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अमेरिका की क्रान्ति के 05 कारण

अमेरिका की क्रान्ति के 05 कारण

संयुक्त राज्य अमेरिका जो आज विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है, सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में अपने विकास की आरम्भिक अवस्था में था और यूरोपीय देशों को अधीनता में था। अमेरिका पहुँचने वाले प्रथम यूरोपीय लोग 1000 ईस्वी के लगभग, आइसलैंड एवं ग्रीनलैण्ड के नोर्स समुद्री लोग (Norse Seamen) थे, लेकिन उनकी खोजों के बारे में यूरोप को जानकारी नहीं मिल पायी। अमेरिकी महाद्वीप पर इसके बाद सबसे पहले पहुँचने वाला व्यक्ति क्रिस्टोफर कोलम्बस था जो भारत को खोजते हुये 12 अक्टूबर, 1492 को वेस्टईंडीज की भूमि पर पहुँच गया। पोप द्वारा दी गई एक स्वीकृति के अनुसार, इस नये संसार पर स्पेन को उपनिवेश बसाने के अधिकार दिये गये अमेरिका का नामकरण एक इटालवी खोजकत्ता अमेरिगो वेस्पुची (Amerigo Vespucci; 1451-1512) के नाम पर हुआ जिसने 1499 ईस्वी में अमेरिकी महाद्वीप के क्षेत्रों में विस्तृत अन्वेषण किये और यह तथ्य सामने रखा कि कोलम्बस द्वारा खोजा गया क्षेत्र भारत नहीं है, बल्कि एक नई दुनिया है, एक नया महाद्वीप है जो एशिया से भिन्न है अमेरिगो वेस्पुची की इस खोज के आधार पर एक जर्मन भूगोलवेत्ता के सुझाव पर नये महाद्वीप का नाम अमेरिका रख दिया गया, यद्यपि इस महाद्वीप पर सबसे पहले पहुँचने वाला व्यक्ति कोलम्बस था ।

1519 में स्पेनी खोजकर्ता टर्नेन्डो कोर्टेज मैक्सिको पहुँचा और कुछ समय बाद मैक्सिको पर स्पेन ने अधिकार कर लिया। मैक्सिको से उत्तर की ओर बढ़ते हुये स्पेनवासी वर्तमान ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ की भूमि पर पहुँचे और उन्होंने 1565 में फ्लोरिड़ा पर अधिकार कर लिया जहाँ उन्होंने सेंट आगस्टीन नामक बस्ती की स्थापना की जो संयुक्त राज्य अमेरिका में यूरोपीय लोगों द्वारा स्थापित की गई पहली बस्ती थे। शीघ्र ही स्पेन ने अमेरिकी महाद्वीप पर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिया, जो उत्तर में रियो ग्रांडे एवं कैलिफोर्निया की खाड़ी से लेकर दक्षिण में ब्यूनोस आयर्स एवं सेन्टियागों तक विस्तृत था, उत्तर से दक्षिण तक लगभग छ: हजार मील की लम्बाई का क्षेत्र । लेकिन स्पेन ने उत्तरी अमेरिका के अपेक्षाकृत कम आकर्षक क्षेत्रों के उपनिवेशीकरण की ओर ध्यान नहीं दिया। शीघ्र ही ब्रिटेन एवं फ्रांस भी अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करने की दौड में शामिल हो गये।

यूरोपीय लोगों के आगमन से पूर्व, सोलहवीं शताब्दी में, संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासियों की संख्या 10 लाख से भी कम थी; इन मूल निवासियों को ‘इंडियन्स’ कहा जाने लगा; ये भिन्न-भिन्न भाषायें बोलने वाले अलग-अलग जातियों में बँटे हुये थे। दक्षिणी अमेरिका के स्थानीय निवासियों के विपरीत, जिन्दोंने सभ्यता का उच्च स्तर तक विकास कर लिया था, संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासी ‘इंडियन्स’ विकास की आरम्भिक अवस्था में थे। ये लोग अनाज की खेती एवं आखेट द्वारा अपना जीवन-यापन करते थे उनका राजनीतिक संगठन सरल एवं प्रजातान्त्रिक था। एक इंडियन कबीले के प्रधान के पास सीमित शक्तियाँ होो थीं, महत्त्वपूर्ण निर्णय कबीले की समिति (tribal committee) द्वारा लिये जाते थे। नये यूरोपीय लोगों के अमेरिका की भूमि पर जब कृषि का विकास आरम्भ किया, तो ‘इंडियन्स’ के लिये आखेट की भूमि कम होने लगी और इसी प्रश्न पर ‘इंडियन्स’ और यूरोपीय उपनिवेशवासियों के मध्य संघर्ष एवं युद्ध आरम्भ हो गये।

आने वाली शताब्दियों में श्वेत जाति ने जब संयुक्त राज्य अमेरिका की सम्पूर्ण भूमि पर अधिकार कर लिया
तो अमेरिका के मूल निवासियों ‘इंडियंस’ की संख्या सिर्फ बीस प्रतिशत रह गयी थी; बहुत-से “युद्धों में मारे
गये, अन्य श्वेत व्यक्तियों द्वारा लायी गयी बीमारियों एवं शराब के शिकार हो गई ।

