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नेपोलियन का साम्राज्य : पतन एवं पटापेक्ष (1808-1815)

नेपोलियन का साम्राज्य : पतन एवं पटापेक्ष (1808-1815)

पुर्तगाल पर अधिकार (1807) : पुर्तगाल और ब्रिटेन के मध्य आर्थिक और राजनीतिक सम्बन्ध काफी गहरे थे। पुर्तगाल ने महाद्वीपीय व्यवस्था को लागू करने से मना कर दिया। नेपोलियन ने स्पेन के साथ मिलकर पुर्तगाल पर अधिकार की योजना बनाई। फ्रांस और स्पेन की संयुक्त सेनाओं ने अक्टूबर, 1807 में पुरतगाल पर आक्रमण कर दिया और 1 दिसम्बर, 1807 को उन्होंने पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन पर अधिकार कर लिया। इससे एक दिन पूर्व ही, पुर्तगाल के ब्रेगेन्जा वंश का शाही परिवार ब्राजील की ओर भाग गया, जहाँ वे नेपोलियन के साम्राज्य के उन्मूलन तक छिपे रहे । नेपोलियन ने घोषणा की कि, ‘ब्रेगेन्जा घराने का पतन इस बात का एक और सबूत प्रस्तुत करता है कि जो भी स्वयं को अंग्रेजों से जोड़ेगा, उसका विनाश निश्चित है। स्पेन पर अधिकार (1808 ) एवं प्रायद्वीपीय युद्ध (1808 1814): पुर्तगाल पर अधिकार के बाद नेपोलियन ने अपने मित्र स्पेन के राज्य पर अधिकार करने की योजना बना डाली। स्पेन में फ्रांस के बूबों राजवंश की ही एक शाखा के राजा चाल्र्स चतुर्थ का शासन था, लेकिन वह एक अक्षम तथा भ्रष्ट शासक था। चार्ल्स चतुर्थ का लड़का फर्डिनेण्ड अपने पिता की हरकतों का विरोधी था, और स्पेन की जनता में लोकप्रिय था। नेपोलियन ने इस पारिवारिक कलह से लाभ उठाने की योजना बनाई। उसने कुशल तरीके से चाल्ल्स चतुर्थ, फर्डिनेण्ड तथा राजपरिवार के अन्य सदस्यों को दक्षिणी फ्रांस में, स्पेन की सीमा के निकट अवस्थित बयने नामक स्थान पर बुलाया वहाँ साम-दाम-दण्ड-भेद, सब चार्ल्स चतुर्थ तथा फर्डिनेण्ड को स्पेन का सिंहासन छोड़ने के लिये राजी कर लिया (1808)। स्पेन की खाली गड्डी पर नेपोलियन ने अपने भाई जोसेफ बोनापार्ट को आसीन कर दिया। जुलाई, 1808 में फ्रांसीसी सेना के संरक्षण में, स्पेन की राजधानी मैड्रिड में, जोसेफ बोनापार्ट का राज्याभिषेक हुआ। उसने तुरन्त स्पेन में नेपालियन साम्राज्य की गृह व्यवस्था लागू कर दी तथा स्पेन के आन्तरिक प्रशासन को तदूनुसार रूपान्तरित कर दिया।

नेपोलियन की उपर्युक्त गतिविधियों से स्पेन की जनता रुष्ट हो गई। स्पेनवासियों में राष्ट्रीय भावना जाग
उठी और विदेशी शासक के रूप में वे नेपोलियन से घृणा करने लगे। उनकी यह राष्ट्रय भावना क्रमश: इतनी
प्रबल एवं व्यापक हो गयी कि इसने एक आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। इससे पूर्व नेपोलियन को राज्यों की नीतियाँ अपनाकर नेपोलियन ने सैनिक; 80,000 इटली के सैनिक; 60,000 पोलैण्ड के सैनिक; तथा अन्य सैनिक टुकड़ियों हॉलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड, डेनमार्क तथा यूगोस्लाविया से धी।

