पुष्यभूति वंश का इतिहास
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पुष्यभूति वंश का इतिहास

पुष्यभूति वंश का इतिहास

गुप्त साम्राज्य को समाप्ति के पश्चात् एकछत्र साम्राज्य का अन्त हुआ। देश विभिन्न छोटे-बड़े राज्यों में विभक्त हो गया| इन राज्यों के शासक आपस में संघर्षरत रहते। न किसी को देश की सुरक्षा का ध्यान था न जन-हित की चिन्ता। देश किसी सार्वभौम सत्ता के अभाव में अशक्त बन गया। छठी शताब्दी के आरम्भ में, थानेश्वर में, एक नए राजवंश का नाम उभर कर सामने आया। इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। इस वंश के आरम्भिक शासकों का पूर्ण ब्यौरा प्राप्त नहीं है। पुष्यभूति के पश्चात् नरवर्धन, राज्यवर्धन तथा आदित्यवर्धन के नाम आते हैं जो स्वतंत्र शासक न होकर किसी अन्य शासक के आधीन थे। उन्हें शासक के प्रति उत्तरदायी रहना होता था। उन्हें उस शासक का सामन्त मानना अधिक. उपयुक्त होगा।

इस वंश का प्रथम शासक प्रभाकरवर्धन था, जिसने परमभट्टारक और महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। प्रभाकरवर्धन बहुत प्रभावशाली शासक था। उसने गुर्जरों की शक्ति परीक्षा कर उन्हें अशक्त कर परास्त किया। प्रभाकर की तीन सन्तानें थीं। एक पुत्री तथा दो पुत्र। उसके बड़े बेटे का नाम राज्यवर्धन तथा छोटे का नाम हर्षवर्धन था। पुत्री का नाम राज्यश्री था, जिसका विवाह कन्नौज के मौखरी राजा गृहवर्मन से हुआ था। 605 ई० में प्रभाकरवर्धन का प्राणान्त हुआ। उसका स्थान उसके बड़े पुत्र राज्यवर्धन ने लिया और उसे सिंहासन पर बिठाया गया। राज्यवर्धन को सिंहासनारूढ़ होते ही समाचार मिला कि मालवा नरेश देवगुप्त ने मौखरी राज्य पर आक्रमण कर गृहवर्मन की हत्या कर राज्यश्री को बन्दी बना लिया। यह समाचार प्राप्त होते ही राज्यवर्धन ने अपना शासन-भार छोटे भाई हर्षवर्धन को सौंप कर, विशाल सेना ले, मालवा के लिए कूच किया। राज्यवर्धन ने मालवराज देवगुप्त को युद्ध में परास्त किया तथा उसके राज्य को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। मालव की यह स्थिति देख गौड (बंगाल) के शासक शशांक ने, राज्यवर्धन को धोखा देकर, उसकी हत्या करा दी। शशांक ने मात्र इतना ही नहीं किया, राज्यवर्धन की बहन राज्यश्री को बन्दिनी बनाना चाहा, जो भागकर विन्ध्य की पहाड़ियों में अज्ञात होनगई। उसने कन्नौज को भी अपने अधिकार में ले लिया।

हर्षवर्धन

भाई राज्यवर्धन की पर बिठाया गया। सन् 606 ई० में गद्दी पर बैठते ही हर्षवर्धन ने सर्वप्रथम अपनी बहिन की खोज के लिए प्रस्थान किया उसने ही विन्ध्याचल के पर्वत प्रदेश में जाकर राज्यश्री को खोज निकाला। जिस समय हर्ष राज्यश्री के पास पहुंचा तो वह वन में एक चिता बनाकर स्वयं को समाप्त करने की योजना बना रही थी। हर्ष के वहां पहुंचने का समाचार शशांक को प्राप्त हुआ तो वह कन्नौज छोड़कर ससैन्य वहां से भाग गया और हर्ष ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। गृहवर्धन के कोई सन्तान न होने के कारण हर्षवर्धन, मंत्रियों की सलाह से वहां का भी शासक बन गया। इस प्रकार हर्ष थानेश्वर तथा कन्नौज, दोनों राज्यों का शासक बना। हर्ष ने इस प्रकार शक्ति सम्पन्न बन, कान्यकुब्ज (कन्नौज) को अपनी राजधानी बनाया।