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका में, इंग्लैण्ड से भारी संख्या में अंग्रेजों का आगमन हुआ। सबसे पहली टोली में क्रिस्टोफर न्यूपोर्ट के नेतृत्व में 104 अंग्रेज आये थे जो 1607 ई. में वर्जीनिया पहुँचे और वहाँ उन्होंने जेम्सटाउन नासक प्रथम अंग्रेज बस्ती की स्थापना की। धीरे धीरे ब्रिटेन ने संयुक्त राज्य अमेरिका में, अठारहवीं शताब्दी के प्रथम उत्तरार्द्ध तक, 13 उपनिवेश स्थापित कर लिये जो इस प्रकार हैं-वर्जीनिया, मेरीलैंड, मेसा-चूसेट्स, कनेक्टिकट रोढ आइलैण्ड, नार्थ कैरोलिना, साउथ कैरोलिना, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, न्यू हैम्पशायर, पेनसिलवेनिया, डेलावरे तथा जार्जिया। 1763 में इन उपनिवेशीय बस्तियों के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की जनसंख्या 15 लाख हो गई इनमें अधिकांश लोग ब्रिटिश मूल के थे; शेष डच, स्वीडिश, फ्रेंच, जर्मन, स्विस, स्कॉँच एवं आइरिश थे। अमेरिकी क्रान्ति या स्वतन्त्रता संग्राम के आरम्भ होने से पूर्व, उपर्युक्त उपनिवेशों ने अपने प्रान्तों में स्वशासनप्रधान राजनीतिक पद्धतियाँ विकसित कर ली थीं, एक ऐसा सामाजिक ढाँचा बना लिया था जिसमें वितृष्णापूर्ण भेदभाव नहीं थे, तथा एक ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित कर ली थी जिसमें व्यक्तिगत उद्यम को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था फ्रांसीसी लेखक क्रेवनकोर के शब्दों में, ‘विभिन्न राष्ट्रों के व्यक्ति, मनुष्यों की एक नयी नस्ल या जाति में, रूपांतरित हो गये थे 1776 से 1783 के दौरान, अमेरिका में उपनिवेशवासियों ने ब्रिटिश आधिपत्य से मुक्ति के लिये, ब्रिटिश सरकार से एक दीर्घकालीन युद्ध लड़ा जिसे, ‘अमेरिका का स्वतन्त्रता युद्ध या संग्राम’ कहा जाता है।

इस स्वतन्त्रता संग्राम को अमेरिका की क्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस संग्राम की सफलता ने अमेरिका में मूलभूत परिवर्तनों की शुरूआत की तथा विश्व को एक महत्त्वपूर्ण वस्तुत: युगांतरकारी संदेश दिया।

अमेरिका स्वतन्त्रता युद्ध/क्रान्ति के 05 कारण

अमेरिका के स्वतन्त्रता युद्ध या अमेरिकी क्रान्ति के क्या कारण थे ? वैसे कोई भी क्रान्ति तब घटित होती है जब बहुत से कारण समय के किसी एक बिन्दु पर घनीभूत हो जाते हैं, लेकिन फिर भी इतिहासकार यह जानने का प्रयास करते हैं कि किसी भी घटना या क्रान्ति का प्रमुख या निर्णायक कारण क्या था ? अमेरिकी क्रान्ति के प्रमुख कारण के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत व्यक्त किये गये हैं।

पहला मत राजनीतिक वैमनस्य का है, जिसे चाल्ल्स मैक्लीन एन्ड्रयूज (दि कोलोनियल बैकग्राउण्ड ऑफ दि अमेरिकन रिवोल्यूशन) ने व्यक्त किया था और जिसे लम्बे समय तक एक पारम्परिक व्याख्या के रूप में स्वीकार किया जाता रहा। इस मत के अनुसार, अमेरिकी क्रान्ति का उद्भव अंग्रेजों एवं उनके अमरीकी उपनिवेशवासियों के मध्य राजनीतिक विचारों में हुये मतभेद के कारण हुआ था।

दूसरा मत आर्थिक संघर्ष को क्रान्ति का केन्द्र-बिन्दु मानता है इस मत को चाल्ल्स आस्टिन बेयर्ड ( एन इकानामिक इन्टरप्रिटेशन ऑफ दि कॉन्सरटीट्यूशन तथा दि इकानामिक ऑरिजिन्स ऑफ जेफरसोनियन डेमोक्रेसी) ने प्रस्तुत किया था इस विचार के अनुसार ब्रिटेन तथा अमेरिका के मध्य व्यापारिक एवं औद्योगिक हितों के संघर्ष ने अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम को जन्म दिया|।

यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका की क्रान्ति को, इतिहास में घटी क्रान्तियों के किसी निश्चित साँचे से नहीं देखा जा सकता। इस क्रान्ति में, माक्क्सवादी दृष्टि से, एक वर्ग का दूसरे वर्ग से सामाजिक वैषम्यमूलक संघर्ष नहीं हुआ। यह क्रान्ति बिना किसी अधिनायक के बिना किसी उग्रवादी वर्ग के सत्ता अधिग्रहण द्वारा, बिना किसी ‘ आतंक के शासन’ की रक्तपातपूर्ण गतिविधियों के, घट गई । लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इस क्रान्ति ने कोई महत्त्वपूर्ण वैचारिक संदेश नहीं दिया यद्यपि इस क्रान्ति ने फ्रांस की क्रान्ति की भाँति मूलभूत सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को तत्काल जन्म नहीं दिया, लेकिन स्वतन्त्रता एवं मानवीय अधिकारों का जो उद्घोष इस क्रान्ति ने किया, उसका महत्त्व अविस्मरणीय है तथा उसका प्रभाव आने वाले कालों में दूर तक महसूस किया गया। सिन्डर (दि मेकिंग ऑफ माडर्न मेन) के शब्दों में, ‘अमेरिका की क्रान्ति इसकी किसी भी पूर्ववर्ती या अनुगामी क्रान्ति के समान नहीं थी यह फ्रांस की क्रान्ति की तरह नहीं थी, न उन्नीसवीं शताब्दी की निष्फल क्रान्तियों की तरह, न आज के युग की रूसी या चीनी क्रान्तियों की तरह। इसको सम्भवत: 1688 की अंग्रेजी क्रान्ति के निकटतम माना जा सकता है जिसने संसद की सर्वोच्चता स्थापित की, लेकिन अंग्रेजी क्रान्ति की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से, अमेरिका की क्रान्ति ने विचारों एवं शक्तियों का विस्फूर्जन किया जिनके प्रभाव को विश्व आज भी महसूस करता है ।

