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जापान का आधुनिकीकरण

जापान का आधुनिकीकरण

प्रशांत महासागर के आंचल में स्थित पूर्वी एशिया का शक्तिशाली देश जापान, विश्व में प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहा था। 12वीं शताब्दी तक यूरोपवासी इस देश से परिचित नहीं थे पुनर्जागरणकाल के खोजी अभियान में यूरोपीय नाविक जापान के सम्पर्क में आये। जापान उत्तर में कुरिल द्वीप समूह से दक्षिण में फामोसा द्वीप तक विस्तृत है। इसके अधीन तीन हजार से अधिक द्वीप हैं, परन्तु 600 द्वीप ही आबाद हैं। इनमें से अधिकांश द्वीप आकार में बहुत छोटे हैं हकाइडो (येजो), होंशू, शीकोकु, क्यूश, सरवालीन तथा फारमोसा प्रमुख द्वीप हैं। एशिया महाद्वीप से आने वाले अधिकांश प्रभावों का प्रवेश द्वार ‘क्यूशू’ द्वीप को कहते हैं, जो चीन के अधिक सन्निकट है। क्यूशू वह द्वीप है, जो यूरोप से अधिक प्रभावित था ।

जापान का विदेशों से सम्पर्क

सर्वप्रथम 23 सितम्बर, 1543 को पुर्तगालियों ने जापान में प्रवेश किया। जापानियों ने उनसे अस्त्र-शस्त्र तथा गोलाबारूद बनाने की कला सीखी । ईसाई पादरियों को यहाँ धर्म प्रचार करने की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी थी। 1571 ई. तक पश्चिमी जापान में ईसाईयों की संख्या 30 हजार तक पहुँच गई। 16वीं शताब्दी के उत्तरार्द् में पुर्तगाल, स्पेन और डच व्यापारी जापान में पहुँचने लगे तथा जापानी जहाज भी एशिया के कई देशों के बन्दरगाहों पर पहुँचने लगे । जापानी यूरोपीय घुसपैठ से भयभीत थे, क्योंकि पूर्व में ईसाईयों ने अमेरिका में प्रवेश करके उनकी राजनीतिक स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया था।

इसके अलावा सामन्तशाही शक्तियाँ भी यह अनुभव करती थी कि एकाकी नीति अपना कर ही सामंतवाद को पतन से बचाया जा सकता है। अन्ततः 17वीं शताब्दी की शुरूआत, 1614 ई. में ही जापान में ईसाईयों तथा अन्य धर्म प्रचारकों का प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया सिर्फ चीनी एवं डच नागरिकों को छोड़कर जापान ने 1637 ई. में विदेशियों के लिए द्वार पूर्णतः बंद कर दिया। इस आदेश की अवहेलना करने पर प्राणदण्ड देने की घोषणा की गई इसके साथ ही समुद्र व्यापार के लिए 50 टन से अधिक बड़े जहाजों के निर्माण को प्रतिबंधित कर दिया गया।

अनुमानत: दो सौ वर्षों के पृथकत्व में जापान आन्तरिक शांति बनाये रखने में सफल रहा परन्तु 19वीं शताब्दी में प्रशांत महासागर में यूरोपीय व्यापारिक गतिविधियों का प्रभाव जापान में देखने को मिला। अन्ततः 1825 ई. में जापानी अधिकारियों ने यह आज्ञा प्रसारित करवाई कि कोई भी विदेशी अगर जापान में जहाज उतारेगा तो उसे गोली मार दी जायेगी।

