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धर्मसुधार आंदोलन के 07 परिणाम

धर्मसुधार आंदोलन के 07 परिणाम

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप के इतिहास में घटित धर्मसुधार आन्दोलन ने यूरोप के धार्मिक परिदृश्य पर तो भारी उथल-पुथल मचा ही दी, साथ ही इसके कुछ प्रभाव यूरोप के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवन में भी दिखाई देने लगे। जैसा कि ल्यूकस (रिनेसां एंड दि रेफर्मेशन) ने लिखा है, ‘सोलहवीं शताब्दी की धार्मिक ऊहापोह ने, पुनर्जागरण की भाँति, भविष्य की संस्कृति पर एक अनूठा प्रभाव डाला।

01 ईसाइयत की शुद्ध नवीन व्याख्याएँ

धर्मसुधार आन्दोलन या प्रोटेस्टेण्टवाद बाइबिल की मूल शिक्षाओं की ओर पुनरागमन था इसके अन्तर्गत ईसाइयत की उन पांडित्यपूर्ण व्याख्याओं को अस्वीकार कर दिया गया जिन्हें मध्यकालीन पादरियों ने रूढ़ बना दिया था पादरियों द्वारा प्रचलित उन आनुष्ठानिक कर्मकाण्डों को भी प्रोटेस्टेण्ट विचारकों ने अनावश्यक माना, जिनको सम्पन कराने के लिए पादरियों अनिवार्य था। प्रोटेस्टेण्ट विचारकों का मानना था कि ईश्वर और व्यक्ति के मध्य सीधा सम्बन्ध है अपनी मुक्ति के लिए व्यक्ति को बाइबिल की शिक्षाओं से ही प्रत्यक्ष प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए, पोप या पादरियों की कृपा पर अवलम्बित नहीं रहना चाहिए प्रोटेस्टेण्ट विचारकों के अनुसार, चर्च, पोप एवं पादरी ईश्वर के विनम्र सेवक मात्र हैं, इसी रूप में उनकी भूमिका स्वीकार्य हो सकती है। यदि वे अहंकारी, दंभपूर्ण व्याख्याकार हैं, या उनके आचरण में नैतिकता का अभाव है, तो उनका विरोध किया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रोटेस्टेण्ट विचारकों ने अपनी शुद्ध नवीन व्याख्याओं से ईसाइयत को रूढ़ियों और आडम्बरों की जड़ता से मुक्त किया, तथा पोप एवं चर्च के भय से आक्रान्त ईसाइयों में यह आत्मविश्वास जाग्रत किया कि बाइबिल की रोशनी में.वे स्वयं अपनी मुक्ति प्राप्त करने में सक्षम हैं।

02 ईसाइयों का द्विध्रुवीकरण एवं विकेन्द्रीकरण

प्रोटेस्टेंट विचारधारा के प्रसार के साथ ही ईसाई जगत की एकता भंग हो गई और वह स्पष्टत: दो बड़े खेमों में बँटा गया कैथोलिक ईसाई तथा प्रोटेस्टेण्ट ईसाई। इन दो बड़े खेमों में भी आंतरिक वर्ग थे , जैसे कि प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों में लूथरवादी, काल्विनवादी तथा.ऐंग्लिकन विचारधाराओं के लोग थे ल्यूकस के अनुसार, ‘शताब्दियों तक यूरोपवासियों के पूर्वजों ने जीवन एवं.धर्म के बारे में कुछ निश्चित सत्यों की शिक्षा दी थी। रोम की मुख्य चर्च की इस गतिविधि ने मध्यकालीन सभ्यता को एक सुनिश्चित एकरूपता प्रदान की थी। प्रोटेस्टेण्ट क्रान्ति ने यूरोप की संस्थागत धार्मिक एकरूपता को भंग कर दिया और उसके स्थान पर प्रतिद्वन्दी चर्चां का एक समूह खड़ा हो गया।

