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धर्मसुधार आंदोलन के 06 कारण

धर्मसुधार आंदोलन के 06 कारण

धर्मसुधार आन्दोलन का अर्थ

धर्मसुधार आन्दोलन (Reformation ) यूरोप में ईसाई धर्म के प्रति, सोलहवीं शताब्दी में घटित हुई, उस धार्मिक असंतोष एवं विप्लव को कहा जाता है जिसके परिणामस्वरूप ईसाई धर्म के अनुयायी स्पष्टत: दो
भागों में बँट गये-कैथोलिक ईसाई एवं प्रोटेस्टेण्ट ईसाई । यह असंतोष इतने मुखर एवं बलवती रूप में व्यक्त हुआ कि इसकी परिणति वस्तुत: ईसाई धर्म में सुधार के रूप में नहीं, बल्कि एक धार्मिक क्रान्ति के रूप में हुई, जिसने ईसाई धर्म के अन्तर्गत, भिन्न मान्यताओं पर आधारित, एक नवीन सम्प्रदाय यानी प्रोटेस्टेण्ट चर्च को जन्म दिया| यूरोप में तथाकथित धर्मसुधार आन्दोलन (रेफर्मेशन) वास्तव में ‘धर्मसुधार’ नहीं, एक ‘धर्मविद्रोह’ (प्रोटेस्टेण्ट रिवोल्ट) एवं धार्मिक क्रान्ति थी। इसके बाद कैथोलिक ईसाई धर्म में जो आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई, उसे ‘प्रति -धर्मसुधार आन्दोलन’ (काउंटर-रेफर्मेशन) कहा जाता है ।

धर्मसुधार आन्दोलन (रेफर्मेशन) से पूर्व ईसाइयों की एकता अविच्छिन्न थी। सभी ईसाई रोमन कैथोलिक
चर्च को धार्मिक आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र मानते थे । इस चर्च को ईसा मसीह द्वारा संस्थापित माना जाता
था, चर्च के कथन को अन्तिम सत्य या ब्रह्मवाक्य माना जाता था, पोप एवं चर्च के अन्य पदाधिकारी सत्य एवं पवित्रता की प्रतिमूर्ति माने जाते थे रोमन कैथोलिक चर्च मध्यकालीन यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली धार्मिक संस्था थी, ईसाइयों के लिए यह एक अनिवार्य एवं अपरिहार्य सत्य थी। मनुष्य के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन पर भी चर्च का जबर्दस्त नियन्त्रण था।

मध्यकालीन कैथोलिक चर्च की क्या विशेषताएँ थीं ? इसके क्या अधिकार एवं प्रभाव थे ? प्रथम, कैथोलिक चर्च की सदस्यता सभी ईसाइयों के लिए अनिवार्य थी। चर्च का प्रभाव सार्वभौमिक एवं विश्वव्यापी (कैथोलिक) होना चाहिए, इसी अपेक्षा में चर्च के साथ ‘कैथोलिक’ शब्द का प्रयोग किया जाता था रोमन साम्राज्य के पतन के बाद जो अव्यवस्था की स्थिति बनी, उस अन्तराल में चर्च सबसे शक्तिशाली एकल संस्था के रूप में उभर कर आई और उसकी यह स्थिति पूरे मध्यकाल में बनी रही। रोमन साम्राज्य की अनुकृति पर ही रोमन चर्च के संगठन की स्थापना की गई। रोम की सेंट पीटर्स चर्च को सर्वोच्च चर्च मान लिया गया क्योंकि ऐसा माना जाता था कि इस चर्च की स्थापना ईसा मसीह के निर्देश पर की गई थी। अत: रोमन कैथोलिक चर्च सभी ईसाइयों की धार्मिक श्रद्धा का केन्द्र था। चर्च का आधार बाइबिल एवं ईसा मसीह की शिक्षाएँ थीं; चर्च वस्तुत: ईसाई धर्म की व्याख्या, प्रचार एवं ईसाइयत से सम्बन्धित अनुष्ठानों के केन्द्र थे।

