दक्षिण का पल्लव राज्य
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दक्षिण का पल्लव राज्य

दक्षिण का पल्लव राज्य

डा० काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार पल्लव शब्द का अर्थ दुष्ट है। इसी दुष्ट अर्थ के कारण इतिहासकार पल्लवों को कोई जंगली जाति की संज्ञा दे बैठे। एक चोल राजकुमार का मनीपल्लम् के नागराजा की कन्या से विवाह सम्पन्न हुआ था। उस कन्या का पुत्र टौण्डमण्डलम का शासनाध्यक्ष राजा बना। टौण्डमण्डलम की राजधानी कांची थी और वहां का राजवंश का नाम नागकन्या के नगर मनीपल्लम् के आधार पर पल्ल कहलाया इससे स्पष्ट है कि पल्लवों में चोलनाग रक्त है। पल्लवजन मूल रूप में सातवाहनों के सामन्त थे। सातवाहन वंश के अन्त के पश्चात् वे अपने अधीनस्थ भाग के राजा बन गए। लगभग 225 ई० में पल्लवों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।

शिवकन्द वर्मा का नाम इस वंश के आरम्भिक शासकों में उल्लेखनीय है। इसका शासित भू-भाग सुदूर दक्षिण में कृष्णा नदी के तटवर्ती प्रदेश में था। वह पेन्नौर और केल्लारी प्रदेश तक फैला हुआ था। सन् 350 ई० में पल्लवों में पूर्वी तट पर अधिकार किया और कांची में अपना सुदृढ़ राज्य स्थापित किया। यह कार्य पल्लवराज विष्णुगोप ने सम्पन्न किया। वह एक महान शक्ति सम्पन्न राजा समुद्रगुप्त ने दक्षिण के जिन 12 राज्यों को पराजित किया था, उनमें से एक पल्लव राज्य भी था। प्रयाग के प्रशस्ति लेख में इसका उल्लेख उपलब्ध है। उसमें जो पल्लव राजा उग्रसेन है, वह पल्लवनरेश विष्णुगोप का सामन्त था। 435 ई. में पल्लव वंश के राजा सिंहवर्मन का भी दान पात्रों में उल्लेख है। इन उल्लेखों से समय और काल की निश्चित पुष्टि होती है। इससे वाल वंश की आरम्भिक स्थिति की जानकारी पुष्ट होती है।

पल्लव राज्य का तीव्र विकास 9वीं शताब्दी में हुआ। सिंहविष्णु ‘अवनिसिंह’ का शक्ति और प्रताप का चारों ओर डंका बजा। उसने सम्पूर्ण चोर मण्डल को शक्ति सपन बनाकर राज्य का कावेरी तक विस्तार कर डाला। उसने सिंहलों और पाण्डवों से भी घनघोर युद्ध किया, उन्हें पराजित किया, अपने अधीन बनाया। उन्हीं विजयों का प्राप्त कर वह ‘अवनिसिंह’ बना। सिंह विष्णु वैष्णव धर्मावलम्बी था। महाबलीपुरम में उसकी मूर्ति और दो रानियों के साथ एक ऊर्ध्वांगित चित्र उपलब्ध हैं। ये चित्र शासक के प्रमाण-चिह्न हैं।

दक्षिण का पल्लव राज्य
दक्षिण का पल्लव राज्य

महेन्द्रवर्मन

पल्लवों के राज्यसिंहासन पर छठी शताब्दी के अन्त में यही शासक विराजमान था। यह सिंहविष्णु अवनिसिंह का पुत्र था। यह वैसा ही वीर-पराक्रमी था, जैसा उसका पिता। इसने ‘ चेत्थकारी’, ‘चैत्यकारि’, ‘चित्रकारयुल्ली’, ‘सत्ताविलास’ और ‘विचित्र चित्त’ जैसी अनेक उपाधियां धारण कीं। ये उपाधियां राजा के बहुमुखी गुणों की प्रिचायक हैं। महेन्द्रवर्मन अपने सम-सामयिक राजा पुलकेशिन द्वितीय (चालुक्य शासक) के समान महान शक्तिशाली और गुण सम्पन्न नहीं थे। फिर वह एक महान प्रशासक-स्वरूप इतिहास के गगन में उभरे। पुलकेशिन द्वितीय ने महेन्द्रवर्मन पर हमला करके उससे पल्लव राज्य का उत्तरी भाग छीन लिया था पुलकेशिन और आगे बढ़कर कांची तक के भू-भाग को पदाक्रान्त करना चाहता था, परन्तु महेन्द्रवर्मन को इतनी जबरदस्त टक्कर खानी पड़ी कि उसे वापस लौटना पड़ा और कांची को कोई हानि न पहुंची। पुलकेशिन ने उत्तरी प्रदेश पर अपने भाई विष्णुवर्मन को नियुक्त किया।

