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धर्मसुधार आन्दोलन की 03 धाराएँ

धर्मसुधार आन्दोलन की 03 धाराएँ

धर्मसुधार आन्दोलन या प्रोटेस्टेंट क्रान्ति का सूत्रपात सबसे पहले मार्टिन लूथर के द्वारा जर्मनी में हुआ। जहाँ पुनर्जागरण का प्रारम्भ सबसे पहले इटली में हुआ, वहाँ धर्मसुधार आन्दोलन की लहरें सबसे पहले जर्मनी में दिखाई दीं जर्मनी के बाद यूरोप के अन्य देशों में भी धर्मसुधार आन्दोलन की भावना प्रसारित हो गयी। धर्मसुधार आन्दोलन या प्रोटेस्टेंटवाद मुख्यत: तीन धाराओं के रूप में प्रकट हुआ-( 1) जर्मनी में लूथरवाद; (2) स्विट्जरलैण्ड में काल्विनवाद; तथा (3) इंग्लैण्ड में ऐंग्लिकनवाद।

01 जर्मनी का लूथरवाद

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में घटित हुए धर्मसुधार आन्दोलन या प्रोटेस्टेण्टवाद का प्रवर्तक एवं संस्थापक मार्टिन लूथर (1483-1546 ई.) था। धर्मसुधार आन्दोलन का प्रारम्भ जर्मनी में ही क्यों हुआ ? इसके लिए जर्मनी के निवासी मार्टिन लूथर का व्यक्तित्व तो उत्तरदायी है ही, लेकिन जर्मनी की कुछ विशिष्ट आन्तरिक परिस्थितियाँ भी इसमें सहायक रहीं। एक तो जर्मनी में सशक्त केन्द्रीय सरकार का अभाव था जिसके माध्यम से चर्च अपनी आज्ञाओं का जनता में सख्ती से पालन करवा सकता था । दूसरा, जैसा कि जे. ई. स्वेन ने कहा है, ‘जर्मनवासी अच्छे रोमन- कैथोलिक अनुयायी नहीं थे, न स्वभाव से, न प्रशिक्षण से । रोम से दूर अवस्थित होने के कारण सम्पर्क कीपारस्परिक कठिनाइयाँ भी थीं। मार्टिन लूथर का जन्म 10 नवम्बर, 1483 को जर्मनी के मेन्सफेल्ड क्षेत्र में एक साधारण कृषक परिवार के यहाँ हुआ था। मेन्सफेल्ड क्षेत्र ताम्रखनन उद्योग के लिए प्रसिद्ध था, और मार्टिन लूधर के पिता हैन्स लूथर ने ताम्रखनन के क्षेत्र में प्रविष्ट होकर अपनी मेहनत से एक छोटे पूँजीपति का दर्जा हासिल कर लिया। कृषक एवं नवबुर्जुआ परिवेश की पृष्ठभूमि में मार्टिन लूथर का लालन-पालन हुआ। उसकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा मेन्सफेल्ड, मेगडेबर्ग एवं ऐसेनेच के स्कूलों में हुई। इसके बाद मार्टिन लूथर को एरफर्ट विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए भेज दिया गया, जहाँ से उसने सन् 1502 में बी. ए. की डिग्री प्रात की। सन् 1505 में उसने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद मार्टिन लूथर के पिता उसे कानून के अध्ययन एवं इसी क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए प्रेरित करते रहे, लेकिन लूथर ने अकस्मात् एक मठ में प्रवेश प्राप्त कर लिया जहाँ उसने धार्मिक विषयों का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया। वह स्वयं साधु बन गया । मठ के उच्चाधिकारियों के कहने पर उसने कुछ समय के लिए विटनवर्ग विश्वविद्यालय एवं उसके बाद एरफरट विश्वविद्यालय में अस्थायी प्रोफेसरशिप स्वीकार कर ली। इसके बाद उसने रोम की यात्रा की जहाँ उसने रोम के धार्मिक जीवन में व्याप्त आडम्बर एवं अनाचार को स्वयं देखा। इसके बाद वह पुनः अपने मठ में लौट आया और धार्मिक विषयों के अनुशीलन एवं उन पर व्याख्यानों में व्यस्त हो गया।

