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अमेरिकी क्रान्ति/स्वतन्त्रता संग्राम का तात्कालिक कारण : शुरुआत, प्रगति एवं घटनाक्रम (1773 से 1783)

अमेरिकी क्रान्ति/स्वतन्त्रता संग्राम का तात्कालिक कारण : शुरुआत, प्रगति एवं घटनाक्रम (1773 से 1783)


ब्रिटिश सरकार की विशिष्ट चाय नीति : 1773 में ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई एक गलती ने अमरीकी उपनिवेशवासियों में क्रान्ति की भावना को प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान किया यह गलती थी प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ द्वारा अपनाई गई विशिष्ट चाय नीति। इस समय ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास चाय की आपूर्ति का आधिक्य हो गया था और यह कम्पनी वित्तीय संकट में थी इस कम्पनी में बहुत से प्रभावशाली व्यक्ति थे और उन्होंने कम्पनी को वित्तीय संकट से बचाने के लिये ब्रिटिश सरकार से सहायता की माँग की। लार्ड नार्थ ने यह निर्णय लिया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अमेरिकी उपनिवेशों में अपने जहाजों के माध्यम से सीधे चाय भेजने की अनुमति दे दी जाये पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी यह चाय ब्रिटिश बन्दरगाहों के माध्यम से ही भेज सकती थी, जहाँ उसे ऊँची दर पर चुंगी देनी पड़ती थी। अमेरिका को सीधे चाय भेजने का अधिकार मिलने पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को ब्रिटिश बन्दरगाहों की भारी चुँगी की बचत हो गई; अब उसे सिर्फ अमेरिका में चाय का लघु सीमा शुल्क ही देना था। लार्ड नार्थ का विचार था कि इससे एक तरफ तो अमेरिकावासियों को चाय सस्ती दर पर मिलेगी, दूसरी ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी अपने
आपूर्ति-आधिक्य एवं वित्तीय संकट से उबर जायेगी किन्तु लार्ड नार्थ ने अमेरिकी उपनिवेशों में चाय के
आयात पर लगाये जाने वाले चुंगी या सीमा-शुल्क (तीन पेंस प्रति पौंड की दर से) को यथावत् जारी रखा,
क्योंकि वह उसे ब्रिटिश संसद की प्रभुसत्ता का प्रतीक मानता था।

यद्यपि लार्ड नार्थ ने अमेरिका को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वारा सस्ती चाय उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की थी, लेकिन लार्ड नार्थ की इस नीति पर अमेरिका के व्यापारियों तथा वहाँ की जनता ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। ऐसा क्यों ? अमेरिका के व्यापारी तो इसलिये नाराज थे क्योंकि लार्ड नार्थ की नयी चाय नीति के कारण चाय के सम्पूर्ण व्यापार पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का एकाधिकार हो जाता; अमेरिका के न तो तस्कर व्यापारी और न ही वैधानिक तरीके से कार्य करने वाले व्यापारियों के लिये अब यह सम्भव था कि वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चाय की तुलना में सस्ती चाय बेच पाते; उनका चाय व्यापार चौपट होने की कगार पर था। इस कारण बहुत से व्यापारियों ने ‘सन्स ऑफ लिबट्टी’ को सहयोग एवं समर्थन देना आरम्भ कर दिया।

अमेरिका के सामान्य लोगों ने नयी चाय नीति को इसलिये पसन्द नहीं किया, क्योंकि उन्हें लगने लगा कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के माध्यम से आने वाली चाय पर सुनिश्चित एवं सुरक्षित रूप से वसूले जाने वाले आयात कर के माध्यम से ब्रिटिश सरकार उपनिवेश वासियों पर कर लगाने के अपने अधिकार को उनके सामने डंके की चोट पर एवं बार-बार सिद्ध करना चाहती है। यद्यपि नयी चाय नीति के कारण उन्हें चाय सस्ते दर पर मिलने वाला था, लेकिन इस सस्ती चाय में उन्हें अपने अपमान की बृ आ रही थी उन्हें चके से बोस्टन टी पार्टी (16 दिसम्बर, 1773) : अमेरिकी उपनियेशवासियां की सीत्र करिय देखने में आई जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने चाय के जहाज अमेरिकी वन्दरगाहीं पर नैंजनार प्राय: सभी बन्दरगाहों पर उपनिवेशों के प्रबद्ध कार्यकर्ता उनका विरोध करने के लिए तैयार ।

उन्होंने चाय की पेटियाँ तहखानों में डलवाकर उन पर ताले बन्द करवा दिये । यूपाक और किलीड चाय उन्हों जहाजों में वापस कर दी गई, जिनमें वह लाई गई थी। बोस्टन में गाहील विशष था 16 दिसम्बर, 1773 की सर्द रात्रि में, सेम्पयूअल एडम्स एवं उसके साथियी के लिए अमेरिकी व्यक्तियों का एक समूह, छदा वेश में, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक चाय से भरे जहा न और उसने जहाज पर से 342 चाय की पेटियाँ समूद्र में फैक दीं इस चटना की ‘बीस्टन टी केनम जाना जाता था। ‘बोस्टन टी पार्टी’ के सम्बन्ध में उपनिवेशवासियों के नेता जॉन एडम्स का कमनथाकि,’वह सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन है। चाय की यह बरबादी इतनी साहसपूर्ण दूढ़ और लवीली कार्य पे उसके परिणाम इतने स्थायी होंगे कि मैं उसे इतिहास की एक बड़ी घटना माने किता नहीं रह ब्रिटिश सरकार उपनिवेशवासियों एवं ब्रिटिश सरकार को आमने-सामने खडा कर दिया। एक ओर उপি की स्वाभिमानपूर्ण भावना थी तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार की सतावादी हठथर्मिता बौस्टन टी की उपनिवेशों पर ब्रिटिश संसद के अधिकार को एक खुली चुनौती थी क्रिटिश सरकार ने उलसे अलग से लिया। राजा जार्ज तृतीय, प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ और त्रिटिश संसद का बहमत, तीनीं ही उ के प्रति बड़ा सख्त रवैया अपनाने के पक्ष में थे । अत: ब्रिटिश संसद ने सन् 1774 के प्रारम्भ में उप के दमन के लिये चार कठोर एवं अनुदार अधिनियमों की एक श्रृंखला परित की यैं अ इर का थे:

(1) बोस्टन बन्दरगाह की व्यापारिक गतिविधियों को उस समय तक के लिये बन्द कर दिया गयाजय तक कि समुद्र में डुबोई गई चाय की क्षतिपूर्ति नहीं कर दी जाती तथा इस वात का प्रमाणল সतुत नहीं कर दिया जाता कि भविष्य में सब शुल्क ईमानदारी से अदा किये जाते रहेंगे। (2) एक अन्य कानून द्वारा मैरूट को व्यावहारिक दृष्टि से स्वशासन से वंचित कर दिया गया। मेसाचूखेट्स की शाखन व्यवस्था में त्रिटिश प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाकर उसकी अत्यधिक उदार विशेषतायें समाप्त कर दी गई । ब्रिटिश क्माडर ल गेज को मेसाचूसेट्स का गवर्नर बना दिया गया और उसकी सहायता के लिये बौस्टन मे चार रेजीमेण्टी की व्यवस्था की गई। (3) वे सरकारी अधिकारी, जिन पर हत्या के अभियोग थे, उनके मुकदमीं की कार्यवाही इंग्लैण्ड या अन्य उपनिवेशों में की जायेगी (4) यह भी व्यवस्था की गई कि ब्रिटिश सैनिकों को लोगीं के बरों कठोर अनुदार प्रतिक्रिया ‘बोस्टन टी पार्ी’ की यटता ने आ में रखा जा सकता है।

