दक्षिण का चोल राज्य
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दक्षिण का चोल राज्य

दक्षिण का चोल राज्य

दक्षिण भारत में ईसा से सौ वर्ष पूर्व चोल लोग राज्य करते थे, जिनका आधिपत्य ई० पश्चात् तन शताब्दो तक कायम रहा। उसके पश्चात् वहां पाण्ड्य और चेरो के शासन का विकास-काल आया, जिसने चोलों को समाप्त कर अपना अधिकार जमाया|। यहां दूसरी शताब्दी में जो करिकाल राजा हुआ, वह महान प्रतापी था। उसने कई बार अपने विरुद्ध संघर्षरत पाण्ड्यों और चेरों के संगठित संघ को युद्ध में परास्त किया था। उसने लंका पर भी आक्रमण किया था उसके कई कार्य अत्यन्त सराहनीय हैं। उसने वनों को साफ कराकर तालाब और नहर बनाने की व्यवस्था कराई। उसने कृषि को उन्नत बनाने में पूर्ण योग दिया। करिकाल के पश्चात् इस भू-भाग पर निरंतर पल्लवों और वातापी के चालुक्यों के हमले हुए । उन आक्रमणों ने यहां के शासकों की शक्ति को क्षीण कर दिया।

चोल राज्य की वास्तविक नींव विजयालय – काल में स्थापित हुई। जब 864 ई० के लगभग उसने वहां का अधिपतित्व ग्रहण किया। इससे पूर्व वहां शासक चोल.अवश्य थे, परन्तु पल्लवों के सामन्तों के रूप में। उनका स्वतंत्र अस्तित्व उभर कर सामने नहीं आया था। 9वीं शताब्दी में पल्लवों के हरास के साथ-साथ चोलों का विकास होता गया, वे हर क्षेत्र में समृद्ध बनते गए। सर्वप्रथम विजयालय ने चोल राज्य को पल्लवों की अधीनता से मुक्त किया । उसने स्वतंत्र राज्य घोषित किया। विजयालय के राज्य-काल में युद्ध निरंतर गतिशील रहा। उसने तंजौर को अपनी राजधानी बनाया। विजयालय 871 ई० में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

आदित्य प्रथम (880-947 ई०) के पश्चात् उसका पुत्र आदित्य प्रथम चोल-मण्डल का अधिपति बना। उसके शासनकाल में पाण्ड्यराज वर्गुणवर्मन द्वितीय ने चोलों पर हमला बोल दिया। आदित्य प्रथम ने पल्लवों और गंगों के साथ चोलों का गठबन्धन कर पाण्ड्यों का सामना किया इस गुद्ध में संघ की विजय हुई। यह विजय आदित्य प्रथम के विजयालय की मृत्यु होकर विशेष प्रयास से प्राप्त हुई थी। फलस्वरूप पल्लव नरेश नृपतुग वर्मन ने उसे खुश कुछ अपने राज्य का भाग दे दिया। सन् 895 ई० के लगभग आदित्य प्रथम ने पल्लवराज अपराजित वर्मा को युद्ध में हराकर कोची पर अधिकार कर लिया।