चिन्तन-मनन की इस प्रक्रिया में मार्टिन लूथर ने अपने उस विशिष्ट धार्मिक सिद्धान्त को प्रस्तुत किया जो बाद में प्रोटेस्टेंटवाद का आधार बना था इस सिद्धान्त के अनुसार, मनुष्य अपने कर्मों से नहीं बल्कि श्रद्धा एवं विश्वास से ईश्वर तक पहुँच सकता है। इस सिद्धान्त को संक्षेप में ‘जस्टिफिकेशन बाई फेथ’ (आस्था या श्रद्धा के माध्यम से पापमुक्ति या मोक्ष) के नाम से जाना जाता है।


रोमन कैथोलिक चर्च में व्याप्त अव्यवस्थाओं के प्रति मार्टिन लूथर का विद्रोह प्रखर रूप में 1517 ईस्वी में उस समय व्यक्त हुआ जबकि पोप का एक प्रतिनिधि टेटजेल, पोप की ओर से, चर्च द्वारा जारी अनुग्रह-पत्रों या क्षमापत्रों (इंडलजेन्सस) की बिक्री कर रहा था टेटजेल का कहना था कि, ‘अनुग्रह-पत्रों के लिए दिए गए पैसों की खनखनाहट के साथ-साथ ही सम्बद्ध व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग में प्रवेश प्राप्त कर लेती है।’ टेटजेल के इस व्यवहार से मार्टिन लूथर बड़ा क्षुब्ध एवं क्रोधित हुआ। धर्म के नाम पर यह खुला भ्रष्टाचार था। मार्टिन लूथर ने अनुग्रह पत्रों की उक्त पद्धति के प्रति अपनी शंकाएँ एवं आलोचनाएँ कुछ प्रतिस्थापनाओं के रूप में लैटिन भाषा में शब्दांकित की और उन्हें ‘नाइन्टी-फाइव थीसिस’ (95 प्रतिस्थापनाएँ) के नाम से 31 अक्टूबर, 1517 को विटनबर्ग के कैसलचर्च के द्वार पर लटका दिया। लूथर द्वारा रचित ‘नाइन्टी- फाइव थीसिस’ चर्च की व्यवस्था के विरुद्ध स्पष्ट, लिखित एवं प्रखर अभिव्यक्ति थी और इसी तिथि से यूरोप में धर्मसुधार आन्दोलन का शंखनाद माना जाता है।


मार्टिन लूथर की उपर्युक्त ’95 प्रतिस्थापनाएँ’ जर्मनवासियों में लोकप्रिय हो गई, उसकी मुद्रित प्रतियों
एवं जर्मन अनुवाद को लोगों ने बहुत चाव से पढ़ा क्षमा-पत्रों की बिक्री बहुत कम हो गई। पोप लियो दशम
ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से मार्टिन लूथर को शांत रहने के लिए राजी करने का प्रयास किया, लेकिन
लूथर ने अपनी प्रतिस्थापनाओं का प्रचार यथावत् जारी रखा । लूथर ने पोप को पत्र लिखकर उसे अपने उपर्युक्त विचारों से अवगत कराया। लूथर की स्पष्ट मान्यता थी कि एक ईसाई की आध्यात्मिक प्रगति के लिए पादरियों।द्वारा किये जाने वाले आनुष्ठानिक कर्मों की कोई सार्थकता नहीं है; एक सच्चा ईसाई ईश्वर की कृपा से, ईश्वर में श्रद्धा एवं आस्था के माध्यम से ही, पाप मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर सकता है। ईसाई धर्मावलंबी को आवश्यकता पड़ने पर बाइबिल की शिक्षाओं से प्रत्यक्ष प्रेरणा लेनी चाहिए। प्रकारांतर से, लूथर ने पोप एवं चर्च की अनिवार्यता के सिद्धान्त को अस्वीकार कर दिया। मार्टिन लूथर ने अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए सन् 1520 में तोन लघु-पुस्तिकायें प्रकाशित कीं; इन पुस्तिकाओं में प्रोटेस्टेंट आन्दोलन की आधारभूत मान्यताओं का प्रतिपादन है। ये तीन लघु पुस्तिकायें इस प्रकार हैं-