कोमोडोर पेरी का जापान में प्रवेश

जिस प्रकार अफीम युद्ध (1839-42) ने चीन का द्वार विदेशियों के लिए खोल दिया था उसी प्रकार 1853 में अमेरिकी नौ-सैनिक कोमोडोर पेरी ने जापान के तट पर उपस्थित होकर पुनः जापान का द्वार विदेशियों के लिए खोल दिया। अमेरिका की जापान में विशेष रुचि के कारणों में प्रथम केलि तथा वहाँ पहुँचने के लिए जापान होकर गुजरना आवश्यक था दूसरा कारण अमेरिका के उत्तरी- पश्चिमी किनारे पर हेल मछली का उन्नत व्यापार था। जापानी बंदरगाहों को अमेरिका के लिए खोलने को लेकर शोगुन एवं अमेरिकी राष्ट्रपति के मध्य 31 मार्च, 1854 को ‘कनागाव’ की संधि हुई। इसकी शर्तें इस प्रकार प्रशांत तट पर सोने के भंडार मिलने के कारण उसका व्यापारिक केन्द्र बनना

(I) विदेशी जहाजों को यह अधिकार प्रदान किया कि वे येडो के पास शिमोदा तथा उत्तरी द्वीप पर र्थित हाकोदाते के बन्दरगाहों पर रसद प्राप्त करने, ताजा पानी लेने कोयला भरने के साथ-साथ मशीनों की मरम्मत करने के उह्देश्य से ठहर सकते हैं।
(ii) जिन देशों के जहाज खराब हो जायें, उन देशों के नाविकों को सुरक्षा प्रदान की जायेगी।
(iii) शिमोदा में वाणिज्यिक दूतावास स्थापित किया जायेगा ।
(iv) व्यापार केवल स्थानीय विनियमों के अधीन ही किया जायेगा ।

जापान की 200 वर्षों से पृथकत्व बनाये रखने की नीति को समाप्त कर देना ही इस संधि का महत्व है। कोमोडोर पैरी का अनुसरण करते हुए अन्य राष्ट्रों ने भी पहल करते हुए जापान से संधि करने के प्रयास किये। ब्रिटिश एडमिरल जेम्स स्टलिंग ने अक्टूबर, 1854 में नागासाकी में संधि की रूसी एडमिरल काठन्ट पुलयातिन के साथ जापान ने शिमोद में फरवरी, 1855 में संधि की डच लोगों ने भी जनवरी, 1856 ई. में जापान के साथ संधि की। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस एवं डच लोगों को निम्नलिखित अधिकार दिये गये।

(1) शिमोदा, हाकोदाते और नागासाकी में जहाजों के लिए रसद प्राप्त करने की सुक्रिश्ा देना।
(ii) शिमोदा एवं हाकोदाते में चाणिज्य दूतों की नियुक्ति।
(iii) नागासाकी में पुरुषों के रहने की सुविधा।
(iv) शिमोदा, हाकोदाते एवं नागासाकी की बंदरगाहों पर जापानी अधिकारियों के माध्यम से नियमों
के अन्तर्गत व्यापार।
(v) सीमित राज्य-क्षेत्रातीत अधिकार।

विभिन्न संधियों के परिणामस्वरूप जापान पार्चात्य देशों के सम्पर्क में आ गया जापान को अपने राज्य क्षेत्र में विदेशियों को प्रवेश देने से प्रभुसत्ता तो सीमित हुई, परन्तु इसके दूरगामी परिणाम सार्थक रहे।

अनेक देशों के सम्पर्क में आने से वहाँ के ज्ञान-विज्ञान एवं दर्शन को समझने से प्रगति के द्वार खुले। पाश्चात्य जगत् के सम्पर्क के उपरान्त जापानियों के दिलों-दिमाग में चेतना का संचार हुआ जिसने जापान के आधुनिकीकरण की पृष्ठभूमि तैयार की।

शोगुन व्यवस्था

मध्यकाल में जापान में सामंतवाद चरमोत्कर्ष पर था। शक्तिशाली सामंतों की उपाधि ‘शोगुन’ थी। शोगुन का शाब्दिक अर्थ ‘बर्बरों का दमन करने वाला’ होता है। वह सेना का शीर्षस्थ अधिकारी होता था ।