जेम्स एडम्स (रिवोल्यूशनरी न्यू इंग्लैण्ड) का मानना है कि अमरीकी उपनिवेशवासियों के राजनीतिक एवं सांविधानिक विचारों को, अमरीका के निवासियों के विभिन्न वर्गों की सामाजिक पृष्ठभूमि एवं उनके हितों
के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। बहरहाल, अमेरिकी क्रान्ति की बहुकारणवादी व्याख्या को स्वीकार करना ज्यादा ठीक रहेगा, जिसके अन्तर्गत, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक आदि विभिन्न कारणों की भूमिका को क्रान्ति की पृष्ठभूमि में न्यूनाधिक रूप में देखा जा सकता है । ये कारण इस प्रकार हैं-

01 राजनीतिक मतभेद

ब्रिटिश सरकार और अमरीकी उपनिवेशवासियों के मध्य मतभेद का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि
ब्रिटिश सरकार ने अमरीकी उपनिवेशवासियों को उनके द्वारा इच्छित स्वशासन की मात्रा प्रदान करने से इन्कार कर दिया। प्रतिनिधि शासन एवं ब्रिटिश संसद की प्रभुसत्ता के सम्बन्ध में दोनों के विचारों में स्पष्ट अन्तर हो गया था। ब्रिटिश सरकार का मानना था कि ब्रिटेन को संसद सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य पर समान प्रभुसत्ता रखने वाली संस्था है । वह ब्रिटेन के उपनिवेशों पर भी वैसा ही अधिकार रखती है, जैसा कि ब्रिटेन के आन्तरिक क्षेत्रों के सम्बन्ध में । वह अमेरिका में मैसेचूसेट्स के लिये भी उसी तरीके से कानून पास कर सकती है, जैसे कि इंग्लैण्ड में बर्कशायर के लिये। इस दृष्टि से, उपनिवेशों की अपनी सरकारों का कोई प्रतिनिध्यात्मक महत्त्व नहीं था, वे ब्रिटिश पालर्लियामेण्ट की कार्यकारी मशीनें मात्र थीं।

दूसरी ओर अमेरिकी उपनिवेशवासियों के नेताओं तथा यूरोप में प्रबोधन युग के अनेक चिंतकों का कहना था कि ब्रिटिश संसद की साम्राज्यीय प्रभुसत्ता का सिद्धान्त सही नहीं है। इस सिद्धान्त से प्रतिनिधि शासन या स्वशासन की भावना का स्पष्ट उल्लंघन होता है। ऐलन नेविल्स एवं हेनरी कॉमिजर (संयुक्त राज्य अमेरिका का इतिहास) के शब्दों में, ‘अमरीकी उपनिवेशवासियों का कहना था कि उनके कानूनी सम्बन्ध केवल ब्रिटिश सम्राट के साथ हैं। सम्राट ने ही समुद्र पार उपनिवेशों की स्थापना की सहमति दी थी और सम्राट ने ही उन्हें सरकारें प्रदान की थीं। राजा इंग्लैण्ड का भी राजा था और मैसेचूसैट्स का भी किन्तु इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट को मैसेचूसैट्स के लिये कानून पास करने का वैसा ही अधिकार नहीं है, जैसे मैसेचूसैट्स की विधानसभा को इंग्लैण्ड के सम्बन्ध में कानून पास करने का अधिकार नहीं है। यदि राजा उपनिवेश से पैसा चाहता है, तो अनुदान के रूप में प्राप्त कर सकता है। किन्तु पार्लियामेंट के स्टाम्प एक्ट या दूसरे राजस्व सम्बन्धी कानून पास कर उसे लेने का कोई अधिकार नहीं है । संक्षेप में ब्रिटिश प्रजाजन पर, चाहे वह ब्रिटेन में हो या अमेरिका में, अपने ही प्रतिनिधि द्वारा और उसी की मार्फत कर लगाया जा सकता हैं।”

अमेरिकी उपनिवेशवासी प्रारम्भ में ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद के इच्छुक नहीं थे जैसा कि एच.बी. पाक्क्स (दि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका- ए हिस्ट्री) ने लिखा है, ‘भावना एवं भौतिक हित. इन दोनों कारणों से लगभग सभी अमेरिकावासी ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही रहना चाहते थे। लेकिन उनमें से कुछ यह महसूस करने लगे थे कि उन्हें पूर्ण स्वशासन एवं ब्रिटेन के नागरिकों के साध समानता का अधिकार था।’ ब्रिटिश अधिकारियों एवं अमरीकी उपनिवेशवासियों में प्रतिनिधित्व प्रणाली को लेकर भी मतभेद् था ।

उपनिवेशवादी उपनिवेशों की सरकारों में उपनिवेशों की जनता के प्रतिनिधित्व को अधिक व्यापक एवं तर्कसंगत बनाना चाहते थे ब्रिटिश सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही थी। बल्कि एक बहुत बड़ी विसंगति यह थी कि स्वयं ब्रिटेन में प्रतिनिध्यात्मक व्यवस्था का समानुपातिक सन्तुलन बिगड़ रहा था नेविन्स एवं कौमेजर (संयुक्त राज्य अमेरिका का इतिहास ) के शब्दों में, ‘ब्रिटिश सांविधानिक प्रक्रिया ने 1688 के बाद एक विकृत और अलोकतन्त्रीय प्रणाली विकसित की। उसके अनुसार एक शासन-अल्पतन्त्र का उद्भव हुआ जो, ‘रॉटन-बरो सिस्टम’ (भ्ष्ट नगर प्रणाली, जिसमें कस्बों को पालर्लियामेण्ट के लिये अपने प्रतिनिधि भेजने का अधिकार नहीं रहा था) पर आधृत था और जिसने नये निर्माण उद्योग वाले कस्बों को संसद में प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित कर दिया था और आबादी के एक बड़े भाग का मताधिकार छोन लिया। अमरीका में मताधिकार का अपहरण और प्रतिनिधित्वहीन नगर या कस्बे थे तो सही, पर उस हद तक नहीं जिस हद तक वे ब्रिटेन में थे वास्तव में अमरीका में समूची अठारहवीं शताब्दी में इस बात के लिए संघर्ष जारी रहा कि निर्वाचकों को बढ़ाया जाये और नये जिलों और पश्चिमी प्रदेशों को पुरानी बस्तियों के समान हौ उचित प्रतिनिधित्व दिया जाये। अमरीका की प्रणाली अधिकाधिक प्रतिनिध्यात्मक बन रही थी इंग्लैण्ड की प्रणाली, दूसरी और, कम प्रतिनिध्यात्मक हो रही थी।

