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नेपोलियन के 06 आन्तरिक सुधार

नेपोलियन के 06 आन्तरिक सुधार

इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रांस की स्थिति को सुदृढ़ करने के बाद नेपोलियन ने फ्रांस की आन्तरिक सुधार-प्रक्रिया पर अपना ध्यान केन्द्रत किया। हेज ( माडर्न यूरोप टू 1870) के शब्दों में, ‘कान्सुलेट
का काल ( 1799-1804) फ्रांस की संस्थाओं के विकास में बोनापार्ट के मुख्य एवं सर्वाधिक स्थायी योगदानों का काल था।’ नेपोलियन की कीर्ति मुख्यत: उसकी सैनिक उपलब्धियों में निहित है लेकिन प्रथम कॉन्सल के रूप में उसके द्वारा किये गये महत्त्वपूर्ण सुधारों ने उसे अमर बना दिया। डेविड थामसन ( यूरोप सिन्स नेपोलियन) के अनुसार, नेपोलियन का प्रथम कॉन्सल के रूप में 1800 से 1803 का काल ‘फ्रांस के संपूर्ण आधुनिक इतिहास के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कालों में से एक है; इस काल में नेपोलियन का सर्वाधिक सृजनशील मूल्यवान कार्य हुआ। फ्रांस के पुनर्गठन के कार्य में नेपोलियन ने त्वरित निर्णय एवं क्रियात्मकता के गुणों को प्रदर्शित किया, मूलभूत बातों के प्रति उसने वैसी ही सुस्पष्टता एवं एकाग्रता प्रदर्शित की जैसा कि उसने युद्धों में प्रदर्शित कर सफलता प्राप्त की थी।

फ्रांस में आन्तरिक सुधार के अनेक कार्यों की शुरूआत फ्रांस के क्रान्तिकारी दशक (1789 से 1799)
के दौरान हो चुकी थी, लेकिन उस काल में किये गये सुधारों में आन्तरिक तारतम्य एवं पूर्णता का अभाव था। इस दृष्टि से नेपोलियन ने क्रान्ति के कार्य को आगे बढ़ाया। उसका प्रयोजन था-फ्रांस के प्रशासनिक, आर्थिक एवं कानूनी ढाँचे का व्यवस्थित पुनर्गठन। जहाँ एक ओर वह अपनी एकाधिकारवादी सुविधा के लिए एक.कार्यकुशल तन्त्र विकसित करना चाहता था, साथ ही उसकी आकांक्षा यह भी थी कि समय के पृष्ठ पर उसकेnअमिट हस्ताक्षर हो जायें -एक शुभंकर अधिनायक के जनहितैषी कार्यों के हस्ताक्षर।

01 आर्थिक सुधार

यह उल्लेखनीय है कि फ्रांस की वित्तीय अव्यवस्था 1789 में लुई की राजतंत्रीय सरकार तथा 1799 में डाइरेक्टरी के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण थी। नेपोलियन प्रारम्भ से ही इस ओर सचेत था कि फ्रांस में वित्तीय संकट पुन: उपस्थित नहीं हो जाये डेविड थामसन के शब्दों में, ‘पुरातन व्यवस्था के प्रभाव में कैंसरयुक्त वित्तीय प्रशासन एवं राजस्व-व्यवस्था को सबसे पहले ठीक किया गया नेपोलियन ने 1800 ई. में ‘बैँक ऑफ फ्रांस’ की स्थापना की जो देश की सबसे शक्तिशाली वित्तीय संस्था बन गई। ‘बैंक ऑफ फ्रांस’ ने जहाँ एक ओर सरकारी ऋणों एवं राजस्व-संग्रह की व्यवस्था को सुचारु रूप से नियन्त्रित किया, वहीं दूसरी ओर कम ब्याज दर पर ऋण देकर वाणिज्य को भी बढ़ावा दिया। 1803 में बैंक ऑफ फ्रांस’ को बैंक नोट जारी करने का एकाधिकार दे दिया गया ।

नेपोलियन ने राजस्व-संग्रह की व्यवस्था को केन्द्रीकृत कर दिया; फ्रांस के विभिन्न क्षेत्रों से राजस्व वसूली का कार्य अब केन्द्र सरकार द्वारा प्रत्यक्षत: नियुक्त अधिकारियों को सौंपा गया। इससे पूर्व क्रान्ति के
काल में, करों की वसूली का कार्य स्वायत्त क्षेत्रीय अधिकारियों द्वारा किया जाता था।

