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नेपोलियन बोनापार्ट का प्रारंभिक जीवन और उसका उत्कर्ष

नेपोलियन बोनापार्ट का प्रारंभिक जीवन और उसका उत्कर्ष

नेपोलियन बोनापार्ट (1769-1821) का नाम विश्व इतिहास के उन महत्त्वपूर्ण एवं चमत्कारी व्यक्तियों
में शामिल किया जाता है जिन्होंने शक्ति के अत्यधिक केन्द्रीकरण के माध्यम से इतिहास के एक युग को
अपने विचारों के अनुकूल दिशा प्रदान की। नेपोलियन का योगदान कितना सार्थक था, या कितना घातक था, इस बारे में विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन नेपोलियन के व्यक्तित्व के कुछ ऐसे बिन्दु हैं और उसके कृतित्व के कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनको दृष्टिगत रखते हुए उसकी अद्भुत साहसिक एवं सृजनात्मक प्रतिभा का लोहा प्राय: सभी स्वीकार करते हैं।

नेपोलियन को ‘क्रान्ति-पुत्र’ कहा जाता है, क्योंकि वह प्रांस के क्रान्तिकारी दशक (1789 से 1799)
के तृतीय एवं अन्तिम चरण (डाइरेक्टरी का शासन काल अर्थात् 1795-1799) में व्याप्त शासकीय दुर्बलता तथा सैनिकवाद के उत्कर्ष की पैदाइश था। लेकिन उसने क्या क्रान्ति की भावना को जीवित रखा, या उसका पूरौ तरह दमन कर दिया ? इस प्रश्न का एक उत्तर सम्भव नहीं है, कयोंकि नेपोलियन की क्रियाशीलता के अलग-अलग स्तरों पर क्रान्ति प्रति उसका रुख अलग-अलग दिखाई देता है। यह सत्य है कि नेपोलियन ने क्रान्ति के एक मूलभूत आदर्श ‘स्वतन्त्रता’ का अपहरण कर लिया। राजनीतिक निरंकुशता का स्थान अब नेपोलियन के सैनिक अधिनायकवाद ने ले लिया था, और इस मामले में वह फ्रांस के भूतपूर्व लुई सीरिज के शासकों से दो कदम आगे ही था। दूसरी ओर, क्रान्ति के एक दूसरे मूलभूत आदर्श ‘समानता’ के व्यावहारिक सामाजिक रूपान्तरण के प्रति नेपोलियन ने अत्यधिक उत्साह एवं रुचि का प्रदर्शन किया, इस अर्थ में कहा जा सकता है कि उसने क्रान्ति की भावना को आगे बढ़ाया और उसे सुदृढ़ करने का प्रयास किया और क्रान्ति का तीसरा आदर्श’ भ्रातृत्व’ या ‘बन्धुत्व’ जो फ्रांसीसी राष्ट्रवाद के रूप में व्यक्त हुआ था, नेपोलियन के संरक्षण में अपने चरम पर पहुँच गया।

नेपोलियन बोनापार्ट के जीवन का अध्ययन कालक्रमानुसार चार भागों में किया जा सकता हैनेपोलियन 1. बोनापार्ट का प्रारम्भिक जीवन एवं डाइरेक्टरी के शासन (1795-1799) के अधीन
उसका उत्कर्ष।

2. नेपोलियन द्वारा सत्ता का अधिग्रहण (1799) एवं प्रथम कॉन्सल के रूप में उसकी गतिविधियाँ
(1799-1804)

3. नेपोलियन सम्राट के रूप में (1804-1875) साम्राज्य का उत्कर्ष एवं चरम (1804 1808)।
4 नेपोलियन का साम्राज्य : पतन एवं पटाक्षेप (1808-1815)

नेपोलियन बोनापार्ट का प्रारम्भिक जीवन एवं डाइरेक्टरी के शासन (1795-1799) के अधीन उसका उत्कर्ष

नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म 15 अगस्त, 1769 में कोर्सिका (Corsica) द्वीप के अजासियो (Ajaccio) नामक स्थान पर हुआ था। नेपोलियन के जन्म से एक वर्ष पूर्व ही, 1768 में, इस द्वीप (कोर्सिका) को फ्रांस
ने इटली में स्थित जिनोआ (Genoa) के रिपब्लिक से खरीदा था । उल्लेखनीय है कि रूसो ने 1762 में एक पूर्वानुमान के आधार पर यह विचार व्यक्त किया था कि ‘मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि कोर्सिका का यह छोटा- सा द्वीप एक दिन यूरोप को चमत्कृत कर देगा।’ रूसो की यह भविष्यवाणी सत्य निकली।