मृत्यु के पश्चात् 16 वर्ष की अल्पायु में, हर्षवर्धन को राजसिंहासन हर्ष का दिग्विजय अभियान थानेश्वर तथा कन्नौज का शासक बन हर्ष की शक्ति में अपार वृद्धि सम्पन्न हुई। उसने एक विशाल सेना को सुगठित किया और उसकी सहायता से भारत की राजनीतिक शक्ति को महान विजयों के योग्य बनाकर साम्राज्य-विस्तार का बीड़ा उठाया। इतिहासकार स्मिथ लिखता है, ‘भारत की राजनीतिक शक्तियों को एकछत्र के नीचे संगठित करने के उद्देश्य से उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग शक्ति सुसंगठन पर लगाया और विजय योजना बनाकर दिग्विजय का नारा बुलन्द किया।’ उस समय काठियावाड़ में मैत्रक-वंश का शासन था इस वंश की राजधानी बल्ली थी। यह राज्य उत्तर में कन्नौज और दक्षिण में चालुक्यों के मध्य स्थित था। इस राज्य का सैनिक दृष्टि से बहुत महत्त्व था। ध्रुवसेन द्वितीय का वर्लभी राज्य था। हर्ष ने धूरूवसेन पर आक्रमण कर उसे युद्ध में परास्त किया। परास्त होकर ध्रुवसेन ने हर्ष से मैत्री कर ली। हर्ष ने अपनी कन्या का ध्रुवेसन से विवाह कर दिया। ध्रुवसन उसके पश्चात् हर्ष का सामन्त बना और सामन्त के रूप में ही उसे वल्लभी का शासनभार सौंपा गया। यह हर्ष की दिग्विजय यात्रा की प्रथम सफलता थी।

इसके पश्चात् हर्ष ने चालुक्य राज्य (महाराष्ट्र) पर धावा बोला। यह वल्लभी राज्य के दक्षिण में था और इसका शासक पुलकेशिन द्वितीय बहुत प्रतापी तथा शक्ति सम्पन्न शासक था। उसने अपनी शक्ति के बल से आस-पास के शासकों को परास्त कर अपने वश में किया हुआ था। पुलकेशिन के राज्य पर हर्ष ने लगभग 620 ई० में आक्रमण किया। इस युद्ध में हर्ष को पराजय का मुख देखना पड़ा। हर्ष नर्मदा-नतट से वापस लौट आया और उसने फिर उससे आगे बढ़ने का साहस न किया। नर्मदा के किनारे को ही उसने अपने राज्य की सीमा मानकर सन्तोष किया।

पुष्यभूति वंश का इतिहास
पुष्यभूति वंश का इतिहास

हर्ष को पूर्वी क्षेत्र के विजय-अभियान में पूर्ण सफलता मिली। उसने संपूर्ण मगध को अपने राज्य का अंग बनाया। उसने सन् 641 में वहां के शासक की उपाधि पुष्यभूति वंश और हर्ष / 195 ग्रहण की। उसने कामरूप (आसाम) के शासक भास्करवर्मन से मैत्री-सम्बन्ध बनाए। हर्ष शशांक के राज्य को समाप्त न कर पाया, परन्तु उसके मित्र भास्करवर्मन ने गोड़ राज्य को समाप्त कर दिया। इस प्रकार हर्ष को अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने राज्य ‘को उत्तर में हिमाचल और दक्षिण में नर्मदा तक फैलाया। पूर्व में आसाम और पश्चिम में सौराष्ट्र तक उसके राज्य के अंग बने परन्तु इस संपूर्ण भू-भाग पर प्रत्यक्ष शासन व्यवस्था नहीं थी। उसका कुछ भाग उसके निजी शासनाधीन था और कुछ पर सामन्तों की शासन-व्यवस्था थी।