नेपोलियन ने सरकारी खर्चों में सख्त मितव्ययिता रखे जाने के आदेश जारी किये। भ्रष्ट अधिकारियों को
दण्डित किया जाने लगा। नेपोलियन ने यह व्यवस्था की कि फ्रांस के सैनिक अभियानों के खचों का बोझ
जनता पर न पड़े और ऐसे खर्चे पराजित राष्ट्र से ही वसूल किये जायें।

नेपोलियन की कुशल आर्थिक नीतियों के कारण ही फ्रांस में 1801-1802 के वित्तीय वर्ष में एक संतुलित बजट की प्रस्तुति का ‘चमत्कारी कार्य’ सम्पन्न हो सका।

02 सामाजिक सुधार

अपने राज्य के लिए व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करने की दृष्टि से, नेपोलियन ने फ्रांस के लगभग सभी सामाजिक वर्गों की दशा सुधारने का प्रयास किया इस सम्बन्ध में उसकी एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घोषणा यह थी कि क्रान्ति की प्रगति के काल में कृषकों द्वारा प्राप्त भूमि पर उन्हीं का स्वामित्व होगा; इस घोषणा का ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत स्वागत हुआ। शहर में कार्य करने वाले मजदूरों की मजदूरी भी बढ़ा दी गई। बुर्जुआ वर्ग नेपोलियन के राज्य से बहुत प्रसन्न था, क्योंकि एक स्थायी, कार्यकुशल सरकार के कारण उनकी समृद्धि सुरक्षित हो गई थी। कुलीनवर्ग एवं पादरीतन्त्र के जो लोग आतंक के शासन के दौरान फ्रांस से भाग गये थे, नेपोलियन के काल में उन्हें रोजगार एवं सुरक्षा का आश्वासन दिया गया, और वे पुन: फ्रांस में आकर बस गये नेपोलियन ने अधिनायकवादी छत्र के नीचे, फ्रांस के क्रान्तिकालीन वर्गभेदहीन समाज में, आपसी वैमनस्य की भावनायें शिथिल हो रही थीं और एक आन्तरिक समरसता का विकास हो रहा नेपोलियन ने न सामंती विशेषाधिकारों को स्वीकार किया, न वर्गभेदमूलक राजस्व व्यवस्था को, इस प्रकार उसने क्रान्ति के सामाजिक दाय पर अपनी मुहर लगा दी।

लेकिन नेपोलियन सामाजिक समानता के सपाट सिद्धान्त में विश्वास नहीं रखता था; उसका मानना था कि योग्य एवं प्रतिभासम्पन्न व्यक्तियों को विशेष सम्मान मिलना चाहिए। इस दृष्टि से उसने 1802 में ‘दि लीजन ऑफ ऑनर ‘(The Legion of Honour) की स्थापना की, जिसकी सदस्यता बिना जाति, कुल, पद एवं धर्म के भेदभाव के, ऐसे योग्य व्यक्तियों को दी गयी, जिन्होंने निष्ठा से फ्रांस की सेवा की थी। नेपोलियन का कहना था कि, ‘फ्रांसीसियों में एक अनुभूति है- सम्मान की; हमें इस अनुभूति का पल्लवन करना चाहिए।’ यह ‘योग्यतामूलक कुलीन तन्त्र’ (aristocracy of merit) नेपोलियन का एक नवीन सामाजिक प्रयोग था ।

