जर्मनी ने स्वयं को सैनिक रूप से शक्तिशाली बनाने के लिए 1882 ई. में त्रिगुट संधि
(Triple Alliance) का निर्माण किया। यह संधि जर्मनी, ऑस्ट्रिया एवं इटली के बीच सम्पन्न हुई, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया कि अगर फ्रांस, इटली पर धावा बोलता है तो, जर्मनी और ऑस्ट्रिया इटली की सहायता करेंगे इसी प्रकार फ्रांस जर्मनी पर हमला करेगा, तो इटली, जर्मनी की मदद करेगा।

इंग्लैण्ड ने जर्मनी की चाल को समझते हुए अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति के विकास पर ध्यान देते हुए सैन्य संधियों करना आवश्यक समझा। 1902 ई. में जापान, 1904 ई. में फ्रांस, 1907 में रूस के साथ इंग्लैण्ड ने संधियाँ कीं। प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व बाल्कन राज्यों में भी राजनीतिक अस्थरता का वातावरण बना हुआ था। इस समय तक अमेरिका भी शक्तशाली राष्ट्र बन चुका था परन्तु उसमें साम्राज्यवाद की भावना नही होने के कारण उसने इस समय यूरोप के शक्ति संतुलन को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया ।

उपरोक्त परिस्थितियों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि अनेक देशों के मध्य शत्रुतापूर्ण सम्बंधों के कारण ही प्रथम विश्वयुद्ध का शंखनाद हुआ था। यह एक कारण का परिणाम न होकर अनेक कारणों का प्रतिफल था।

प्रथम विश्वयुद्ध के 06 कारण

01 यूरोप का दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजन

बिस्मार्क ने नेरन्स के साथ मैत्री सम्बंध बनाने के लिए 1872 ई. में रूस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया के सम्राटों को मिलाकर ‘तीन सम्राटों के संघ’ का निर्माण किया परन्तु बाल्कन क्षेत्र में रूस एवं ऑस्ट्रिया की प्रतिद्वंद्विता के चलते यह सम्भव नहीं हो पाया। बिस्मार्क ने अन्ततः 1887 ई. में रूस से संधि कर ली। 1890 में उसने चांसलर पद छोड़ दिया। उस स्थिति में जर्मनी की विदेश नीति सम्राट केसर विलियम के हाथों में आ गई। सम्राट केसर विलियम ने रूस को विशेष तवज्जो नहीं दी। इस अदूरदर्शितापूर्ण व्यवहार का यह परिणाम निकला कि 1894 ई. में फ्रांस एवं इंग्लैण्ड के मध्य मित्रता हो गई । बिस्मार्क की इस कूटनीतिपूर्ण चाल से भयभीत होकर इंग्लैण्ड ने भी 1902 में जापान, 1904 में फ्रांस और 1907 ई. में इंग्लैण्ड ने फ्रांस और रूस के साथ मिलकर समझौता किया जिसे त्रि-राष्ट्रीय समझौता या त्रिवर्गीय मैत्री संघ (Triple entente) कहा जाता है।

इन दोनों गुटों की प्रतिद्वंद्विता की खाई इतनी गहरी होती गई कि 1914 ई. में प्रथम विश्व युद्ध घटित हो गया।

02 साम्राज्यवादी आकांक्षा

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा यूरोप का सिर दर्द बन चुकी थी। जर्मनी एवं इटली के एकीकरण से पूर्व इन देशों में औद्योगीकरण की शुरूआत हो चुकी थी, एकीकरण के पश्चात् इसने गति पकड़ ली जिसके परिणामस्वरूप उपनिवेशीकरण की भावना बलवती होने लगी। बिस्मार्क के 1890 ई. में चांसलर पद त्यागने के पश्चात् सम्राट केसर विलियम का नेतृत्व उद्योगपतियों के प्रभाव में कार्य करने लगा। उसने बल्लिन-बगदाद रेल लाइन की योजना पेश की तो इंग्लैण्ड भयभीत होने लगा। 1895 में जर्मनी सम्राट विलियम द्वितीय ने कहा कि, “जर्मनी एक विश्व शक्ति है और अब उसके भविष्य का निर्माण समुद्र पर होगा।”