दक्षिण का चोल राज्य
दक्षिण का चोल राज्य

इसका परिणाम यह हुआ कि उसके राज्य की सीमा राष्ट्रकूटों के राज्य से जाकर मिल गई। इस स्थिति में उसने तलाकड के गंगों के राज्य पर भी अपना अधिकार.कर लिया। उसने गंगों के सरदार को अपने अधीन सामन्त बनाया वह शैव मतावलम्बी था। उसने अपने शासनकाल में कई सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया।
परान्तक प्रथम (908-946) आदित्य की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम राजगद्दी पर बैठा उसने
गद्दी पर बैठते ही मदुरा के पाण्ड्यों पर हमला किया और उन्हें बुरी तरह युद्ध में हराया। उसने लंका की तरफ से भी हमला बोला परन्तु उसमें वह विशेष सफल नहीं हुआ। उसने पल्लवों पर भयंकर आक्रमण किया। हमला इतना घातक था कि उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया और वे फिर कभी सिर न उठा पाए। इस क्षेत्र में वह सफलता पर फलता प्राप्त कर रहा था परन्तु तभी उसे एक नए शत्रु का सामना करना पड़ा। ये राष्ट्रकूट थे, जो दक्षिण पथ का स्वयं को स्वामी मानते थे। चे चोलों की इस शक्ति को देखकर कुण्ठित बने। राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय (940-968) ने चोलों पर हमला कर दिया। इस हमले में उन्होंने कांची पर अधिकार कर लिया। उन्होंने तंजौर पर भी हमला किया और उसे भी जीता। इन युद्ध में परान्तक के पुत्र युवराज राजादित्य का निधन हुआ। राष्ट्रकूटों.के इस आक्रमणों ने चोलों की बढ़ती हुई शक्ति को क्षति पहुंचाई। परान्तक की 955 ई० में मृत्यु हुई।

राजराजा प्रथम (985-1012 ई०)

परान्तक के निधन के पश्चात् 30 वर्ष तक चोलों की स्थिति डांवाडोल रही। राज्य में अराजकता छाई हुई थी। 985 ई० में राजराजा सिंहासनारूढ़ हुआ। यह वह समय.था, जब राष्ट्रकूटों की शक्ति कम हो चुकी थी। चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों का अन्त करके कल्याणी में अपनी राजधानी बना ली थी दक्षिण में सत्ता एक राजवंश से दूसरे राजवंश के हाथों में जा रही थी। राजराज प्रथम ने स्थिति का लाभ उठाकर अपने चोल राज्य का समुचित विस्तार किया और फिर पाण्ड्यों की राजधानी मथुरा पर अधिकार किया। उसने अमर भृजंग को अपना बन्दी बना लिया। उसने.चेर सेन. को भी पराजित किया और त्रिवेन्द्रम तक आगे बढ़ आया। पाण्ड्यों के मित्र लंका के राजा को भी उसने अछूता नहीं छोड़ा। उसने लंका के राजा महेन्द्र पंचम को पराजित कर संधि करने पर बाध्य किया इसने लंका का राजकोष लूटा और वहीं के एक नगर में अपनी राजधानी स्थापित की। उसने वहां एक मन्दिर भी बनवाया।

लंका पर विजय प्राप्त कर उसने गंग प्रदेश पर आक्रमण किया और 961 ई० में विजय प्राप्त की। उसके बाद राजराजा का चालुक्यों से युद्ध आरम्भ हो गया। चालक्यों की दो शाखाएं थीं। पश्चिमी शाखा का राज्य नर्मदा और तुंगभद्रा नदियों के मध्य में स्थित था। उसकी राजधानी मान्यखेट थी। वहां तैल द्वितीय के पुत्र सत्याश्रय का राज्य था। वहां का सब प्रबन्ध वही देखता था। चोल सेना ने सत्याश्रय को परास्त कर उसकी राजधानी पर अपना अधिकार कायम कर लिया। वास्तव में उसका यह विजय अभियान स्थायी रूप धारण न कर पाया। सत्याश्रय ने कुछ ही समय में अपनी सैन्य-शक्ति को पुनर्गठित किया और अपना विजित राज्य फिर अपने अधिकार में कर लिया। उसने चोलों को अपने राज्य से खदेड़कर बाहर कर दिया। इस बार उसकी सेना के समक्ष चोल सेना पराजित हुई। राजाराज ने पश्चिमी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के पश्चात् पूर्वीं क्षेत्र को भी अछूता न छोड़ा। उसने उस पर भी आक्रमण किया। यहां दूसरी शाखा बेंगी पर शासन करती थी। चालुक्य राजा शक्ति वर्मा ने कई बार भयंकर युद्ध किया परन्तु हर बार पराजय का मुख देखना
पड़ा। अन्त में उसने हताश होकर संधि कर ली और उसकी अधीनता स्वीकार की।