महेन्द्रवर्मन शुरू में जैन धर्मावलम्बी था। बाद में वह शैव मतावलम्बी बना। वह बहुत सहिष्णु और उदार स्वभाव का था। उसने अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। वह संगीतज्ञों और कलाकारों का संरक्षक था। चट्टानों को कटवाकर मन्दिर बनाने की स्थापत्य कला का वह प्रवर्तक कहा जाता है। उसकी निर्माण-शैली महेन्द्र-शैली के नाम से विख्यात हुई। वह एक महान विद्वान और कलाप्रिय था। उसने ‘मन्त्रविलास’ ग्रन्थ की रचना की। यह प्रहसन आज भी प्रसिद्ध है। इस ग्रन्थ ने कापालिक और बौद्ध भिक्षुओं में फैली बुराइयों को उजागर किया । नरसिंहवर्मन प्रथम महेन्द्रवर्मन के बाद उसका पुत्र नरसिंहवर्मन प्रथम राजगद्दी पर आसीन हुआ।

नरसिंहवर्मन एक वीर, साहसी और महान संघर्षकर्ता तथा विजेता था।. उससे अपने शासनकाल में, सिंहासन संभालते ही, पुलकेशिन द्वितीय से युद्ध करना पड़ा। उसने कांची पर चढ़ाई कर दी और घोर युद्ध छिड़ गया। इस भयंकर में उसने पुलकेशिन को मात्र परास्त ही नहीं किया, वरन् अपने सेनापति से वातापी पर आक्रमण भी कराया। यह युद्ध निर्णायक हुआ, जिसमें पुलकेशिन मृत्यु को प्राप्त हुआ। पल्लवों ने चालुक्यों की राजधानी वातापी पर अपना अधिकार कर लिया। यह महान विजय थी, जिसने सम्पूर्ण दक्षिण भारत पर पल्लवों का दक्षिण में एकछत्र राज्य बना दिया। इस विजय की खुशी मानने के लिए नरसिंहवर्मन ने दक्षिणी चालुक्य राज्य पर ही अधिकार नहीं किया वरन् सम्पूर्ण दक्षिण भारत पर अपना आधिपत्य घोषित कर दिया। उसने ‘महामल्ल’ की उपाधि भी इसी खुशी में धारण की और महाबलीपुरम नगर की स्थापना की। सुन्दर नगर बसाया गया। इस नगर में कई शिवमन्दिर बनवाए और उसमें शिव की एक विशाल मूर्ति स्थापित कराई।

उसी समय नरसिंहवर्मन ने लंका की दिशा में एक समुद्री अभियान छेड़ा, जो अत्यन्त सफल रहा। अभियान का उद्देश्य अपने आश्रित (लंका के राज्यसिंहासन के दावेदार) भारवर्मन की सहायता करके उसे लंकाधिपति बनाना था। चीनी यात्री ह्वेनसांग भी नरसिंहवर्मन के ही शासनकाल में कांची आया था। उसने अपने लेख में लिखा है कि पल्लव राज्य की भूमि में अच्छी उपज होती थी राज्य के रहने वाले लोग समृद्ध तथा सुखी थे। आम आदमी सुशिक्षित, सम्पन्न तथा सदाचारी थे। शिक्षित जनों की कला में विशेष प्रवृत्ति थी। कांची लगभग छै मील के घेरे में फैली थी। नगर में 100 से अधिक बुद्धविहार थे, जिनमें 10,000 से अधिक बौद्ध भिक्षु निवास करते थे। विद्वानों का साधारण जन आदर करते थे। पल्लव राज्य की परिधि लगभ के निकट एक बन्दरगाह था। उसे महावल्लपुरम कहते थे। सुन्दर निर्मित मन्दिर नगर की शोभा थे। नरसिंहवर्मन प्रथम ने चेरों, चोलों, कलत्रों, पाण्ड्यों सभी को युद्ध में परास्त किया था। उसके शासनकाल में पल्लव वंश बहुत समृद्ध था। उसका सितारा पराकाष्ठा पर दमदमा रहा था। उसके समक्ष सिर उठाने की किसी में सामर्थ्य न थी। प्रजा-जन में उसके लिए अपार आदर-भाव था। सभी लोग उसे सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखते थे।