जापान की सरकार का सैन्य स्वरूप था जापानी सैनिक वर्ग की नीति संहिता को ‘बुशीदो’ कहा जाता था।
शोगुन व्यवस्था के समय राजनीति का केन्द्र ‘येडो’ था जापानी सम्राट को ‘मिकादो’ कहते थे, जो क्योतो में
निवास करता था । सम्राट ‘क्योतो’ में ही अपने उच्च अधिकारियों ‘कुगी’ से मंत्रणा करता था शोगुन ने राज्य
की समस्त शक्तियों पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।


৪ जुलाई, 1853 ई. में अमेरिकी नौ-सेना के अधिकारी कोमोडोर पैरी को वहां के राष्ट्रपति ‘फिलमोर’ द्वारा चार जहाजों के साथ येडो की खाड़ी में उतारने की स्वीकृति के साथ ही जापान के द्वार विदेशियों के लिए खुल गये जापान के द्वार विदेशियों के खोलने के मूल में शोगुन को माना जाता है। यह स्थिति उनके लिए बड़ी समस्या बन गई क्योंकि जापान में उनका विरोध आरंभ हो गया। इस घटना के साथ ही शोगुनों का पतन प्रारम्भ होने लगा तोकूगावा वंश के सामंत ‘योरीतोमो’ का नाम ही शोगुनों में उल्लेखनीय रहा है। कालान्तर में ‘सतसुमा एवं चोशू’ वंश शोगुनों का विरोधी हो गया। इसके साथ ही जिस शोगुन ने अमेरिका से संधि की थी उसकी मृत्यु हो चुकी थी 1866 ई. में अंतिम शोगुन ‘केईकी’ गद्दी पर बैठा। इस प्रकार परिस्थितियों में परिवर्तन आने लगा शोगुन पर चारों तरफ से दबाव आने के कारण 14 अक्टूबर, 1867 को उसने त्याग-पत्र दे दिया। इस प्रकार तोकूगावा सम्प्रदाय के पतन के साथ जापान की पृथकत्व की नीति का सदा के लिए अंत हो गया। शोगुन के समाप्त होने पर 25 जनवरी, 1868 ई. को ‘मुत्सुहितो’ जापान का सम्राट बन गया । वह 15 वर्ष की आयु में सम्राट बना। उसे विदेशी विचारों के समर्थक के साथ-साथ कूटनीतिज्ञ माना जाता है। उसने राज्य सत्ता पर आधिपत्य स्थापित करके सामंतों को जागीरों से अपदस्थ करके निरबल वना दिया। अपनी राजधानी को उसने ‘क्योतो’ से ‘येडो’ (टोकियो) स्थानान्तरित कर दिया। जापान में शोगुन से सम्राट के पास सत्ता के हस्तान्तरण के साथ ही आधुनिकीकरण की शुरूआत हो गई। सम्राट ने ‘मेइजी’ की उपाधि धारण की। मेईजी का आशय ‘जागृत’ होता है।

मेइजी युग (25 जनवरी, 1868 – 30 जुलाई, 1912)

शोगुन पद की समाप्ति तथा 1868 में सम्राट मुत्सुहितों द्वारा सत्ता सम्भालने को जापान के इतिहास में एक युगान्तरकारी घटना माना जाता है। इस काल में जापान में प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति देखने को मिलती है जिसका विवरण इस प्रकार है :

सामन्त प्रथा की समाप्त

विधायिनी परिषद् ( दाइजोक्वान) के माध्यम से कार्य करने वाले। शासन को अनेक समस्याओं से मुखातिब होना पड़ा। इन समस्याओं में अहम समस्या सामन्तवाद की थी जब तक शाही शासन एवं जनता के मध्य सामन्ती सरदार मौजूद थे तब तक सत्ता का केन्द्रीकरण हो पाता चुनौतीपूर्ण कार्य था परन्तु 1868 ई. में सामंती सरदार के क्षेत्र में केन्द्रीय प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में नागरिक अधिकारी की नियुक्ति होने के उपरान्त सामंतों की पकड़ शासन से ढ़ीली पड़ते लगी। 1869 ई. तक सतसुमा, चोशु, हिजेन व टोसा ने सम्राट के समक्ष समर्पण कर दिया। जागीरों के समर्पण के पश्चात् 1871 ई. में एक शाही फरमान द्वारा सामंतवाद का पूर्णतः अन्त कर दिया गया।