जून, 1812 में नेपोलियन ने नीमन नदी को पार किया तथा रुस पर आक्रमण कर दिया नेपोलियन
की सेना- संख्या, संगठन एवं साजो-सामान की दृष्टि से रूस की सेना से काफी बेहतर स्थिति में थी। रूस की सेना को इस स्थिति का आभास था, अत: वह फ्रांस की सेना का प्रत्यक्ष सामना करने के स्थान पर अपनी ही भूमि पर पीछे हटती गई, उनका पीछा करते हुये फ्रांस की सेना रूस के अन्तर्वर्ती क्षेत्र में आगे बढ़ती गई । पीछे हटने से पूर्व रूस की सेना आसपास के क्षेत्र को विनष्ट कर देती थी, ताकि फ्रांस की सेना को वहाँ आने पर रसद पानी की आपूर्ति नहीं मिल सके। ऐसी स्थिति में, नेपोलियन की सेना की विशाल संख्या, उसकी शक्ति के स्थान पर उसके लिये बोझ बन गई। सेना के प्रयाण के छठे दिन से सेना के लिए भोजन की कमी पड़ने लगी, तथा खुराक के अभाव में घोड़े भी मरने लगे। नेपोलियन शत्रुओं को परास्त करने की धुन में आगे बढ़ता रहा। अन्त में रूस की सेना ने मास्को जाने वाले रास्ते में बोरोडिनो नामक स्थान पर फ्रांस की सेना का मुकाबला करने का निर्णय लिया यहाँ 7 सितम्बर 1812 को दोनों सेनाओं के मध्य बड़ा घमासान एवं रकपातपूर्ण युद्ध हुआ जिसमें 40,000 रूसी तथा 30,000 फ्रांसीसी सैनिक मारे गये यह नेपोलियन की बड़ी संघर्षपूर्ण विजय थी; रूस की सेना और पीछे हट गई और उसने मास्को का रास्ता खुला छोड़ दिया। 14 सितम्बर को नेपोलियन ने मास्को पर अधिकार कर लिया। नीमन से मासको तक की 700 मील की यात्रा में नेपोलियन की सेना ने बहुत कष्ट सहे और मार्ग की कठिनाइयों के कारण प्रतिदिन हजारों की संख्या में अपने सैनिक गंवाये। नेपोलियन ने मास्को शहर को वीरान पाया । जिस रात्रि में नेपोलियन ने मास्को में प्रवेश किया, उसी रात्रि को शहर के विभिन्न हिस्सों में रूसियों द्वारा आग लगा दी गई । खाने-पीने की वस्तुओं को भी नष्ट कर दिया। लेकिन नेपोलियन तमाम परेशानियों के बावजूद हफतों तक मास्को में डटा रहा, इस उम्मीद में कि जार उससे शान्ति-समझौते के लिये उसके पास आयेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मास्को में सर्दी भी बढ़ रही थी। अन्त में हताश होकर 22 अक्टूबर को नेपोलियन ने अपनी सेना के साथ मास्को से पुन: नीमन की ओर वापिस लौटने का निर्णय लिया।