नेपोलियन का परिवार मूलत: इटली का था । उसके पूर्वज लगभग 250 वर्ष पूर्व इटली से आकर
कोर्सिका में बस गये थे नेपोलियन सिर्फ इसी अर्थ में फ्रांसीसी था कि कोर्सिका पर उसके जन्म से एक वर्ष
नेपोलियन बोनापाट पूर्व फ्रांस ने अधिकार कर लिया था। कोर्सिका के निवासियों ने अपनी भूमि पर फ्रांस के अधिकार को स्वीका नहीं किया था, और वे स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत थे । नेपोलियन ने स्वयं कहा है कि, ‘मैं उस समय पैदा हुआ जब मेरा देश (कोर्सिका) मृत्यु की ओर अग्रसर था । तीस हजार फ्रांसीसी निवासी हमारे तटो पर उतरे, और उन्होंने रक्त के समुद्र में स्वतन्त्रता के सिंहासन को डुबो दियायह एक ऐसा घृणास्पद दृश्य था जिससे मेरे शिशु नेत्रों को पीड़ा पहुँची।

नेपोलियन के पिता, चाल्ल्स बोनापार्ट, पेशे से वकील थे तथा कुलीन वर्ग से सम्बद्ध थे। लेकिन अब वे नाममात्र के ही कुलीन रह गये थे, उनके पास कोई जमीन-जायदाद नहीं थी और वे निर्धनता का ही जीवन जी रहे थे। नेपोलियन की माता लेतितिया रमोलिनी अत्यन्त सुन्दर एवं दृढ़ संकल्पयुक्त महिला थी। बड़ी हास्यास्पद गलतियों के साथ ही वह फ्रेंच भाषा बोल पाती थी चाल्ल्स बोनापार्ट एवं लेतितिया रमोलिनी के आठ सन्तातें थीं, पाँच लड़के एवं तीन लड़कियाँ । नेपोलियन उनका दूसरा पूत्र था । नेपोलियन की प्रारम्भिक शिक्षा प्रांस में ब्रीन तथा पेरिस के सैनिक विद्यालयों में सरकार से मिलने वाली छात्रवृत्ति के आधार पर हुई। नेपोलियन की मातृभाषा इटैलियन थी, उसने फ्रेंच भाषा यही आकर सीखी। वह फ्रेंच भाषा को विदेशी भाषा के रूप में बोलता था, इसलिये अन्य विद्यार्थी उसकी हँसी उड़ाया करते थे।
ब्रीन के सैनिक विद्यालय में नेपोलियन बड़ा उपेक्षित महसूस करता था। अन्य विद्यार्थी जो उच्च कुलीन परिवार से थे तथा समृद्ध थे, नेपोलियन की गरीबी का मजाक किया करते थे और उसे अनेक प्रकार से तंग करते थे। नेपोलियन ने गणित विषय में अपनी योग्यता प्रदर्शित की। इतिहास एवं भूगोल भी उसके रुचिकर विषय थे। सोलह वर्ष की अवस्था में नेपोलियन की सैनिक शिक्षा समाप्त हो गई और उसे सेना के तोपखाना विभाग में सेकिण्ड लेफ्टनेंट के पद पर नियुक्त किया गया । एक युवा सेकिण्ड लेफि्टिनेंट के रूप में नेपोलियन को बहुत कम वेतन मिलता था । उसने बड़ी तंगहाली में अपना यह समय गुजारा। इसी दौरान, उसकी इतिहास के अध्ययन में विशेष रुचि जाग्रत हुई।

इतिहास को वह ‘सत्य की मशाल तथा पूर्वाग्रह का विनाशक’ मानता था । वह कोर्सिका का इतिहास लिखना चाहता था। वह वस्तुत: फ्रांस से घृणा करता था तथा फ्रांस की परतन्त्रता से को्सिका को मुक्त कराना चाहता था। इस काल में वह लम्बी अस्वीकृत छुट्टियों पर कोसिका में रहा, इस कारण उसे सेना की नौकरी से हाथ धोना पड़ा। फ्रांस में क्रान्ति आरम्भ होने के बाद नेपोलियन को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ। वह 1792 में पुन: पेरिस आ गया। वह जैकोबिन दल के साथ जुड़ गया। फ्रांस की क्रान्तिकारी सेना को।प्रशिक्षित सैनिक अफसरों की आवश्यकता थी, अत: नेपोलियन को शीघ्र ही अपनी योग्यता के प्रदर्शन का अवसर मिल गया। 1793 में उसे फ्रांसीसी सेना के तोपखाने में लेफि्टिनेन्ट कर्नल के पद पर नियुक्त कर, तुलों (Toulon) नामक नगर पर कब्जा करने के लिए भेजा गया। तूलों पर एक ब्रिटिश जहाजी बेड़े के कप्तान एडमिरल हुड ने अधिकार कर लिया था; वह फ्रांस की तत्कालीन सरकार ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के लिये एक बडी चुनौती थी। नेपोलियन ने तोपखाने के आक्रमण की नई पद्धतियों को अपनाकर अपनी सैनिक प्रतिष्ठा की नींव डाली। नेपोलियन की कुशलता से फ्रांस की सेना ने ‘तूलों’ पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया । नेपोलियन को इस सफलता के उपलक्ष में 24 वर्ष की अवस्था में ही, ब्रिगेडियर जनरल के पद पर स्थापित कर दिया
गया। इसके बाद, 5 अक्टूबर, 1795 को पेरिस में राजतंत्रवादियों के एक समूह ने जब ‘राष्ट्रीय सम्मेलन के
विरुद्ध विद्रोह कर दिया (वेन्देमिएरे के विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध ) तब इस विद्रोह का अपने तोपखाने के
कुशल संचालन के माध्यम से, दमन करने में नेपोलियन बोनापार्ट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस अवसर
पर नेपोलियन ने फ्रांस के गणतन्त्र की रक्षा की।