‘एन ओपन लेटर टू दि क्रिश्चियन नोविलिटी ऑफ दि जर्मन नेशन कन्सर्निंग दि रिफार्म ऑफ दि क्रिश्चियन स्टेट’ (ईसाई राज्य में सुधार के सम्बन्ध में जर्मन राष्ट्र के सामंतों के नाम एक खुला पत्र: जून- अगस्त, 1520)। इस पत्र में लूथर ने स्पष्ट किया कि ईसाइयत में एक पादरी किसी कार्यालय के कर्मचारी की तरह है, प्रत्येक ईसाई को स्वविवेक से यह जानने का अधिकार है कि सही क्या है, गलत क्या है, तथा पोप धर्मग्रन्थ (बाइबिल) के विरुद्ध आचरण करता है तो एक ईसाई के धर्मग्रन्ध का साथ देना चाहिए तथा पोप का विरोध करना चाहिए।

‘दि बेबीलोनियन कैप्टिविटी ऑफ दि चर्च’ (‘चर्च की बेबीलोनियाई कैद’ : अगस्त, 1520) । इस पुस्तिका में लूथर ने चर्च के अधिकांश अनुष्ठानों की निरर्थकता को उजागर किया है ।

‘ए ट्रिटाइज ऑफ क्रिश्चियन लिबर्टी’ (‘ एक ईसाई की मुक्ति का ग्रन्थ’ : नवम्बर, 1520) । इस पुस्तिका में लूथर ने अपने इस सिद्धान्त की विशद् एवं गहन व्याख्या की है कि सत्कर्मों से व्यक्ति मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है। मुक्ति के लिए ईश्वर में श्रद्धा एवं उसकी कृपा आवश्यक है। मार्टिन लूथर की उपर्युक्त गतिविधियों से पोप बहुत क्रोधित हुआ और उसने मार्टिन को धर्मद्रोही घोषित कर, उसके पास ईसाई धर्म से निष्कासन का आदेश (बुल ऑफ एक्स-कम्यूनिकेशन) भेज दिया मार्टिन लूथर ने विटनबर्ग के एक उत्साही जनसमूह के सामने पोप के इस आदेश की प्रति को सार्वजनिक रूप से जलाया (10 दिसम्बर, 1520)। मार्टिन लूथर इस घटना के बाद से एक धार्मिक विचारक के स्थान पर एक धर्मसुधारक एवं राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर कर सामने आया । लूथर को जर्मनी की जनता का नैतिक एवं भावनात्मक समर्थन मिलने लगा। 1521 में पोप के दबाव में सम्राट चार्ल्स पंचम ने लूथर को वम्म्स की राज्य परिषद् में अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बुलाया। लूथर ने अपने विचार वापिस लेने से मना कर दिया।

परिषद् ने लूथर की सभी गतिविधियों पर राजकीय प्रतिबंध लगाने तथा उसकी पुस्तकों को जलाने के आदेश दिये। लेकिन लूथर के एक शुभचिंतक ड्यूक प्रेडरिक ने लूथर को एक सुरक्षित स्थल पर छिपा दिया। अपने इस दस माह के अज्ञातवास में लूथर ने अनेक पत्रों एवं पुस्तिकाओं की रचना की इस दौरान लिखी गई पुस्तिका ‘ आन मोनास्टिक वोज’ में लूथर ने संन्यस्त जीवन को निरर्थक बताया है, तथा धर्मपुरुषों के विवाह की अनुशंसा की है। इस दौरान लूथर ने बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद किया जो सितम्बर, 1522 में प्रकाशित होने के कारण ‘सेप्टेम्बर टेस्टामेण्ट’ के नाम से लोकप्रिय हो गया। लूथर के विचारों को लोकप्रियता मिलने लगी थी, जर्मनी में उसे व्यापक जनसमर्थन मिल रहा था।