उपर्युक्त चारों अधिनियमों को उपनिवेशों में ‘अवपीड़नात्मक या अनुदार/असह्य अरधथिनियरमो” (Corcive or Intolerable Acts) के रूप में जाना गया । इसी समय ब्रिटिश संसद ने एक महत्त्वपूर्ण अधिनियम ‘क्यूबेक एक्ट’ (Qubec Act) पारित कर दीया जी दण्डात्मक नहीं था, लेकिन जिसके क्रियान्वयन में उपनिवेशवासियों ने खतरे का आभास कर लिया था।

क्यूबेक एक्ट के द्वारा कनाड़ा के क्यूबेक प्रान्त की सीमाओं को ओहियो नदी तक वढ़ा दिया गया; इससे पर्य
ओहियो नदी के अनेक उत्तरी क्षेत्रों पर अमेरिकी प्रान्तों (मेसाचूसेट्स, कनेक्टीकट एवं वजीनिया) का अधिकार था जो अब समाप्त हो गया। ऐसा वस्तुत: इन प्रान्तों की फ्रांसीसी-कनाडियन जनता की इच्छा के अनुसार किया गया था, और ऐसा करने का उद्देश्य अमेरिकी उपनिवेशों को दण्डित करना नहीं था लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से क्यूबेक में निरंकुश शासन की स्थापना कर दी और वहाँ कैथोलिक चर्च को प्रमुख स्थान प्रदान कर दिया। अमेरिकी उपनिवेशों के नेताओं ने ब्रिटिश सरकार के इस कदम को इस रूप में प्रचारित किया कि ब्रिटिश सरकार अमेरिकी उपनिवेशों की भी स्वतन्त्रता का दमन करने की योजना बना रही है और वहाँ भी कैथोलिक धर्म को प्रतिष्ठापित करना चाहती है। क्यूबेक एक्ट दमनात्यक नहीं था, लेकिन अमेरिकी उपनिवेशों में रहने वाली गैर कैथोलिक जनता ने इसे पसन्द नहीं किया तथा अमेरिका के स्वातन्त्र्य प्रिय वर्ग ने इसमें ब्रिटिश सरकार की निरंकुशता-समर्थक मानसिकता को पढ़ लिया।

ब्रिटिश सरकार के उपर्युक्त अधिनियमों से अमरीकी उपनिवेशवासियों में असंतोष एवं आशंका की लहर फैल गई। इसके विरोध में पत्र-पत्रिकाओं में अनेकलेख छापे गये, पर्चे बंटवाये गये तथा अनेक स्थानों पर सभायें आयोजित की गई। इसी समय वर्जीनिया की सभा ने अमरीका के संयुक्त हितों’ पर विचार करने के लिये एक अन्तर-प्रान्तीय कांग्रेस बुलाने का प्रस्ताव पारित किया अन्य प्रान्तों ने अत्यन्त उत्साहपूर्वक इस प्रस्ताव का स्वागत किया। जार्जिया को छोड़कर सभी प्रान्तों ने इस कांग्रेस में भाग लेने के लिये अपने प्रतिनिधियों का चयन किया।

प्रथम महाद्वीपीय कांग्रेस (सितम्बर, 1774): अमेरिका के बारह प्रान्तों (जार्जिया इसमें सम्मिलित नहीं हुआ) के 56 प्रतिनिधि फिलाडेल्फिया में 5 सितम्बर, 1774 को प्रथम महाद्वीपीय कांग्रेस में सम्मिलित हुये। इस कांग्रेस में भाग लेने वाले महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि थे -जार्ज वाशिंगटन, पैट्रिक हेनरी, जान एडम्स, सेम्युअल एडम्स, जॉन जे, जॉन डिकिन्सन आदि।

उक्त कांग्रेस के प्रतिनिधि दो प्रकार की विचारधाराओं में विभाजित थे एक ओर उग्रवादी (Radicals) थे जिनका मानना था कि अब वह समय आ गया है जबकि ब्रिटिश सरकार का शक्ति-प्रदर्शन के द्वारा विरोध किया जाये। इस उग्रवादियों में मेसाचूसेट्स के प्रतिनिधि -सेम्युअल एडम्स एवं जॉन एडम्स तथा वर्जीनिया के प्रतिनिधि-पैट्रिक हेनरी एवं रिचर्ड हेनरी ली , प्रमुख थे। दूसरी ओर नरमपन्थी (Moderates) थे जैसे कि पेनसिल्वेनिया के जॉन, डिकिन्सन, जो ब्रिटिश सरकार और उपनिवेशवासियों के मध्य किसी शान्तिपूर्ण
समझौते की उम्मीद रखते थे।

कांग्रेस के अधिकांश प्रतिनिधि अभी भी ब्रिटिश सरकार के सशस्त्र प्रतिरोध के पक्ष में नहीं थे कांग्रेस ने ‘अधिकारों एवं वेदनाओं का एक घोषणा-पत्र’ (Declaration of Rights and Grievances) तैयार किया, जिसे इंग्लैण्ड के राजा के पास विचारार्थ भेजा गया। इस घोषणा-पत्र में ब्रिटिश संसद द्वारा व्यापार नियन्त्रण के अधिकार को स्वीकार किया गया, बशर्ते वह सही हितों के संवर्धन के लिये हो। इस घोषणा पत्र में कहा गया है कि अमेरिकी प्रान्तों को अपने आन्तरिक मामलों में कानून बनाने का ” निरपेक्ष अधिकार” है, यद्यपि राजा उन पर निषेधाधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। जाहिर है कि इस घोषणा पत्र में नरमपंथियों की भावना का स्वर प्रमुख था। लेकिन कांग्रेस ने दो अन्य ऐसे निर्णय लिये जो ब्रिटिश सरकार के लिये चुनौतीपूर्ण थे। एक तो निर्णय यह था कि कांग्रेस ने ब्रिटेन के साथ वाणिज्यिक सम्बन्ध विच्छेद की नीति का अनुसरण करने का निर्णय लिया, यदि ब्रिटिश सरकार उपनिवेशवासियों की माँग स्वीकार नहीं करती है। विभिन्न प्रान्तों के मध्य इस प्रकार की सहमति को ‘महाद्वीपीय सहयोग’ (Continental Association) का नाम दिया गया। तदूनुसार यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक जिले में “सुरक्षा एवं निरीक्षण समितियाँ” बनाई जायें जो यह सुनिश्चित करें कि व्यापारियों द्वारा वाणिज्यिक बहिष्कार की नीति का उल्लंघन न हो । ‘महाद्वीपीय सहयोग’ की नीति पर हस्ताक्षर करने वाले प्रान्तों ने यह निर्णय लिया कि तीन महीने के अन्दर उपनिवेशों में ब्रिटेन से किया जाने वाला सम्पूर्ण आयात बन्द कर दिया जाये तथा तीन सालों में इंग्लैण्ड को किया जाने वाला सारा निर्यात समाप्त कर दिया जाये। एक अन्य महत्त्वपूर्ण निर्णय द्वारा कांग्रेस ने ब्रिटेन द्वारा हाल में जारी किये गये अनुदार असह्य अधिनियमों’ पर, मेसाचूसेट्स के विरोध को अनुमोदित कर दिया, साथ ही यह घोषणा की गई कि यदि ब्रिटिश सरकार ने मेसाचूसेट्स की जनता का दमन करने के लिये शक्ति का प्रयोग किया तो उसके विरोध में ‘सारे अमरीका को इन लोगों को सहायता प्रदान करनी चाहिए।’ यह ब्रिटिश सरकार को एक गम्भीर चुनौती थी। ब्रिटिश सरकार अपने कानूनों को वापिस लेने को तैयार नहीं थी दूसरी ओर उपनिवेशवासियों की बेरुखी के कारण इन कानूनों को क्रियान्वित करने के लिए बल का प्रयोग आवश्यक था लेकिन उस स्थिति में विद्रोह के भड़कने का खतरा था ब्रिटिश सरकार और उपनिवेशवासियों के मध्य संघर्ष और टक्कर की सम्भावनायें प्रबल हो गई थीं।