डाइरेक्टरी के शासन काल के दौरान नेपोलियन को विशेष प्रगति का अवसर मिला। डाइरेक्टर बारा
(Barras) नेपोलियन की सैनिक योग्यता से विशेष प्रभावित था । बोनापार्ट को 1796 में इटली के सैनिक
अभियान का कमान्डर नियुक्त किया गया यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दायित्व था और इस दायित्व के कुशल निर्वहन से नेपोलियन ने अपनी सैनिक कीर्ति की धाक जमा दी। इस अभियान पर जाने से दो दिन पूर्व हो नेपोलियन ने एक सुन्दर विधवा स्त्री, जोसेफिन ब्यूहानेंस, जो उससे छ: वर्ष बड़ी थी और दो बच्चों की माँ थी से विवाह कर लिया।

इटली का सैनिक अभियान (1796-1797)

यह अभियान अप्रैल, 1797 तक चला। इस अभियान की समीक्षा इन शब्दों में की जाती है-‘वह आया, उसने देखा और उसने जीत लिया (He came, he saw he conquered)। हेजन के शब्दों में, ‘बोनापार्ट का प्रथम इटली अभियान सैनिक दृष्टि से एक अतिश्रेष्ठ अभियान था-युद्ध की कला का एक आदर्श प्रतिमान। इस सैनिक अभियान के अन्तर्गत, नेपोलियन ने 35,000 उत्साही फ्रांसीसी सैनिकों के साथ आल्प्स पर्वतमाला की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्हें आस्ट्रिया एवं साडीनिया की सम्मिलित सेनाओं का सामना करना पड़ा; इस सेना में लगभग 70,000 व्यक्ति थे नेपोलियन की सेना शत्रुओं की तुलना में न केवल आधी थी, बल्कि पूरी तरह सुसज्जित भी नहीं थी लेकिन नेपोलियन का सैनिक चातुर्य और कौशल विपक्षी सेनाओं पर भारी पड़ गया। नेपोलियन ने आस्ट्रिया और साडीनिया की सैनिक टुकड़ियों को संगठित होने का अवसर नहीं दिया और उनसे अलग-अलग मोर्चों पर लड़ने की नीति बनाई। उसने पहले आस्ट्रिया की सैनिक टुकडी को हराकर उसे पूरब की ओर भगा दिया, उसके बाद वह पश्चिम की ओर मुड़ा और साडीनिया को परास्त करके सार्डिनिया की राजधानी ट्यूरिन की ओर बढ़ा।

सारडीनिया ने घबराकर नेपोलियन के साथ संधि कर ली और तदूनुसार फ्रांस को सेवाय एवं नाइस के प्रान्त दे दिये गये। इसके बाद नेपोलियन ने अपना ध्यान आस्ट्रिया की सेना पर केन्द्रित किया पो (Po) नदी को पार कर नेपोलियन की सेनायें आगे पहुँचीं, लेकिन आस्ट्रिया की सेनायें एड्डा (Adda) नदी के पीछे चली गई। इस नदी को लोदी ब्रिज से ही पार किया जा सकता था, और ब्रिज के दूसरी ओर आस्ट्रिया की सेना ने अपनी तोपों का जाल बिछा रखा था लेकिन बोनापार्ट ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी सेना को ब्रिज पार करने का आदेश दिया और स्वयं भी अपनी जान की परवाह न करते हुये आगे चलने लगा आस्ट्रिया की तोपों की अग्निवर्षा की परवाह न करते हुये नेपोलियन की सेनाओं ने आगे बढ़कर आस्ट्रिया की तोपों पर कब्जा कर लिया। स्वयं बोनापार्ट के शब्दों में, ‘मेरे नेतृत्व में सैनिकों द्वारा की गई तमाम गतिविधियों में, लोदी पुल के खतरनाक रास्ते की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती।’ मौत के मुँह में जाकर, जिस जबदस्त निर्भीकता के साथ नेपोलियन ने विजयश्री हासिल की थी, उसने उसे अपने सैनिकों के मध्य एक आदर्श व्यक्ति बना दिया; वे नेपोलियन को प्यार से अब ‘दि लिटिल कॉरपोरल’ (छोटा-सा नायक) कहने लगे। आस्ट्रिया की सेनायें पीछे हटकर मान्टुआ (Mantua) के दुर्ग में छिप गयीं| 16 मई 1796 को
नेपोलियन ने मिलान (Milan) शहर पर अधिकार कर लिया। लेकिन विएना तक पहुँचने के लिए मान्टुआ पर अधिकार करना जरूरी था दूसरी ओर, आस्ट्रिया की सेनायें यह भली-भाँति जानती थीं कि यदि मान्टुआ
उनके हाथ से निकल गया तो इटली पर उनका अधिकार समाप्त हो जायेगा।