राजराजा ने अपनी मित्रता को सुदृढ़ बनाने के लिए अपनी पुत्री का विवाह विमलादित्य के साथ कर दिया। उसने कलिंग राज्य पर भी अपनी विजय का झंडा फहराया। यह भी एक अभिलेख से प्रामाणित होता है कि उसने मालद्वीप पर भी अपना अधिकार कर लिया था।

राजराजा के कृत्यों का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि वह महान प्रतापी और शक्तिशाली शासक था। उसने अनेक युद्ध किए और उनमें विजय प्राप्त की। उसने अपने राज्य का पर्याप्त विस्तार किया। उसने पास विशाल जल-सेना थी, जो व्यापार के क्षेत्र में भी विशेष उपयोगी सिद्ध हुई। इसी समुद्री सेना के फलस्वरूप वह मालद्वीप और लंका तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर पाया। उसके एक महान विजेता के रूप में भी यश अर्जित किया। वह ललित कला और संगीत का प्रेमी था। उसने शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय उपलब्धियां अर्जित कीं। उसने सन् 1000 ई० में भूमि का सर्वेक्षण कराया। उसने स्थानीय स्वायत्त शासन को प्रश्रय दिया। उस काल में चिन्तन की यह नवीन उपलब्धि थी। उसने तंजौर में राजेश्वर का विशाल मन्दिर बनवाया। यह मन्दिर उस काल के कलात्मक निर्माण का अद्भुत उदाहरण है। वह अपने दरबार में विद्वानों और कलाकारों को आश्रय प्रदान करता था। राजराजा ने अपने शासनकाल में प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति की और हर प्रकार का गौरव प्राप्त किया। उस समय चोल राज्य ने भी महान् उन्नति की।

राजेन्द्र प्रथम (1012-1044 ई०)

राजराजा के पश्चात् उसका पुत्र राजन्द्र प्रथम चोल राज्य का शासक बना। राजेन्द्र चोल वंश का महानतम प्रतापी तथा यशस्वी शासक प्रमाणित हुआ। इसके शासनकाल में चोल राज्य उन्नति के उच्चतम शिखर पर पहुंचा। उसने सर्वप्रथम लंका पर आक्रमण किया और इस द्वीप को पूर्णरूपेण अपने साम्राज्य का अंग बतांया। उसके बाद उसने पाण्ड्यों पर विजय प्राप्त कर उनके भू-भाग का अपने पुत्र यशवम्मा को शासक नियुक्त किया। उसने पश्चिम के चालुक्य शासक जयसिंह जगदेव मल्ल से युद्ध करके उसे पराजित किया। वह बराबर अपना विजय अभियान छेड़ता रहा। उसने पूर्व भारत पर दृष्टि डाली और आक्रमण किया। चोल सेना गोदावरी और बस्तर होकर उडीसा के रास्ते बंगाल तक पहुंच गई। उसने कलिंग दक्षिण कोनाल, दण्डभुक्ति, राढ, पूर्वी बंगाल और गौड़ राज्यों को पदाक्रान्त कर विजय-पर विजय हासिल कीं। ये सफलताएं प्राप्त कर उसने विशाल सेना के साथ गंगा नदी को पार किया। गंगा पार कर उसने महीपाल पर आक्रमण किया और उसे युद्ध में पराजित कर गंगाजल का पान किया। कहा जाता है कि विजित लोग गंगाजल के मटके अपने सिरों पर उठा-उठाकर लाए और वह जल उन्होंने सैनिकों को पिलाया। कहते हैं, वह जल इतना अधिक था कि उससे चोल सरोवर बन गया। इसी विजय के उपलक्ष में राजेन्द्र ने ‘गंगे चोल कोंड’ की उपाधि धारण की। राजेन्द्र ने वर्मा और मालवा द्वीपों के भी भागों पर
अधिकार स्थापित किया। वहां उस समय संग्राम विजयोत्तुंग वर्मा राज्य करता था।