कानकार्ड एवं लेक्सिंगटन की लड़ाइयाँ ( अप्रैल 1775 ) : प्रथम महाद्वीपीय कांग्रेस से मेसाचूसेट्स
के प्रतिनिधि यह उम्मीद लेकर वापस आये थे कि ब्रिटिश सरकार के अनुदार अधिनियमों का विरोध करने में
अन्य प्रान्तों के लोग उनका साथ देंगे। मेसाचूसेट्स के निचले सदन ने शीघ्र ही स्वयं को प्रान्तीय कांग्रेस के रूप में पुनर्गठित कर लिया और जान हेनकॉक के नेतृत्व में एक सुरक्षा समिति का गठन कर उसे प्रतिरोध की योजना बनाने का दायित्व सौंपा। यद्यपि ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त जनरल गेज एवं उसकी रेजीमेन्टों ने बोस्टन नगर पर अधिकार कर रखा था, लेकिन उपनिवेश के अन्य क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की सेनायें युद्ध की तैयारी कर रही थीं और अस-शसत्र इकट्ठा कर रही थीं सशस्त्र युद्ध सन्निकट था।

19 अप्रैल, 1775 को ब्रिटिश सेना एवं मेसाचूसेट्स के नागरिकों के मध्य युद्ध आरम्भ हो गया। जनरल गेज को खबर मिली कि कानकार्ड ( बोस्टन से 18 मील दूर) नामक स्थान पर मेसाचूसेट्स के सैनिकों ने भारी अस्तर-शस्त्र जमा कर लिये थे कानकार्ड के इस फौजी जखीरे पर कब्जा करने के लिये, जनरल गेज ने अपने 800 सैनिकों की एक टुकड़ी 18 अप्रैल, 1775 की शाम को रवाना की इस टुकड़ी को यह आदेश भी दिया गया था कि यदि सम्भव हो तो हेनकाक एवं सेम एडम्स को गिरफ्तार कर लिया जाये दूसरी ओर, ‘सन्स ऑफ लिबटीं’ संस्था के सदस्यों ने रात्रि में देहातियों को ब्रिटिश हमले के प्रति चौकन्ना कर दिया था इसलिये जब आगामी सुबह ब्रिटिश सेना लेक्सिंगटन नामक स्थल पर पहुँची, तो वहाँ उसने मेसाचूसेट्स की प्रान्तीय कांग्रेस द्वारा समर्पित 70 सशस्त्र व्यक्तियों के समूह को सामने पाया| एक छोटी लड़ाई दोनों समूहों के बीच हुई जिनमें आठ अमेरिकी नागरिक तथा एक व्रिटिश सैनिक मारा गया, दस व्यक्ति घायल हुये । ब्रिटिश सेना कानकार्ड पहुँचने में सफल रही और वहाँ के आयुध भण्डार को उसने नष्ट कर दिया, लेकिन जब ब्रिटिश सैनिक बोस्टन पुनः लौट रहे थे, तो मार्ग में दीवारों, घरों, पेड़ों तथा झाड़ियों के पीछे छिपे औपनिवेशिक सैनिकों एवं नागरिकों ने उन पर जगह-जगह आक्रमण किया और लगभग 200 ब्रिटिश सैनिक मारे गये। इस घटना की खबर अन्य प्रान्तों में पहुँची तो विभिन्न प्रान्तों में लगभग 20,000 उपनिवेशवासी कैम्ब्रिज में इकट्ठे हो गये और ब्रिटिश सैनिकों ने अपने आपको बोस्टन में घिरा हुआ पाया।


ब्रिटिश सैनिकों एवं अमेरिकी उपनिवेशवासियों के मध्य, लेक्सिंगटन एवं कानकार्ड में हुई उपर्युक्त लड़ाइयों से, अमेरिकी क्रान्ति को शुरुआत मानी जाती है। इमरसन ने कहा था कि, ‘लेक्ंसिगटन में वह गोली दागी गई जिसे विश्व में सुना गया । लेक्सगटन में सैम एडम्स ने जब तोपों की गड़गड़ाइट सुनी तो उसने प्रसन्न होकर कहा ‘कैसा सुन्दर प्रभात है आज ।’

द्वितीय महाद्वीपीय कांग्रेस (1775 ): मई , 1775 में अमेरिकी प्रान्तों की ‘दूसरी महाद्वीपीय कांग्रेस’
के प्रतिनिधि फिलाडेल्फिया में एकत्र हुये। यह कांग्रेस पिछली कांग्रेस की तुलना में अधिक सहमतिपूर्ण एवं
स्पष्टतः उग्रवादी थी। इसने मेसाचूसेट्स के विद्रोहियों को पूर्ण समर्थन दिया तथा एक महाद्वीपीय सेना के गठन तथा युद्ध के संचालन का निर्णय लिया 15 जून को जार्ज वाशिंगटन को ‘महाद्वीपीय सैना’ का सेनापति नियुक्त किया गया।

यह उल्लेखनीय है, जैसा कि एच.बी. पाक्क्स (दि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका ए हिस्ट्री) ने
लिखा है, इस स्थिति में भी बहुत कम अमेरिकावासी स्वतन्त्रता के खुलेआम पक्ष में थे, लेकिन युद्ध की
शुरुआत होते ही उपनिवेशों में ब्रिटिश सत्ता का अधिकार तेजी से शिथिल होने लगा, व्यावहारिक स्तर पर,
सैद्धान्तिक स्तर पर पूर्णतः नहीं। शाही गवर्नरों को भगा दिया गया, विभिन्न प्रान्तों की विधान सभाओं ने प्रान्तीय कांग्रेसों की शक्तियाँ ग्रहण कर ली, एवं कार्यकारी संचालन के लिये सुरक्षा समितियों का गठन किया गया ।