03 शिक्षा की राष्ट्रीय पद्धति

फ्रांस की पुरातन व्यवस्था में शिक्षा पर चर्च का अधिकार था । क्रान्ति के काल में, शिक्षा को चर्च के प्रभाव से मुक्त कर, एक राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति की सुकल्पना की गई, बहुत अल्पांश में उसे लागू भी किया गया, लेकिन शिक्षा की राष्ट्रीय पद्धति को शिक्षा के सभी स्तरों पर, व्यापक एवं प्रभावशाली रूप में, प्रचलित करने का श्रेय नेपोलियन को है। नेपोलियन के काल में प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक, विश्वविद्यालय, तकनीकी, व्यावसायिक, सैनिक-सभी प्रकार की शिक्षाओं के निर्देश का एक. भव्य राज्यव्यापी ढांचा तैयार किया गया नेपोलियन द्वारा की गई नई व्यवस्थाओं के अनुसार, प्राथमिक या आरम्भिक शिक्षा की व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र विशेष (कम्यून) द्वारा क्षेत्रीय अधिकारियों (प्रिफेक्ट या सब- प्रिफेक्ट) की देखरेख में की जायेगी माध्यमिक विद्यालयों में फ्रांसीसी भाषा, लैंटिन भाषा तथा आरम्भिक विज्ञान की विशेष शिक्षा दी जायेगी; ये विद्यालय सार्वजनिक उपक्रम में हों या निजी क्षेत्र में, उन पर राष्ट्रीय सरकार का नियन्त्रण रहेगा। ‘ लाईसी’ (Lycees) या उच्च माध्यमिक विद्यालय प्रत्येक महत्त्वपूर्ण नगर में खोले जायेंगे एवं इन विद्यालयों में, शिक्षा की उच्चतर शाखाओं में, राज्य द्वारा नियुक्त अध्यापकों द्वारा शिक्षण कार्य किया जायेगा विशेष प्रकार के विद्यालय जैसे तकनीकी विद्यालय, सैंनिक विद्यालय, सिविल सेवा विद्यालय आदि राजकीय नियन्त्रण के अधीन होंगे और उनमें अध्यापकों की नियुक्ति राज्य द्वारा की जायेगी पेरिस विश्वविद्यालय का नवगठन किया गया और इस विश्वविद्यालय को फ्रांस में शैक्षिक एकरूपता बनाये रखने का दायित्व सौंपा गया। इस विश्वविद्यालय के प्रमुख अधिकारियों एवं शिक्षकों की नियुक्ति राज्य के प्रथम कॉन्सल नेपोलियन द्वारा की जायेगी। राजकीय विद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिये पेरिस में नाम्मल स्कूल खोला ।

फ्रांस की राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति के ध्येय को स्पष्टत: रेखांकित किया गया । यह ध्येय था-ईसाई धर्म के
नैतिक सिद्धान्तों में विश्वास तथा राज्य के प्रमुख व्यक्ति (नेपोलियन) के प्रति स्वामिभक्ति। नेपोलियन ने शिक्षा पद्धति के क्षेत्र में व्यापक संस्थागत सृजनात्मकता प्रदर्शित की, लेकिन उसने विद्यार्थियों में स्वतन्त्र चिन्तन के विकास की प्रवृत्ति को प्रतिबन्धित किया। उसके द्वारा प्रचलित राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति का मुख्य ध्येय उसकी अपनी राज-व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण था, न कि विद्यार्थियों का पूर्वाग्रहमुक्त सर्वांगीण विकास| इस शिक्षा पद्धति पर उसके अधिनायकवादी स्वार्थों की छाया स्पष्ट थी। दूसरे, नेपोलियन के निरन्तर प्रयासों के बावजूद वित्त के अभाव एवं योग्य शिक्षकों की कमी के कारण राष्ट्रीय विद्यालयों का पूरी तरह प्रसार नहीं हो पाया; यही कारण था कि नेपोलियन युग के अन्त में फ्रांस के आधे से ज्यादा बच्चे निजा विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे; इनमें से अधिकांश निजी विद्यालय कैथोलिक चर्च द्वारा संचालित किये जा रहे थे।

04 नवीन धार्मिक व्यवस्था

(कौन्कोडा, 1802 ) क्रान्ति के काल में, राज्यं एवं कट्टर कैथॉलिक ईसाइयों के मध्य वैमनस्य की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। क्रान्तिकारियों द्वारा चर्च पर राजकीय नियन्त्रण स्थापित करने के प्रयास से बहुत से धर्माधिकारी, तथा आतंक के शासन काल की ईसाइयत विरोधी गतिविधियों के कारण अनेक कैथोलिक ईसाई, क्रान्ति से विमुख हो गये तथा प्रतिक्रियावादी तत्वों के साथ सहानुभूति रखने लगे। पोप ने भी फ्रांस की सरकार के साथ सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था ।