चोल शासकों ने अपनी नौसेना का भी उपयोग किया। उसने निकटवती भू-भागों के द्वीपों पर अपना अधिकार कर लिया। उसके शासनकाल में लंका, पाण्ड्य, चेर इत्यादि प्रदेशों में विद्रोह भी भड़के परन्तु राजेन्द्र ने उन्हें कुचल दिया। उसने गंगई- कोण्ड चोलपुरम को अपनी राजधानी बनाया। उसने चीनी -सम्राट से मैत्री सम्बन्ध स्थापित किया। राजेन्द्र ने महान ख्याति अर्जित की।

राजाधिराज प्रथम (1044-1052 ई०)

यह राजेन्द्र प्रथम का ज्येष्ठ पुत्र था, जिसने उसकी मृत्यु-पश्चात् राज्यासन ग्रहण किया। उसका शासनकाल आरम्भ होते ही पाण्ड्य, चेर तथा लंका में फिर विद्रोह भड़का परन्तु राजाधिराज ने विद्रोहों को दबा दिया। इसका अपने पूर्व शत्रु कल्याणी के पश्चिमी चालुक्यों से भी युद्ध हुआ और उंसमें चोल पराजित हुए। राजाधिराज इसी युद्ध में स्वर्गवासी बना। यह, युद्ध चालुक्य राजा सोमेश्वर से हुआ था जिसमें राजाधिराज का निधन हुआ। राजाधिराज के भाई राजेन्द्र द्वितीय ने युद्ध कायम रखा और अपने भाई की मृत्यु का बदला लिया। अन्त में उसने विजय प्राप्त की।

राजेन्द्र द्वितीय (1052-1063)

राजेन्द्र द्वितीय ने युद्धभूमि में ही राज्याधिकार धारण कर प्रशासनाधिकार ग्रहण किया। उस समय चोल-चालुक्य संघर्ष गतिशील था। 1061 ई० में चालुक्यों की पश्चिमी शाखा के सोमेश्वर ने बेंगी के राजा की मृत्यु होने पर उसके पुत्र को बेंगी की गद्दी पर बिठाया। उसने एक सेना चोलों से संघर्षार्थ भेजी। उस भयंकर युद्ध में चालुक्यों की हार हुई। उस युद्ध में उनका सेनापति चामण्डराय और बेंगी का राजा शक्तिवर्मन वीरगति को प्राप्त हुए। इस प्रकार राजेन्द्र द्वितीय विजयी हुआ। उसने लंका पर भी आक्रमण किया था। राजेन्द्र द्वितीय की ई० 1063 में उसने चोल राज्य को पर्याप्त सुदृढ़ किया ।

वीर राजेन्द्र (1063-1070 ई०)

राजेन्द्र द्वितीय के बाद उसका भाई वीर राजेन्द्र 1063 ई० में सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने सिंहासनारूढ होते ही अपने शत्रु चालुक्यराज सोमेश्वर पर आक्रमण कर उसे युद्ध में पराजित किया। कुण्डलसंगम के पास उसका दूसरा भयंकर युद्ध हुआ। चालुक्यराज सोमेश्वर युद्ध में पराजित हुआ और उसने तुंगभद्रा में कूद कर।आत्महत्या कर अपने जीवन का अन्त कर लिया। सोमेश्वर प्रथम की मृत्य के पश्चात् सोमेश्वर द्वितीय राजा घोषित किया गया वीर राजेश्वर ने उसे भी न छोड़ा। उस पर भी आक्रमण किया। उसी समय सोमेश्वर द्वितीय के छोटे भाई ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह ने भयंकर रूप धारण किया। इस स्थिति में वीर राजेन्द्र ने कूटनीति।का प्रयोग किया। उसने मन्त्री से मैत्री कर अपनी पुत्री का उससे विवाह कर दिया। यह सब करके उसने उसे दक्षिण का राजा बना दिया। विक्रमादित्य की स्थिति मजबूत।देखकर बेंगी के राजा ने उससे संधि कर ली और युद्ध बंद कर दिया गया। इस प्रकार युद्ध का अन्त हुआ।