नेपोलियन की सेनाओं ने माण्टुआ के दुर्ग को घेर लिया। आगामी आठ महीनों में, जून 1796 से जनवरी, 1797 के मध्य, आस्ट्रिया ने माण्टुआ के दुर्ग को बचाने के लिये, चार बार अपनी सैनिक टुकड़ियाँ भेजीं, लेकिन हर बार नेपोलियन की सैनिक कुशलता के कारण उन्हें परास्त होना पड़ा। नेपोलियन की सेनायें द्रुतगति से आक्रमण कर, आस्ट्रिया की सैनिक टुकड़ियों को विभाजित अवस्था में परास्त कर देती थीं।

नेपोलियन के सैनिक कहा करते थे, कि ‘ये हमारी टांगे हैं जो हमें युद्ध में विजय दिलाती हैं ‘ जनवरी, 1797
के मध्य में रिवोली के युद्ध में बोनापार्ट की सेनाओं ने आस्ट्रिया को करारी मात दी, इसके दो सप्ताह बाद
माण्टुआ के दुर्ग पर नेपोलियन का अधिकार हो गया आल्प्स पर्वतमाला से आगे बढ़ते हुए जब नेपोलियन
लियोबेन (Leoben) पहुँचा, जो कि वियाना से 100 मील दूर था, आस्ट्रिया ने समझौते के लिए समर्पण कर
दिया। नेपोलियन का सितारा अब बुलन्दी पर था उत्तरी इटली में अपने बारह महीने के प्रवास के दौरान फ्रांसीसियों ने अठारह बड़े और पैंसठ छोटे युद्ध लड़े थे। इन युद्धों में विजय के फलस्वरूप लगभग 3 करोड़
फ्रैंक की धनराशि का लाभ पेरिस की सरकार को हुआ। इसके अलावा, प्राचीन एवं आधुनिक इटली की
लगभग 300 महत्त्वपूर्ण कलाकृतियाँ भी पेरिस के संग्रहालयों में भिजवा दी गई ।

इटली के सैनिक अभियान के दौरान नेपोलियन ने इस प्रकार कार्य किया था जैसे कि वह ही राज्य का
प्रमुख हो। उसने डाइरेक्टरी की सलाह के बिना ही अपने तरीके से अनेक कार्य किये। उसने इटली के छोटे-
छोटे स्वतन्त्र राज्यों में से कुछ को अपनी इच्छा से नई इकाइयों में गठित कर दिया। उसने जेनोओ के
रिपब्लिक को फ्रांस के गणतन्त्रात्मक संविधान का प्रारूप देकर ‘लिग्यूरिन रिपब्लिक’ (Ligurin Republic) बना दिया। नेपोलियन ने पोप से भी उसके कुछ राज्य ले लिये। नेपोलियन ने वेनिस के रिपब्लिक पर भी अधिकार कर लिया जो यूरोप के प्राचीनतम एवं गौरवशाली राज्यों में से एक था। नेपोलियन ने पोप तथा वेनिस के राज्यों से प्राप्त भूमि को मिलान (Milan) नगर से जोड़कर एक नये ‘सिसलपाइन गणतन्त्र’ (Cisalpine Republic) की स्थापना की। आस्ट्रिया में नेपोलियन राजा महाराजाओं की भाँति अपना दरबार भी लगाने लगा ।

17 अक्टूबर, 1797 को आस्ट्रिया ने फ्रांस के साथ कैम्पो फोर्मियो की सन्धि’ (Treaty of Campo
Formio) पर हस्ताक्षर कर दिये। तद्नुसार लोम्बाडीं एवं बेल्जियम का क्षेत्र आस्ट्रिया ने पफ्रांस को दे दिया।।फ्रांस ने इसको एवज में उसे वेनेशिया का क्षेत्र दिया। राइन नदी के बायें किनारे के क्षेत्र पर फ्रांस का अधिकार लगा था। माना गया।

इटलीवासियों के लिए नेपोलियन एक महान् व्यक्ति के रूप में अवतरित हुआ जिसने उन्हें आस्ट्रया के
निरंकुशतावाद एवं प्राचीन सामन्तवाद से मुक्ति दिलाई। दूसरी ओर युद्ध में विजयों से प्राप्त काफी धनराशि
नेपोलियन ने फ्रांस भेजकर वहाँ अपनी स्थिति मजबूत बना ली। पराजित शत्रुओं से मिले अधिकांश उपहार
उसने अपने सैनिकों में बाँट दिये, और इस प्रकार उन पर अपना जादुई प्रभाव बनाये रखा।