03 ईसाइयों में धार्मिक वैमनस्य एवं रक्तपात

धर्मसुधार आन्दोलन के बाद ईसाई समुदाय के दो
बड़े गुटों कैथोलिक गुट तथा प्रोटेस्टेण्ट गुट में बंट जाने के बाद इन दोनों गुटों में पारस्परिक असहिष्णुता,।वैमनस्य तथा हिंसा-प्रतिहिंसा की स्थितियाँ बन गई जो धर्मसुधार आन्दोलन का एक दुःखद परिणाम था। इसके बाद धार्मिक युद्धों, अत्याचार तथा उत्पीड़न का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ, वह ईसाईयत के नाम पर एक कलंक है। फ्रांस में 1562 से 1588 के मध्य लगभग आठ धार्मिक युद्ध लड़े गये जिन्होंने फ्रांस में अशान्ति एवं असुरक्षा का वातावरण बनाए रखा। फ्रांस के राजाओं ने इस काल में प्रोटेस्टेंट ह्यूगनाटों पर बड़े निर्मम अत्याचार किये। अगस्त, 1572 ईस्वी में फ्रांस में ‘सेंट बार्थोलोम्यू दिवस हत्याकांड’ के नाम से इतिहास में ज्ञात एक बड़ी त्रासदी हुई, जिसके अन्तर्गत कैथोलिकों द्वारा सुनियोजित तरीके से, प्रोटेस्टण्टों की सामूहिक हत्यायें की गईं इनमें से अनेक को रात में सोते हुए ही मार डाला गया, या घरों से उठाकर नीचे फेंक दिया गया। 1618 से 1648 ईस्वी के मध्य जर्मनी में ‘तीस वर्षीय युद्ध’ लड़ा गया, जिसके अन्तर्गत कैथोलिकों और प्रोटेस्टेण्टों के मध्य धार्मिक वितृष्णा के रक्तरंजित एवं वीभत्स घटनाक्रम हुए। इंग्लैण्ड में मेरी ट्यूडर (1553- 1558 ई.) के शासन काल में प्रोटेस्टेण्ट अनुयायियों को बड़ी जबर्दस्त यातनाएँ दी गईं, अनेक बिशपों को जीवित जला दिया गया। अपने नृशंस धार्मिक उत्पीडन के कारण मेरी ट्यूडर को ‘ब्लडी (खूनी) मेरी’ कहा नखरे उठाना जाता है। प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों द्वारा भी कैथोलिक ईसाइयों का अनेक देशों में बड़ा वीभत्स दमन किया गया जैसा कि एगन फ्राइडेल (ए कल्चरल हिस्ट्री आफ यूरोप) ने लिखा-‘प्रोटेण्टेण्टवाद लगभग उन सभी देशों में जहाँ वह विजयी रहा, अपने साथ कठोर असहिष्णुता की व्यवस्था लेकर आया, जिसका प्रमुख कारण था- राज्य की चर्चो को प्रमुखता का स्थान और राज्य, स्वयं अपनी प्रकृति से, एक सर्वाधिक असहिष्णु तंत्र होता है।’

04 राजत्व के प्रभाव एवं नियन्त्रण में वृद्धि

जिन देशों में प्रोटेस्टेण्ट धर्म को अपना लिया गया, उन देशों के शासकों के प्रभाव एवं शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इन देशों पर रोमन कैथोलिक चर्च एवं पोप के अधिकार समाप्त हो गये। ये सारे अधिकार इन देशों के शासकों ने प्राप्त कर लिए, पूर्व में रोमन कैथोलिक चर्च के अधीन जो विपुल भूमि एवं सम्पत्ति थी, उस पर भी इन शासकों का नियन्त्रण स्थापित हो गया। यह माना जाता है कि लूथरवाद एवं ऐंग्लिकवाद ने राष्ट्रीय शासकों के निरंकुशवाद में वृद्धि की। लूथर ने बाइविल के आधार पर सेंट पाल के इन विचारों का समर्थन किया कि राज्य दैवी अधिकार से चलते हैं और दैविक अधिकारसम्पन्न राजाओं की आज्ञा का पानल प्रजा का कर्त्तव्य है। इंग्लैण्ड में ऍग्लिकनवाद तथा राष्ट्रीय चर्चों की स्थापना के साथ ही वहाँ के राजा सर्वशक्तिसम्पन्न हो गये कुछ विद्वानों ने काल्विन के कुछ कथनों के आधार पर उसे प्रजातांत्रिक भावना का समर्थक माना है, लेकिन काल्विन की सम्पूर्ण विचारधारा के परिदृश्य में यह बात सही नहीं जान पड़ती। काल्विन ने भी राज्य को दैवीय शक्ति-सम्पन्न कहा है। उसका स्पष्ट कथन है कि कुलीनतंत्र को ही आवश्यक परिस्थितियों में राज्य का विरोध करने का अधिकार है, आम प्रजाजन को नहीं। ल्यूकस के अनुसार, ‘अनेक लेखकों ने प्रजातंत्र के शिक्षक के रूप में काल्विन के महत्त्व को बहुत अतिशयोक्तिपूर्वक वर्णित किया है जबकि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि लूथर और काल्विन दोनों पुनर्जागरण युग की राजनीतिक मानसिकता के विवर्त में ही घूम रहे थे जिसके अनुसार राज्य निर्बाध शक्तिसम्पन्न है और उसमें कुलीनतन्त्र का विशेष महत्त्व है।