इस प्रकार एक नवीन और मूलत: क्रान्तिकारी सरकार अमेरिका के सभी तेरह उपनिवेशों में अंवरतरित हो गयी इसी दौरान, ब्रिटिश सरकार ने यह घोषित कर दिया था कि ‘अमेरिका के उपनिवेश विद्रोह की स्थिति में हैं। आने वाले युद्ध ही यह निर्णय करेंगे कि वे ब्रिटिश सरकार के अधीन रहेंगे या स्वतन्त्र हो जायेंगे।’ जान एडम्स ने प्रत्युत्तर में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार के इस वक्तव्य ने ‘अमरीका के तेरह उपनिवेशों को शाही संरक्षण के बाहर कर दिया है और अब हम स्वतंत्र हैं।’ ‘देशभक्त’ एवं ‘स्वामिभक्त’ : युद्ध की शुरुआत के साथ ही यह पहचान स्पष्ट होने लगी थी कि अमेरिका का कौनसा नागरिक ‘देशभक्त’ (Patriot) है अर्थात् अमेरिका की स्वतनत्रता का पक्षधर है, तथा कौनसा नागरिक ‘स्वामिभक्त’ (loyalist) या ‘टोरी’ (Tory) है अर्थात् ब्रिटिश सरकार का पक्षधर है। बहुत- से नागरिक असमंजस की स्थिति में थे कि वे किस तरफ रहें। एच.बी. पाक्क्स के अनुसार, ‘सामान्यत: अमेरिकी क्रान्ति को सर्वाधिक सैनिक समर्थन उत्तरी किसानों एवं शिल्पियों से तथा उत्तरी व्यापारियों एवं दक्षिणी बागान-मालिकों से मिला जो ब्रिटिश वाणिज्यवाद के प्रतिबन्धों से घृणा करते थे लेकिन उतर के बहुत से उच्चवर्गीय नागरिक क्रान्तिकारी समितियों के शासन की तुलना में राजा जार्ज का शासन अधिक पसन्द करते थे, तथा मध्यवरती उपनिवशों के बहुत-से समृद्ध किसानों को कोई ऐसा माकूल कारण नहीं दिखाई देता था जिसके आधार पर वह ब्रिटिश सत्ता का विरोध करें। किसी को ज्ञात नहीं कि जनसंख्या का कितना अनुपात ब्रिटिश सरकार के प्रति स्वामिभक्ति की ओर झुकाव रखता है, लेकिन यह अनुपात लगभग एक-तिहाई रहा होगा …. अमेरिकी क्रान्ति (फ्रांस एवं रूसी क्रान्तियों से भिन्न) में कोई ‘आंतक का शासन’ नहीं था। बहुत कम स्वामिभक्तों को फांसी पर लटकाया गया, और बिना किसी ठोस कारण के तो किसी को भी नहीं।

आरम्भिक युद्ध

ब्रिटिश सैनिकों एवं उपनिवेशवासियों के मध्य हुये आरम्भिक युद्धों में 17 जून, 1775 को हुआ बोस्टन बन्दरगाह के निकट चाल्ल्सटाउन की पहाड़ियों में लड़ा गया ‘बंकरहिल का युद्ध’ महत्त्वपूर्ण है। इस युद्ध में ब्रिटिश जनरल पर विलियम हॉवे के नेतृत्व में लगभग 24,000 ब्रिटिश सैनिकों का सामना कर्नल विलियम प्रेसकोट के नेतृत्व में लड़ रहे अमेरिकी सैनिकों से हुआ। इस युद्ध में यद्यपि ब्रिटिश सैनिकों ने विजय प्राप्त की, लेकिन उन्हें भयंकर नुकसान उठाना पड़ा। उनके मृतकों की संख्या लगभग 1,054 थी जो कि अमेरिकी सैनिकों की तुलना में तिगुनी थी इस युद्ध में अमेरिकी सैनिकों ने ब्रिटिश सैनिकों को नाकों चने चबवा दिये, और जनरल होवे इस युद्ध में हुई ब्रिटिश सैनिकों की भीषण आहुति को नहीं भुला सका। उसे शेष वर्ष के दौरान, बोस्टन में रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ा नेविन्स एवं कौमेजर के अनुसार, ‘इस लड़ाई ने अमरोकियों के सम्मुख यह सिद्ध कर दिया कि बिना पर्याप्त संगठन और साधनों के भी वे यूरोप के सर्वोत्तम नियमित सैनिकों को पीछे हटा सकते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। बंकरहिल की लड़ाई से सात दिन पूर्व ही, ऐथन ऐलन के नेतृत्व में, औपनिवेशिक सैनिकों की एक टुकड़ी ने बहादुरी से लड़ते हुये टिकोनडेरोगा (Ticonderoga) के किले पर अधिकार कर लिया था, जो कनाड़ा जाने के मुख्य रास्ते पर अवस्थित था और आयुध भण्डार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था । इसी दौरान बेनेडिक्ट अर्नोल्ड के नेतृत्व में क्यूबेक पर आक्रमण के लिये एक अमेरिकी सैनिक अभियान गया था लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पाई।

स्वतन्त्रता की घोषणा

जून, 1776 तक अमरीकी प्रान्तों के प्रतिनिधियों को यह स्पष्ट आभास हो गया था कि ब्रिटिश सरकार से समझौते की उम्मीद करना व्यर्थ है अत: ब्रिटिश सरकार से सम्बन्ध विच्छेद एवं अमेरिकी प्रांतों की पूर्ण स्वतन्त्रता का विचार अब् जोर पकड़ने लगा था जनवरी, 1776 में प्रकाशित टामस पेन की बहुचर्चित लघु पुस्तिका ‘कामन सेन्स’ने भी अमेरिकावासियों की पूर्ण स्वतन्त्रता के विचार को प्रचारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया दूसरी ओर, ब्रिटिश सेना के साथ अब तक हुये युद्धों में यद्यपि अमेरिकी सैनिकों ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन किया था, लेकिन वे सफलता नहीं प्राप्त कर पाये थे। महाद्वीपीय कांग्रेस के कुछ व्यक्तियों का विचार था कि फ्रांस से सैनिक सहायता मिलने पर ब्रिटिश सेना को परास्त करना आसान हो जायेगा। लेकिन फ्रांस की सैनिक सहायता तभी उपलब्ध हो सकती थी जबकि अमेरिकी प्रांत ब्रिटिश सरकार उपर्युक्त पृष्ठभूमि में, 4 जुलाई , 1776 को महाद्वीपीय कांग्रेस ने एक क्रान्तिकारी कदम उठाते हुये सभी 13 अमेरिकी उपनिवेशों की “स्वतन्त्रता का घोषणा पत्र” (Declaration of Independence) जारी कर दिया। इस घोषणा पत्र को टामस जैफरसन के नेतृत्व में पाँच सदस्यों की एक समिति ने तैयार किया था।