हर्ष की प्रशासन-व्यवस्था

हर्ष एक महान विजेता होने के साथ-साथ कुशलतम प्रशासक और प्रबन्धक भी था। वह विश्वृंखलित परिस्थितियों में धैर्य धारण कर स्थिति पर नियंत्रण रखने की प्रतिभा में प्रवीण था। उसने उत्तर भारत के बहुत विशाल भू-भाग में शान्ति स्थापित कर वहां की व्यवस्था नियंत्रित की। उसने अपने प्रशासन को नियमबद्ध किया। प्रशासन के सब विभागों को सुधारा, संवारा और व्यवस्थित किया।

सैन्य व्यवस्था

मात्र 16 वर्ष की आयु में जब हर्ष के बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या कर दी गई तो उसने सर्वप्रथम अपना ध्यान सैन्य-गठन पर दिया। उसने दिग्विजय का निश्चय लिया था, इसलिए भी उसे सुगठित सैन्य शक्ति की आवश्यकता थी। उसकी सेना में हाथी, घोड़े और पैदल, तीनों दल सुगठित थे। उसने अपनी सेना में रथों को
स्थान नहीं दिया। हर्ष स्वयं अपनी सेना का संचालन करता था और युद्ध में स्वयं भाग लेता था, परन्तु उसका एक मुख्य सेनापति भी था। वह महाबलाधिकृत कहा जाता था। उसकी सेना के जितने अंग थे, उनके पृथक-पृथक सेनापति होते थे हर्ष की प्रशासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी, जिसका प्रधान वह स्वयं था। वह स्वयं सेना का अध्यक्ष बनकर युद्ध में सेना के साथ रहता था। शान्ति-काल में राजा प्रजा- हित कार्यों में संलग्न रहता। राजा अपने राज्य की स्थिति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विभिन्न विभागाध्यक्षों से निरंतर सम्पर्करत रहता और उनकी कठिनाइयों को जानकर उनका निवारण करता। वह राज्य के विभिन्न भागों की यात्राएं करता और जनसम्पर्क कायम करने के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों से संपर्क बनाता। उसका अधिकांश समय धार्मिक कार्यों तथा प्रशासन की सुव्यवस्था में व्यतीत होता। हर्ष की सहायतार्थ मन्त्री-परिषद भी था। इन्हें सचिवों के नाम से पुकारा जाता था।

न्याय-व्यवस्था

मुख्य-न्यायाधीश स्वयं सम्राट होता था। न्यायपालिका थी और वह उसका प्रमुख अधिकारी। दण्ड प्रक्रिया बहुत कड़ी थी। वह सब अपराधियों को दण्डादेश देता था। कुछ अपराधों के लिए अंग-भंग करने की भी प्रथा थी। कुछ अपराधियों को नगर से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उन्हें जंगलों में रहकर जीवन व्यतीत करना होता था। सड़कें और नगर चोर-डाकुओं से सुरक्षित नहीं थे। चीनी यात्री हवेनसांग लिखता है कि उसे कई स्थानों पर आपत्ति का ग्रास बनना पड़ा। प्रशासनिक सुविधा के लिए इतने बड़े राज्य को कई इकाइयों में विभक्त करके व्यवस्था संचालन करना आवश्यक था। इसलिए हर्ष ने राज्य को प्रान्तों में विभक्त कर दिया था। ये प्रान्त मुक्ति’ तथा ‘देश’ कहकर पुकारे जाते थे। ‘मुक्ति’ तथा ‘देश’ के पृथक-पृथक प्रशासक थे। प्रान्त कई जिलों में विभक्त था। इन जिलों को ‘विषय’ कहते थे। गांव प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। गांव की समस्याओं की देखभाल एक समिति करती थी। गांव का प्रबन्ध ग्रामिक देखता था।