05 राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा का विकास

यूरोप के विभिन्न देशों में स्थित कैथोलिक ईसाइयों का धार्मिक केन्द्र रोम में अवस्थित था, अत: उनकी धार्मिक आस्था राष्ट्रीयता का अतिक्रमण करती थी। प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय राष्ट्र-केन्द्रित थे, राष्ट्रीय चेतना ने उनके विकास में योगदान दिया, तथा प्रतिफल के रूप में उन्होंने राष्ट्रीयता की भावना को दृढ़तर किया। इंग्लैण्ड में ऐंग्लिकनवाद को अपनाने के बाद सारी चर्चों को राष्ट्रीय चर्च घोषित कर दिया गया। ल्यूकस के शब्दों में, ‘धर्म सुधार के युग में राष्ट्रवाद एक महत्त्वपूर्ण शक्ति थी। लूथरवाद ने जहाँ भी जड़ें जमायों, वहाँ वह राष्ट्रवाद का पुष्टिकारक बन गया।’ प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन के करण धर्म एक राष्ट्रीय वस्तु बन गया। इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रों की शत्रुता में धर्म भी एक प्रश्न बन गया, जैसे कि ऐंग्लिकनवादी इंग्लैण्ड बनाम कैथोलिक स्पेन। धर्मसुधार आन्दोलन ने एक राष्ट्रवादी राज्य के निर्माण में सहायक भूमिका निभायी।

लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय चर्चों की स्थापना ने राष्ट्रीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण
भूमिका निभाई। रोमन कैथोलिक चर्चों में प्रार्थनाएँ लैटिन में की जाती थीं, बाइबिल भी लैटिन में ही उपलब्ध थी। प्रोटेस्टेण्ट चर्चों में धार्मिक क्रियाकलापों में लैटिन के स्थान पर राष्ट्रीय भाषाओं को अपनाया जाने लगा। ल्यूथर ने स्वयं बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया, जिसे जर्मन भाषा एवं साहित्य के विकास में एक महान् साहित्यिक पड़ाव माना जाता है। बाइबिल के अनुवाद अन्य देशों -फ्रांस, इंग्लैण्ड, इटली, स्पेन, नीदरलैण्ड्स, डेनमार्क, स्वीडन, आइसलैंड, फिनलैंड, हंगरी आदि में भी स्थनीय भाषाओं में किए गए। प्रार्थनाएं भी लोकभाषाओं में की जाने लगी। धर्मोपदेश तथा धार्मिक संगीत में भी राष्ट्रीय भाषाओं का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार राष्ट्रीय भाषाओं में विशद् साहित्यिक रचनाएँ हुई। पुनर्जागरण युग में भी राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में अभिवृद्धि हुई। मारवर्ग, लीडन, जेनेवा एवं अन्य स्थलों पर मानववादी शिक्षा पद्धति पर आधारित प्रोटेस्टेण्ट विश्वविद्यालय खोले गए। बाइबिल की शिक्षाओं के अध्ययन पर जोर दिया जाने लगा।

06 आर्थिक प्रभाव

धर्मसुधार आन्दोलन के आर्थिक प्रभावों का सही आकलन कर पाना मुश्किल है, लेकिन कुछ आर्थिक प्रवृत्तियों के विकास को धर्मसुधर आन्दोलन के कारण उपजी मानसिकता से जोड़ा जा सकता है। रोमन कैथोलिक चर्च सूदखोरी एवं धनसंचय की प्रवृत्ति की निन्दा करती थी। प्रोटेस्टेण्ट चर्चों ने मध्यकाल में ईसाइयत द्वारा प्रचलित इन आर्थिक प्रतिबन्धों को निरर्थक माना; इससे व्यापारियों का उत्साह
के बाद धर्मसुधार के धर्मसुधार बढ़ा और क्रमशः व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन मिला। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि धर्मसुधार ने पूँजीवादी प्रवृत्तियों के विकास में योगदान दिया। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने अपनी पुस्तक ‘दि प्रोटेस्टेंट एथिक एण्ड दि स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म ‘में पूँजीवाद के विकास में धर्मसुधार आन्दोलन की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित किया है। ईसाई चर्चों एवं मठों की विपुल भूमि एवं सम्पत्ति पर राज्य का अधिकर हो जाने के कारण इस पूँजी के उत्पादक प्रयोग की सम्भावनाएँ खुल गई थीं।

07 प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन या रोमन कैथोलिक चर्च में सुधार


प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा की बढ़ती हुई सफलता का एक परिणाम यह निकला कि रोमन कैधोलिक चर्च के अधिकारियों में घबराहट फैल गई। प्रारम्भ में पोप एवं कैथोलिक चर्च के कट्टर अनुयायियों का मानना था कि दमन से प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा को समाप्त किया जा सकता है, लेकिंन जब युरोप के विभिन्न देशों तथा वहाँ के शासकों ने प्रोटेस्टेण्ट विचारधारा को मान्यता देना प्रारम्भ कर दिया, तो उन्होंने इस चुनौती का सामना करने के लिए रोमन कैथोलिक चर्च के सिद्धान्तों तथा संगठन में आन्तरिक सुधार द्वारा इसे सशक्त बनाने की योजना बनाई। रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा प्रोटेस्टेण्ट अन्दोलन की सफलता से भयभीत होकर अपनाई गई इस आन्तरिक सुधार प्रक्रिया को प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन कहा जाता है।

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