इस घोषणा पत्र में यह स्पष्ट कहा गया कि ” अमेरिका के सभी संयुक्त उपनिवेश अब, और अधिकारपूर्वक इन्हें होना भी चाहिये, मुक्त और स्वतन्त्र राज्य है।” इस घोषणा पत्र में विस्तार से उन कारणों को भी स्पष्ट किया गया जिन्होंने अमेरिकी प्रांतों को ब्रटिश सम्राट से सम्बन्ध विच्छेद के लिये विवश किया। इस सम्बन्ध- विच्छेद का मूलभूत कारण यह बताया गया कि इंग्लैण्ड के शासक जार्ज तृतीय की उन्हें अपने पूर्णतः निरंकुश शासक के अन्तर्गत ले लेने की नीयत थी।

‘स्वतन्त्रता के घोषणा पत्र’ का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा वह था जिसमें राजनीतिक दर्शन एवं लोकप्रशासन सम्बन्धी उन मूलभूत सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया गया था जो ऐतिहासिक दृष्टि से परिवर्तनकारी थे। ये सिद्धान्त इस प्रकार थे :

(1) ‘सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं। अपने विधाता से वे कुछ अधिकार लेकर उत्पन्न होते हैं। इन अधिकारों में शामिल हैं-जीवन, स्वतन्त्रता और सुख की खोज के अधिकार।’ मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों का यह सिद्धान्त, अमेरिकावासियों ने प्रसिद्ध चिंतक जॉन लॉक की पुस्तक ‘सेकिण्ड ट्रिटाइज ऑन गवर्नमेण्ट से ग्रहण किया था दूसरे, समानता के सिद्धान्त ने अमेरिका में प्रचलित सभी पारम्परिक असमानताओं के प्रति अपनी स्पष्ट अस्वीकृति घोषित कर दी। टामस जैफरसन ने अपना पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद कर लें और स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दें। ‘अनअपहरणीय (Inalienable ) स्वयं यह स्वीकार किया था कि ‘निस्सन्देह अमरीका में बहुत-सी असमानताएँ थीं-जैसे धनी और गरीब की असमानता, पुरुष और स्त्री की असमानता, काले और गोरे की असमानता।

(2) घोषणा पत्र में यह भी कहा गया कि मनुष्य के उपर्युक्त ‘अनअपहरणीय’ अधिकारों को सुरक्षित
करने के लिये जनता की सरकारें बनती हैं जो शासित लोगों की सहमति से अपने न्यायपूर्ण अधिकार प्राप्त
करती हैं। स्पष्टत: यह कुलीनतन्त्र की सरकार की तुलना में, जनप्रिय या जनतंत्रात्मक सरकार के गठन की
आवश्यकता का संकेत था। प्रकारांतर से, यह ‘जनता की प्रभुसत्ता’ (popular sovereignty) के सिद्धान्त की घोषणा थी। नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में निस्संदेह यह लोकतन्त्र की विचारधारा है, एक ऐसी विचारधारा जो इतने संक्षिप्त एवं स्पष्ट रूप में पहले कभी प्रस्तुत नहीं की गई।

(3) स्वतन्त्रता के घोषणा पत्र में आगे यह भी कहा गया कि ‘जब शासन का कोई रूप इन उद्देश्यों का विनाशक हो जाता है तो जनता को यह अधिकार है कि वह उसे बदल दे या खत्म कर दे और उसकी जगह नया शासन स्थापित कर दे और उसकी बुनियाद ऐसे सिद्धान्तों पर रखे और उसके अधिकारों को ऐसे रूप में गठित करे, जो उसे अपने आपको सुरक्षा एवं सुख प्राप्त कराने के लिए सबसे अधिक सम्भव प्रतीत हो।’ दूसरे शब्दों में, जनता यदि सरकार बना सकती है तो उसे निरस्त भी कर सकती है; उन्हें एक अयोग्य सरकार को उलटने अथवा बदलने और नई सरकार बनाने का अधिकार है। प्रकारांतर से आवश्यकता पड़ने पर जनता को ‘क्रान्ति का अधिकार’ है। एच.बी. पाक्क्स के शब्दों में इस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया, मानवीय अधिकारों में आस्था की खनखनाती हुई घोषणा के साथ न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका बल्कि सम्पूर्ण मानवीय जाति का परवर्ती इतिहास मुख्यत: एक अनवरत संघर्ष की गाथा है,उक्त घोषणा पत्र में व्यक्त आदर्शों को प्रभावकारी वास्तविकताओं में रूपान ऐत करने के संघर्ष का नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में, ‘यह एक महत्त्वपूर्ण बात है कि अपने राष्ट्रीय इतिहास के प्रारम्भ में ही अमरीकियों ने अपना रुख सिद्धान्तों के आधार पर बनाया और एक दार्शनिक विचारधारा भी घोषित की।. जो विचार शताब्दियों तक दार्शनिकों की सम्पत्ति रहे थे, वे दर्शन के क्षेत्र से बाहर निकाल कर कानून में परिणत कर दिये गये।

अमेरिका में ‘स्वतन्त्रता की घोषणा’ का देशभक्तों ने बड़े जोशो-खरोश से स्वागत किया न्यूयार्क में इंग्लैण्ड के राजा जार्ज की मूर्ति गिरा दी गई ‘स्वामिभक्त ‘ या ‘टोरी’ लोग घबरा गये। प्रांतीय सरकारों को नवीन क्रान्तिकारी सिद्धान्तों के आधार पर गठित किया जाने लगा। ब्रिटेन में राजा एवं संसद ने ‘स्वतन्त्रता की घोषणा’ को देशद्रोह के रूप में लिया और उपनिवेशवासियों को विद्रोही घोषित कर दिया। अमेरिकी स्वतन्त्रता का संघर्ष आगामी सात वर्षों तक (1776 से 1783) चलता रहा।

स्वतन्त्रता संघर्ष की प्रगति एवं घटनाक्रम बंकरहिल की लड़ाई में भारी नुकसान उठाने के बाद, तथा जार्ज वाशिंगटन के आक्रामक रवैये को देखते हुये, ब्रिटिश जनरल हॉवे अपने सैनिकों के साथ बोस्टन शहर को छोड़कर चला गया तथा आगामी वर्षों के लिये उसने न्यूयार्क को ब्रिटिश सैनिक गतिविधियों का केन्द्र
बना लिया।

अगस्त, 1776 से नवम्बर, 1776 के मध्य न्यूयार्क में जनरल हॉवे की ब्रिटिश सेना एवं जार्ज वाशिंगटन
की अमेरिकी सेना के मध्य अनेक लड़ाइयाँ हुईं जिनमें ब्रिटिश सेना ने अनेक विजयें हासिल कीं। देशभक्तों का हॉसला टूटने लगा था लेकिन जार्ज वाशिंगटन ने हिम्मत नहीं हारी और वह उचित अवसर की तलाश में था।जो उसे शीघ्र ही मिल गया।

दिसम्बर, 1776 एवं जनवरी, 1777 के दौरान, जार्ज वाशिंगटन ने द्वुत गति से आक्रमण करते हुये,
मौसम तथा ब्रिटिश सेना की गलतियों का लाभ उठाते हुये, उन्हें ट्रेण्टन (दिसम्बर, 1776) तथा प्रिन्सटन
(जनवरी, 1777) के युद्धों में परास्त कर दिया और उन्हें वहाँ से भागने के लिये मजबूर किया।