28 वर्ष की उम्र में ही बोनापार्ट फ्रांस का राष्ट्रीय नायक बन गया । अपनी लोकप्रियता के बलबूते पर
वह आसानी से डाइरेक्टरी का सदस्य बन सकता था, लेकिन डाइरेक्टरी का सदस्य बनने के लिए 40 वर्ष की उम्र आवश्यक थी। बहरहाल, नेपोलियन अभी सत्ता के औपचारिक केन्द्र में आने के लिए समय को पूर्ण
परिपक्व नहीं मानता था और अपनी सैनिक कोर्ति को और उच्चतर शिखर पर ले जाने का आकांक्षी था। क्रैम्पो।फोर्मियो की सन्धि के बाद फ्रांस के समक्ष अब यूरोप की एक ही बड़ी शक्ति बची थी, वह थी-इंग्लैण्ड।।लेकिन इंग्लैण्ड अपनी नौसैनिक शक्ति, उपनिवेशों की संख्या तथा व्यापारिक समृद्धि के कारण एक दुर्जेय शक्ति बना हुआ था। डाइरेक्टरी ने नेपोलियन को इंग्लैण्ड के विरुद्ध सैनिक अभियान का कमान्डर नियुक्त।किया।

नेपोलियन का मानना था कि इंग्लैण्ड पर प्रत्यक्ष आक्रमण कर उसे जीत पाना बहुत टेढ़ी खीर होगी।
आवश्यकता थी इंग्लैण्ड को पहले निर्बल बनाने की। नेपोलियन का विश्वास था कि इंग्लैण्ड की शक्ति और
समृद्धि का मुख्य र्रोत उसे भारत के उपनिवेश से मिलने वाला धन था । यदि भारत पर अधिकार करके अंग्रेजों को वहाँ से भगा दिया जाये तो इंग्लैण्ड की शक्ति जायेगी, और उसे परास्त करना आसान हो जायेगा इस।दृष्टि से नेपोलियन ने यह योजना बनाई कि पहले मिस्र पर आक्रमण कर उसे जीता जाये, और उसके बाद।मिस्त्र की आधारभूमि से भारत पर आक्रमण किया जाये। नेपोलियन इस दृष्टि से सिकन्दर महान् के पदचिन्हों।का अनुकरण कर रहा था। नेपोलियन ने अपनी इस कल्पना के बारे में कहा था कि, ‘मैं स्वयं को एशिया के मार्ग की ओर देख रहा हूँ, हाथी पर बैठा हुआ और सिर पर पगड़ी बाँधे हुए।’ डाइरेक्टरी के सदस्य पेरिस में नेपोलियन की बढ़ती हुई लोकप्रियता से परेशान थे; उन्होंने बड़ी सहजता से नेपोलियन के मिस्र पर आक्रमण करने की योजना को स्वीकृति दे दो।

मिस्त्र का सैनिक अभियान (1798-1799)

19 मई, 1798 को नेपोलियन 38,000 लोगों की सेना एवं 400 वाहनों के बेड़े के साथ, तूलों नगर से मिस्र के लिए रवाना हुआ। उसके साथ 100 विशेषज्ञ विद्वानों का एक दल भी था जो मिस्र एवं आसपास के क्षेत्रों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उसके साथ गया था भूमध्यसागर में ब्रिटिश नौसेना से बचते हुए, नेपोलियन आगे बढ़ा। उसने माल्टा पर अधिकार कर लिया। आगे बढ़ते हुये वह जून के अन्त में मिस्र्र पहुँचा। मिस्र उस समय तुर्की के सुलतान के अधीन था, लेकिन मिस्र के वास्तविक शासक मामेलुक थे, जो वहाँ की सामन्ती सैनिक जाति थी।

नेपोलियन ने 2 जुलाई को अलेक्जेण्ड्रिया पर अधिकार कर लिया। उसके बाद उसके काहिरा की ओर प्रस्थान किया। जलती हुई रेत के मध्य की गई यह यात्रा बड़ी कष्टकारक थी। तीन सप्ताह की यात्रा के बाद, काहिरा के बाहर स्थित पिरामिड़ दृष्टिगोचर हुये।’पिरामिडों के युद्ध’ (21 जुलाई, 1798 ) में नेपोलियन की सेनाओं ने मामेलुकों को करारी मात दी। इस युद्ध के फलस्वरूप नेपोलियन ने काहिरा पर अधिकार कर लिया। अब वह।मिस्र का मालिक था। लेकिन नेपोलियन की यह सफलता बहुत क्षणिक सिद्ध हुई। 1 अगस्त, 1798 को एडमिरल नेलसन के नेतृत्व में ब्रिटिश जहाजी बेड़े ने अलेक्जेण्ड्रिया के पूर्व में अवस्थित, अबूकिर खाड़ी में डेरा जमाये नेपोलियन के जहाजी बेड़े पर जात्र 1णि कर, उसे परास्त कर दिया। यह युद्ध ‘नील नदी के।के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में पराजय के फलस्वरूप नेपोलियन को अपने जहाजी बेड़े से हाथ धोना पड़ा और अब वह सैनिक टुकड़ी के साथ मिस्त्र में अकेला रह गया । लेकिन नेपोलियन ने हिम्मत नहीं हारी।