राजनीतिक व्यवस्था में इस प्रकार के परिवर्तन का प्रभाव समाज के प्रत्येक वर्ग पर पड़ा। सबसे अधिक प्रभाव किसानों पर पड़ा। किसान शोगुन व्यवस्था के समय पंगु थे, वहीं मेइजी व्यवस्था के पश्चात उनको अपनी भूमि पर खेती करने या नहीं करने, बेच कर शहर में बसने आदि आत्मनिर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो गई।

सामंतों के विशेषाधिकारों की समाप्ति के समय दाइमो तथा समुराई वर्ग के हितों का ध्यान रखा गया। इन दोनों वर्गों को पेंशन देने का निर्णय लिया गया । कालान्तर में इनकी पेंशन का राष्ट्रीय कोष पर अधिक भार पड़ने के कारण 1873 ई. में पेंशन के बदले नगदी तथा सरकारी बाण्ड देने की घोषणा की गई।

सैन्य सुधार

मेइजी की स्थापना से पूर्व सैन्य व्यवस्था का आधार सामन्ती था, परन्तु सामंत प्रथा के अंत के उपरांत सैनिक संगठन में परिवर्तन देखने को मिला। अभी तक जापान में सैनिक कार्यों का निष्पादन समुराई वर्ग द्वारा किया जाता था इस वर्ग के अलावा किसी का भी सैन्य सेवाओं में प्रवेश नहीं था। परन्तु सामंत प्रथा की समाप्ति के पश्चात् यह तय किया गया कि कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता एवं क्षमता के आधार पर सेना में भर्ती हो सकता है। जापान में सैन्य सेवाओं का द्वार जब सभी के लिए खोल दिया गया तो सेना का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया। 1872 में जापान में सैनिक सेवा को अनिवार्य कर दिया गया। इसके पश्चात् जापान के नागरिकों को सैनिक शिक्षा प्राप्त करके निश्चित समय तक सैन्य सेवा में रहना आवश्यक हो गया।

इस व्यवस्था का जापान में दूरगामी परिणाम सैनिकवाद के उदय के रूप में देखने को मिला। अन्ततः जापान
की साम्राज्यवादी आकांक्षा बलवती होने लगी और वह भी साम्राज्यवादी युद्धों में रलझ गया।

औद्योगिक प्रगति

सामान्यतयाः भौगोलिक स्थिति के कारण एशिया के देश पश्चिम की अपेक्षा उद्योग और व्यवसाय की दृष्टि से उनसे काफी पीछे थे। जापान ने इस स्थिति से निकलने की दिशा में प्रयत्न किये। उसने विदेशों से मशीनों एवं तकनीकों को आयात किया, कल-कारखाने स्थापित किये, सरकार ने धन व्यय करने के लिए पूँजीपतियों को प्रोत्साहित किया। फलतः कुछ समय के बाद ही जापान में कारखाने स्थापित होने लगे 1870 ई. में जापान में उद्योग मंत्रालय स्थापित हो गया, 1871 में मशीन के पुर्जे बनाने का कारखाना, 1875 में सीमेण्ट कारखाना, 1876 में कॉँच कारखाना, 1878 में सफेद इंटों के कारखाने, 1881, 1882 में कपड़े के कारखाने आदि अनेक कारखाने स्थापित हो गये सरकार ने वाष्प शक्ति से कारखानों को संचालित करने का प्रयास किया 1890 तक अधिकांश कारखाने वाष्पशक्ति से संचालित होने लगे। औद्योगिक विकास के लिए धन की आवश्यकता होती है। इसलिए बैंकिंग व्यवस्था की ओर भी ध्यान
दिया। 1868 ई. तक सरकार के पास स्वयं का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त आय नहीं धी। मुद्रा विनिमय एवं
बैंकिंग समस्याओं को ध्यान में रखते हुए 1872 में राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गई । कालान्तर में यह कार्य
और प्रगति करने लगा। 1881 ई. में केन्द्रीय संस्था ‘बैंक ऑफ जापान’ की स्थापना की गई। एक और कदम बहाते हुए 1896 में राष्ट्रीय बैंकों को निजी बैंकों में परिवर्तित कर राष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली को समाप्त कर दिया।