ब्रिटिश जनरल हॉवे अपनी सेना के साथ फिलाडेल्फिया की ओर चला गया, ताकि जार्ज वाशिंगटन को भी दक्षिण की ओर बुलाया जा सके। 11 सितम्बर, 1777 को ब्रेण्डीवाइन के युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों ने जार्ज वाशिंगटन की सेना को परास्त कर दिया और 26 सितम्बर को जनरल हॉकवे ने फिलाडेल्फिया पर अधिकार कर लिया।

लेकिन साराटोगा के युद्ध (17 अक्टूबर, 1777 ) में अमेरिकी सेना ने ब्रिटिश सेना पर एक महत्त्वपूर्ण
विजय प्राप्त की। नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में, ‘युद्ध की सबसे बड़ी निर्णायक लड़ाई, सैनिक अर्थों में
उसका मोड़ बिन्दु, साराटोगा की लड़ाई थी।’ साराटोगा की लड़ाई कनाडा से जनरल बगीायेन के नेतृत्व में भेजी गई ब्रिटिश सेना तथा जार्ज वाशिंगटन की अमेरिकी सेना के मध्य अक्टूबर, 1777 में हुई जनरल वर्गीयेन की।एक बहुत बड़ी गलती यह थी कि उसने अपनी सैनिक टुकड़ियों को अलग दिशाओं से आक्रमण करने के लिये विभाजित कर दिया था। जार्ज वाशिंगटन ने बर्गयेन की मुख्य सैनिक टुकड़ी को हड़सन नदी की ऊपरी चाटी में साराटोगा नामक स्थान पर घेरकर आत्मसमर्पण के लिये मजबूर कर दिया समर्पण सन्धि (17 अक्टूबर, 1777) के अनुसार, बगोयेन ने अपनी सेना को वापिस इंग्लैण्ड भेजने की शर्त स्वीकार कर ली।

साराटोगा के युद्ध में अमेरिका की विजय में ब्रिटेन के पराभव से उसके शत्रु देशों के हौँसले बुलंद हो
गये और उन्होंने अमरीकावासियों को उनके संघर्ष में सहयोग देने का निर्णय कर लिया। क्रमशः फ्रांस
(1778) , स्पेन ( 1779) एवं नीदरलैण्ड्स (1780) ने ग्रेट ब्रिटेन के विरुद्ध अमरीकी उपनिवेशवासियों को
सैनिक सहयोग प्रदान करने की घोषणा कर दी ।

अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम का यह एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश सेना अमेरिका में उत्तरी क्षेत्र को जीतने में सफल नहीं हो पाई तो उसने दक्षिण की ओर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया। दक्षिण की ओर आक्रमण करते हुये ब्रिटिश सेना ने सवन्ना (29 दिसम्बर, 1778 ), जार्जिया (1779), दक्षिणी कैरोलिना ( 1779) तथा चाल्ल्सटन (मई, 1780) पर अधिकार कर लिया। लेकिन अमेरिकी सेना ने अपनी इन पराजयों का बदला 7 अक्टूबर, 1780 को उत्तरी कैरोलिना की दक्षिणी सीमा पर स्थित किंग माउण्टेन के युद्ध में ब्रिटिश सेना को, एक घमासान संघर्ष में परास्त करके ले लिया।

ब्रिटिश सेना एवं अमरीकी सेना के मध्य अन्तिम एवं निर्णायक युद्ध यार्कटाउन (अक्टूबर, 1781 ) में
हुआ। फ्रांसोसी सेनायें अमेरिका में प्रविष्ट हो चुकी थीं, और जार्ज वाशिंगटन के साथ ब्रिटिश सेनानायक
कार्नवालिस से युद्ध के लिये तत्पर थी अमेरिका एवं फ्रांस की संयुक्त सेनाओं ने कार्नवालिस के नेतृत्व में लड़ रही, ब्रिटिश सेना को 19 अक्टूबर, 1781 को यार्कटाउन में घेर लिया। ब्रिटिश सेना की किलेबंदियों को अमेरिकी तोपों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया । एक फ्रांसीसी नौसैनिक बेड़े ने यार्कटाउन के समुद्री रास्ते की नाकाबन्दी कर दी जिससे कि कार्नवालिस अपने सैनिकों के साथ समुद्री मार्ग से न भाग पाये अपने को चारों ओर से घिरा हुआ पाकर कार्नवालिस ने अपने 7,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। कार्नवालिस ने अपनी तलवार जार्ज वाशिंगटन के पास भेज दी। इसके बाद ब्रिटिश सैनिकों ने अपने हथियार इकट्ठे किये और उनके बैंड ने ‘दि वल्लर्ड टन्ड अपसाइट डाउन’ (दुनिया उलट गई) की धुन बजाई । अमेरिका का स्वतन्त्रता युद्ध वस्तुत: समाप्त हो गया था, यद्यपि इंग्लैंड के क्रुद्ध शासक जार्ज तृतीय ने अपनी पराजय को स्वीकार करने से मना कर दिया। अंत में अपनी अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों के सम्पूर्ण आकलन के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका पर अधिकार को त्यागने का निर्णय ले लिया। 1782 में ब्रिटेन ने अमरीका के अधिकांश बन्दरगाहों से अपनी सेना हटा ली थी, सिर्फ न्यूयार्क पर उनका अधिकार रह गया था ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी नेताओं से सन्धि वार्ता आरम्भ कर दी।

पेरिस की शान्ति-सन्धि

3 सितम्बर, 1783 को प्रेट ब्रिटेन एवं अमेरिका के मध्य की गई शान्ति- सन्धि द्वारा इंग्लैण्ड ने अमेरिका के तेरह उपनिवेशीय प्रांतों को प्रभुतासम्पन्न एवं स्वतन्त्र ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ के रूप में स्वीकार कर लिया। इस नवीन राष्ट्र की सीमायें इस प्रकार निर्धारित की गई- उत्तर में कनाड़ा एवं ‘दि ग्रेट लेक्स’ तक; दक्षिण में फ्लोरिडा तक; पूर्व में अटलांटिक तक तथा दक्षिण में मिसीसिपी इसके साथ ही अमेरिका में ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया अमेरिकावासियों ने अब एक नव प्रभात देखा-मुक्त एवं स्वतंत्र रोशनी का प्रभात। एच.बी. पाक्क्स के शब्दों में, ‘इस प्रकार अमेरिकावासियों ने अपने भाग्य को स्वयं नियन्त्रित करने के अधिकार को प्रतिष्ठापित कर लिया और नवीन सिद्धान्तों पर आधारित, एक नवीन राष्ट्र का उदय हुआ।
अमेरिका की सफलता एवं ब्रिटेन की असफलता के कारण अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम में अमेरिकावासी अपने सीमित साधनों के बावजूद, अपनी उत्कट इच्छाशीक्ति एवं अदम्य स्वातंत्र्य-भावना के बलबूते पर, एक दीर्घकालीन संघर्ष में जीत गये दूसरी और, ब्रिटिश साम्राज्य अपनी आर्थिक समृद्धि, प्रशिक्षित सैन्य शक्ति, विपुल आयुध भण्डार तथा अमरीका में ब्रिटिशा स्वामिभक्तों के सहयोग के बावजूद युद्ध में अन्ततोगत्वा परास्त हो गया। ऐसा क्यों ? एक प्रकार से देखा जाये तो यह संघर्ष ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति और अमेरिकावासियों की देशभक्ति की भावना के मध्य था। शक्ति और भावना की इस लड़ाई में विजय भाबना की हुई, जबकि ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का गणित ऐसी कोई सम्भावना व्यक्त नहीं कर रहा था लेकिन यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि ऐसा हुआ ऐतिहासिक घटनायें कार्यकारण श्रृंखला में बंधी होती हैं, आधुनिक इतिहासकारों का ऐसा मानना है अमेरिकी स्वातन्त्र्य संग्राम की दीर्घकालीन प्रक्रिया का यदि सुक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो उन स्थितियों को पहचाना जा सकता है जो इस संग्राम के अन्त में अमेरिका की जय और ब्रिटेन की पराजय का कारण बनीं। दोनों पक्षों के मध्य इस प्रकार के निर्णायक भेदों या अन्तरों को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है :