राजस्व-व्यवस्था

हर्ष प्रजा के राजस्व के रूप में केवल छठा भाग लेता था। आयात-कर भी बहुत कम था जो चुंगीघरों द्वारा वसूल किया जाता था। राजा हर्ष की उदारता सराहनीय थी। उसकी सब प्रशंसा करते थे। राज्य की आय का काफी बड़ा भाग विद्वानों की सहायतार्थ तथा धार्मिक कृत्यों में व्यय किया जाता था विद्वानों को पुरस्कारों की व्यवस्था थी। राज्य की ओर से याचकों को दान दिए जाते थे।

लोकहितकारी कार्य-व्यवस्था

हर्ष दयालु प्रकृति का उदार व्यक्ति था। उसे प्रत्येक कार्य करते समय अपनी जनता के हित का प्रमुख ध्यान रहता। उसने जनता सुविधार्थ यात्रा के लिए सड़कें बनवाई। सड़कों के किनारों पर फलदार वृक्ष लगवाए। यात्रियों के निवासार्थ धर्मशालाओं की व्यवस्था सम्पन्न की। धर्मशालाओं में यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए चिकित्सकों तथा औषधियों की व्यवस्था की। राज्य की ओर से शिक्षा के लिए विद्यालय खुलवाए गए, जिनमें आवास तथा निशुल्क शिक्षा-व्यवस्था का प्रबन्ध था। शिक्षा-केन्द्रों को राजकीय सहायता दी जाती थी। साहित्यकारों को भी राजकीय सहायता की व्यवस्था की। हर्ष में धार्मिक सहिष्णुता का अपार गुण था। उसके कोष से सभी धार्मिक जनों को सहायता प्राप्त होती रहती थी। शिक्षा के साथ-साथ वह कलाओं का भी अपार प्रशंसक था और कलाकारों को उनके कार्यों में सहयोग प्रदान करता था। उसके दरबार में सगुणों का सम्मान होता था।

प्रयाग की पंचवर्षीय सभा

संप्राट हर्ष प्रतिवर्ष प्रयाग में एक सभा करता था, जिसमें विभिन्न देवताओं को सम्मानित किया जाता था। एक विशाल समारोह में सूर्य, शिव, बुद्ध इत्यादि देवताओं की प्रतिमाएं सुसज्जित कर उनकी पूजा- अर्चना होती थी। इन सभाओं में सब संप्रदाय के लोग एकत्रित होकर महाराज का पुरस्कार पाते। इसी दान को लेकर ‘महादान-भूमि’ कहलाता। कहा. जाता है हर्ष इन अवसरों पर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान कर देता था। इस प्रकार की एक सभा में चीनी यात्री ह्वेनसांग भी उपस्थित हुआ था। ह्रेनसांग ने उस सभा का जैसा देखा, वर्णन प्रस्तुत किया।