जर्मनी के स्थानीय नरेश एवं सामंत भी व्यक्तिगत कारणों से जर्मनी में गृहयुद्ध एवं अशांति की स्थिति चाहते
थे; उनमें से अधिकांश ने मार्टिन लूधर का साथ दिया जर्मनी का नवधनाढ्य मध्यम वर्ग भी लूथर का प्रशंसक था। क्रमश: जर्मनी दो गुटों में विभाजित हो गया-एक ओर सम्राट चाल्ल्स पंचम के नेतृत्व को स्वीकार करने वाले कैथोलिक जर्मन, तथा दूसरी ओर मार्टिन लूथर के विचारों को मानने वाले प्रोटेस्टेण्ट जर्मन इन दोनों गुटों में जर्बदस्त संघर्ष की स्थिति बन गई थी, जिसकी समाप्ति 1555 में आग्सबर्ग की संधि के साथ हुई। इस।संधि द्वारा लूथरवाद को वैधानिक मान्यता दे दी गई । प्रत्येक राज्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी एक धर्म।को अपना सकता था- रोमन कैथोलिक धर्म या लूथरकृत प्रोटेस्टेण्ट धर्म आग्सबर्ग की संधि लूथरवाद एवं प्रोटेस्टेण्ट धर्म की विजय थी जर्मनी के उत्तरी राज्यों ने लूधरवाद को स्वीकार कर लिया, यद्यपि दक्षिण जर्मनी के राज्य रोमन कैथोलिक चर्च के प्रति आस्थावान बने रहे। उत्तरी जर्मनी से प्रसारित होकर लूथरवाद डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड तथा पोलैंड में लोकप्रिय हुआ।