महेन्द्रवर्मन द्वितीय

कांची नगर नरसिंहवर्मन की मृत्यु के पश्चात् उसका बेटा महेन्द्रवर्मन (668-670 ई०) द्वितीय शासनाधिकारी बना। उसे केवल दो वर्ष राज्य किया। उसके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई।

चालुक्य

नरेश विक्रमादित्य ने पराजित किया। उसने परमेश्वरवर्मन प्रथम यह महेन्द्रवर्मन द्वितीय का पुत्र था। इसके शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों में युद्ध छिड़ गया था। चालुक्य-शासन विक्रमादित्य ने पाण्ड्यनरेश भारवर्मन् को साथ लेकर परमेश्वरवर्मन पर हमला किया। परमेश्वरवर्मन युद्ध में पराजित हो गया। उसकी राजधानी कांची पर चालुक्यों का अधिकार हो गया। इस विपत्ति-काल में भी परमेश्वरवर्मन ने साहस न जाने दिया उसने अपनी सेना को पुनर्गठित कर सुदृढ़ बनाया और युद्ध में चालुक्य राजा विक्रमादित्य को कांची वापस करने के लिए बाध्य कर दिया।

पल्लवों और चालुक्य सेनाओं में बराबर युद्ध होता रहता था। कभी पल्लव चालुक्यों की राजधानी वातापी को अपने अधिकार में ले लेते और कभी चालुक्य पल्लवों की राजधानी कांची पर छा जाते। यह अधिकार किसी का भी कभी स्थायी न रह पाता। इसमें अस्थिरता बनी रहती थी। इसका कारण यही था कि कुछ ही समय पश्चात् दोनों राजवंश अपनी राजधानी पर पुन: स्थापित हो जाते। परमेश्वर शिवभक्त था। उसने महाबलीपुरम में भी एक विशाल शिवमन्दिर बनवाया। उसने महाबलीपुरम में भी बहुत से स्मारक बनवाये। उसने 685 ई० तक राज्य किया।

नरसिंहवर्मन द्वितीय

नरसिंहवर्मन द्वितीय परमेश्वरवर्मन का पुत्र और राज्य का उत्तराधिकारी था इसका शासनकाल शान्तिपूर्ण रहा। बाहरी आक्रमण का आतंक उसे सहन नहीं करना पड़ा। उससे पूर्व शासनकाल में जो युद्ध हुए थे, उनके परिणाम पल्लवों के पक्ष में हुए थे। इसका उल्लेख ‘राजसिंह ‘,’अगमप्रिया’, ‘शंकरभक्त’ इत्यादि उपाधियां अभिलेखों में उपलब्ध है। इसने कुछ मन्दिर बनवाए थे, जिनमें कांची का कैलाशमन्दिर विशेष उल्लेखनीय है। महान कवि दण्डिन का जन्म इसी काल में हुआ। यह संस्कृत के विख्यात कवि हैं। यह अद्वितीय विद्याप्रेमी था इसने चीन को एक शिष्ट मण्डल भी भेजा था।

परमेश्वरवर्मन द्वितीय

परमेश्वरवर्मन नरसिंहवर्मन द्वितीय का जेष्ठ पुत्र था। इसके शासनकाल में विक्रमादित्य द्वितीय ने कांची पर भयंकर आक्रमण किया था, जिसमें परमेश्वरवर्मन द्वितीय को पराजय का मुख देखना पड़ा। उसने फिर गंगनरेश से युद्ध आरम्भ कर दिया। उस युद्ध में भी वह पराजित हुआ। इसमें वह भयंकर रूप से घायल होकर मारा भी गया। इसने भी एक मन्दिर बनवाया था।