ह्वेनसांग

हेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आनेवाला एक चीनी यात्री था। उसका जन्म 605 ई० में हुआ। उसने अपने भाई के ही समान बौद्धधर्म अंगीकार किया था। वह बौद्ध भिक्षु बना और दीक्षा ली। ह्वेनसांग बाल्यकाल से ही सत्य का जिज्ञासु रहा था। उसकी इच्छा हर समय सत्य की खोज करने में रहती। उसने विभिन्न स्थानों में जाकर ज्ञान अर्जित किया। जब वह जंगगन में रहता था, तभी उसने भारत आने की योजना बनाई। उसने अपने शासक से भारत आने के लिए सहायता मांगी, परन्तु वह उसे न मिली। इससे वह निराश न हुआ और सन् 629 ई० में 24 वर्ष की आयु में अपने दो मित्रों के साथ भारत-यात्रा पर चल दिया। उसके दोनों साथी पूरी यात्रा में साथ न देकर मार्ग से ही वापस लौट गए परन्तु हवेनसांग अपने निश्चय पर अटल रहा। वह मार्ग की विपत्तियों का सामना करके आगे बढ़ता गया। मार्ग में उसे कुछ व्यापारियों ने सहायता दी, फिर भी कठिनाइयां कम न थीं। वह कठिनाइयों से भयभीत न हुआ और आगे बढ़ता गया। वह अपनी यात्रा के मध्य कश्मीर पहुंचा और दो वर्ष एक विहार में रहकर अध्ययन किया। वह वहां सन् 631 ई० से 633 तक रहा। कश्मीर से प्रस्थान कर वह मथुरा, थानेश्वर इत्यादि स्थानों पर गया और फिर कन्नौज पहुंचा, जहां हर्ष ने उसका अपार स्वागत किया कन्नौज से यात्रा आरम्भ कर उसने तीर्थों की यात्रा की और प्रयाग, कौशाम्बी, अयोध्या, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर, पाटलिपुत्र तथा गया और राजगृह होकर नालन्दा गया। वहां उसने संस्कृत तथा बौद्ध ग्रन्थों का अध्ययन किया। यह अध्ययन दो वर्ष तक किया। सन् 640 ई० में वह मांजीपुरम गया। वहां से महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, सिन्धु, मुलतान तथा गजनी होकर काबुल पहुंचा। वह पामीर की पहाड़ियों को पार करके काशगर तथा खोतान गया। वहीं से वह अपने देश लौट गया। यात्रा से लौटने पर चीनी शासक ने उसे पर्याप्त आदर-सत्कार दिया। हवेनसांग ने अपना शेष जीवन भारत से ले जाए गए ग्रन्थों के अनुवाद तथा यात्रा वर्णन लिखने में व्यतीत किया। सन् 664 ई. में उसका देहान्त हुआ।

ह्वेनसांग द्वारा प्रस्तुत भारत : राजनीतिक स्थिति

हर्ष के प्रशासन की राजनीतिक स्थिति बहुत सुदृढ़ थी। प्रशासनिक व्यवस्था सराहनीय थी। शासक अपनी प्रजा की सुख-सुविधा का ध्यान रखता था। राज्य-कर बहुत कम तथा सरलतापूर्वक देय थे। जन-जीवन सरल तथा अभय था। जनता को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। यात्रा पर किसी प्रकार का बन्धन नहीं था। मजदूरों से बेगार नहीं ली जाती थी। भूमि- कर के रूप में उपज का छठा भाग देना पड़ता था। सरकारी भूमि चार भागों में विभक्त थी एक भाग से सरकारी खर्च चलता था, दूसरे से सरकारी कर्मचारियों को जागीरें दी जातीं, तीसरे से विद्या तथा कला-कौशल का उत्थान-कार्य सम्पन्न होता और चौथे से विभिन्न संप्रदायों को दान-दक्षिणा की व्यवस्था की जाती। राजकीय सड़कें चौड़ी और सुव्यवस्थित थीं। उनके किनारों पर छायादार और फलदार वृक्ष लगे थे सड़कों पर सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था थी। परन्तु फिर भी डाकुओं का भय बना रहता था। यात्रियों की हर प्रकार की सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाता था। अपराधी कठोर दण्ड पाते थे। राजद्रोहियों को अंग-भंग करने के दण्ड भी दिए जाते थे उनके हाथ-पैर काट दिए जाते थे। व्यापार से राज्य की अच्छी आय थी। हर्ष की एक विशाल सेना थी, जिसकी
उन्नति का हर सम्भव, प्रयास किया जाता।