02 स्विट्जरलैण्ड में काल्विनवाद

लूथरवाद के बाद प्रोटेस्टेण्ट धर्म की दूसरी महत्त्वपूर्ण धारा स्विट्जरलैण्ड में काल्विनवाद के रूप में उभर कर आयी, जो लोकप्रिय होकर बाद में फ्रांस, नीरदलैण्ड्स, हंगरी, जर्मनी, पोलैण्ड तथा इंग्लैण्ड में प्रसारित हुई। काल्विनवाद किसी एक व्यकव्ति की रचना नहीं थी; इसके मूल विचार का संस्थापन उलरिच ज्विंगली (1484-1531 ई.) ने किया, तथा उसकी विस्तृत एवं शास्त्रबद्ध व्याख्या जॉन कौल्विन (1509 1564)
ने प्रस्तुत की। ल्यूकस (रिनेसा एंड दि रेफर्मेशन) के शब्दों में, ‘काल्विनकृत धर्मशास्त्रीय व्यवस्था प्रोटेस्टेण्ट
खेमे के सिद्धान्तों का सर्वाधिक वाला शक्तिशाली क्रान्तिकारी था, लेकिन उसके विचार एक शा्त्रीय व्यवस्था का रूप नहीं ले पाये स्विट्जरलैण्ड में धर्मसुधार की मशाल उलरिच ज्विंगली (1484-1531 ई.) ने रोशन की। दिसम्बर. 1518 ई. में उसने ज्यूरिच की एक चर्च में नौकरी प्राप्त कर ली तथा धर्मोपदेश का कार्य आरम्भ किया। उसने अपने उद्देश्यों को शुद्ध बाइबिल पर आधारित रखा और अपने अनुयायियों को भी बाइबिल से प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया उसने चर्च तथा पादरियों द्वारा मनुष्य के धार्मिक जीवन में की जाने वाली मध्यस्थता एवं अनावश्यक हस्तक्षेप की आलोचना की। उसने बाइबिल की शिक्षाओं के प्रतिकूल किए जाने वाले तथाकथित धार्मिक क्रियाकलापों एवं आचरणों की निन्दा की। सन् 1524 में ज्यूरिच की चर्च को ज्विंगली के सिद्धान्तों पर आधारित कर दिया गया। यह स्विट्जरलैण्ड में प्रोटेस्टेण्टवाद की विजय का संकेत था। ज्विंगली के विचार स्विट्जरलैण्ड के अन्य क्षेत्रों में भी लोकप्रिय होने लगे और उन्हें मान्यता मिलने लगी रोमन कैथोलिक वैज्ञानिक प्रस्तुतिकरण था लूधर एक गहरी धार्मिक अनुभूतियों अनुयायियों और ज्विंगली के समर्थकों ( प्रोटेस्टेण्ट अनुयायी) के मध्य तनाव एवं युद्ध की स्थिति बन गई । दुर्भाग्यवश ऐसे ही एक युद्ध में 1531 ई. में ज्विगली को मार डाला गया लेकिन उसकी मृत्यु के समय तक प्रोटेस्टेण्टवाद स्विट्जरलैंण्ड में काफी लोकप्रिय हो चुका था। ज्विगली के अधूरे कार्य को कुछ समय बाद जॉन काल्चिन (1509-1564) ने आगे बढ़ाया। उसने प्रोटेस्टेण्टवाद की न केवल विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की, बल्कि उसे लोकप्रियता के नये शिखरों तक पहुँचाया। काल्विन द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘इंस्टीट्यूटस ऑफ दि क्रिश्चियन रिलीजन’ प्रोटेस्टेण्टवाद की एक सशक्त शास्त्रीय व्याख्या थी। जॉन काल्विन मूलत: फ्रांस का निवासी था लेकिन फ्रांस के राजा ने उसके विचारों को स्वीकार नहीं किया, अत: उसने भाग कर स्विट्जरलैण्ड के जेनेवा नगर-राज्य में शरण ली। स्विट्जरलैण्ड में आने के बाद उसने अपने धार्मिक चिन्तन को निखारा, व्यवस्थित किया और उपर्युक्त पुस्तक की रचना की। काल्विन के दो आधारभूत विचार इस प्रकार हैं : प्रथम, एक ईसाई धर्मानुयायी की आध्यात्मिक प्रगति का एकमात्र निर्देशक धर्मग्रन्थ बाइबिल है जिसमें स्वयं ईश्वर ने मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित किया है। द्वितीय, आचरण में सादगी एवं नैतिकता अनिवार्य है काल्विन के नेतृत्व में जेनेवा का नगर राज्य प्रोटेस्टेण्ट धर्म का एक आदर्श केन्द्र बन गया । काल्विनवाद बड़ी शीघ्रता से स्विट्जरलैण्ड एवं फ्रांस में लोकप्रिय हो गया, बाद में इसका प्रसार यूरोप के अन्य देशों- स्काटलैण्ड, नीदरलैण्ड्स, हंगरी, पोलैण्ड, इंग्लैण्ड तथा लूथरवाद के केन्द्र जर्मनी में भी हुआ। काल्विनवाद का प्रसार-क्षेत्र लूथरवाद की तुलना में अधिक था।