अधिराजेन्द्र (1070 ई०)

1070 ई- में वीर राजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात् अधिराजेन्द्र चोल राज्यसिंहासन पर बैठा। उत्तराधिकारी होने के लिए उसका राजेन्द्र द्वितीय से संघर्ष हुआ। बेंगी के पूर्वी राज्य का वास्तव में उत्तराधिकारी राजेन्द्र द्वितीय ही था। उसने जनता को भड़काकर विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह की स्थिति में जूझने में अधिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई। राजेन्द्र द्वितीय ने बेंगी और चोल दोनों राज्यों की सत्ता हथिया ली और कुलोत्तुंग के नाम से स्वयं को ही चोलराजा घोषित कर दिया।

कुलोत्तुंग प्रथम (नरसिंह वर्मन : 1070-1ii2 ई०)

कुलोत्तुंग ने अभिषेक के पश्चात् चोल और बेंगी राज्यों को मिलाकर एक कर दिया। यह करके उसने सोमेश्वर द्वितीय को अपनी ओर मिला कर विक्रमादित्य पर हमला कर दिया उसे युद्ध में हराकर उसने गंवड़ी पर अपना अधिकार कर लिया। उसने पाण्ड्य चेरों के विद्रोह का भी दमन किया। त्रिपुरी के हैहय नरेश से भी उसने युद्ध किया। कुलोत्तुंग के शासन के अन्तिम 4-5 वर्ष पूर्ण सफलता के साथ व्यतीत हुए। होयसल के नृपति विष्णुवर्द्धन ने चोल साम्राज्य के कई प्रदेशों, जैसे गंगबड़ी, नौलम्बड़ी और तलकाड पर अपना अधिकार जमा लिया। हैहय नरेश ने रामेश्वरम तक का भाग जीत लिया था विक्रमादित्य ने 1118 ई० में बेंगी पर अधिकार किया। कुलोत्तुंग महान शासक था जिसने अपने कौशल से इतना बड़ा साम्राज्य गठित किया। उसने दो बार राज्य-भूमि की नाप कराई। उसकी राजधानी गंगईकोंड चोलपुरम ही रही। उसके शासनकाल में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। उसका विदेशों में भी अच्छा सम्पर्क व प्रभाव था। उसने 1077 ई० में 72 यात्री चीन भेजे थे।

विक्रमचोल (1122-1135 ई०)

कुलोत्तुंग का पुत्र विक्रमचोल था। वह 1122 ई- में चोल राज्य का स्वामी बना। उसने शीघ्र ही बेंगी राज्य को चोल राज्य का अंग बना दिया। उसने गंगवड़ी के भी कुछ भाग पर अधिकार किया। उसने ‘अकलंक’ और ‘त्यागसमुद्र’ उपाधियां ग्रहण कीं। सन् 1125 ई० में उसके राज्य में अकाल पड़ा था। उसने चिदम्बरम में नटराज का मन्दिर बनवाया। सन् 1125 ई० में ही उसका प्राणान्त हुआ।

कुलोत्तुंग द्वितीय (1135-1150 ई०)

इसने अपना शासनकाल शान्तिपूर्वक व्यतीत किया। इसने नटराज मन्दिर में जो गोविन्ददेव की मूर्ति बनवाई, कहते हैं उसे रामानुजाचार्य ने तिरुपति में प्रतिष्ठापित किया था।

राजराजा द्वितीय (1150-1173 ई० )