आर्थिक स्थिति

हेनसांग लिखता है कि प्रजा सुखी तथा सम्पन्न थी। जनता का मूल व्यवसाय खेती- बाड़ी था। उनकी जीविका का मूल साधन यही था। व्यापार केवल वैश्य लोग करते थे। ये लोग जल और थल-मार्गों से व्यापारिक यात्राओं पर जाते थे। ह्वेनसांग भारतीय भवनों के आकर्षक रूप-सज्जा को देखकर चमत्कृत हो गया था। निर्धनों के भवन भी काठ अथवा ईंटों के बने थे। भवनों को भांति-भांति की चित्रकारियों से सजाया जाता था। चित्रों के बनने से वे और भी आकर्षक दिखते थे। साधारणजन खुशहाल थे, ह्वेनसांग यहां से बहुमूल्य गौतमबुद्ध की मूर्तियां अपने साथ ले गया था।

सामाजिक स्थिति

ह्वेनसांग लिखता है कि भारतीय सरल प्रकृति के थे। उनका जीवन सादा, तथा आडम्बरहीन था। उनका रहन-सहन, खान-पान सादा था। दूध, घी, भुने चने, मोटी रोटी यही सब लोग खाते थे मांस, प्याज, लहसन बहुत कम लोग खाते थे। मिट्टी तथा काठ के बर्तनों में एक बार खाना खाते थे, खाना खाने के बाद बर्तनों को फेंक देते थे जाति-बन्धन कठोर होने के कारण छुआछूत की प्रथा थी। वस्त्रों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता था। बालविवाहों का प्रचलन था। अन्तर्जातीय विवाह नहीं होते थे। पर्दे की प्रथा नहीं थी। स्त्री-शिक्षा पर ध्यान दिया जाता था। सती-प्रथा का प्रचलन था। विधवा-विवाह नहीं किए जाते थे विद्या’ तथा कला- कौशल में लोगों की विशेष रुचि थी। विद्वानों की मुख्य भाषा संस्कृत थी। संन्यासियों को समाज में विशेष आदर दिया जाता धा। विधवा-विवाहों का प्रचलन नहीं था।

सन्यासी जनता में ज्ञान का प्रचार करते थे संन्यासी निन्दा तथा प्रशंसा के प्रभावों मुक्त थे।

धार्मिक स्थिति

हनसाग लिखता है कि समाज का मूल धर्म ब्राह्मण-धर्म था। ब्राह्मणों का समाज में विशेष आदर था। वैदिक क्रियाओं में यज्ञ इत्यादि विशेष रूप से किए जाते थे। अधिकांश जन वैष्णव अथवा शैव्य थे। थानेश्वर में शैव्य धर्म की अधिक मान्यता की जा्ी थी। मूर्ति पूजा का विशेष महत्त्व था। मन्दिरों में देव मूर्तियों की स्थापना की जाती थी। हर्ष के राज्य में ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध तथा जैन धर्म के भी प्रचार को पूर्ण स्वतंत्रता थी। फिर भी यह स्पष्ट था कि जिस प्रकार ब्राह्मण धर्म फल-फूल रहा था वह स्थिति जैन तथा बौद्ध धर्मों की नहीं थी। बौद्ध धर्म के महायान तथा हीनयान, दोनों ही पन्थों का प्रचलन था। पश्चिमोत्तर भारत में बौद्ध धर्म अपने अन्तिम श्वांस गिन रहा था। पूर्वी भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार कुछ अधिक था। बौद्ध धर्मावलम्बियों की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती जा रही थी। उनके विहार तथा मठ पर्याप्त संख्या में विद्यमान थे बौद्ध लोग बुद्ध भगवान की पूजा करने लगे थे और उन्होंने उनकी मूर्तियां बना ली थीं।