भौगोलिक पहचान एवं गतिशीलता का अन्तर : अमेरिकी सैनिक अपनी ही भूमि पर लड़ रहे थे, वे अपने भौगोलिक क्षेत्रों को पहचानते थे और इन क्षेत्रों में उनकी गतिशीलता त्वरित एवं प्रभावशाली थी। आवश्यकता पड़ने पर वे गुरिल्ला या छापामार पद्धति का भी प्रयोग कर सकते थे । दूसरी ओर, ब्रिटिश सैनिकों के लिये अमेरिका का विस्तृत भू-भाग एक मायावी जंगल की तरह था। नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में, ‘अमेरीकियों के लिये एक अनुकूल परस्थिति तो रणक्षेत्र थी। वे अपने ही विरल आबादी वाले प्रदेश में लड़ रहे थे, जिसमें से बहुत-सा प्रदेश अब भी गैर-आबादी जंगली प्रदेश था । ब्रिटेन यहाँ से तीन हजार मील दूर था।

यह सम्भव था कि अमेरीकियों की एक सेना एक जगह हार जाये, किन्तु सैंकड़ों मील दूर एक नई सेना लड़ने के लिये उठ खड़ी हो सकती थी। ब्रिटिश लोगों के लिये इतने विशाल प्रदेश को अपने नियन्त्रण में रख पाना एक प्रकार से असम्भव था। सैनिकों और सामग्री को इतने विशाल समुद्र के एक छोर से दूसरे छोर पर जहाजों से पहुँचाना महँगा भी था और कठिन भी। इसके अलावा लन्दन से ब्रिटिश सेना का उचित सामरिक संचालन असम्भव था।

सैनिक नेतृत्व एवं जीवट का अन्तर : ब्रिटेन के पास प्रशिक्षित सैनिक एवं सेनानायक थे। उसके पास अस्त्र-शस्त्र भी भरपूर थे दूसरी ओर अमेरिका के पास न केवल प्रशिक्षित सैनिकों एवं उपयुक्त शस्त्रों की कमी थी, बल्कि धन के अभाव के कारण उनके सैनिकों को बड़े कष्ट में रहना पड़ता था। ऐसे अवसर भी आये जब अमेरिकी सैनिकों को अनेक दिनों तक बिना मांस के रहना पड़ा और आहार के लिये अनेक बार उन्हें पड़ोसियों के फार्मों पर आक्रमण करना पड़ता था । बहुत से सैनिकों को यूनिफार्म नहीं मिल पायी, और वे अपने ही कपड़े पहने रहते थे जब तक वे जीर्ण-शीर्ण नहीं हो जाते थे। सैनिकों को अनेक बार ठंड में बिना कम्बल के सोना पड़ता था, और बिना जूतों के ही यात्रा करनी पड़ती थी। कुछ सैनिकों के पास तो कपड़े इतने कम होते थे कि वे शर्म के मारे युद्ध के मैदान में आ ही नहीं पाते थे। जार्ज वाशिंगटन की सेना संख्या में अपेक्षाकृत बहुत छोटी होती थी, और वह भी कई बार उन्मूलन के कगार पर आ जाती थी। यद्यपि लगभग 2 लाख सैनिकों ने अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया, लेकिन जार्ज वाशिंगटन कभी भी एक समय पर 16,000 से अधिक सैनिक इकट्ठे नहीं कर पाया, और तेज ठंड के दौरान तो उसकी सेना की संख्या कई बार, 3,000 के आस-पास ही रह जाती थी दूसरी ओर, अमेरिका में ब्रिटिश सेना 30,000 या इससे अधिक होती थी। वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखा जाये तो सैनिक दृष्टि से ब्रिटेन का पलड़ा अमेरिकनों से बहुत भारी था। इसके बावजूद ब्रिटिश सेना पराजित हुई। ऐसा क्यों ? इसका कारण व्यक्तिनिष्ठ है। सैनिक नेतृत्व एवं सैनिक जीवट की दृष्टि से अमेरिकी सेनायें कहीं बेहतर सिद्ध हुईं।

एक तो ब्रिटिश सेना में भाड़े के सैनिक बहुत अधिक थे। स्वयं ब्रिटेन के लोग अमेरिका जाने वाली ब्रिटिश सेना में शामिल होना कम पसन्द करते थे, अतः राजा जार्ज को जर्मनी के हेस एवं अन्य प्रांतों से लगभग 30,000 भृतक सैनिकों को लेना पड़ा। ये भाड़े के सैनिक अमेरिका में ब्रिटिश सेना की ओर से बिना किसी जीवट एवं आन्तरिक लगाव के, युद्ध करते थे तथा थोड़ी-सी विपरीत परिस्थिति में ही मैदान छोड़ कर भाग जाते थे एच.बी. पाक्क्स के अनुसार, ‘ब्रिटिश सेना और अंच्छा प्रदर्शन कर सकती थी यदि वह अमेरिकावासी ‘स्वामिभक्तों’ की सेनाओं का प्रभावशाली उपयोग करती। युद्ध के दौरान लगभग 30,000 से 50,000 स्वामिभक्त अमरीकी लोगों ने ब्रटिश सेना में सेवा की, यद्यपि उनमें से अधिकांश ने बहुत कम समय के लिये। लेकिन ब्रिटिश सेनानायक उन पर अविश्वासपूर्ण नजर रखते थे और उन्होंने उनका सहयोग सुनिश्चित करने के लिये बहुत कम प्रयास किये।

दूसरी ओर अमेरिकी सैनिक, यद्यपि उनके संगठन एवं प्रशिक्षण में अनेक खामियाँ थीं, तथा उनके पास साधनों की कमी भी थी, तथा युद्ध के मैदान में वे बडे जीवट एवं उत्साह के साथ उतरते थे, उनके मन में स्वतन्त्रता की प्रबल आकांक्षा थी और युद्ध में अपनी कर्मशीलता के प्रति उनकी गहरी आन्तरिक निष्ठा थी।

नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में, ‘अमेरीकियों के लिये एक लाभ की स्थिति यह थी कि कभी-कभी नाजुक
क्षणों में वे मर-मिटने की अत्यन्त उच्च भावना प्रदर्शित करते थे। ये किसान सिपाही, जो शिकारगाहों और
खेतों से ताज़े-ताज़े निकलकर लड़ाई के मैदान में आते थे, जो व्यक्तिवादी और मनमाने होते थे, अगर तीन-
चौथाई समय परेशानी पैदा करते थे तो कभी- कभी देशभक्ति की भावना से अत्यधिक शानदार लड़ाई भी
लड़ते थे। उत्तरी सैनिक, जो 1771 में बरगोयन की आक्रामक सेना को नष्ट करने के लिये गठित हुए थे और
दक्षिणी सैनिक, जिन्होंने 1780-81 में एक के बाद एक पराजयों का सामना किया था, और फिर भी तब तक बार-बार हमले किये थे, जब तक कि उन्हें विजय प्राप्त नहीं हो गई, यह सिद्ध करते थे कि उत्कट देशभक्ति की भावना को पराजित नहीं किया जा सकता।


दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार द्वारा युद्ध का संचालन कुशलतापूर्वक नहीं किया गया ब्रिटिश सेना के
अधिकारियों ने, अहंकार एवं अत्यधिक आत्मविश्वास में, अमेरिकी सेना की जुझारू प्रकृति का न्यून प्राक्कलन किया, अर्थात् उसके महत्त्व को बहुत कम आंका। ब्रिटिश नौसेना विभाग के अध्यक्ष लार्ड सैंडविच का कथन था कि, ‘अमेरिकी सैनिक कच्चे, अनुशासनहीन एवं डरपोक हैं।’ जनरल गेज का मानना था कि अमेरिका को जीतने के लिये केवल चार ब्रिटिश रेजीमेन्टों की आवश्यकता है।

अमेरिका के विरुद्ध सैनिक अभियानों में नियुक्त ब्रिटिश सेनापतियों (जनरल हॉवे, बगंयेन आदि) ने सही रणनीति एवं त्वरित गतिशीलता के साथ युद्ध नहीं किया । उनमें उत्साह भी कम था और वे इतने आरामतलब थे कि शीघ्र प्रयाण नहीं करते थे। साराटोगा की लडाई में ब्रिटिश सेना की पराजय का एक कारण यह था कि ब्रिटिश सेनापति जनरल बगौंयेन ने अपनी सैनिक टुकड़ियों को विभाजित कर दिया था, और वह उन्हें सही समय पर एकत्र नहीं कर सका नेविन्स एवं कौमेजर के अनुसार, ‘देशभक्तों के लिये एक वरदान यह भी था कि बरगोयन, होव और क्लिंटन ने ब्रिटिश फौजों का प्रबन्ध अच्छी तरह नहीं किया। एच. बी. पाक्क्स का मानना है कि, ‘लन्दन में राजा के मन्त्री अधिक योग्यता वाले व्यक्ति नहीं थे यद्यपि अधिकांश इंग्लैण्डवासी औपनिवेशिक साम्राज्य के परम्परागत सिद्धान्त का समर्थन करते थे, लेकिन युद्ध के प्रति इंग्लैण्ड की जनता में बहुत कम उत्साह था। कुछ उदारवादी अंग्रेज, वास्तव में अमेरिका की विजय देखना चाहते थे जिससे कि राजा का अपमान हो एवं उसके व्यक्तिगत शासन की समाप्ति हो।

दूसरी ओर, अमेरिकी सेना को जार्ज वाशिंगटन के रूप में एक जुझारू एवं दृढ़प्रतिज्ञ सेनापति मिला था यद्यपि वह एक अतिमानवीय व्यक्तित नहीं था, न ही कोई विलक्षण सेनानायक था, उसने अनेक बार गलतियाँ की, ‘लेकिन उसका प्रभावशाली व्यक्तित्व विश्वास एवं आज्ञाकारिता जाग्रत करता था, और उसमें एक श्रेष्ठतम स्तर तक, ईमानदारी साहस एवं संकल्प के मूलभूत नैतिक गुण विद्यमान थे ।’ नेविन्स एवं कौमेजर के शब्दों में, ‘अमेरीकियों के लिए सबसे अधिक लाभ की बात तो यह थी कि उन्हें नेता बहुत अच्छा मिला था। अमेरीकियों के पास जार्ज वाशिंगटन जैसा नेता था । कांग्रेस ने जब उसे चुना था तब उसे अपनी क्षमताओं का कोई ज्ञान नहीं था…उसने कभी भी एक आधुनिक डिवीजन से बड़ी सेना का संचालन नहीं किया, उसने बहुत-से गलत कदम उठाये और बार-बार पराजित भी हुआ। किन्तु 43 वर्ष की आयु में कमान सभालने के बाद वह युद्ध की आत्मा बन गया । अपनी अटूट देशभक्ति, अपनी शान्त बुद्धिमत्ता, अपने प्रखर नेतिक साहस के कारण व्जीनिया का यह भू-स्वामी और सीमा प्रदेश का कर्नल (जॉर्ज वाशिंगटन) युद्ध की प्ररणास्पद आत्मा था। अत्यन्त निराशा और अन्धकार के क्षणों में भी उसने अपनी गरिमा, वीरता और संकल्प को नहीं खोया, वह जानता था कि साहस, उद्यम और सतर्कता का कैसे मिश्रण किया जाना चाहिए उसकी ईमानदारी, उदात्तता और उदार-हृदयता में कमी कभी नहीं आई । उसकी दृढ़ता कभी नहीं लड़खड़ाई। वह जानता था कि अपनी हमले की घड़ी के लिए कैसे प्रतीक्षा की जाती है।”

विदेशी सहायता की भूमिका : अमेरिका की निर्णायक विजय फ्रांस की सैनिक सहायता के बिना दुष्कर होती। फ्रांस (1778), स्पेन ( 1779) एवं नीदरलैण्ड्स (1780) ने ब्रिटेन के विरुद्ध अमेरिकी सेना को सहयोग प्रदान कर एक ओर अमेरीकियों का शक्तिवर्धन किया, तो दूसरी ओर ब्रिटेन की शक्ति को अनेक स्थलीय एवं नौसैनिक युद्धों में विभाजित कर दिया। अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के अन्तिम चरण के दौरान, ब्रिटेन जिब्राल्टर में भी युद्धरत था, वेस्टइंडीज में भी और उत्तरी अमेरिका में भी अमेरिका को मिली विदेशी सहायता ने स्वतन्त्रता संग्राम में उसकी विजय में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। यार्कटाउन के युद्ध (अक्टूबर, 1781) में ब्रिटिश सेनापति कार्नवालिस को इसलिये समर्पण करना पड़ा क्योंकि अमेरिका एवं फ्रांस की संयुक्त सेनाओं ने उसे घेर लिया था, और फ्रांस के नौसैनिक बेड़े ने समुद्र की ओर से उसके भाग जाने का रास्ता बन्द कर दिया था। यह उल्लेखनीय है कि फ्रांसीसी सहायता अमेरिका के समर्थन की तुलना में, ब्रिटिश-विरोधी भावना से अधिक प्रेरिंत थी।

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