1887 में ‘योकोहामा सोना चाँदी बैंक’ स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा के व्यापार को नियन्त्रित
करने के अलावा विदेशी व्यापार के लिए पूंजी उपलब्ध करवाना था। 1894 ई. के पश्चात् औद्योगिक एवं कृषि बैंकों की स्थापना होने लगी। इस प्रकार जापान में बैंकिंग प्रणाली फलीभूत होने लगी।

इस औद्योगिक विकास के मूल में यातायात के साधनों का विकास प्रमुख रहा है। 1852 ई. में सतसुमा में
भाप से चलने वाले जहाजों के नमूने तैयार किये गये 1855 ई. में शोगुन शासन के दौरान पश्चिमी शैली का
यान तैयार करवाया गया तथा 1857 ई. में बिना पश्चिमी सहायता के, भाप से संचालित जहाज को समुद्र में
उतारा गया। 1865 ई. में योकोसूका में एक जहाज निर्माण की गोदी प्रारम्भ की गई। जापानी सरकार ने जहाज निर्माण करने वाली कम्पनियों को आर्थक सम्बल प्रदान किया।

1872 ई. में जापान में टोकियो से योकोहामा के मध्य 19 मील की दूरी तक रेल लाइन बिछाकर रेल
की शुरूआत की गई। यह कार्य निजी कम्पनियों के सहयोग से सम्पन्न किया गया कालान्तर में रेल्वे का
राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। मेइजी शासन ने डाक एवं तार व्यवस्था को भी सुस्थापित किया।

कृषि क्षेत्र में प्रगति

शोगुन व्यवस्था के समय कृषकों की स्थिति अच्छी नहीं थी। कृषक स्वयं के लिए काम नहीं करके सामंतों के लिए करते थे। मेइजी शासन के समय कृषकों को भूमि का स्वामी मानते हुए बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया। भूमिकर अनाज के बदले नकद लिया जाने लगा। यह उपज का 25% निर्धारित किया गया। कृषि में सुधार करने के लिए पश्चिमी कृषि विशेषज्ञों की मदद ली गयी। कृषि विद्यालयों की स्थापना की गई। अच्छी उपज देने वाले कृषि बीजों को उत्पन्न किया जाने लगा।

1907 ई. तक धान का उत्पादन दोगुना तथा गेहूँ, जौ तथा रेशम के कीड़ों की पैदावार ढाई गुना तक पहुँच गई। परन्तु जनसंख्या वृद्धि अधिक होने के कारण जमीन कम होती चली गई जिससे किसान अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते थे। परिणामस्वरूप किसानों को जमीन बेचकर शहर की ओर प्रवास करना पड़ा।

इस प्रकार व्यापार, बैंकिंग, परिवहन, उद्योग एवं कृषि में सुधार के परिणामस्वरूप जापान के आर्थिक विकास ने गति पकड़ी। आर्थिक विकास में जापानी सरकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