सांस्कृतिक स्थिति

ह्रेनसांग ने अपनी यात्रा के विषय में जो लिखा है उसमें उस समय की सांस्कृतिक स्थिति का पूर्ण आभास मिलता है। ह्वेनसांग लिखता है अध्यापक अपने विद्यार्थियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखते थे शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी विद्यार्थियों से किसी प्रकार की सेवा नहीं ली जाती थी। अध्यापक योग्य तथा चरित्रवान थे। पटना जिले में राजगृह के निकट नालन्दा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था। ह्वेनसांग ने इस विश्वविद्यालय में दो वर्ष अध्ययन किया था यह विश्वविद्यालय इतना ख्यातिप्राप्त था कि विदेशों से विद्यार्थी यहां अध्ययनार्थ आते थे। इस विद्यालय में कई हजार भिक्षु रहते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय बौद्ध शिक्षा का केन्द्र अवश्य था परन्तु इसमें सभी धर्मों की शिक्षा की व्यवस्था थी। वहां वाद-विवाद की पूर्ण स्वतंत्रता थी। विश्वविद्यालय के नियम पर्याप्त कठोर थे। उनका पालन करना अध्यापकों तथा विद्यार्थियों का धर्म होता था वहां आचार्यों की संख्या एक हजार और विद्यार्थियों की लगभग दस हजार थी। 220 गांवों की आय से विद्यालय का खर्च चलता था। यहां की शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा था ।

हर्ष का जीवनान्त

हर्ष ने 42 वर्ष सफल शासन-व्यवस्था के पश्चात् 648 ई० में प्राण त्याग किया। हर्ष का कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसके मन्त्री अर्जुन ने राज्य पर अपना अधिकार जमा लिया। हर्ष के साम्राज्य पर कई शासकों ने अधिकार किया। इस प्रकार पुष्यमित्र वंश का अन्त होने पर हर्ष का साम्राज्य बिखर कर खण्ड-खण्ड हो गया। सम्राट हर्ष की गणना भारत के महान सम्राटों में की जाती है। इसके विशेष कारण ये हैं कि वह महान विजेता तथा साम्राज्य-निर्माता था। हर्ष ने सैंतीस वर्ष निरंतर तथा शेष समय सविराम युद्ध पर युद्ध किए। उसने विजय पर विजय हासिल करके साम्राज्य सुगठित किया। उसे अपनी पारिवारिक थाती के रूप में मात्र थानेश्वर का छोटा सा राज्य प्राप्त हुआ था। उसने उस छोटे से राज्य को अपने दिग्वजय अभियान द्वारा साम्राज्य में परिवर्तित किया। उसने सम्पूर्ण उत्तर भारत में अपना एकछत्र राज्य स्थापित किया। वह अपनी दक्षिण-भारत विजययात्रा में सफल नहीं हुआ। दक्षिण में उसे पुलकेशिन द्वितीय ने परास्त कर दिया उसकी उत्तर भारत की विजय ही इतनी महान थी कि उन्होंने उसे महान बना दिया। गुप्त साम्राज्य के समाप्त होने पर भारत की राजनीतिक एकता, जो समाप्त हो गई थी, उसे हर्ष ने पुनः स्थापित किया। उसने जिस साम्राज्य की स्थापना की उसे अपने जीवन के अन्तकाल तक सुरक्षित रखा। उसमें विजेता तथा निर्माता, दोनों गुण वर्तमान थे।