उसने अपना आक्रामक तेवर बनाये रखा। जनवरी, 1799 में उसने सीरिया पर आक्रमण कर दिया। वह नवीन विजयों से अपने सैनिकों का उत्साह बनाये रखना चाहता था, तथा भारत या कुस्तुन्तुनिया की तरफ प्रयाण जारी रखने का स्वप्न सँजोये हुये था। लेकिन वह अपनी उम्मीदों में सफल नहीं हो पाया। मिस्त्र से सीरिया तक।का रेगिस्तानी रास्ता अनेक मुश्किलों से भरा हुआ था। नेपोलियन की सेनाओं ने गाजा (Gaza) एवं जृफा।(Jaffa) के किलों पर कब्जा कर लिया, लेकिन वे एकरे (Acre) के किले पर कब्जा नहीं कर पाये। दो महीने।तक इस किले के लिए संघर्ष चलता रहा, लेकिन नेपोलियन को सफलता नहीं मिली। अन्त में परेशान होकर वह अपने सैनिकों के साथ काहिरा वापिस आ गया, लेकिन इस बीच वह अपने 5,000 सैनिकों को खो चुका था। कुछ सप्ताह के बाद उसने ‘अबूकिर के युद्ध’ (25 जुलाई, 1799) में तुर्की की सेनाओं के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण विजय प्राप्त की। बोनापार्ट को लेकिन अब यह अहसास हो चुका था कि पूर्वी साम्राज्य (Oriental Empire) के उसके स्वप्न को साकार कर पाना सम्भव नहीं है, न ही मिस्र में दीर्घकालीन अधिकार रख पाना।

अत: बोनापार्ट ने मिस्र के सैनिक अभियान को किसी विश्वस्त अधिकारी के हाथ में छोड़कर स्वयं फ्रांस लौट
जाने का निश्चय किया। फ्रांस में हो रही घटनाओं के समाचार सुनकर उसका निश्चय दृढ़ हो गया, और वह
21 अगस्त, 1799 की रात्रि को चुपचाप अपने चुनिंदा साथियों के साथ फ्रांस के लिये रवाना हो गया। मिस्र में फ्रांस के सैनिक अभियान की जिम्मेदारी उसने क्लाबार को सौंप दी थी बाद में क्लाबार की मिस्र में हत्या कर दी गई और अगस्त, 1801 में फ्रांस की सेना को परास्त होकर मिस्र से भागना पड़ा। इस प्रकार मिस्र में फ्रांस।के सैनिक अभियान की समाप्ति हुई।

उधर नेपोलियन ब्रिटिश नौसेना की निगाहों से बड़ी मुश्किल से बचते हुए अक्टूबर, 1799 में फ्रांस
पहुँचा, लगभग 47 दिनों की यात्रा के बाद । इस समय तक फ्रांस का परिदृश्य बदल चुका था। यूरोप की बड़ी शक्तियों ने फ्रांस के विरुद्ध एक द्वितीय संयुक्त मोर्च (Sccond Coalition) का गठन कर लिया था, और 1799 के मध्य तक इस मोर्चे ने फ्रांस को अनेक अवसरों पर नीचा दिखाया था । इटली में नेपोलियन द्वारा प्राप्त सफलताओं पर पानी फिर चुका था। डाइरेक्टरी के सदस्य, अक्षमता एवं भ्रष्टाचार के कारण, जनता का विश्वास खो चुके थे। नेपोलियन के लिये यह एक उपयुक्त अवसर था सत्ता के अधिग्रहण का । फ्रांस की जनता।भी चाहती थी कि नेपोलियन जैसा कोई सशक्त व्यक्ति सत्ता के केन्द्र में हो।

डाइरेक्टरी का अन्त तथा नेपोलियन द्वारा सत्ता का अधिग्रहण

नेपोलियन की षड्यन्त्रकारी योजना के तहत् 18 एवं 19 ‘ब्रुमेयर’ (9 व 10 नवम्बर, 1799) को फ्रांस में एक राज्य-विष्लव (Coup d’।etat) घटित हुआ जिसने डाइरेक्टरी का अन्त कर, नेपोलियन को फ्रांस की सत्ता के केन्द्र में स्थापित कर दिया।