सन 1900 ई. में जर्मन नौ-सेना अधिनियम में भी यह उल्लेख किया गया है कि,”जर्मनी का नौसैनिक बेड़ा इतना शक्तिशाली होगा कि यदि सर्वाधिक बलशाली नौसैनिक शक्ति भी उससे मुकाबला करेगी, तो उसकी प्रतिष्ठा के लिए खतरा उत्पन्न हो जायेगा।” यह स्पष्ट रूप से इंग्लैण्ड के लिए चुनौती का खुला आमंत्रण था। साम्राज्यवादी राष्ट्रों के मध्य अफ्रीका, चीन और प्रशांत महासागर के अनेक द्वीपों पर आधिपत्य स्थापित करने की उत्कट दौड़ शुरू हुई। साम्राज्यवादी दौड़ ने यूरोपीय शांति को खतरे में धकेल दिया। अफ्रीका के बोअर युद्ध से जर्मनी और ब्रिटेन के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया। सूडान को लेकर हुए फसोदा कांड से इंग्लैण्ड एवं फ्रांस के सम्बंधों में कड़वाहट उत्पन्न हो गई। 1894-95 में जापान ने चीन के साथ युद्ध करके उसके कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जिससे उसका रूस से टकराव सुनिश्चित हो गया। इसकी परिणिति 1904-05 में रूस और जापान के बीच युद्ध के रूप में हुई। इस युद्ध में रूस पराजित हो गया। साम्राज्यवादी ताकतों के टकराव का एक केन्द्र बाल्कन प्रायद्वीप भी था जहाँ तुर्की, रूस एवं ऑस्ट्रिया के हित टकराते थे। रूस और ऑस्ट्रिया बाल्कन प्रायद्वीप में टकी के प्रभाव को समाप्त करके अपना-अपना स्वामित्व स्थापित करना चाहते थे अन्तत: रूस और ऑस्ट्रिया का यही स्वार्थ प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बना।

03 अस्त्र -शस्त्र बढ़ाने की प्रतिद्वंद्विता

19र्वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोप में सैन्यवाद का उद्भव जाता है। इसके मूल में साम्राज्यवाद एवं राष्ट्रवाद की भावना को माना जा सकता है। सैन्यवाद को खकित करते हुए प्रो. फे (दि ओरिजिन्स ऑफ द वर्ल्ड वार) ने लिखा है कि “सैन्यवाद के अन्तर्गत दो तथ्य आहत हैं प्रथम, विशाल सेनाओं तथा नौ-सेनाओं की भयानक एवं बोझिल व्यवस्था तथा परिणामस्वरूप उपन होने वाला सन्देह, भय एवं घृणा का वातावरण द्वितीय, यह कि जनरल स्टाफ की अध्यक्षता में सैनिक एवं नौ-सैनिक अधिकारियों का शक्तिशाली वर्ग, जो किसी भी राजनीतिक संकट के समय नागरिक प्रशासन अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करता है।”

जब जर्मनी ने नौ-सैनिक शक्ति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, तो इंग्लैण्ड ने भी नाविक शक्ति को सुधारने की दिशा में पहल कर दी। इस प्रकार यूरोप में सैन्यवाद ने परस्पर राष्ट्रों को आशंकित कर दिया। सभी देशों ने अपनी सुरक्षा का ध्यान रखते हुए, अस्त्र- शस्त्रों की वृद्धि की, जिसने देशों को विश्वयुद्ध की चौखट पर
पहुँचा दिया।

04 समाचार-पत्रों का योगदान

समाचार-पत्र संचार का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वे किसी भी देश के जनमत को प्रभावित कर सकते हैं। समाचार-पत्रों ने देश की जनता को अपनी भावनाओं को
अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान किया। इंग्लैण्ड के समाचार-पत्रों ने जर्मनी के सम्राट विलियम द्वितीय की
आलोचना कर वहाँ की जनता को विरोधी बनाया 1914 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग से प्रकाशित होने वाले ‘बोर्सगजट’ ने बड़े अक्षरों में छापा कि ‘रूस तैयार है, फ्रांस को भी तैयार रहना चाहिए।