02 आर्थिक संघर्ष

ब्रिटिश सरकार एवं अमरीकी उपनिवेशवासियों के मध्य संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक प्रश्नों को लेकर था ब्रिटेन अपने अमरीकी उपनिवेशों को अपने वाणिज्यवादी सिद्धान्त के अन्तर्गत मानता था। वाणिज्यवाद की अवधारणा के अनुसार, ब्रिटेन का यह मानना था कि उसके अमरीकी उपनिवेशों का मुख्य उद्देश्य मातृ देश अर्थात् ब्रिटेन को लाभ पहुँचाना है। ये उपनिवेश इसलिये हैं ताकि उनसे ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त किया जा सके तथा ब्रिटेन में तैयार किया गया पक्का माल वहाँ खपाया जा. सके। साथ ही, इन उपनिवेशों को ब्रिटेन की अतिरिक्त जनसंख्या के लिए निकास क्षेत्र के रूप में भी देखा जा रहा था। अमरीकी उपनिवेशवासियों को यह स्वीकार्य नहीं था कि वे ब्रिटिश वाणिज्यवादी हितों की पूर्ति के निर्मित्त मात्र बन जाये। इंग्लैण्ड की सरकार ने अपने वाणिज्यवादी हितों की सुरक्षा के लिये अमरीकी उपनिवेशों के लिये अनेक प्रकार के अधिनियम पारित किये; इन अधिनियमों से अमरीकावासियों में आर्थिक असंतोष उत्पन्न हुआ जो क्रमशः घनीभूत होकर अमरीकी स्वतन्त्रता-संग्राम या क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण कारण बन गया । ऐसे अधिनियम इस प्रकार थे-


(1) नौ-संचालन कानून : प्रारम्भ से लेकर सप्तवर्षीय युद्ध तक, ब्रिटिश संसद ने ब्रिटेन के वाणिज्यवादी हितों का संरक्ष समय-समय पर पारित किये गये इन नौ-संचालन कानूनों के तीन उद्देश्य थे – ब्रिटिश उपनिवेश अपना व्यापार ब्रिटिश जहाजों के माध्यम से ही करें; वे अधिकांश सामान की खरीददारी अपने मातृदेश (ब्रिटेन) से ही करे; तथा वे अपना अधिकांश विक्रय भी मातृदेश को ही करे। इन सब गतिविधियों का स्पष्ट प्रयोजन, औपनिवेशिक व्यापार के नियन्त्रण के द्वारा ब्रिटिश व्यापारियों को लाभ पहुँचाना था।

ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रथम नौ-संचालन कानून वर्जीनिया राज्य की स्थापना के बाद पारित किया गया। 1620 में इंग्लैण्ड की सरकार ने यह आदेश जारी किया कि वर्जीनिया की तम्बाकू का निर्यात केवल इंग्लैण्ड को किया जायेगा, एवं उसका प्रेषण कार्य अंग्रेजी जहाजों के द्वारा ही किया जायेगा लेकिन यह नियम अधिक समय तक लागू नहीं किया जा सका। 1650 में ब्रिटेन में कामनवेल्थ की सरकार ने एक नौ-संचालन कानून पारित किया जिसके अनुसार ब्रिटिश उपनिवेशों के साथ विदेशी जहाजों द्वारा किये जाने वाले व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया लेकिन इस नियम को गम्भीरता से लागू करने का प्रयास नहीं किया गया 1660 में एक नया नौ-संचालन कानून पास किया गया जिसमें यह घोषणा की गई कि सारा औपनिवेशिक व्यापार ब्रिटिश या उपनिवेशीय जहाजों के माध्यम से किया जायेगा तथा अमरीकी एवं वेस्ट इंडियन उपनिवेशों में होने वाली कुछ निश्चित वस्तुओं, जिनमें तम्बाकू एवं चीनी भी शामिल है, का निर्यात केवल इंग्लैण्ड को ही किया जायेगा 1663 में ब्रिटिश संसद ने उक्त कानून में एक ‘स्टेपल अधिनियम’ (Staple Act) और जोड़ दिया जिसके अनुसार ब्रिटिश उपनिवेशों पर इंग्लैण्ड के अलावा अन्य देशों से की जाने वाली प्रत्यक्ष खरीद पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

(2) व्यापारिक एवं औद्योगिक नियन्त्रण : ब्रिटिश संसद ने अनेक अधिनियमों द्वारा अमरीकी पनिवेशों की व्यापारिक नियन्त्रित करने का प्रयास किया 1696 में ब्रिटेन के उपनिवेशों के आर्थिक विकास को नियन्त्रित करने का कार्य एक नवगठित ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड एण्ड प्लान्टेशन्स’ (Board of Trade and Plantations) को सौंप दिया गया, जिसे अमरीका सम्बन्धी मामलों में बड़े विस्तृत अधिकार प्रदान किये गये ब्रटिश सरकार ने क्रमश: उपनिवेशों से निर्यात की जाने वाली लगभग सभी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं (मछली, अनाज एवं रम को छोड़कर) का निर्यात सिर्फ इंग्लैण्ड को किया जाना अनिवार्य कर दिया। मात्र इंग्लैण्ड को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की सूची में तम्बाकू, चावल, लकड़ी, लोहा तथा चमड़ा जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुयें शामिल थीं। ब्रिटिश सरकार ने अमरीकी उपनिवेशों की औद्योगिक प्रगति को भी नियन्त्रित करने का प्रयास किया । सन 1699 के ‘ऊन सम्बन्धी अधिनियम’ (Woolen Act) द्वारा उपनिवेशों को ऊनी वस्तुओं के निर्यात की मनाही कर दी गई। 1732 में एक कानून द्वारा उपर्युक्त प्रतिबन्ध को अमरीकी उपनिवेशों के टोप-निर्माताओं नौ-संचालन (नेविगेशन) कानूनों के माध्यम से करने का प्रयास किया।
औद्योगिक गतिविधियों को, ब्रिटेन के आर्थिक लाभ में वृद्धि के उद्देश्य से, (hatmakers) पर भी लागू कर दिया गया। 1750 में एक कानून द्वारा अमरीकी उपनिवेशों में लौह वस्तुओं के उत्पादन को सीमित एवं नियन्त्रित कर दिया गया।