रोमन कैथोलिक चर्च का सर्वोच्च पदाधिकारी पोप था । सर्वोपरि धर्मसत्तापुरुष होने के कारण पोप का ईसाइयों पर असाधारण प्रभाव था। पोप की सहायता के लिए पादरी हुआ करते थे। पोप और पादरियों का कार्य ईसाइयों को धर्माचरण की ओर प्रवृत्त करना था ईसाइयों की पापमुक्ति या मोक्ष के लिए पादरियों का निर्देशन अनिवार्य माना जाता था, पादरी एक प्रकार से ‘मध्यस्थ पुरोहित’ थे। वे बाइबिल के प्रामाणिक व्याख्याकार।तथा चर्च द्वारा ईसाइयों के लिए निर्धारित सात आनुष्ठानिक कमों (सेक्रामेन्ट्स) के सम्पादक माने जाते थे।

धीरे-धीरे चर्च, पोप एवं पादरियों के प्रभाव में अधिकाधिक वृद्धि होने लगी। ऐसा होने के अनेक
कारण थे। प्रथम, चर्च के पास भूमि, भवन एवं धन के रूप में विपुल सम्पदा इकट्ठोी हो गई। द्वितीय, उस
समय का एकमात्र संगठित शिक्षित वर्ग पादरियों के रूप में विद्यमान था। चर्च का शिक्षा एवं शिक्षण संस्थाओं पर अधिकार था। शिक्षित होने के कारण पादरियों का शासकीय कार्यों में भी महत्त्व था तृतीय, चर्च के पास
धर्मसुधार आंदोलन एवं प्रतिवादी धर्मसुधार एक महत्त्वपूर्ण एवं कार्यक्षम संगठन था जो जनमानस के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता था चर्च के विरुद्ध बोलना धर्मविरोध माना जाता था और धर्मविरोध एक दण्डनीय अपराध था चतुर्थ, चर्च समाज की अनेक उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण गतिविधियों से सम्बद्ध था मैजेनिस एवं ऐपल (संसार का इतिहास) के शब्दो में, ‘मध्यकालीन यूरोप का वास्तविक ज्ञान ईसाई चर्च का अध्ययन किए बिना सम्भव नहीं है क्योंकि चर्च उस समय का सबसे अधिक प्रभावपूर्ण संगठन था। चर्च बीते समय की संस्कृति का रक्षण करता था और उसे बाद।में आने वाली पीढ़ियों को सौंप देता था इसका सम्पर्क हर व्यक्ति के जीवन से कई प्रकार से रहता था और इसने बहुत-सी संस्थाओं का स्वरूप बदल दिया एक तरह से दुःशील और क्रूर समाज के लिए इसका प्रभाव अच्छा रहा। इसने युद्धों को रोकने का प्रयत् किया। चर्च ने गरीबों, कृपक दासों (सफों) और सभी दुर्भाग्य पीड़ित लोगों के प्रति बेहतर बर्ताव करने के लिए प्रेरित किया। चर्च के लोगों ने रोगियों की चिकित्सा के लिए अस्पताल खोले और युवकों की शिक्षा के लिए स्कूल और विश्वविद्यालय चलाये । यद्यपि पादरी वर्ग प्राय: स्वयं चर्च की शिक्षाओं के अनुरूप आचरण नहीं करता था परन्तु चर्च निरन्तर और अधिक करुणामय और सत्याचरणशील जीवन के लिए प्रेरित किया करता था। फिर ऐसी कौनसी परिस्थितियाँ बनीं जो चर्च के विरुद्ध असंतोष को धीरे-धीरे इस रूप में जमा करती रहीं कि सोलहवीं शताब्दी में वह एक धार्मिक विप्लव का कारण बन गई।