05 कैसर विलियम द्वितीय का चरित्र

1890 ई. में बिस्मार्क द्वारा चांसलर पद से त्याग पत्र देने के बाद विलियम द्वितीय ने नेतृत्व सम्भाला। उसकी चाहत थी कि विश्व की राजनीति को जर्मनी दिशा दे। वह जर्मन जाति को श्रेष्ठ जाति मानता था। उसने ‘पान-जर्मन लीग’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड, बेल्जियम, हॉलेण्ड तथा अन्यत्र निवास करने वाली जर्मनी जाति के लोगों को संगठित करना था। इसकी पुष्टि करते हुए हेजन ने लिखा है कि, ‘विलियम द्वितीय की इच्छा थी कि जर्मनी की सामुद्रिक शक्ति सुदृढ़ होनी चाहिए। वह जर्मनी को विश्व की निर्णायक शक्ति बनाना चाहता था। उसकी सोच थी कि यूरोप, एशिया, अफ्रीका तथा सम्पूर्ण विश्व की राजनीति में जर्मनी की सम्मति के बिना कोई निर्णय नहीं होना चाहिए।

06 तात्कालिक कारण

बोस्निया की राजधानी ‘सेराजेवो’ में सर्बियाई युवक द्वारा ऑस्ट्रिया के राजकुमार की पत्नी सहित 28 जून, 1914 हत्या प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक काग्ण बन गया। इसके पश्चात् सर्विया ने ऑस्ट्रिया को अल्टीमेटम दे दिया। अल्टीमेटम में उल्लिखित शर्तों को सर्बिया द्वारा ठुकरा
देने पर ऑस्ट्रिया ने 28 जुलाई, 1914 को युद्ध की घोषणा कर दी। 30 जुलाई, 1928 को रूस ने, 31 जुलाई, 1914 को ऑस्ट्रिया और 1 अगस्त को जर्मनी ने अपनी सेना का प्रस्थान कराया। इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध की शुरूआत हो गई।

युद्ध का घटनाक्रम

इंग्लैण्ड के विदेश मंत्री एडवर्ड ग्रे ने तत्कालीन परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए, युद्ध को रोकने के
लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन की माँग की, परन्तु जर्मनी ने इस माँग को दरकिनार कर दिया। ऑस्ट्रिया व
सर्बिया के सम्बंधों में बोसनिया-हर्जीगोविना के सम्बंधों को लेकर पहले से ही टकरार चल रही थी। ऑस्ट्रिया
के राजकुमार की हत्या के पश्चात् उसे सर्बिया से प्रतिशोध लेने का अवसर मिल गया। ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के सम्मुख दस सूत्रीय माँग पत्र प्रस्तुत कर उसे स्वीकारने का 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। सर्बिया ने माँग पत्र की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। अन्तत: ऑस्ट्रिया ने 28 जुलाई, 1914 को सबिया पर आक्रमण कर दिया। सर्बिया में स्लाव जाति के लोग निवास करते थे, उसी जाति के लोग रूस में भी थे। रूस एवं सर्बिया
में जातीय एकता होने के कारण उन्होंने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया। उधर जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का
पक्ष लिया। जर्मनी का रूस के सामने आने पर फ्रांस से स्वत: ही युद्ध करना आवश्यक हो गया, क्योंकि रूस एवं फ्रांस त्रिगुट संघ के सदस्य थे। जर्मनी ने फ्रांस पर आक्रमण करने के लिए बेल्जियम से मार्ग देने की माँग की। बेल्जियम के तटस्थ होने के कारण उसने इंकार कर दिया जिससे रुष्ट होकर जर्मनी ने बेल्जियम पर हमला बोला तो उसकी रक्षा के लिए इंग्लैण्ड को आगे आना पड़ा। त्रिगुट संघ का सदस्य होने के कारण 1915 में इटली भी इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं रूस के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया। नवम्बर, 1914 में जापान, जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में कूद पड़ा। 1917 ई. में अमेरिका ने युद्ध में भाग लिया। जर्मनी ने लीज (Licge) और नामूर ( Nanur) की लड़ाई में बेल्जियम को पराजित कर 20 अगस्त, 1914 को राजधानी ब्रुसेल्स पर अधिकार कर लिया।