(3) शीरा अधिनियम (1733): अमरीकी उपनिवेशवासियों के लिये सबसे अधिक कटु 1733 का शीरा अधिनियम’ (Molasses Act) था जिसका स्पष्ट उद्देश्य अमरीकी उपनिवेशों एवं फ्रांस तथा स्पेन द्वारा अधिकृत वेस्टइंडीज के मध्य होने वाले अत्यन्त लाभकारी व्यापार की समाप्ति था। इस अधिनियम द्वारा अमरीकी उपनिवेशों के लिये विदेशी क्षेत्रों से शीरे, चीनी तथा स्पिरिट के आयात पर भारी कर लगा दिये गये, जिनका प्रयोजन यह था कि उपनिवेशों के व्यापारी उक्त वस्तुओं को ब्रिटिश व्यापारियों से ही खरीदें उपनिवेशवासियों के लिये एक राहत की बात यह धी कि शीरा अधिनियम को सख्ती से लागू करने का प्रयास नहीं किया गया, लेकिन इस स्थिति का लाभ उपनिवेशों के आम व्यापारियों को कम तथा तस्करों को अधिक मिला।

उपर्युक्त नौ-संचालन कानूनों तथा व्यापारिक एवं औद्योगिक नियन्त्रण अधिनियमों के फलस्वरूप अमरीकी उपनिवेशों को निर्यात से मिलने वाली आमदनी कम हो गई, एवं आयात की वस्तुओं पर उनका खर्चा अधिक बढ़ गया । निर्यात हो या आयात, दोनों ही अवस्थाओं में अमरीकी उपनिवेशवासी नुकसान की
स्थिति में आ गये। ब्रिटिश सरकार द्वारा कानून इंग्लैण्ड में तैयार करवाये जाते थे और उनमें मातृदेश के हित
को सर्वोपरि मानकर उपनिवेशों की आर्थिक व्यवस्था तदनुसार नियनत्रित कर दी जाती थी। यह उल्लेखनीय है कि 1764 से पूर्व इंग्लैण्ड ने उपनिवेशों से पैसा प्रत्यक्ष कर के द्वारा इकट्ठा करने का प्रयास नहीं किया; उसे औपनिवेशिक व्यापार के नियन्त्रण से पर्याप्त लाभ प्राप्त हो रहा था।

(4) जार्ज ग्रेनविले के आर्थिक उपाय : 1763 के बाद अमरीकी उपनिवेशों के प्रति ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीति में एक मुख्य अन्तर यह आया कि ब्रिटिश सरकार ने अपनी युद्धजनित आर्थिक आवश्यकताओं की भरपाई के लिये, अमरीकी उपनिवेशों के प्रति अधिक कठोर आर्थिक नीति अपनाने का फैसला लिया। इंग्लैण्ड और फ्रांस के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय उपनिवेशों को लेकर जो सप्तवर्षीय युद्ध (1756-1763 ई.) लड़ा गया, उसके परिणामस्वरूप अमेरिका में ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य का विस्तार तो हुआ, लेकिन ब्रिटेन का युद्ध ऋण बहुत अधिक बढ़ गया । ब्रिटिश अधिकारियों ने यह निर्णय लिया कि अमरीकी उपनिवेशों पर कठोर आर्थिक नियन्त्रण द्वारा, इस युद्ध ऋण की आंशिक भरपाई कर ली जाये । इस प्रकार के निर्णय के लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी, इंग्लैण्ड का तत्कालीन प्रधानमंत्री जार्ज ग्रेनविले (George Grenville) था उसने अमेरिका के प्रति नयी आर्थिक नीति का अनुसरण किया जिसके दो प्रमुख पक्ष थे – ( 1) अमरीकी उपनिवेशों पर प्रत्यक्ष करों के माध्यम से ब्रिटेन के राजस्व में वृद्धि;
(2) नौ-संचालन कानूनों का सख्ती से क्रियान्वयन तथा तस्कर व्यापार पर प्रतिबन्ध। ग्रेनविले के काल में पारित दो अधिनियम अमरीकी उपनिवेशवासियों के आर्थिक असंतोष के विशेष कारण बन गये ये अधिनियम थे – शुगर एक्ट (1764); तथा स्टाम्प एक्ट (1765)। एच.बी. पाव्र्स के अनुसार, ‘जार्ज ग्रेनविले एक ईमानदार एवं मेहनती व्यक्ति था, लेकिन कल्पनाशक्तिहीन अधिकारी था जिसे उन लोगों की प्रकृति की समझ नहीं थी जिनके सम्बन्ध में वह कार्य करने जा रहा था।