नेपोलियन पोप एवं फ्रांस के असंतुष्ट कैथोलिक ईसाइयों का राजनीतिक समर्थन प्राप्त करना चाहता
था, लेकिन वह धर्म पर राज्य के प्रभावी नियन्त्रण को भी बनाये रखना चाहता था। धर्म के बारे में नेपोलियन के क्या विचार थे ? उसका कहना था कि, ‘मैं धर्मों में विश्वास नहीं रखता मिस्न में मैं मुसलमान बन गया और इस प्रकार वहाँ कदम रख सका, इटली के पादरियों का समर्थन जीतने के लिए मैं ‘अल्ट्रामोण्टेन’ (पोपाधिकारवादी) बन गया ….. यहाँ (फ्रांस में) मैं लोगों की भलाई के लिये कैथोलिक बन जाऊँगा।’ नेपोलियन धर्म की स्वतन्त्र महत्ता में विश्वास नहीं रखता था, लेकिन वह धार्मिक भावना को सामाजिक-राजनीतिक प्रयोजनों के लिए उपयोगी मानता था । नेपोलियन के शब्दों में, ‘लोगों के पास धर्म अवश्य होना चाहिये, लेकिन वह धर्म सरकार के हाथों में होना चाहिये।’ ‘मैं धर्म में अवतार के रहस्य को नहीं देखता हूँ, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के रहस्य को देखता हूँ।


नेपोलियन के प्रयासों फलस्वरूप, तत्कालीन पोप पॉयस सप्तम से दीर्घकालीन विचार-विमर्श के पश्चात्, फ्रांस की सरकार एवं पोप के मध्य 1801 में एक ‘धर्मसन्धि’ (Concordat) सम्पन्न हुई। इस धर्म
सन्धि के माध्यम से, फ्रांस में कैथोलिक ईसाई धर्म को औपचारिक स्वीकृति प्रदान कर दी गई। यद्यपि
कैथोलिक ईसाई धर्म को फ्रांस का राजधर्म नहीं घोषित किया गया, तथा फ्रांसीसी जनता की धार्मिक
स्वतन्त्रता एवं धार्मिक सहिष्णुता की भावना का सम्मान यथावत् रखा गया, तथापि धर्मसन्थि में यह स्वीकार।कर लिया गया कि फ्रांस की बहुसंख्यक जनता कैथोलिक धर्मावलम्बी है पोप ने, पफ्रांस में क्रान्ति के काल में अधिगृहीत चर्च की भूमि पर अपने अधिकार त्याग दिये, तथा फ्रांस की सरकार ने पादरियों को वेतन देने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया। नये बिशपों का नामांकन प्रथम कॉन्सल (नेपोलियन ) द्वारा किया।जायेगा। नये धर्माधिकारियों को कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व फ्रांस की सरकार के प्रति स्वामिभक्ति की शपथ।लेनी होगी इस प्रकार फ्रांस में कैथोलिक ईसाई धर्म की पुनः औपचारिक स्थापना हो गई लेकिन जैसा कि।हेज (माडर्न यूरोप टू 1870) ने लिखा है, ‘कैथोलिक चर्च अब राज्य के साथ, लुई सोलहवें के काल की।तुलना में, अधिक मजबूती से बंध गई। ‘

उपर्युक्त ‘धर्मसन्धि’ नेपोलियन की एक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। एक ओर इसने क्रान्तिकारियों द्वारा
धर्म के क्षेत्र में किये गये महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को पोप एवं कैथोलिक ईसाइयों की औपचारिक स्वीकृति दिलवा।दो। दूसरी ओर, फ्रांस की सरकार ने क्रान्तिकाल के असंतुष्ट कैथोलिक ईसाइयों का समर्थन प्राप्त कर लिया।।उपर्युक्त’धर्मसन्धि’ दोनों पक्षों के लिए इतनी उपयोगी सिद्ध हुई, कि आगामी 103 वर्षों तक (1905 तक) वह।फ्रांस की सरकार एवं चर्च के पारस्परिक सम्बन्धों की नियामक सन्धि बनी रही।