नन्दिवर्मन द्वितीय

परमेश्वरवर्मन के कोई पुत्र नहीं जन्मा नन्दिवर्मन द्वितीय परमेश्वरवर्मन के ही वंश की एक अन्य शाखा का राजकुमार था, जिसकी नियुक्ति मन्त्री परिषद ने की। इसने सन् 730 ई० से 800 ई० तक 70 वर्ष राज्य किया। इसके शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के भी युद्ध हुए। चालुक्य-नरेश विक्रमादित्य द्वितीय ने कांची को अपने अधिकार में ले लिया पल्लवों ने कांची पर फिर अधिकार कर लिया। नन्दिवर्मन वीर, साहसी एवं अपार महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसने पल्लवों की बिखरती हुई शक्ति को फिर से गठित किया। उसने अपना हारा हुआ भू-भाग फिर वापस लौटाया और अपनी प्रतिष्ठा को आंच न आने दी। इसके शासनकाल में पल्लरवों ने पाण्ड्य शासकों से भी युद्ध किया। संघर्ष राजकुमार चित्रमाप के पक्ष में था। पाण्ड्य नरेश ने नन्दिवर्मन से युद्ध आरम्भ कर दिया। युद्ध में नन्दिवर्मन का सेनापति विजयी हुआ। सेनापति उदयचन्द ने अपूर्व कौशल दिखाकर आक्रमणकारी सेना को तहस-नहस कर दिया। उसने चित्रमाप का संहार किया। नन्दिवर्मन ने गंगों से भी युद्ध में विजय पाई। गंगराजा हार गया। इस विजय अभियान में नन्दिवर्मन को लूट का पर्याप्त धन प्राप्त हुआ।

चालुक्यों से जो यह घमासान युद्ध हुआ, उसमे नन्दिवर्मन पराजित हुआ। राजा राजसिंह ने पाण्ड्यों के गठबन्धन को छिन्न-भिन्न करके समाप्त कर दिया। नन्दिवर्मन की विजय कायम न रही। इसका कारण राष्ट्रकूटों का दक्षिण में भयंकर संघर्ष था। उनकी शक्ति सुसंगठित थी और उनके पास लड़ाकू वीरों की अपार सेना थी। नन्दिवर्मन के बाद पल्लव वंश के क्रमश: चार शासक हुए। इनके शासनकाल में चालुक्यों, राष्ट्रकुटों, पाण्ड्यों और चोलों में निरन्तर संघर्ष चलता रहा, युद्ध-पर-युद्ध होते रहे।

अपराजितवर्मन इस राजवंश का सम्भवत: अन्तिम राजा था जिसने सन् 876 ई० से 895 ई॰ तक शासन-भार संभाला। इसने कुशलतापूर्वक राज्य किया और गंगों को साथ लेकर पाण्ड्यों को हराया। इसका अन्तिम युद्ध चोलराज आदित्य प्रथम से हुआ। इस युद्ध में यह विजय प्राप्त न कर सका और वीरगति पाई। पल्लवों का राज्य चोलों के राज्य में समाकर समाप्त हो गया। इस तरह 897 ई० में पल्लव-शक्ति समाप्त हो गई।

प्रशासनिक स्थिति

पल्लव-शासन-व्यवस्था में राजा राज्य का सर्वश्रेष्ठ सत्ताधिकारी होता था। मन्त्री ‘राज्यादिकद’ कहलाते थे। उनका एक मण्डल होता था मंत्रियों को राजा नियुक्त करता था। राजा सेना का सर्वोच्च अधिकारी होने के नाते उसका सम्पूर्ण दायित्व स्वयं संभालता था। राज्यों से संधि इत्यादि के निर्णय राजा द्वारा ही लिए जाते थे। महत्त्वपूर्ण उपांधियां भी राजा ही धारण करता था। जन कल्याण कार्यो, मन्दिरों की व्यवस्था, विद्यालय, सरोवर इत्यादि का कार्य भी राजा स्वयं सम्पन्न करता था।

राजा का पुत्र युवराज होता था। वह अपने पिता के शासनकाल से ही राजका्यं में अपने पिता का सहयोगी बनता था राज्य के अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर राजा अपने सम्बन्धियों और मित्रों की नियुक्ति करता था। प्रशासन-अधिकारियों को बहुत जांच- पड़ताल के पश्चात् नियुक्त किया जाता था सेना की देखभाल और अधिकारियों की नियुक्ति सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहती थी| सैनिकों के पूर्व कार्य-निर्वाह को ध्यान में रखकर पदोन्नति की जाती थी। सेना का सबसे श्रेष्ठ अधिकारी सेनाध्यक्ष होता था। पल्लवों के पास एक विशाल जहाजों का बेड़ा था। उसकी सहायता से द्वीपों की व्यवस्था की जाती थी पल्लवों ने लंका पर कई सफल अभियान किए। पल्लवों का जहाजी प्रबन्ध प्रशंसनीय था। सम्पूर्ण साम्राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए राष्ट्रों में विभक्त था। राष्ट्र विभिन्न विषय थे। विषयों में कोहम और कोहम में ग्राम। राष्ट्र का शासक सामन्त होता था उन्हें ‘राष्ट्रीय’ कहा जाता था। विषय के स्वामी को विषयक तथा ग्राम व कोहम-अधिकारी ‘विपित्र’ कहलाता था।