(5) शुगर एक्ट ( 1764): शुगर एक्ट वस्तुत: 1733 ई. के शीरा कानून का ही परिष्कृत रूप था। शुगर एक्ट के द्वारा अमरीकी उपनिवेशों में प्रांसीसी एवं स्पेनी वेस्ट इंडीज से आने वाले शीरे पर आयात कर
की दर छह पेन्स प्रति गैलन से घटाकर तीन पेन्स प्रति गैलन कर दी गई । कर को घटाने के पीछे उद्देश्य कर
वसूली को सरल एवं व्यावहारिक बनाना था, क्योंकि छह पेंस प्रति गैलन का पुराना टैक्स बहुत भारी होने के कारण वसूल करना सम्भव नहीं था। शुगर एक्ट के माध्यम से ग्रेनविले का उद्देश्य चुंगी की वसूली से राजस्व की वृद्धि करना था, जबकि पूर्ववर्ती शीरा कानून का मुख्य उद्देश्य चुंगी से आय प्राप्त करना नहीं था, बल्कि उपनिवेशों को इंग्लैण्ड से शीरा खरीदने के लिये विवश करना था। शुगर एक्ट में इस कानून को सख्ती से लागू करने की व्यवस्था भी की गई तथा ब्रिटिश सतर्कता अधिकारियों को यह स्पष्ट निर्देश दिये गये कि इस कानून को तोड़ने वाले सभी जहाज पकड़ लिये जाये। शुगर एक्ट के माध्यम से वास्तविक चुंगी वसूली की प्रक्रिया से अमरीकी उपनिवेशवासियों को बड़ी नाराजगी हुई। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस प्रकार की कर-वसूली को वे अनचित मानते थे। उन्हें सिर्फ आर्थिक असंतोष ही नहीं था, मानसिक भी था। 1764 में ही ब्रिटेन से अमरीकी उपनिवेशों में आयात की जाने वाली कुछ वस्तुओं पर टैक्स 2.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया।

अमरीकी उपनिवेशों में आयात किये जाने वाले शीरे एवं अन्य वस्तुओं पर आयात कर की कड़ाई से वसूली करने के लिये सीमा-शुल्क अधिकारियों को “सहायतादेश” (रिट्स ऑफ असिस्टेन्स) या सर्च – वारण्ट
प्रदान किये गये, जिसके आधार पर वे तस्करी के सामान के संदेह में किसी भी जहाज गोदाम या किसी भी
व्यापारी के घर की जब चाहे तलाशी ले सकते थे इस प्रकार के “सहायतादेशों” का बड़ा विरोध किया गया,
विशेषकर बोस्टन में, जहाँ पेशे से वकील जेम्स ओटिस नामक व्यक्ति ने, इसे अमरीकी नागरिकों के मूलभूत
अधिकारों का उल्लंघन बताया।

( 6) स्टाम्प एक्ट ( 1765 ): ब्रिटिश सरकार ने 1765 में अमरीकी उपनिवेशों के लिये स्टाम्प एक्ट पारित कर दिया, जिसके अनुसार समाचार- पत्रों तथा कानूनी एवं व्यापारिक दस्तावेजों पर स्टाम्प कर देना अनिवार्य कर दिया गया। ग्रेनविले का अनुमान था कि स्टाम्प कर से होने वाली आमदनी से अमेरिका में रखी गई ब्रिटिश सेना के खर्च का एक-तिहाई हिस्सा वसूला जा सकेगा ब्रिटिश सरकार के व्यापारिक नियन्त्रण अधिनियमों के माध्यम से लगाये जाने वाले अप्रत्यक्ष करों का अनुभव तो अमरीकी उपनिवेशवासियों को पहले से था, लेकिन यह पहली बार था कि स्टाम्प एक्ट के माध्यम से उनसे प्रत्यक्ष कर वसूली की जा रही थी।

स्टाम्प एक्ट का समाचार आते ही अमरीकी उपनिवेशवासियों में आक्रोश की लहर फैल गई स्टाम्य
एक्ट में उन्हें उनके प्रत्यक्ष आर्थिक शोषण की बू आने लगी। दूसरा, उनका मानना था प्रतिनिधित्व के बिना
कर-वसूली’ (Taxation without representation) एक प्रकार का अत्याचार है। ब्रटिश व्यापारिक नियन्त्रण के सिद्धान्त को यद्यपि उन्होंने अधिक अन्यायपूर्ण नहीं समझा, लेकिन प्रत्यक्ष कर वसूली तो उनकी दृष्टि में उनके मूलभूत प्राकृतिक अधिकारों का हनन था। मैजेनिस एवं ऐपल ( संसार का इतिहास) के शब्दों में, ‘करों के बारे में उपनिवेश वाले अंग्रेजों से अपने मतभेदों के सम्बन्ध में बहुत स्पष्ट थे वस्तुत: मतभेद करों के बारे में उतना अधिक नहीं था, क्योंकि वे बहुत अधिक नहीं थे जितना कि पार्लमेंट में उनके प्रतिनिधित्व के विचार पर था। ब्रिटिश दृष्टिकोण से, पार्लमेंट का प्रत्येक सदस्य साम्राज्य के तमाम लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए उन्हें अधिकार है कि वे सभी पर कर लगायें दूसरी ओर उपनिवेश वालों का विश्वास था कि उन पर कर लगाने वाली समिति में कॉलोनी के प्रतिनिधि होने ही चाहिए। इस प्रश्न पर प्रत्येक पक्ष अपने विचारों पर अडिग था। नि:सन्देह उपनिवेश अपने प्रतिनिधियों को ब्रिटिश पार्लमेंट में भेजना नहीं चाहते थे; यह पद्धति व्यावहारिक नहीं हो सकती थी। वे चाहते यह थे कि उन्हें अपनी ही असेम्बलियों में अपने ऊपर कर लगाने का अधिकार दिया जाए।

स्टाम्प एक्ट के विरोध में अमरीकी उपनिवेशवासियों ने उग्र प्रदर्शन किया, इस प्रकार की उग्रता की उम्मीद ब्रिटिश अधिकारियों ने नहीं की थी । उपनिवेशों की सभाओं ने स्टाम्प एक्ट के विरोध में निन्दा प्रस्ताव
पारित किये, तथा अक्टूबर, 1765 में न्यूयार्क में नौ उपनिवेशों के प्रतिनिधियों की कांग्रेस ने एक सामूहिक
विरोध पत्र तैयार किया। किन्तु इनसे अधिक प्रभाव छोड़ने वाला वह उग्र प्रदर्शन था जो उपनिवेशवासियों ने
न्यूयार्क, वर्जीनिया, कैरोलिना, मैसाचूसेट्स आदि में किया। सन्स ऑफ लिबट्टी’ (Sons of Liberty) नामक संगठन के नेतृत्व में लोगों ने स्टाम्प बेचने वाले एजेन्टों को घेर कर उन्हें इस्तीफा देने या भाग जाने के लिए विवश कर दिया, स्टाम्पों को सार्वजनिक रूप से जलाया गया बोस्टन में चीफ जस्टिस टामस हचिन्सन के घर को उग्र भीड़ ने तोड़-फोड़ दिया।