मास्को से नेपोलियन की वापसी-यात्रा, इतिहास का एक भयावह एवं दर्दनाक घटनाक्रम है। मास्को से नेपोलियन के लगभग एक लाख सैनिक वापसी के लिये रवाना हुये थे, उनमें से कुछ हजार ही वापिस पहुँच पाये। मार्ग में एक ओर तो ठंड एवं बर्फीली हवाओं का प्रकोप था, दूसरी ओर वस्त्र तथा भोजन की कमी। लौटती हुई फ्रांसीसी सेना पर रूस के कौसेक गुरिल्ला दल के लोग भी छुप-छुप कर आक्रमण कर रहे थे। बर्फीला मौसम, वस्त्रों का अभाव, उफनते हुये नदी नाले, उजड़ी वीरान बस्तियों के मार्ग भोजन की कमी, कौसेक सैनिकों के आक्रमण, इन सब कठिनाइयों के कारण फ्रांस के सैनिक रास्तों में दम तोड़ते जा रहे थे, अनेक आत्महत्या कर रहे थे। भोजन की इतनी कमी थी कि सैनिक घोड़ों को मारकर उन्हें खा रहे थे बचे- खुचे कुछ हजार सैनिक जब 13 दिसम्बर को नीमन पहुँचे तो उनकी स्थिति बड़ी दयनीय थी-फटे हुये कपड़े, भूख से बेहाल, अर्द्धविक्षिप्त। कुछ तो उनमें से बड़ी मुश्किल से चलते हुये, अस्पताल पहुँच पाये जहाँ उन्होंने शान्ति से मरने के लिये कमरों की माँग की। नेपोलियन का रूसी अभियान बड़ा विनाशकारी रहा। उसके पाँच लाख से भी अधिक सैनिक रूसी आक्रमण की भेंट चढ़ गये हेजर के शब्दों में, ‘इतिहास के वृत्तान्तों में इस प्रकार के डरावने दारुण पृष्ठ कुछ ही होंगे ‘ जर्मनी में स्वतन्त्रता का युद्ध (1813 ): फ्रांस के अधीन जर्मन रियासतों के संघ में राष्ट्रीयता की भावना का उदय हो रहा था और जर्मनी के देश नेपोलियन के आधिपत्य से स्वतन्त्र होना चाह रहे थे रूस में नेपोलियन के दुःखद अनुभव से इन जर्मन राष्ट्रों का उत्साह और बढ़ गया। प्रशिया ने जर्मनी राष्ट्रों के मुक्ति आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया रूस ने भी प्रशिया के साथ सन्धि करके इस आन्दोलन में सहयोग देने के लिये रूसी सेना को भेज दिया। प्रशा ने मार्च, 1813 में नेपोलियन के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया। दिसम्बर, 1812 में नेपोलियन रूस के विनाशकारी अनुभव के बाद पेरिस लौटा था। लेकिन नेपोलियन ने पुनः 2 लाख सैनिकों की एक सेना गठित कर ली, तथा सैक्सनी प्रदेश में प्रवेश कर प्रशिया एवं रूस की सेनाओं को लुटजेन (2 मई, 1813) तथा बोटजेन (20 मई, 1813) के युद्धों में परास्त कर दिया ऐसे समय पर आस्रिया के प्रधानमन्त्री मेटरनिख ने नेपोलियन के समक्ष युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा जिसे उसने स्वीकार कर लिया। इसका कारण यह था कि नेपोलियन इस अन्तराल में फ्रांस एवं इटली से और अधिक सैनिक टुकड़ियाँ जुटाना चाहता था। लेकिन यह अन्तराल नेपोलियन के लिये घातक सिद्ध हुआ, क्योंकि इस दौरान ग्रेट ब्रिटेन ने प्रशा तथा रूस के साथ मिलकर फ्रांस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चे का गठन कर लिया था । युद्ध विराम के प्रस्ताव के पश्चात् आस्ट्रिया के प्रधानमन्त्री मेटरनिख ने यूरोप में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से नेपोलियन के समक्ष शान्ति समझौते का प्रस्ताव रखा, लेकिन नेपोलियन समझौता नहीं, निर्णायक विजय चाहता था, अत: उसने मेटरनिख की बात को अस्वीकार कर दिया। तब आस्ट्रिया भी प्रशा और रूस के साथ फ्रांस के विरुद्ध संयुक्त गठबन्धन में शामिल हो गया।


राष्ट्रा का युद्ध (16-19 अक्टूबर, 1813): अक्टूबर 18 से 19, 1813 के मध्य लिपजिग नामक स्थान पर तीन दिवसीय युद्ध हुआ जिसे ‘राष्ट्रों के युद्ध’ (Battle of the Nations) नाम से जाना जाता है।

लिपजिग के इस युद्ध में नेपोलियन को आस्ट्रिया, रूस एवं प्रशिया की संयुक्त सेनाओं से युद्ध करना पड़ा। मित्र राष्ट्रों की सेना में 3 लाख लोग थे, नेपोलियन की सेना में मात्र 20,000 । नेपोलियन इस युद्ध में बुरी तरह परास्त हुआ, और अपने बचे-खुले सैनिकों के साथ राइन नदी के पार भाग गया ।