जर्मनी सैनिकों ने तीन ओर से फ्रांस पर आक्रमण किया। फ्रांसीसी सरकार का केन्द्र ‘बोरदो’ (Bordeaux) में स्थापित था। वॉन क्लक (Von Kliuck) के नेतृत्व में जर्मन सेना मार्न नदी तक पहुँच गई । जनरल जाफरे के नेतृत्व में मित्र राष्ट्रों की सेना युद्ध कर रही थी। जर्मनी को फ्रांस में सफलता नहीं मिलने पर उसने ‘कैले’ से इंगलिश चैनल पार कर इंग्लैण्ड पर आक्रमण करना चाहा, परन्तु प्रास और इ३ग्लण्ड की संयुक्त सेनाओं ने उसके विजय रथ को रोक दिया। इसी प्रथम विश्व युद्ध समय अगस्त, 1914 में रूस ने पूर्वी प्रशा पर आक्रमण कर दिया। इस घटना के पश्चात् जर्मनी को रूस का तरफ बढ़ना पड़ा। उसने हिण्डेनबर्ग के नेतृत्व में रूसी सेना को पराजित किया।

सितम्बर, 1914 में रूस ने ऑस्ट्रिया पर हमला बोल दिया। ऑस्ट्रिया पराजित हो गया और ‘गेलेशिया
पर रूस का अधिकार स्थापित हो गया। जब रूसी सेनाएँ हंगरी के मैदानों की ओर बढ़ रही थी, तब ज्मन
सेनापति हिण्डेनबर्ग ने रूस के अधीनस्थ पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया इस प्रकार जर्मनी के हस्तक्षेप के
कारण रूस को ऑस्ट्रिया के खिलाफ अभियान में सफलता नहीं मिली। रूस ने सैनिक स्थिति में सुधार करके एक बार फिर 1916 में आस्ट्रिया पर धावा बोला परन्तु जर्मनी द्वारा मदद करने के कारण वह असफल हो गया। इस युद्ध में रूस को भारी नुकसान हुआ। जनता ने जार की अकर्मण्यता एवं अदूरदर्शिता को जिम्मेदार मानते हुए मार्च, 1917 में क्रांति कर दी। युद्ध मन्त्री अनवर पाशा के नेतृत्व में 3 नवम्बर, 1914 को टकी ने जर्मनी के समर्थन में युद्ध में भाग लिया। टकी की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर मित्राष्ट्र अधिकार करना चाहते थे, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। अक्टूबर, 1915 में बल्गेरिया के युद्ध में जर्मनी के पक्ष में आने के साथ ही सर्बिया का पतन निश्चित हो गया। 28 नवम्बर, 1915 को सर्बिया पराजित हो गया।

रूमानिया की पराजय ( 1916), अमेरिका का युद्ध में प्रवेश ( 1917), रूस में बॉल्शेविक क्रांति,
बल्गेरिया द्वारा आत्मसमर्पण, ट्की व आस्ट्रिया द्वारा आत्मसमर्पण (अवटूबर, 1918), इसके पश्चात् सिर्फ
जर्मनी ही युद्ध मैदान में था। जर्मनी में क्रांति हो जाने के कारण जनता ने सम्राट से त्याग-पत्र मांग लिया। 9
नवम्बर, 1918 को सम्राट ने त्याग-पत्र दे दिया। इस प्रकार 11 नवम्बर, 1918 को जर्मनी ने युद्ध विराम-संधि पर हस्ताक्षर कर दिये। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो गया।

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