स्टाम्प एक्ट के विरोध में सबसे प्रभावशाली कदम यह उठाया गया कि ब्रिटिंश वस्तुओं का आयात न करने के सम्बन्ध में एक सामान्य सहमति बना ली गई। इससे ब्रिटिश व्यापारियों को भारी नुकसान होने लगा। ब्रिटिश सरकार स्टाम्प एक्ट के खिलाफ उठे जनाक्रोश एवं ब्रिटिश व्यापार को हो रहे भारी नुकसान कोदेखकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने को बाध्य हो गयी| इसी समय ग्रेनविले के स्थान पर राकिंघम ने ब्रिटिश सरकार के प्रधानमंत्री का पदभार संभाल लिया। मार्च, 1766 में राकिंघम सरकार ने स्टाम्प एक्ट को रद्द कर दिया। अपनी विजय एवं सफलता के कारण अमरीकी उपनिवेशवासियों में हर्ष की लहर दौड़ गयी; अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम या क्रान्ति का यह बीजारोपण था। दूसरी ओर, ब्रिटिश मन:स्थिति में कोई अन्तर नहीं आया था। राकिंघम ने यद्यपि स्टाम्प को रद्द कर दिया था, तथापि दूसरी ओर उसने यह ‘घोषणात्मक अधिनियम’ (Declaration Act) भी पारित कर दिया कि अमरीकी उपनिवेशों पर व्रिटिश संसद की प्रभुसत्ता विद्यमान रहेगी ।

(7 ) टाउनशैण्ड कर अधिनियम : 1767 में ब्रिटिश सरकार एवं अमेरिकी उपनिवेशवासियों में आर्थिक प्रश्न पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई जब टाउनशैण्ड कर अधिनियम क्रियान्वित कर दिये गये। चाल्र्स टाउनशैण्ड तत्कालीन ब्रिटिश सरकार में राजकोष का प्रमुख अधिकारी (Chancellor of the Exchequer) था, और उसी के नाम से इन कर अधिनियमों का नाम रखा गया। टाउनशैण्ड का मानना था कि अमेरिकी उपनिवेशवासी प्रत्यक्ष करों के तो विरुद्ध थे, लेकिन अप्रत्यक्ष करों के प्रति उन्हें आपत्ति नहीं थी। अत: उपनिवेशवासियों से ब्रिटिश सरकार को आप्रत्यक्ष तरीके से कर वसूली करनी चाहिए। अतः टाउनशैण्ड कर अधिनियमों द्वारा ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका में इंग्लैण्ड से आयात की जाने वाली पाँच वस्तुओं शीशा (Glass), सौसा (lead), कागज, पेन्टरों के रंग तथा चाय पर चुंगी-शुल्क वसूल करना आरम्भ कर दिया।

टाउनशैण्ड की आशा के विपरीत, अमेरिका के लोगों ने ब्रिटिश संसद द्वारा उन पर किसी भी प्रकार का कर, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, लगाने को न्यायसंगत नहीं माना। उपनिवेशवासियों की चेतना अब अधिक जाग्रत
हो चुकी थी, और वे ‘प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं’ के सिद्धान्त में दृढ़ता से विश्वास करते थे। टाउनशैण्ड कर योजना के विरोध में अमेरिकावासियों ने केवल वाचिक विरोध ही नहीं किया, बल्कि उनका आक्रोश उन्हें चुंगी अधिकारियों पर आक्रमण करने की स्थिति में ले आया। वाचिक विरोध की दृष्टि से पेनसिलवेनिया के एक वकील जॉन डिकिन्सन द्वारा लिखे गये पत्रों की श्रृंखला, जिसका शीर्षक था-‘एक किसान की ओर से पत्र’ (Letters from a Farmer) महत्त्वपूर्ण थी। डिकिन्सन ने इन पत्रों में यद्यपि ब्रिटिश संसद द्वारा अमेरिकी व्यापार को नियन्त्रित करने के अधिकार को तो स्वीकार कर लिया लेकिन इस बात का स्पष्ट विरोध किया कि उसे उपनिवेशवासियों पर किसी भी प्रकार का ‘प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष’ कर लगाने का अधिकार था।

पुनः उपनिवेशों के अनेक व्यापारियों ने टाउनशैण्ड कर योजना के विरोध में ब्रिटिश वस्तुओं का आयात नही करने का निर्णय लिया। बहुत से समुद्री बन्दरगाहों पर अवैध व्यापार में लिप्त व्यापारियों को चुंगी अधिकारियों से बचाने में ‘सन्स आफ लिबर्टी’ संस्था ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार की घटनायें बोस्टन में आम बोस्टन में अवैध व्यापार को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दो सैनिक टुकड़ियाँ तैनात कर दीं। ‘सन्स ऑफ लिबर्टी’ के सदस्यों ने तथा बोस्टन के नागरिकों ने इन्हें अवांछित तत्त्व मानकर उनके प्रति

वितृष्णा प्रदर्शित की। 5 मार्च, 1770 को जब कुछ मजाकिया लोगों की भीड़ बर्फ के गोले एवं पत्थर फेंक कर बोस्टन में इन सैनिकों का उपहास कर रही थी, तब कुछ सैनिकों ने इस भीड़ पर गोली चला दो और चार- पाँच नागरिकों को मार डाला। इस घटना को ‘बोस्टन हत्याकांड’ के नाम से जाना जाता है।