03 इंग्लैण्ड में एंग्लिकनवाद

प्रोटेस्टेण्ट समूह का तीसरा महत्त्वपूर्ण वर्ग इंग्लैण्ड में एंग्लिकनवादियों के रूप में उभर कर सामने आया। इंग्लैण्ड में धर्मसुधार के कार्य का आरम्भ स्वयं राजा के माध्यम से हुआ, एवं राजा का निजी स्वार्थ इसका तात्कालिक कारण बना, यद्यपि चर्च एवं पादरियों की गतिविधियों के विरोध में असंतोष की भावना इंग्लैण्ड में पहले से ही विद्यमान थी। इंग्लैण्ड की साहित्यिक रचनाओं में पादरियों को लोभी प्रकृति का कहा गया है। रोमन कैथोलिक चर्च ने इंग्लैण्ड की एक-तिहाई भूमि पर अधिकार कर रखा है। मैजेनिस एवं ऐपल के शब्दों में, ‘इंग्लैण्ड में पोप के हस्तक्षेप से इतना अधिक असंतोष व्याप्त था कि सन् 1351 में ही पोप को इंग्लैण्ड में चर्च के पदों पर नियुक्तियाँ करने की मनाही करने का एक आदेश जारी किया गया था। इस तरह इंग्लैण्ड सुधार के लिए परिपक्व हो चुका था और जब एक राजा ने अपने मनचाहे ढंग से कुछ भी करने के अधिकार पर जोर दिया तब तीर छूट गया। इंग्लैण्ड का तत्कालीन शासक ट्यूडर परिवार का हेनरी अष्टम् ( 1509 1547 ई.) था जिसने अपने भाई की विधवा कैथरीन से विवाह किया था ईसाई धार्मिक कानून में इस प्रकार के विवाह की अनुमति नहीं थी, लेकिन तत्कालीन पोप जूलियस द्वितीय ने इस विवाह के लिए हेनरी को विशेष आज्ञा प्रदान की। कैथरीन से हेनरी को कोई पुत्र नहीं हुआ। उधर, हेनरी कैथरीन की एक सुन्दर परिचारिका, एन बोलिन, के मोहजाल में फँस गया। हेनरी अब कैथरीन को तलाक देकर एन बोलिन से विवाह करना चाहता था। हेनरी ने कैथरीन से तलाक की अनुमति देने के लिए पोप से कहा। पोप ने उसे इस तलाक की आज्ञा नहीं दी, क्योंकि स्पेन का राजा चाल्ल्स पंचम कैथरीन का भतीजा था और पोप स्पेन के राजा को नाराज नहीं करना चाहता था पोप के इस निर्णय से क्रुद्ध होकर हेनरी ने इंग्लैण्ड की पाल्लियामेंट में यह कानून पारित करवा लिया कि इंग्लैण्ड का राजा ही इंग्लैण्ड की चर्च का सर्वोपरि प्रधान है और पोप का उस पर कोई प्रभाव नहीं है। इसके बाद हेनरी ने कैथरीन को तलाक देकर एन बोलिन से विवाह कर लिया। पोप ने हेनरी को धर्म से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार इंग्लैण्ड की चर्च रोमन कैथोलिक चर्च से अलग हो गई । इंग्लैण्ड की चर्चों को ऐग्लिकन या राष्ट्रीय चर्च घोषित कर दिया गया इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेण्टवाद की विजय इस प्रकार उपर्युक्त नाटकीय घटनाक्रम केउपरान्त हुई। लेकिन हेनरी के काल में ऐंग्लकनवाद के रूप में कोई उल्लेखनीय सैद्धान्तिक परिवर्तन इंग्लैण्डकी चर्चों में नहीं हुआ, मुख्य परिवर्तन यही हुआ कि रोम में अवस्थित पोप के स्थान पर इंग्लैण्ड का राजा चर्च का प्रधान हो गया। हेनरी के उत्तराधिकारी एडवर्ड पष्ठ (1547-1553 ) के काल में इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा के प्रचार में विशेष प्रगति हुई। चर्च की अनेक पुरानी परम्पराओं को त्याग दिया गया, प्रार्थनाएँ लैटिन के स्थान पर अंग्रेजी में की जाने लगीं तथा अंग्रेजी में एक ‘बुक ऑफ कामन प्रेयर’ की रचना की गई ।

एडवर्ड के बाद उसकी बहन मेरी ट्यूडर (1553-1558) शासक बनी, जो कट्टर रोमन कैथोलिक थी। उसने प्रोटेस्टेण्ट धर्मसुधार आंदोलन एवं प्रतिवादी धर्मसुधार अनुयायियों पर अनेक अत्याचार किए, इसलिए उसे ‘खुनी मेरी’ भी कहा जाता है लेकिन एलिजाबेथ (1558- 1603) ने अपने काल में पुनः ऐग्लिकन चर्च की सर्वोपरिता स्थापित की। उसके काल में ऐग्लिकन विचारधारा के सिद्धान्तों को अधिक विस्तृत रूप में “39 सिद्धान्तों” के नाम से इंग्लैण्ड की पालर्लियामेंट द्वारा पारित किया गया। इन सिद्धान्तों में बाइबिल को जीवन का पथप्रदर्शक मानने तथा ईश्वर में आस्था के बल पर मुक्ति प्राप्त करने के विचार पर बल दिया गया है। एलिजाबेथ के काल में इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा ऐग्लिकनवाद के रूप में दृढ़ता से स्थापित हो गयी ।

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