धर्मसुधार आन्दोलन के 06 कारण

01 राष्ट्रीय भावना एवं निरंकुश राजतन्त्रों का उदय

धर्मसुधार आन्दोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण था यूरोप के विभिन्न देशों, जैसे-इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन आदि में राष्ट्रवादी भावना का विकास एवं इस भावना पर आधारित निरंकुश राजतन्त्रों का उदय, जिन्होंने चर्च की प्रभुसत्ता को चुनौती दी। राष्ट्र की सर्वोपरिता के सिद्धान्त पर आधारित राजनीतिक चेतना ने चर्च एवं पोप के राजनीतिक हस्तक्षेप को अनुचित माना। पोपतंत्र और राजतन्त्र दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए, और इस संघर्ष में पोपतंत्र की पराजय हुई, क्योंकि राष्ट्रीय भावना के ज्वार ने धार्मिक अंधश्रद्धा की दीवारों को तोड़ दिया। शक्तिशाली राष्ट्रवादी राज्यों ने अनेक कानून पास कर अपने राज्यों में पोप की शक्तियों को सीमित कर दिया। उन्हें किसी विदेशी पोप की अधिसत्ता स्वीकार्य न थी इन राज्यों ने चर्च के न केवल बहुत-से अधिकार छीन लिए, बल्कि चर्च की सम्पत्ति पर कर लगाने का अधिकार भी प्राप्त कर लिया। इन राष्ट्रीय राज्यों की शक्ति का आधार क्या था ?

राष्ट्रीय चेतना, शक्तिशाली फौजें, संगठित अधिकारी तंत्र, प्रजा पर कर लगाने का अधिकार, नवधनाढ्य व्यापारिक वर्ग का समर्थन आदि। राजतन्त्र और पोपतंत्र के मध्य टकराव के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थे:
(1) मध्यकालीन सामंती अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए पोप ने विशद् राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर लिये थे जिनके आधार पर वह किसी भी रोमन कैथोलिक राज्य में राजनीतिक हस्तक्षेप कर सकता था, मनचाही नियुक्तियाँ करवा सकता था, यहाँ तक कि आवश्यकता पड़ने पर राजा को धर्म से बहिष्कृत भी कर सकता था पुनर्जागरण युग के बाद राष्ट्रीय शक्तिसम्पन्न शासकों को पोप के उक्त राजनीतिक अधिकार स्वीकार्य नहीं थे ।
(2) रोमन कैथोलिक चर्च के अधीन विपुल भू-सम्पदा थी बहुत-सी भूमि इसमें कर मुक्त थी। इंग्लैण्ड की लगभग एक-तिहाई भूमि चर्च के अधीन थी।
(3) चर्च के अपने न्यायालय थे और राज्य के न्यायालयों से उनका मतभेद बना रहता था।
(4) रोमन कैथोलिक राज्यों के नागरिकों को अपनी आय का दसवाँ हिस्सा धार्मिक कर के रूप में चर्च को
देना पड़ता था और यह धनराशि रोम चली जाती थी।

02 पुनर्जागरण एवं मानववादी चेतना का प्रभाव

पुनर्जागरण के फलस्वरूप उत्पन्न तर्कबुद्धि सम्पन्न चेतना ने धार्मिक अंधविश्वासों की तथा मानववादी दृष्टि ने परलोकमुखी आस्थाओं की जड़ें हिला दीं। विवेकशील मनुष्यों ने चर्च एवं पादरियों के कथनों एवं उनकी गतिविधियों को तौलना-परखना प्रारम्भ कर दिया। बाइबिल की व्याख्या पर भी पादरियों का एकाधिकार नहीं रहा, क्योंकि मुद्रणयंत्र के आविष्कार के बाद बाइबिल आसानी से लोगों को उपलब्ध होने लगी। बाइबिल में ऐसा कहा गया है, यह कहकर पादरी लोग आसानी से अब लोगों को भ्रमित नहीं कर सकते थे। दूसरी ओर, पुनर्जागरण युग की मानववादी चेतना ने धर्म की पारलौकिक महत्ता के सिद्धान्त को अस्वीकार कर दिया। मैजेनिस एवं ऐपल के शब्दों में, ‘चर्च आध्यात्मिक गुणों और पारलौकिक जीवन के लिए तैयारी करने पर बल देता था लेकिन वे लोग जो इस जीवन के धन-धान्य से समृद्ध हो रहे थे, और बहुत से ऐसे लोग जिन्हें धन प्राप्त होने की आशा थी यह विश्वास करते थे कि ऐहलौकिक जीवन में भी सुख के बहुत से अवसर हैं।’