डाइरेक्टरी के स्थान पर अब फ्रांस में ‘कांसुलेट’ की स्थापना की गई जिसके तीन ‘कॉन्सल’ सदस्य
होंगे- नेपोलियन बोनापार्ट, साई (Sieyes) एवं टुका (Ducos)। नेपोलियन को प्रथम ‘कॉन्सल’ नियुक्त किया।गया। नेपोलियन प्रथम कॉन्सल के रूप में (1799 1804) फ्रांस की कार्यकारी सत्ता अब पाँच सदस्यीय ‘संचालक-मण्डल’ (डाइरेक्टरी) के स्थान पर तीन- सदस्यीय ‘कान्सुलेट’ (Consulate) के पास आ गयी। इस ‘कान्सुलेट’ का केन्द्र-बिन्दु इसका प्रथम कॉन्सल,।नेपोलियन था। नयी व्यवस्था के लिए, एक माह के अन्तर्गत ही, नेपोलियन के निर्देशन में, फ्रांस के नये संविधान का निर्माण कर लिया गया| इस संविधान को नाम दिया गया-‘गणतन्त्र के आठवें वर्ष का संविधान।(1799) फ्रांस का नया संविधान (1799): फ्रांस का नया संविधान-‘गणतन्त्र के आठवें वर्ष का संविधान।(1799) ‘ क्रान्ति के आरम्भ होने के बाद लागू किया गया फ्रांस का चौथा संविधान था। इस संविधान के द्वारा।राज्य की सभी शक्तियाँ प्रथम कॉन्सल, नेपोलियन बोनापार्ट के हाथों में केन्द्रित कर दी गई । वैसे कहने के लिए राज्य की कार्यकारी शक्ति तीन कॉन्सल्स के हाथ में थी तथा विधायी शक्ति चार सदनों में निहित थी-राज्य।परिषद् (Council of State), ट्राइब्यूनेट (Tribunate), विधाननिर्मा्री सभा (Legislative Body ), एवं सीनेट (Senate)। यह सारा तामझाम क्रान्ति के मूलभूत कार्य ‘जनता को प्रभुसत्ता’ के मिथक को बनाये रखने के लिए किया गया था। लेकिन वास्तविक प्रभुसत्ता अब नेपोलयन के हाथ में थी। बिना उसके आदेश से बनाये गये बिल पर सदन में न बहस हो सकती थी, न मतदान। बिल पारित होने के बाद भी प्रथम कॉन्सल के आदेश के बिना उसे क्रियान्वित नहीं किया जा सकता था। कुल मिलाकर, वास्तवकि विधायी एवं कार्यकारी शक्ति नेपोलियन के हाथ में थी, बाकी सारा जंजाल गणतन्त्र के नाम को बचाये रखने के लिए था। जैसा कि हेजन ने लिखा है- ‘फ्रांस अब भी गणतन्त्र था-नाम के स्तर पर, लेकिन व्यावहारिक रूप में यह राजतन्त्रनथा बौनापार्ट की स्थिति उतनी ही आकर्षक थी जितनी कि दैविक इच्छा से राज करने वाले किसी राजा की;नअन्तर बस इतना ही था कि कॉन्सल के रूप में नेपोलियन का कार्यकाल दस वर्ष का ही था और उसे अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करने का अधिकार नहीं था। इन कमियों का भी उसने बाद में पूर्तिकरण कर लिया।

यह उल्लेखनीय है कि 1802 में नेपोलियन को प्रथम कॉन्सल के पद पर आजीवन नियुक्त घोषित कर दिया
गया और उसे अपने उत्तराधिकारी को मनोनीत करने का अधिकार भी दे दिया गया। फ्रांस के उपर्युक्त संविधान को सार्वजनिक जनमत (popular plebiscite) द्वारा पुष्ट कर लिया गया। फ्रांस की जनता ने नेपोलियन द्वारा उपर्युक्त संविधान के माध्यम से सत्ता के अधिग्रहण को इतनी आसानी से कैसे स्वीकार कर लिया ? एक तो फ्रांस की जनता डाइरेक्टरी के लिजलिजे, अक्षम तथा भ्रष्ट शासन से दु:खी थी और किसी मजबूत केन्द्रीकृत सरकार की आकांक्षी थी। नेपोलियन को उसने फ्रांस के सशक्त नायक के रूप में देखा। दूसरे, फ्रांस पर विदेशियों के आक्रमण का गम्भीर खतरा मण्डरा रहा था और फ्रांस का अस्तित्व खतरे में था।

द्वितीय संयुक्त मोर्चे के खिलाफ युद्ध (1801 1802 ) : फ्रांस के विरुद्ध तत्कालीन बड़ी शक्तियों ने एक द्वितीय संयुक्त मोर्चे (Second Coalition) का गठन कर लिया था नेपोलियन जब मिस्र के सैनिक
अभियान पर गया हुआ था, जब इस संयुक्त मोर्चे ने इटली एवं राइन नदी की घाटी पर अधिकार कर लिया
तथा कैम्पो फोर्मियों की सन्धि को प्रभावशून्य बना दिया था यह संयुक्त मोर्चा अब फ्रांस के क्षेत्र में घुसकर
युद्ध करने के लिए कटिबद्ध था। इस संयुक्त मो्चे के प्रमुख राष्ट्र थे-ग्रेट ब्रिटेन, आस्ट्रिया एवं रूस।

बोनापार्ट ने कूटनीति एवं चापलूसी के माध्यम से उपर्युक्त गठबन्धन के एक महत्त्वपूर्ण अंग, रूस की तटस्थता प्राप्त कर ली। रूस अपने मित्र राष्ट्रों से असंतुष्ट भी था। उसने स्वयं को इस गठबंधन से अलग कर लिया। यह नेपोलियन की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। इसके बाद नेपोलियन ने अपने पुराने शत्रु आस्ट्रिया से युद्ध में लोहा लेने की ठानी।

नेपोलियन का द्वितीय इटली अभियान ( 1800 ) :