यह कुलोत्तुंग द्वितीय का पुत्र था। इसके शासनकाल में उत्तराधिकार के लिए पराक्रम पाण्ड्य और कुलशेखर पाण्ड्य में युद्ध हुआ। लंका नरेश ने यह देखकर कि पराक्रम पाण्ड्य युद्ध में मारा गया, उसके पुत्र की सहायतार्थ भेजी। वह सेना उसे सिंहासनारूढ कराने के लिए भेजी गई थी। चोल सेना ने लंका की सेना को पराजित कर वीर पाण्ड्य को अपदस्थ कर दिया और कुलशेखर को पाण्ड्य राजा स्वीकारा।

राजाधिराज द्वितीय (1173-1178 ई०)

इस शासनकाल में पाण्ड्य गृहयुद्ध फिर भड़क उठा। लंकापति पराक्रमबाहु ने कुलशेखर को अपनी ओर फोड़कर चोलराज के खिलाफ संधि सम्पन्न की राजाधिराज ने भी अपनी नीति बदल डाली। उसने पाण्ड्य का पक्ष लेकर कुलशेखर से युद्ध की घोषणा की। इससे कुलशेखर पराजित हुआ । चोल सेना ने वीर पाण्ड्य को पाण्ड्यों का राजा बनाया। इस तरह राजाधिराज ने लंकापति की चाल को सफल न होने देकर पाण्ड्य की लंका के अधीन होने से रक्षा की। सन् 1178 में राजाधिराज मृत्यु को प्राप्त हुआ।

कुलोत्तुंग तृतीय (1178-1206 ई०)

पाण्ड्य गृहयुद्ध इसके शासनकाल में तौसरों बार फिर भड़का। पराक्रमबाहु ने इस बार कूटनीति का दूसरा खेल खेला। इस बार उसने वीर पाण्ड्य को अपने साथ किया। कुलोत्तुंग तृतीय ने विक्रम पाण्ड्य का समर्थन किया उसने पराक्रमबाहू की सेना को पराजित कर मदुरा के सिंहासन पर विक्रम को बिठाया। अन्त में वीर पाण्डय ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे भी क्षमा-दान दिया गया। कुलोत्तुंग तृतीय ने उसे थोड़ा भू-भाग भी दिया। कुलोत्तुंग तृतीय ने होयसलों की शक्ति को खंडित नहीं होने दिया। बाद में उसने होयसल नरेश बल्लाल द्वितीय से अपने सम्बन्ध ठीक कर लिए थे। उसके साथ एक कान्यकुब्ज कन्या का विवाह भी कर दिया था। वास्तव में देखा जाए तो वही अन्तिम महान चोल सम्राट था। वह ललित कलाओं का भी प्रेमी था और साहित्यकारों का आदर करता था। उसने मन्दिरों के निर्माण में अधिक रुचि दिखाई।

राजराजा तृतीय (1206-1246 ई०)

चोल प्रशासन का यह ढलता हुआ समय था जब राजराजा तृतीय शासक बना। राज्य में जगह-जगह विद्रोह प्रबल रूप धारण कर रहे थे। पाण्ड्यों ने भीषण आक्रमण किया और राजराजा बन्दी बना लिया गया। इस बन्धन से उसे होयसाल नरेश नरसिंह द्वितीय ने मुक्त कराया। राजरांजा को एक बार फिर सामन्त कोप पेरु ने आक्रमण करके बन्दी बनाया। इस बार भी नरसिंह द्वितीय की ही सहायता से वह मुक्त हुआ। इस प्रकार चोल राज्य लगभग होयसलों का आश्रित राज्य बना।

राजेन्द्र तृतीय (1246-1279 ई०)

यह इस वंश का अन्तिम स्वतंत्र शासक था। इसके शासनकाल में विषटन तेजी से सम्पन्न हुआ। राज्य के लगभग सभी सामन्तों ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। पाण्ड्य राजा जयवर्मन ने उसे युद्ध में पराजित करके बन्दी बना लिया। उसने उसे अपनी अधीनता स्वीकार करने को विधश कर दिया। इस प्रकार 1258 ई० से 1289 ई० तक वह पाण्ड्यों का सामन्त बन गया। यही चोल राज्य का अन्तिम अध्याय था।

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