बौद्धिक चेतना

शिक्षा के विकास से ही कोई राष्ट्र प्रत्येक क्षेत्र में विकास कर सकता है। इस सत्य को जापान ने स्वीकार करते हुए आधुनिक शिक्षा पर विशेष बल दिया। मेइजी शासन की स्थापना के पश्चात् 1871 ई. में शिक्षा विभाग की स्थापना करके प्रत्येक परिवार के प्रत्येक सदस्य को शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य कर दिया गया। इसका परिणाम यह निकला कि समस्त जापानी शिक्षित हो गये। जहाँ शोगुन व्यवस्था के अन्तर्गत केवल सामंतों एवं उनके परिवारजनों के अलावा उच्च वर्ग को ही शिक्षा प्रदान की जाती थी, वहीं मेइजी शासन की स्थापना के पश्चात् सभी नागरिकों को शिक्षा प्राप्त कत्ने का अधिकार दे दिया गया ।

सर्वप्रथम बच्चों को चारित्रिक निर्माण सम्बन्धी शिक्षा मुहैया करवायी जाती थी इसके साथ ही राष्ट्र एवं सम्राट के प्रति भक्ति और निष्ठा का पाठ पढ़ाया जाता था। जापानी शिक्षा मुख्यत: तीन देशों से प्रभावित थी-प्रारम्भिक शिक्षा अमेरिका से, विश्वविद्यालयी शिक्षा फ्रांस से और व्यावसायिक शिक्षा जर्मनी से। अनेक विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई 17 वर्षीय शिक्षा का प्रचलन था। राजनीति, कानून, व्यवसाय के अतिरिक्त विज्ञान एवं तकनीक की भी शिक्षा दी जाती थी। पश्चिमी शिक्षा के भी विकास पर ध्यान दिया गया । बेन्थम, मिल आदि की कृतियों को जापानी लिपि में अनुवाद किया गया। जापानी, अग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं के अध्ययन की व्यवस्था की गई।

पाश्चात्य भाषाओं के ग्रंथों का जापानी में अनुवाद करने के लिए 1811 ई. में ‘बान्शोशीराबेशो’ नामक संस्था
का गठन किया गया येदो के कन्प्यूशियसी विद्यालय शोगूनी आयुर्वेद शिक्षालय और बान्शो शीराबेशो को
मिलाकर 1869 ई. में इसका नाम राजकीय विश्वविद्यालय रखा गया 1886 ई. तक यहाँ सभी संकायों में अध्ययन करवाया जाने लगा।

जापान में स्त्रियों की शिक्षा पर भी विशेष बल दिया गया। प्राथमिक शिक्षा लड़कों के समान थी परन्तु माध्यमिक शिक्षा पत्नी और अच्छी माता बनने के लिए प्रदान की जाती थी। 1913 ई. में जापान में महिला शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। ‘याकोहामा माईनीचीशीम्बून’ जापान से प्रकाशित प्रथम समाचार-पत्र था, जिसका प्रकाशन 1870 ई. में किया जाने लगा। महिलाओं एवं बच्चों के लिए अलग से
पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाता था समाचार-पत्रों ने जापानियों के बौद्धिक स्तर को बढ़ाने का कार्य
किया।

राजनीतिक चेतना का अभ्युदय

19वीं शताब्दी में जापान में कुछ प्रगतिशील सोच वाले विचारक पैदा हुए, जिन्होंने शासन-सुधार के लिए पहल की। शासन-सुधार की पहल करने वालों का नेता ईसागाकी नाईसूके था 1874 ई. में उसने 1868 के घोषणा पत्र के अनुसार सम्राट से जापान में संसद के गठन की माँग की इस माँग को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए ‘आईकोकूरैशा’ ( देशभक्तों का समाज) नामक संगठन की 1885 ई, में स्थापना की कालान्तर में इसका नाम ‘कोक्काई कीसेई दोमेई’ (राष्ट्रीय संसद स्थापना दल) हो गया। जमींदारों, किसानों, मजदूरों एवं व्यापारियों का इस आन्दोलन का समर्थन प्राप्त था। इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप सम्राट ने जापान में एक सीनेट और प्रधान केन्द्रीय न्यायालय की स्थापना की। 1878 ई. में जापान में स्थानीय स्वशासन भी प्रारम्भ किया गया।