03 आर्थिक परिवर्तनों से उत्पन्न समृद्धि एवं व्यक्तिवादिता

पुनर्जागरण काल में व्यापार-वाणिज्य का विकास हुआ, समृद्ध नगरों एवं सम्पन्न व्यापारिक वर्ग का अभ्युदय हुआ। आर्थिक रूप से समृद्ध नवधनाढ्य वर्ग व्यक्तिवाद एवं स्वतन्त्रता का पोषक बन गया । उन्हें अपने जीवन पर चर्च की गतिविधियों का आधिपत्य स्वीकार नहीं था। उन्हें चर्च का यह नियम पसंद नहीं था कि सूद पर न कर्ज लेना चाहिए, न देना चाहिए। इस नवधनाढ्य वर्ग ने धर्म के मामलों में पादरियों की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया, उन्हें विश्वास था कि आर्थिक समृद्धि की भाँति आध्यात्मिक लाभ भी व्यक्ति द्वारा स्वयं प्राप्त किया जा सकता है। पुनर्जागरण काल में हुए आर्थिक परिवर्तनों से लाभान्वित व्यापारिक वर्ग ने जहाँ एक ओर चर्च की शक्ति को कमजोर करने के लिए राजाओं का साथ दिया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने धर्मसुधार आन्दोलन को अपना भरपूर भावनात्मक सहयोग भी प्रदान किया।

04 चर्च की खोखली सिद्धान्तपरकर्ता, विलासिता एवं अनाचार

चर्च के अधिकारी जहाँ एक ओर सादगी और धर्माचरण की शिक्षा दे रहे थे, उनकी व्यक्तिगत जीवन शैली उनके सिद्धान्तों के खोखलेपन को उजागर कर रही थी। चर्च के पास विपुल धन सम्पत्ति आने के बाद वहाँ विलासिता, अनाचार एवं पाखण्ड के दृश्य दिखाई देने लगे थे पोप अलेक्जेण्डर षष्ठ (1492-1503 ईस्वी) अपने भ्रष्ट आचरण के लिए कुख्यात था, उसकी अनेक अवैध संतानें थीं। पोप लिओ दशम (1513-1521 ई.) येन-केन प्रकारेण लोगों से धन ऐंठने के अभियान में लगा रहता था उसने गिरजाघरों को बेच डाला, यहाँ तक कि ईसाई संतों की मूर्तियाँ भी गिरवी रख दीं। उसने ईसाई धर्म को एक ‘शापिंग काम्पलेक्स’ बना दिया। चर्च के अन्य पादरी एवं अधिकारी भी आरामपसन्द, सदाचरण में शिथिल एवं अपने धार्मिक कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन हो गए। मानववादी चिंतक इरैस्मस ने अपनी पुस्तक ‘द प्रेज ऑफ फॉली ‘ (1509 ) में पादरियों की सांसारिकता, लोभी प्रकृति, विकारग्रस्त मानसिकता एवं उनके अनाचार का वर्णन व्यंग्यात्मक शैली में किया है । कहा जाता है कि ‘इरैस्मस के चुटकुलों ने, लूथर के क्रोध की तुलना में, पोप को अधिक नुकसान पहुँचाया।’ इतिहासकार वार्नर एवं मार्टिन ने धर्मसुधार आन्दोलन की पृष्ठभूमि में चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार को एक प्रमुख कारण माना है। उनके शब्दों में, ‘धर्म सुधार पोप पद की सांसारिकता एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक नैतिक विद्रोह था ।