नेपोलियन जब मिस्र में था, तब आस्ट्रिया ने उत्तरी इटली के क्षेत्र पर पुनः अधिकार कर लिया था और इस प्रकार नेपोलियन के प्रथम इटली अभियान (1796-1797) की सफलताओं पर पानी फिर गया था । नेपोलियन ने अब पुन: इटली में सैनिक अभियान का नेतृत्व किया। 40,000 व्यक्तियों की सेना के साथ नेपोलियन ने आल्प्स पर्वतमाला के ‘महान् संत बर्नार्ड दरें (Great Saint Bemard Pass) के बर्फले रास्ते को पार किया, तथा पो नदी की उर्वर घाटी में उतरने के बाद मारेन्जो (Marengo) नामक स्थान पर उसका आस्ट्रिया की सेना के साथ आमना-सामना हुआ (14 जून, 1800)। युद्ध बड़े नाटकीय तरीके से चला, लेकिन अन्ततोगत्वा नेपोलियन की सेनाओं ने आस्ट्रिया पर एक।शानदार विजय हासिल की आस्ट्रिया ने फ्रांस के साथ एक सन्धि कर ली जिसके अनुसार उसने उत्तरी इटली पर फ्रांस का अधिकार स्वीकार कर लिया। छः महीने बाद (दिसम्बर 3, 1800 ) फ्रांस की सेना ने मोरो।(Moreau) के नेतृत्व में जर्मनी के होहेलिन्देन नामक स्थान पर भी आस्ट्रिया की सेनाओं को परास्त किया। इस पराजय के कारण वियना का रास्ता खुल गया। आस्ट्रिया ने विवश होकर फ्रांस के साथ (9 फरवरी,।1801) ‘ल्युनविल की सन्धि’ (Treaty of Luneville) कर ली , तद्नुसार ‘कैम्पो फोर्मियो की सन्धि’ की श्तों को पुनः स्वीकार कर लिया गया।

इंग्लैण्ड के साथ शान्ति-समझौता (1802)

रूस की तटस्थता एवं आस्ट्रिया की पराजय के बाद, अब फ्रांस के समक्ष ग्रेट ब्रिटेन की चुनौती शेष थी। प्रांस और ब्रिटेन पिछले लगभग नौ वर्षों से युद्धरत थे ब्रिटेन के एडमिरल नेलसन ने नील नदी के युद्ध (अगस्त, 1798) में फ्रांस की नौसेना को परास्त किया था, और मिस्त्र में फ्रांस के अभियान को विराम लगा दिया था। इंग्लैण्ड ने फ्रांस एवं उसके मित्र राष्ट्रों के अनेक उपनिवेशों पर अधिकार भी कर लिया था। लेकिन इंग्लैण्ड का आक्रामक रुख फ्रांस में नेपोलियन द्वारा अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ बदलने लगा इंग्लैण्ड का भी कर्जा बहुत बढ़ गया था, जनता में युद्ध के प्रति वितृष्णा बढ़ने लगी थी। इंग्लैण्ड के मन्त्रिमण्डल में भी परिवर्तन हुआ जिसके परिणामस्वरूप युद्ध प्रेमी नेता विलियम पिट को हटना पड़ा। उधर नेपोलियन के नेतृत्व में फ्रांस यूरोप में एक दुर्जेय शक्ति बन रहा था।

इन परिवर्तित परिस्थितियों में इंग्लैण्ड ने फ्रांस के साथ शान्ति-सन्धि के लिये बातचीत शुरू की। मार्च, 1802 में दोनों देशों ने ‘आमियाँ की शान्ति-सन्ध’ (Peace of Amiens) पर हस्ताक्षर कर दिये। तद्नुसार, इंग्लेण्ड।ने फ्रांस में गणतन्त्र के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया। इंग्लैण्ड ने फ्रांस के सभी उपनिवेशों ( श्रीलंका एवं ट्रिनिडाड को छोड़कर) को लौटा दिया, तथा माल्टा एवं मिस्र में भी अपने अधिकार त्याग दिये। फ्रांस ने।दक्षिण इटली से अपने अधिकार वापिस लेने की बात स्वीकार कर ली। प्रकारान्तर से, इंग्लैंड ने ल्युनविल को।संधि’ द्वारा की गई महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार कर लिया। हेजन के अनुसार, ‘इस प्रकार दस वर्षो के अन्तराल में पहली बार यूरोप में शान्ति स्थापित हुई। फ्रांस एवं इंग्लैण्ड दोनों ही देशों में उत्साह बड़ा प्रबल।हुआ।’ लेकिन ‘आमियाँ की शान्ति-सन्धि’ जो एक स्थायी शान्ति-व्यवस्था के लिए की गई थी, वस्तुत: एक युद्ध-विराम सन्धि (truce) हो सिद्ध हुई। एफ.एम.एच. मरखम ( नेपोलियन एण्ड दि अवेकनिंग ऑफ यूरोप) के अनुसार ‘प्रारम्भ से ही इंग्लैण्ड ने इस शान्ति-सन्धि को एक श्वसन-अन्तराल (breathing space) एवं।एक प्रयोगात्मक शान्ति (experimental peace) के रूप में लिया।

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