1878 ई. में प्रान्तीय प्रतिनिधि सभा का गठन करने का निर्णय किया गया शहरों, कस्बों एवं गाँवों में इसी प्रकार के अनेक संगठन बनाये गये, परन्तु इससे लोग सन्तुष्ट नहीं थे। इसी समय जापान में अनेक राजनीतिक दलों का गठन किया गया (1) 1881 ई. ईतागाकी ने ‘छो जीयूतो’ (डदारवादी दल), (2) 1882 में काउण्ट ओकूमा शीगेनोब्रू ने ‘रीक्केन कार्डशिनी’ (संवंधानिक -सुधार दल), (3) रूढ़िवादियों ने ‘रीक्केन-तेईसेईतो’ (संवैधानिक सांग्राज्यशाही दल) ।

शोगुन प्रथा की. समासि के पश्चात् ही जापान में एकान्तिक नीति के समान होने के साथ ही संप्राट
शक्तिशाली हो गया । उसने प्रशासनिक पुनर्गठन की पहल करते हुए, 1868 ई. में मंत्रिमंडल या परिषद् का
गठन किया। परिषद् में तीन महत्त्वपूर्ण पद स्थापित किये (1) सोसाई (सर्वोच्च अधिकारी), (2) प्रथम श्रेणी के पार्षद, (3) द्वितीय श्रेणी के पार्षद । वास्तविक शक्ति इसी परिषद् के अधीन थी इसके अतिरिक्त राज्य के दो प्रमुख मंत्रियों तथा उनके अधीन अधिकारियों की भी नियुक्ति की गई ये मंत्री विधायिनी परिषद् (दाइजोक्वान) और दरबार में संवाद एवं समन्वय बनाये रखने का कार्य करते थे। इस व्यवस्था का यह परिणाम निकला कि शक्ति एक ही संगठन में केन्द्रीकृत हो गयी

नयी विधि संहिता का निर्माण

प्राचीनकालीन जापान में प्रत्येक जागीर में अलग-अलग रीति- रिवाजों का प्रचलन था, ये रीति-रिवाज नये युग की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम थे। इसलिए सुधारवादी नेताओं ने विधि संहिता का निर्माण किया। विधि संहिता में फ्रांसीसी न्यायशास्त्री गुस्ताव बोइसनादे का प्रभाव अधिक झलक रहा था। यह सरकार का कानूनी सलाहकार था। कालान्तर में दीवानी संहिता जर्मन लोगों के सहयोग से तैयार की गई।

टोकियो शाही विश्वविद्यालय के जर्मन विद्वान् हरमन राएंसलर को संविधान प्रारूप समिति का परामर्शदाता
बनाया गया था जिन शारीरिक दण्डों को घृणित समझा गया, उन्हें हटा दिया गया। ज्यूरी द्वारा अभियोगों की
जाँच पद्धति को भी अस्वीकार कर दिया गया। शिक्षित अथवा अच्छे आचरण वाले व्यक्ति को भी जीवन पर्यन्त न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था अन्ततः 1890 ई. में इस विधि संहिता को जापानी सम्राट ने स्वीकार कर लिया।

मेइजी संविधान का निर्माण

जापानी राजनीतिज्ञ श्रीइतो’ ने नया संविधान बनाने का बीड़ा उठाया। विभिन्न पाश्चात्य देशों की यात्रा कर उनके संविधानों का अध्ययन एवं आत्मसात कर 1883 ई. में स्वदेश लौटकर संविधान निर्माण में जुट गये । अथक प्रयासों के बाद पाँच वर्षों में संविधान का प्रारूप बनाया गया। देश की जनता की इच्छा एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 1888 ई. में संविधान का प्रारूप बनकर तैयार हुआ और 1889 ई. में लागू कर दिया। संविधान में जनता हितों को ध्यान में रखते हुए सम्राट को साम्राज्य का अधिपति बनाया गया रान्य की समस्त कार्यकारी शक्तियाँ सम्राट में निहित की गयीं युद्ध तथा शांति की घोषणा का अधिकार भी सम्राट को दिया गया । सम्राट के हस्ताक्षर कर देने पर ही कोई कानून अन्तिम माना जायेगा, यह घोषित किया गया मन्त्रिपरिषद् एवं प्रीवी कौन्सिल के माध्यम से सम्राट इन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।