05 नेपोलियन की कानून संहिता

क्रान्ति से पूर्व, पुरातन व्यवस्था के अन्तर्गत, फ्रांस के अलग- अलग क्षेत्रों में इतने विविध प्रकार के कानून प्रचलित थे कि प्रांस एक कानूनी जंगल की तरह था यद्यपि क्रान्ति के बाद फ्रांस के प्रथम लिखित संविधान (1791) में कानूनों में एकरूपता लाने की बात कही गई थी, तथा ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ की सरकार ने इस दिशा में प्रयासों का शुभारम्भ भी किया था, लेकिन फ्रांस के क्रान्तिकारी दशक (1789 से 1799) की ऊहापोह में यह कार्य अधूरा ही रह गया। समय की माँग थी कि फ्रांस।के कानूनों में एकरूपता हो, प्रत्येक नागरिक को अपने कानूनी अधिकारों की स्पष्ट जानकारी हो, तथा क्रान्तिके काल में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को ठोस कानूनी आधार प्राप्त हो। नेपोलियन ने इस चुनौती को स्वीकार।किया और अगस्त, 1800 में चार प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं की एक समिति को फ्रांस के कानूनों की एक संहिता।तैयार करने के लिए कहा। नेपोलियन ने इस समिति की गतिविधियों में व्यक्तिगत रुचि ली, तथा अपनी वैचारिक चेतना एवं विधायी दृष्टि से नयी कानून-संहिता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

मार्च, 1804 में फ्रांस की नयी कानून-संहिता को लागू कर दिया गया। इस संहिता को ‘नेपोलियन की
कानून-सहिता’ (The Code of Napoleon) का नाम दिया गया यह ‘नागरिक संहिता’ (Civil Code.
1804) के नाम से भी जानी जाती है। नेपोलियन की कानून-संहिता अपनी सरलता, सूक्ष्मता एवं सुस्पष्टता के।लिए देश-विदेश में विख्यात हो गई। इस कानून-संहिता की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने मनुष्य।के अधिकारों से सम्बन्धित क्रान्ति की मूलभूत विरासत को वैधानिक दृष्टि से सुरक्षित बना दिया।
फ्रांस की ‘नागरिक संहिता’ या ‘नेपोलियन की कानून-संहिता’ में बाद में कुछ अन्य विशिष्ट संहिताओं
को गठित करके जोड़ दिया गया, जो इस प्रकार थीं- ‘नागरिक प्रक्रिया की संहिता (Code of Civil
Procedure, 1806); ‘वाणिज्य की संहिता’ (Code of Commerce, 1807); ‘आपराधिक प्रक्रिया की संहिता’ (Code of Criminal Procedurc, I808) एवं ‘दण्डविषयक संहिता’ (Penal Code, 1810)।

नेपोलियन की कानून-संहिता ने क्रान्ति की उपलब्धियों को सुदृढ़ बनाया जैसे कि नागरिक समानता का अधिकार, धार्मिक प्रभाव से मुक्त कानून एवं धार्मिक सहिष्णुता, सभी उत्तराधिकारियों के लिए विरासत की
समानता, कृषकों का भू-स्वामित्व, सामंतवाद एवं विशेषाधिकारों का अन्त दास प्रथा की समाप्ति आदि।
कानूनों की एकरूपता एवं स्पष्टता फ्रांस की जनता के लिए नेपोलियन का एक नायाब तोहफा था। नेपोलियन की कानून संहिता ने फ्रांस के सभी निवासियों को, कुल, धर्म एवं जाति के भेदभाव से मुक्त, कानूनी समानता का अधिकार प्रदान किया। पिता की सम्पत्ति में ज्येष्ठतम पुत्र का नहीं, बल्कि सभी पुत्रों का समान अधिकार माना गया परिवार पर पिता के अधिकार को सर्वोच्च मानते हुये, परिवार के अन्य सदस्यों के लिए पिता के प्रति आज्ञाकारिता को अनिवार्य बना दिया गया । पिता अपनी संतानों को दण्डित भी कर सकता था।

संतानों को अपने विवाह के लिए पिता की स्वीकृति आवश्यक थी । नेपोलियन की कानून-संहिता में स्त्रियों के अधिकारों की यथोचित सुरक्षा नहीं की गई । पत्नी का पति के नियन्त्रण में रहना आवश्यक था, और वह बिना।पति की स्वीकृति के सम्पत्ति रोमन कैथोलिक चर्च के नियम को अस्वीकार करते हुये, तलाक के अधिकार को स्वीकृति प्रदान कर दी। तलाक पारस्परिक सहमति से या व्यभिचार, क्रूरता तथा अन्य गम्भीर आपराधिक स्थितियों में लिया जा सकता था। व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार को स्वीकार किया गया ब्याज की दर कानून द्वारा तय कर दी गई ।