हर्ष महान विजेता तथा निर्माता होने के साथ साथ-साथ सुशासक भी था। उंसने अपने साम्राज्य का मात्र निर्माण ही नहीं किया, उसे सुव्यवस्था भी प्रदान की। हर्ष बहुत उदार, दयालु तथा प्रजापालक शासक था। उसके राज्य में कर बहुत कम और सरलता से देय थे। प्रजा को करों का भुगतान करने में कोई असुविधा न होती थी। उसके राज्य की अर्थ-व्यवस्था सुदृढ़ थी। देश में शान्ति-व्यवस्था कायम रखने के लिए उसने दण्ड विधान कठोर रखा था । कठोर दण्ड विधान के कारण प्रजा सुख-शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करती थी । हर्ष प्रजा के सुख-दुख का विशेष ध्यान रखता था। वह अपने राज्य में घूम-घूम कर प्रजा की कठिनाइयों का ज्ञान प्राप्त करता और उनके निवारण की व्यवस्था सम्पन्न कराता। वह अपने साम्राज्य के सुशासन की जिम्मेदारी स्वयं वहन करता था । वह हर चीज को स्वयं अपनी आंखों से देखता था, कर्मचारियों पर विश्वास करके वह स्वयं कभी अंधकार में नहीं रहता था। हर्ष ने अनेक लोकमंगलकारी कार्य सम्पन्न किए, जिनका प्रभाव प्रजा की सम्पन्नता से जुड़ा। उसमें महान हर्ष साहित्य तथा विद्याओं का अनुरागी था डॉ० रमाशंकर त्रिपाठी लिखते हैं, ‘हर्ष विद्वानों का आश्रयदाता था। वह स्वयं भी लेखनी का प्रयोग उसी कला-कौशल से करता था, जिस कौशल से तलवार चलाता था। वह कलम और तलवार दोनों का धनी था। वह उच्चकोटि क्ा कलाविद था । उसने ‘रत्नावली’, ‘नागानन्द’ और ‘प्रियदिर्शका’ नामक ग्रंथों की रचना की। वह विद्वानों तथा लेखकों को अपने दरबार में सम्मानित करता तथा आदर देता था। वाणभट्ट उसके दरबार का सबसे ख्याति प्राप्त लेखक था, जिसने ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ ग्रंथों की रचना की। हर्ष की शिक्षा के प्रचार में विशेष रुचि थी। उसने अनेक शिक्षा-संस्थाओं की स्थापना कराई और उनके लिए उदारता से धन की व्यवस्था की। उसने नालन्दा विश्वविद्यालय की आय के लिए 220 गांवों की आय आरवंटित की उसने अपनी प्रजा के बौद्धिक विकासार्थ अपार धन की व्यवस्था कराई। उसने सरस्वती की सेवा करना अपना परम धर्म माना। वह महान शिक्षाविद् था। हर्ष ईश्वर में विश्वास रखने वाला धर्मपरायण शासक था। वह हृदय में कोभल भाव रखने वाला दयालु व्यक्ति था अपने जीवन के आरम्भ में वह ब्राह्मण-धर्म का अनुयायी था। उस समय बह शिव, सूर्य आदि की उंपासना किया करता था।

उसके पश्चात् वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। इसका यह अर्थ नहीं कि उसके विचार संकीर्ण बन गए.थे। वह उच्वकोटि का धार्मिक सहिष्णुता-अनुरागी था। वह सभी धर्मों के प्रति श्रद्धाभाव रखता था और सभी का समान आदर करता था। वह सभी धर्मों के संन्यासियों को दान- दक्षिणा देता था। जो सभा वह बुलाता था, उसमें सभी धर्मों के श्रेष्ठजन भाग लेते थे। हर्ष आध्यात्मिक दृष्टि से भी महान था। उसमें किसी भी प्रकार की संकीर्णता नहीं थी। वह अपने समय का महान व्यक्ति था। हर्ष ने राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान में महान योगदान दिया। हर्ष के शासनकाल में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार अन्य देशों में भी तथा मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति को प्रचारित किया गया। दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीपों में भी उसका प्रचार-प्रसार कम नहीं हुआ। इस दृष्टि से हर्ष के शासनकाल में उल्लेखनीय कार्य सम्पन्न हुए हर्ष का यह प्रयास गौरवपूर्ण था। हर्ष का यह कार्य उसे अन्य सम्राटों की अपेक्षा अधिक उच्च स्थान प्रदान करता है। हर्ष ने भारतीय संस्कृति को समुन्नत किया। हर्ष प्राचीन भारत के श्रेष्ठतम सम्राटों में से एक था। उसके अन्दर समुद्रगुप्त की वीरता के साथ-साथ अशोक की महानता तथा सांस्कृतिक उत्थान की भावना थी। उसने सैनिक सफलताओं के साथ सांस्कृतिक गरिमा के उत्थान की दिशा में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। इसीलिए वह बहुत बड़ा शासक होने पर भी महान था, उसके आदर्श महान थे।

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