‘राष्ट्रों के युद्ध’ में पराजय के बाद फ्रांस के बाहर, नेपोलियन का साम्राज्य, ताश के पत्तों की तरह
बिखर गया। जर्मन राष्ट्रों के राइन संघ को भंग कर दिया गया । वेस्टफेलिया से राजा जेरोम बोनापार्ट को भगा दिया गया। हॉलैण्ड स्वतन्त्र हो गया। आस्ट्रिया ने टाइरोल तथा इलीरियन प्रांतों को पुनः प्राप्त कर लिया, तथा वेनेशिया एवं स्विट्जरलैण्ड पर अधिकार कर लिया।


नेपोलियन के पास अब फ्रांस का केन्द्रीय साम्राज्य बचा था । आस्रिया ने 1813 के अंत में नेपोलियन के समक्ष एक ऐसी सन्धि का प्रस्ताव रखा था जो उसके लिये ऐसी स्थिति में लाभकारी थी; तद्नुसार मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस की प्राकृतिक सीमाओं (राइन, आल्प्स एवं पाइरेनिज) के अन्तर्गत उसके साम्राज्य की सीमाओं को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन नेपोलियन ने इसे ठुकरा दिया। सैनिक विजयों के अभ्यस्त तथा सैनिक दर्प के अभिमान में, नेपोलियन अभी भी सन्धि नहीं, विजय की आकांक्षा रखता था।

फ्रांस पर मित्र राष्ट्रों का संयुक्त आक्रमण (1814): 1814 में तीन मित्र राष्ट्रों (रूस आस्ट्रिया एवं प्रशिया) की संयुक्त सेना, जिसके अन्तर्गत 4 लाख सैनिक थे, ने फ्रांस पर विभिन्न दिशाओं से आक्रमण कर दिया। फरवरी एवं मार्च, 1814 के दो महीनों में यद्यपि नेपोलियन बहादुरी के साथ मित्र राष्ट्रों की सेनाओं से युद्ध करता रहा, लेकिन अन्त में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली। 31 मार्च, 1814 को मित्र राष्ट्रों की
सेनाओं ने पेरिस पर अधिकार कर लिया। नेपोलियन ने मित्र राष्ट्रों के साथ फाउन्टेनब्लि्यू की व्यक्तिगत सन्धि कर ली जिसके अनुसार उसने फ्रांस के सिंहासन पर अपना एवं अपने परिवार का अधिकार त्याग दिया; बदले में उसे एल्बा (Elba) के छोटे से द्वीप का राज्य दिया गया तथा बीस लाख फ्रेंक की वार्षिक पेंशन स्वीकृत की गई। एल्बा का द्वीप भूमध्यसागर में कोर्सिका के निकट इटली के टस्कनी तट पर अवस्थित था, यह उन्नीस मील लम्बा तथा छ: मील चौड़ा द्वीप था। नेपोलियन को एल्बा जाने के लिए फ्रांस के सैनिकों ने अश्रुपूरित विदाई दी। एल्बा में नेपोलियन दस महीने तक रहा।


मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस की गद्दी पर बू्बों राजवंश के लुई अठारहवें को आसीन कर दिया। लुई अठारहवें ने क्रान्ति की भावना का सम्मान करते हुये, फ्रांस की जनता के अधिकारों को, अपने चार्टर में स्वीकार किया।
नेपोलियन की वापसी, सौ दिन का शासन, एवं वाटरलू का युद्ध (18 जून, 1815) फ्रांस में अभी भी नेपोलियन के नाम का जादू था। लुई अठारहवें की गतिविधियों से ऐसा लगने लगा था कि वह कुलीन सामन्तों एवं धर्मगुरुओं के विशेषाधिकार उन्हें वापस लौटा सकता है, अतः कृषक वर्ग एवं मध्यमवर्ग फ्रांस की गद्दी पर बूबों राजवंश की वापसी में प्रसन्न नहीं था हेजन के शब्दों में, ‘बूबों राजवंश के कुछ महीनों के शासन से लुई अठारहवें के प्रतिकूल एवं नेपोलियन के अनुकूल, एक मानसिक वातावरण फ्रांस में तैयार हो गया।