अपनी कमियों एवं सीमाओं के बावजूद, नेपोलियन की कानून-संहिता’ एक मौल का पत्थर सिद्ध हुई। इसे विश्व इतिहास को नेपोलियन के एक स्थायी योगदान के रूप में देखा जा सकता है । सेंट हेलेना में अपने निर्वासन के दिनों में नेपोलियन ने कहा था कि, ‘मेरी वास्तविक कीर्ति इस बात में नहीं है कि मैंने चालीस युद्ध जीते। …. वाटरलू मेरी विजयों की स्मृति को मिटा देगा। जिसे कभी भी नहीं मिटाया जा सकेगा. जो निरन्तर स्थायी वनी रहेगी वह मेरी नागरिक संहिता (सिविल कोड) है ‘ हेज (माडर्न यूरोप टू 1870) के अनुसार, ‘यह सत्य है कि नेपोलियन की कानून संहिता में अनेक कठोर दण्डों का प्रावधान रखा गया एवं स्क्री की स्थिति पुरुष की तुलना में स्पष्टतः हीन बना दी गई, लेकिन फिर भी यह कानून संहिता दीर्घकाल तक सबसे सुविधाजनक एवं प्रबुद्ध कानूनी संकलन बनी रही। बोनापार्ट को द्वितीय जस्टीनियन के नाम से सही पुकारा गया है।’ फिशर (नेपोलियन) के शब्दों में, नेपोलियन की नागरिक संहिता का ‘सभ्यता के इतिहास में महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इसने फ्रांस की क्रान्ति द्वारा युरोप में प्रवर्तित भारी सामाजिक सुधारों को रेखांकित. किया एवं उन्हें स्थायित्व प्रदान किया…. स्पष्ट एवं ठोस रूप में, नेपोलियन की कानून-संहिता ने यूरोप के समक्ष सभ्य समाज को नियन्त्रित करने वाले निमयों को प्रस्तुत किया।’ लियो गर्शोय (दि पफ्रेंच रिवोल्यूशन एण्ड नेपोलियन) के मत में, नेपोलियन की कानून संहिता में फ्रांस की क्रान्ति का सारांश एवं परिष्कार देखा जा सकता है।

नेपोलियन की कानून-संहिता फ्रांस में ही नहीं, बल्कि फ्रांस द्वारा विजित एवं प्रभावित अन्य देशों-
बेल्जियम, राइन के पश्चिम में स्थित जर्मनी के क्षेत्र, तथा इटली में भी लागू कर दी गई।

06 सार्वजनिक हित के कार्य एवं सांस्कृतिक अभिरुचि

नेपोलियन बोनापार्ट ने सार्वजनिक हित के कार्यों में तथा फ्रांस के सांस्कृतिक उत्कर्ष में भी अपनी अभिरुचि प्रदर्शित की। नेपोलियन ने फ्रांस में संचार एवं वाणिज्य की सुविधा के लिए अनेक मार्गों का निर्माण किया। 1811 तक उसने लगभग 229 मार्गों का निर्माण कर लिया था, जिनमें से 30 प्रमुख मार्ग पेरिस से शुरू होकर क्रय-विक्रय नहीं कर सकती थी। लेकिन नेपोलियन की कानून संहिता के सुदूर क्षेत्रों तक जाते थे। इस प्रकार के निर्माण कार्यों में नेपोलियन ने युद्धबंदियों की सेवाओं का प्रयोग किया।

अनेक महत्त्वपूर्ण पुल भी इस काल में बनाये गये। नहरों एवं जलमार्गों की व्यवस्था को भी सुचारु किया गया। नौसैनिक एवं वाणिज्यिक बन्दरगाहों का भी विस्तार एवं दुर्गीकरण किया गया। खतरनाक दलदलो
को सुखा दिया गया। नेपोलियन के काल में अनेक राज्य प्रासादों की मरम्मत एवं अलंकरण का कार्य किया गया नये स्मारक बनाये गये। सड़कों बहुमूल्य कलाकृतियों से फ्रांस के संग्रहालय तथा महलों को सजा दिया गया । पेरिस शहर का सौन्दर्यीकरण किया गया। कान्सुलेट के काल में, पेरिस का विकास यूरोप के आमोद-केन्द्रित नगर ( pleasure city) के रूप में होने लगा था नेपोलियन के काल में पेरिस की जनसंख्या दुगुनी हो गई। तंलि किनारे छायादार वृक्ष लगाये गये इटली, स्पेन एवं नीदरलैंड से लायी गयी

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