जापानी संविधान द्विसदनात्मक था संविधान को ‘डायट’ कहते थे। डायट में लॉर्ड सभा और लोकसभा नामक दो सदन थे। लॉर्ड सभा में राजवंश, बेरन, काठण्ट और कुलीनों का वर्चस्व था, परन्तु लोकसभा जनता दवारा निर्वाचित सदस्यों का सदन था। संसद का वार्षिक अधिवेशन बुलाया जाता था मताधिकार सम्पत्ति के आधार पर मिलता था। बजट के अनुमोदन एवं नये करों को लगाने के लिए संसद की स्वीकृति आवश्यक थी। संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को सप्राट द्वारा स्थगित किया जा सकता था संसद में मन्त्रियों से प्रश्न पूछा जा सकता था और उनके खिलाफ ऑवश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता था, परन्तु पद से हटाने का अधिकार केवल सम्राट के पास था।

1889 ई. में मेइजी संविधान में प्रत्येक व्यतक्ति को कानूनी समानता के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता एवं
राजकीय पदों पर योग्यतानुसार नियुक्ति पाने का अधिकार दिया गया किसी भी व्यक्ति को बिना ठोस आधार के बन्दी नहीं बनाया जा सकता था और न ही न्यायालय द्वारा दण्डित किये बिना कारागृह में रखा जा सकता था प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण एवं संगठन बनाने का अधिकार प्राप्त था।

जापान में शिंतो धर्म की पुनस्थापना

मेइजी काल में जापानियों में बदलाव देखा गया, परन्तु उनका बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आधार जापानी आदर्शों में ही निहित था मुत्सुहितों ने सम्राट बनते ही जापानी प्राचीन धर्म ‘शिंतो’ को पुनर्स्थापित किया जिससे लोगों में नवीन शक्ति का संचार हुआ। शिंतो धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जापान में ईसाई धर्म के प्रचार को प्रोत्साहन मिला। 1889 ई. में संविधान में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त स्वीकार कर लिया गया। जापान में बौद्ध धर्म का भी बोलबाला रहा है।

समीक्षा

शोगुन व्यवस्था के अंत और मेइजी की पुन्थापना ने यह अहसास करा दिया कि जापान अपने को महाशक्ति के रूप में परिवर्तित करके ही अपनी अभिलाषा को पूरी कर सकता है। जापान में प्रत्येक क्षेत्र (राजनीतिक, औद्योगिक, धार्मिक, शिक्षा) में परिवर्तन देखने को मिलते हैं जापान के आधुनिकीकरण ने उसकी विदेश नीति का निर्धारण किया। वह पूर्व में पश्चिमी देशों के साथ की गई संधियों को संशोधित करवाने के लिए व्यग्र हो उठा, क्योंकि वे संधियाँ उसकी स्वतंत्रता एवं सार्वभौम सत्ता पर धब्बा थी इस दिशा में पहल करते हुए 1873 ई. में जापान ने इस कार्य के लिए एक मिशन विदेशी सरकारों से बातचीत करने के लिए भेजा, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 1888 ई. में उसने पुन: प्रयास किया, परन्तु असफल रहा। अन्ततः जापान को यह अहसास हो गया कि शक्ति प्रदर्शन के बिना यह सम्भव नहीं हो सकता है। इसलिए उसने सैन्य शक्ति के साथ-साथ औद्योगिक, कृषि और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने शुरू किये। जापान में क्रमश: राष्ट्रवाद का उदय हो गया।

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