नेपोलियन ने इस स्थिति से लाभ उठाने का निश्चय किया। इस समय मित्र राष्ट्रों के अधिकारी वियना कांग्रेस में यूरोप के बँटवारे को लेकर झगड़ रहे थे। नेपोलियन एल्बा द्वीप से कुछ चुनिंदा सैनिकों के साथ रवाना हुआ, और 1 मार्च, 1815 को फ्रांस के दक्षिणों तट पर अवस्थित कैन्स (Cannes) नामक स्थल पर उतरा। उसी रात्रि में नेपोलियन ने कैन्स से पेरिस की ओर प्रस्थान किया। नेपोलियन के पास सैनिकों की संख्या इतनी कम थी कि उसे आसानी से बंदी बनाया जा सकता था। नेपोलियन ने फ्रांस की सैनिक टुकड़ियों से उसे सहयोग देने के लिये, बड़ी भावनात्मक अपील की। एक के बाद दूसरी रेजीमेण्ट नेपोलियन के साथ जुड़ती गई। कैन्स से पेरसि की यात्रा के दौरान, नेपोलियन का फ्रांस की जनता, विशेषकर कृषकों ने, बड़े उत्साह से स्वागत किया। ग्रेनोब्ले में शाही सेना की जो टुकड़ी नेपोलियन की गिरफ्तारी के लिये खड़ी थी, वह भी नेपोलियन के आह्वान पर उसके साथ हो गयी। 20 मार्च को नेपोलियन पेरिस पहुँचा और उसने ट्यूलेरिस के राजभवन पर अधिकार कर लिया। लुई अठारहवाँ, जिसने राज्य की रक्षा के लिये मरने की शपथ ली थी, वहाँ से भाग गया और बेल्जियम चला गया। नेपोलियन पुनः फ्रांस का सम्राट बन गया उसका यह शासनकाल बहुत सीमित अवधि के लिये रहा; उसे उसका ‘सौ दिन का शासनकाल’ (20 मार्च, 1815 से 29 जून, 1815) कहा जाता है। नेपोलियन द्वारा सत्ता के पुनः अधिग्रहण का समाचार पाकर वियना में एकत्र मित्र राष्ट्रों के प्रतिनिधि हतप्रभ रह गये। मित्र राष्ट्रों ने पुनः अपनी संगठित सेना नेपोलियन के विनाश के लिये भेजी। बेल्जियम में, ब्रुसेल्स से 12 मील दक्षिण में अवस्थित, वाटरलू के प्रसिद्ध मैदान में नेपोलियन और मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के मध्य 18 जून, 1815 रविवार को अन्तिम, निर्णायक युद्ध हुआ। नेपोलियन ने यद्यपि अपनी चिरपरिचित फुर्ती, बहादुरी एवं सैनिक कौशल के साथ युद्ध लड़ा, लेकिन मित्र राष्ट्रों की भारी सेना को हरा पाना बड़ा दुष्कार कार्य था। शाम तक नेपोलियन की सेना बुरी तरह परास्त हो गयी और उसके बचे-खुचे सैनिक भाग छूटे। स्वयं नेपोलियन भी भागकर पेरिस आ गया, उसके बाद उसने फ्रांस के पश्चिमी तट से अमेरिका की ओर भाग जाने का प्रयास किया, लेकिन ब्रिटिश नौसेना की निगाहों से बच पाना मुश्किल था। 7 जुलाई , 1815 को मित्र राष्ट्रं ने पुनः पेरिस पर कब्जा कर लिया, और वृद्ध लुई अठारहवें को पुनः फ्रांस की गद्दी पर आसीन कर दिया।


उधर नेपोलियन ने अपने पलायन की सम्भावना को मुश्किल जानकर, 15 जुलाई, 1815 को एक ब्रिटिश
सैनिक जहाज के कमान्डर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। नेपोलियन को, निर्वासन की सजा देकर; फ्रांस से बहुत दूर, दक्षिणी अटलांटिक सागर में अवस्थित सेंट हेलेना के द्वीप में भेज दिया गया। छः वर्ष बाद वहाँ, 5 मई, 1821 ई. को, 52 वर्ष की अवस्था में, उदर के कैंसर के कारण, नेपोलियन की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार इतिहास के एक चमत्कारी व्यक्तित्व का अन्त हुआ।