मण्डीकर संग्राहक उघाते थे और उसे राजकोष में जमा करते थे। वन के विभाग का अध्यक्ष ग्रामिक कहा जाता था ब्राह्मण कर मुक्त थे। उन्हें जो दान प्राप्त होता था, उस पर कोई कर की व्यवस्था नहीं थी। ग्रामों को व्यवस्था ग्राम- सभाएं करती थीं वे सब सामाजिक कार्यों का नियंत्रण करतीं। भूमि की नाप-तोल भी उन्हीं का दायित्व था ग्रामों में होने वाले आपसी झगड़ों का निपटारा भी इन सभाओं द्वारा ही होता था इनका एक मुखिया होता था।

धार्मिक स्थिति

इस काल तक आते-आते बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव हरासोन्मुख तथा वैदिक धर्म का पुनरुद्धार होने लगा था। शैव धर्म की भी विकासशील स्थिति थी। राजाओं ने एक बार फिर से यज्ञ करने की प्रथा को अपनाया और देवताओं के मन्दिर बनवाए गए। विशेष रूप से शिव और विष्णु के मन्दिर बने क्योंकि उपासना के क्षेत्र में विष्णु और शिव की ही सर्वाधिक मान्यता थी। भक्ति मार्ग का इस काल में विशेष प्रचलन हुआ। धार्मिक सहिष्णुता का भारतीय धर्म क्षेत्र ‘में बोलबाला था। सहिष्णुता भारतीय सभ्यता का विशेष गुण रहा। पल्लव राजे सहिष्णु भाव रखते थे। ये प्रायः सभी उदार प्रवृत्ति के थे।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि बौद्ध धर्मावलम्बी अपनी इच्छानुसार अपने धर्म का पालन करते थे। उनके ऊपर किसी किस्म का कोई प्रशासनिक प्रतिबन्ध नहीं था। बौद्ध धर्मावलम्बियों के कांची में 100 विहार थे। उन विहारों में 10,000 बौद्ध निवास करते थे।

साहित्य- उत्थान

पल्लव शासकगण प्रायः सभी विद्या और कला के प्रेमी थे वे कलाकारों और विद्वानों को विशेष आदर देते थे तथा प्रशासन की ओर से अनुदान देकर सहायता भी करते थे, सम्मानित भी करते थे। पल्लव शासकों ने संस्कृत के उत्थान में अपना पूर्ण सहयोग दिया। उनके जो अभिलेख मिले हैं, वे सब संस्कृत भाषा में हैं। संस्कृत के साथ-साथ शासकों ने तमिल की ओर भी अपना ध्यान दिया। प्रकाण्ड पण्डित दण्डिन नरसिंहवर्मन का मान्य दरबारी था भास और शुद्रक संस्कृत के नाटककार थे। इनके नाटकों का राज्य-सभा में अभिनय होता था नरसिंहवर्मन ने ‘अगमप्रिय’ की उपाधि धारण की। यह महान विद्या प्रेमी था महेन्द्रवर्मन ने मत्तविलास प्रहसन नामक ग्रन्थ की रचना की। यह हास्यरस का अनुपम ग्रन्थ है।
वास्तुकला की चार शैलियां :

महेन्द्रवर्मन शैली : 600 से 625 ई० तक।
मानमल्ल शैली : 625 से 674 ई० तक।
राजसिंह शैली : 700 से 900 ई० तक।
उत्तराचित शैली : अप्राप्य

इन शैलियों में प्रमुख शैलियां मानमल्ल और राजसिंह शैलियां हैं। इन शैलियों को कलाकारों ने अन्य शैलियों में नवीन रूप प्रदान किया। इनके प्रयोग काष्ठकला अन्तिम और कन्दराओं में मिलते हैं। समुद्र-तट पर पांच मठ बने हैं। उन्हें पांच – पांडव कहा जाता है। ये इस शैली की उत्कृष्ण सम रचनाएं हैं। कांची के कैलाशनाथ और बैकुण्ठ पेरूमल राजसिंह शैली हैं। इनके अतिरिक्त इस काल में कलात्मक मूर्तियां भी बरनीं। कुछ मन्दिर जो चट्टानों को काटकर बने, वे अद्वितीय कला-कृतियां हैं। कुछ मूर्तियां पत्थर और इंटों की भी हैं। इन कृतियों को देखने अनेकों यात्री वहां जाते है ।

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