05 धर्मसुधार आन्दोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि

सोलहवीं शताब्दी में हुई प्रोटेस्टेण्ट क्रान्ति या धर्मसुधार आन्दोलन से पूर्व भी कुछ विचारकों ने चर्च में व्याप्त विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया था । यद्यपि उनका उद्देश्य कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना नहीं था, बल्कि चर्च की व्यवस्था में आन्तरिक सुधार करना ही था। चर्च की आलोचना करने वाले ऐसे कुछ विचारकों को धर्मद्रोही करार दिया गया, उनमें से कुछ को जिंदा जला दिया गया चर्च के खिलाफ पहला गम्भीर आक्रमण चौदहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड के जॉन वाइक्लिफ (1330-1384) ने किया। एगन फ्राइडेल (ए कल्चरल हिस्ट्री ऑफ दि मॉडर्न एज) के अनुसार, ‘जान वाइक्लिफ ने उन विचारों को पहले ही प्रस्तुत कर दिया जिन पर परवर्ती कालीन, धर्मसुधार आन्दोलन (रैफर्मेशन) आधारित था।’ वाइक्लिफ ने कहा कि पोप ईश्वर का विनम्र सेवक मात्र है, उसे सांसारिक भोग- विलासों से दूर रहना चाहिए। सांसारिक सुखों में लिप्त पोप का हमें बहिष्कार करना चाहिए । वाइक्लिफ ने कहा कि चर्च के लिए पोप का होना आवश्यक नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को बाइबिल स्वयं पढ़ने एवं समझने का अधिकार है। वाइक्लिफ ने स्वयं बाइबिल का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया। उसने चर्च में पादरियों द्वारा किए जाने वाले आनुष्ठानिक कमों को भी निरर्थक बताया। वाइक्लिफ के विचारों का तत्कालीन धर्माधिकारियों की परिषद् ने विरोध किया, उसे आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने से मना कर दिया गया वाइक्लिफ की मृत्यु के बाद उसके शरीर को कब्र से निकालकर उसे गोबर और धूरे के ढेर पर फेंक देने के आदेश दिए गए। बोहेमियन विचारक जॉन हस (1369-1415) ने भी ईसाई जगत में व्याप्त धार्मिक पाखण्ड की आलोचना की धर्मद्रोह के अपराध में उसे जीवित जला दिया गया फ्लोरेंस के सेवोनरोला (1452-98) ने भी चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार की आलोचना की, इस तरह की बात करने के लिए उसे जलती हुई भट्टी में झोंक दिया गया ।

दक्षिणी फ्रांस के अल्बीजेन्सिस सम्प्रदाय के व्यक्तियों को चर्च-विरोधी प्रचार के अपराध में पोप द्वारा भेजे गए । धर्मयोद्धाओं द्वारा मार दिया गया उपर्युक्त विचारकों को यद्यपि नष्ट कर दिया गया, लेकिन जैसा कि जे. ई. स्वेन ने लिखा है, उनके विचार जीवित रहे और बाद की पीढ़ियों में फलीभूत हुए ।

06 तात्कालिक कारण

धर्मसुधार आन्दोलन का तात्कालिक कारण था-सन् 1517 ई. में पोप के प्रतिनिधि टेटजेल द्वारा अनुग्रह-पत्रों या क्षमापत्रों की विक्री। चर्च की ओर से टेटजेल द्वारा इन क्षमापत्रों को, धन इकट्ठा करने के लिए बेचा जा रहा था, और यह कहा जा रहा था कि इनको खरीदने वाला व्यक्ति पैसा खर्च करके पाप मुक्ति हासिल कर सकता है भ्रष्टाचार के इस खुले खेल के विरोध में मार्टिन लूथर ने अपना विरोध-पत्र ‘नाइन्टी-फाइव थीसिस’ (95 प्रतिस्थापनाओं) के नाम से विटनवर्ग के गिरजाघर पर लटका दिया था। मार्टिन लूथर के इस कृत्य से धर्मसुधार आन्दोलन का सूत्रपात माना जाता है।

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