नेपोलियन का मूल्यांकन

इतिहास में बहुत कम व्यक्ति ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन नेपोलियन की भांति विविध, विभिन्न एवं विरोधी दृष्टिकोणों से किया गया हो। कुछ लोग नेपोलियन को एक प्रेरणास्तरोत मानते हैं, एक ऐसा अतिमानवीय
व्यक्तित्व जिसने फ्रांस को यश एवं गौरव की ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कुछ लोग उसे अधम, रक्तपिपासु प्राणी मानते हैं जिसने बर्बरता का घृणित उदाहरण प्रस्तुत किया। कुछ लोग उसे विलक्षण सैनिक प्रतिभासम्पन्न विभूति मानते हैं, जो युद्ध की तमाम बारीकियों एवं जटिलताओं से सुविज्ञ था। कुछ अन्य लोगों ने उसे दुष्ट खलनायक कहा है, जिसने 1799 से 1815 के अन्तराल में पफ्रांस के लगभग दस लाख प्राणियों को युद्धों की विभीषिका में झोंक दिया। एक ओर नेपोलियन की छवि एक ऐसे नेता के रूप में उभर कर आती है जिसने अपनी अदम्य शक्ति एवं मनोवैज्ञानिक अन्तर्दृष्टि से फ्रांस की क्रान्ति के सिद्धान्तों को पूरे यूरोप में प्रसारित कर दिया। दूसरी ओर वह एक ऐसे अत्याचारी व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है जिसने अपने आचरण में सारे नैतिक मानदण्डों को तिलांजलि दे दी और फ्रांस को अपमान और शर्म की स्थिति में ला दिया। नेपोलियन के बारे में उपर्युक्त विरोधी मान्यताओं के बावजूद, नेपोलियन के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कुछ सामान्य सहमति या अपेक्षाकृत कम असहमति वाले बिन्दुओं को ढूँढ़ा जा सकता है।

यह निर्विवाद है कि नेपोलियन इतिहास के महान्, अत्यन्त प्रतिभासम्पन्न सेनानायकों में से एक था।
वह युद्ध की कला में निष्णात था, और बहुत कम लोगों ने नेपोलियन की तरह युद्ध की सूक्ष्मताओं एवं
जटिलताओं को समझा होगा। उसके अधिकांश सैनिक अभियान सैनिक रणनीति के आदर्श उदाहरण थे। वह शत्रु को अपनी तीव्र गति, चातुर्य तथा सैनिक कौशल से दिग्भ्रमित कर देता था युद्ध के मैदान में नेपोलियन अदम्य शक्ति, असीमित आत्मविश्वास तथा गहरी अन्तर्दृष्टि का परिचय देता था । वेलिंगटन के अनुसार, युद्ध के मैदान में नेपोलियन की उपस्थिति चालीस हजार सैनिकों की शक्ति के बराबर भी। सैनिक नेतृत्व की दृष्टि से नेपोलियन की तुलना सिकन्दर महान् से की जा सकती है।

नेपोलियन एक सामान्य व्यक्ति के स्थान से ऊपर उठकर सम्राट के पद तक पहुँचा था। शून्य से सर्वस्व
तक की उसकी यांत्रा, उसकी अपनी प्रतिभा एवं अध्यवसाय का नतीजा थी। नेपोलियन का उत्कर्ष इतिहास के रूमानी, नाटकीय कथानकों में से एक है। स्वयं नेपोलियन का कथन है कि, ‘फ्रांस के राजमुकुट को मैंने जमीन पर पड़ा हुआ पाया और उसे अपनी तलवार के जोर पर ऊपर उठाया।

नेपोलियन एक महान् सेनानायक एवं विजेता ही नहीं था, वह अत्यन्त मेघावी एवं कुशल प्रशासक भी
था। उसने पफ्रांस की क्रान्ति के द्वारा आरम्भ किये गये अनेक सुधार कार्यों को आगे बढ़ाया और उन्हें सुदृढ़ रूप प्रदान किया। नेपोलियन द्वारा लागू की गई कानून-संहिता ने फ्रांस के सभी नागरिकों की कानून के समक्ष समानता के सिद्धान्त की पुष्टि कर दी। नेपोलियन ने सामन्ती- कुलीन–धार्मिक सभी प्रकार के विशेषाधिकारों की समाप्ति को व्यावहारिक सुदृढ़ता प्रदान की। वह वर्गभेदहीन समाज में विश्वास करता था, और योग्यता को मनुष्यों में अन्तर का आधार मानता था। फ्रांस के कृषकों को, नेपोलियन ने, उनके द्वारा क्रान्तिकाल में सामन्तों एवं कुलीनों से प्राप्त भूमि का स्वामित्व प्रदान कर समाजवादी दृष्टि से एक क्रान्तिकारी कार्य सम्पन्न किया। यद्यपि नेपोलियन एक निरंकुश अधिनायक था, उसने फ्रांस के नागरिकों की स्वतन्त्रता का अपहरण कर लिया, लेकिन एक प्रशासक के रूप में उसके सुधार कार्यों पर दृष्टिपात करने पर नेपोलियन की छवि एक शुभंकर तानाशाह या जनहितैषी अधिनायक के रूप में उभर कर आती है । मानवीय समानता के क्रान्तिकारी आदर्श को नेपोलियन ने व्यावहारिक दृष्टि से सुदृढ़ करने का प्रयास किया, उसका यह योगदान अभूतपूर्व एवं प्रशंसनीय था । इसी अर्थ में नेपोलियन को क्रांति का पुत्र एवं उत्तराधिकारी कहा जाता है। डेविड थामसन के शब्दों में… ‘नेपोलियन ने फ्रांस की क्रॉांति के प्रभावों को (आन्तरिक सुधारों द्वारा) विस्तृत एवं स्थायी किया…. नेपोलियन की विजयों के फलस्वरूप यूरोप में आधुनिकीकरण की हवा बहने लगी। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि नेपोलियन ने फ्रांस के गणतन्त्र की समाप्ति कर जो निरंकुश शासन स्थापित किया, वह अपनी निरंकुशता में बूबों राजवंश से दो कदम आगे ही था। पियरे लेनफे (हिस्ट्री ऑफ नेपोलियन दि फस्ट, चार खण्डों में) के अनुसार, ‘नेपोलियन वह नेता नहीं था जिसने क्रान्ति को सुदुढ़ किया, बल्कि वह हिंसा और कुटिलता से युक्त मनुष्य था जिसने स्वतन्त्रता का दमन किया, जिसने स्वतन्त्र वाणी पर प्रतिबन्ध लगा दिया, जिसने संसद एवं प्रेस को अपना गुलाम बना लिया।’ लेनफ के शब्दों में, ‘नेपोलियन में उस परम मानवीय महानता की कमी है जो आत्मा के सच्चे मूल्यांकन में निहित है; अपने लाइलाज आत्माभिमान एवं दंभ के कारण वह छोटे मनुष्यों के स्तर पर ही रहता है।

नेपोलियन अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी एवं अहंकारी व्यक्ति था। उसका धर्म उसकी महत्त्वाकांक्षा थी और
उसका सत्य उसका अपना अहंकार। अपनी सैनिक महत्त्वाकांक्षाओं के बलबूते पर यह्यपि उसने फ्रांस को
उन्नीसवीं शताब्दी के दशक में कीर्ति के शिखर पर पहुँचा दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में उसने फ्रांस के लगभग दस लाख व्यक्तियों की आहुति दे डाली। अन्त में फ्रांस को अपयश एवं अपमान ही झेलना पड़ा। नेपोलियन में अहंकार एवं दर्प की भावना इतनी प्रबल थी कि अपनी शक्ति का लाभ उठाते हुये उसने स्वयं को सम्राट पद पर प्रतिष्ठित कर लिया और इस प्रकार फ्रांस में राजतन्त्र को पुनः स्थापित कर दिया उसके निरंकृश अधिनायकवाद के मूल में उसकी घोर अहमकेन्द्रित चेतना थी।

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