‘बोस्टन हत्याकांड’ से उपनिवेशवासियों में आक्रोश की लहर फैल गई । बोस्टन शहर से सैनिक टुकड़ियों को हटा लिया गया तथा दोषी सैनिकों पर अभियोग चलाया गया। बोस्टन हत्याकांड’ वाले दिन ही ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ ने टाउनशैण्ड करों को निरस्त करने की अनुशंसा कर दी। ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता के सिद्धान्त की रक्षा के लिये केवल चाय पर लघु चुंगी शुल्क को बनाये रखा गया। स्वतन्त्रता की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि अमेरिकी क्रान्ति या स्वतन्त्रता संग्राम का यह एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि स्वतन्त्रता की वास्तविक प्राप्ति से पूर्व ही अनेक अमेरिकी उपनिवेशवासी स्वशासन एवं स्वतन्त्रता की मन:स्थिति में ढल चुके थे, और इस प्रकार अमेरिका के स्वात स्वतन्त्रता संग्राम के नेता जॉन एडम्स का कथन है कि, ‘क्रान्ति लोगों के मस्तिष्क में थी, एवं उपनिवेशों की एकसूत्रता में थी, ये दोनों कार्य वास्तविक युद्ध शुरू होने से पहले ही सम्पन्न हो चुके थे।

इतिहासकार लुई एल. सिन्डर (दि मेकिंग ऑफ मॉर्डन मेन) के शब्दों में, ‘तेरह अमेरिकी उपनिवेश इंग्लैण्ड के उपबन्धात्मक स्वरूप से धीरे-धीरे ऊपर उठ गये। उनमें एक स्वतन्त्रता की भावना का विकास हुआ, एक ऐसी अनुभूति जागी कि मातृदेश ने अपनी संतान की उपेक्षा कर दी है। स्वतन्त्रता का विचार, जो प्रारम्भ में अस्पष्ट एवं धुंधला था, यूरोपीय मातृभूमि से सम्बन्धों के दूर एवं दूरतर होते जाने के कारण, क्रमश: लोगों के मस्तिष्क भें स्पष्ट अवतरित हो गया अमेरिका में बसने ‘त्ाले अधिकांश लोग यूरोपीय थे, उनमें से अनेक ब्रिटिश मूल के भी थे; इसके बावजूद ऐसा क्यों हुआ कि अपने यूरोपीय मातृदेश (ब्रिटेन) के प्रति स्वामिभक्ति के स्थायी भाव की अपेक्षा, की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार हो चुकी थी। अमेरिकी उनमें स्वतन्त्रता की भावना जाग्रत हो गयी, और वह भी इस रूप में कि वास्तविक स्वतन्त्रता से पूर्व ही, वे स्वातंत्र्य पूर्ण मन:स्थिति में आ गये ? ऐसी कौनसी परिस्थितियाँ थीं जिनके कारण अमेरिकी उपनिवेशवासियों के मन में ब्रिटेन के प्रति उपेक्षाभाव रूढ़ हो गया, और साथ ही प्रबल हो गई स्वतन्त्रता की आकांक्षा ? इसका विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है-

(1) अमेरिका के अधिकांश उपनिवेशों में शासन-पद्धति का आरम्भ से ही कुछ इस तरह विकास हुआ था कि वे स्वशासन के अभ्यस्त हो गये थे सभी उपनिवेशीय प्रान्तों में असेम्बलियाँ थीं, उनके लिये चुनाव भी होता था। ब्रिटिश सरकार ने आरम्भ से ही अमेरिकी उपनिवेशों के आन्तरिक शासन में रुचि नहीं ली, अत: इंग्लैण्ड का इन उपनिवेशों के प्रशासन में हस्तक्षेप बहुत ही न्यून या नगण्य प्राय था । अमेरिका के प्रशासन में इंग्लैण्ड की अहस्तक्षेपवादी मन:स्थिति की पृष्ठभूमि में स्वयं इंग्लैण्ड की आन्तरिक कठिनाइयाँ थीं। एक तो अमेरिकी उपनिवेश अपने मातृदेश से अत्यधिक भौगोलिक दूरी (लगभग 5,000 किलोमीटर दूर) पर अवस्थित थे, और संचार का एक मात्र माध्यम विशाल अटलांटिक महासागर को पार करने वाले जहाज थे, अतः इंग्लैण्ड के लिए अमेरिकी प्रशासन के मसलों पर विस्तार से ध्यान दे पाना सम्भव नहीं था। दूसरा इंग्लैण्ड के स्टुअर्ट वंश के राजा इंग्लैण्ड में संसद के विरुद्ध अपने शासन की निरंकुशता को बढ़ाने के प्रयास में इतने मशगूल रहे कि वे अमेरिका में ब्रिटिश उपनिवेशों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाये तीसरा, अमेरिका के उत्तरी तट पर बसे उपनिवेशों की दरिद्रता एवं न्यून लाभकारी स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उनके आन्तरिक मामलों में रुचि नहीं ली।

ब्रिटिश सरकार की न्यूनतम हस्तक्षेप की नीति के कारण, अमेरिकी उपनिवेशवासियों ने अपने- अपने प्रान्तों में स्वशासन की पद्धतियों को विकसित कर लिया और वे इसके अभ्यस्त हो गये एक शताब्दी से भी अधिक स्वशासन की स्थिति में रहने के बाद, 1763 के बाद जब ब्रिटेन ने अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अमरीकी उपनिवेशों पर अपने प्रशासनिक शिकंजे को जकड़ना चाहा, तो उपनिवेशवासियों को यह स्थिति अप्रिय एवं अजनबी लगी वे स्वशासन की मन:स्थिति में ढल चुके थे, और अपने आन्तरिक मामलों में उन्हें परतन्त्रता स्वीकार्य नहीं थी। जेफरसन ने कहा था कि, ‘अमेरिकी क्रान्ति की वास्तविक शुरुआत 1620 में ही हो गयी थी, जब वजीनिया को अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने का अधिकार दिया गया ।

(2) अमेरिकी उपनिवेशों में बसने. वाले अधिकांश लोग यद्यपि यूरोपीय थे, और उनमें भी बहुसंख्यक लोग ब्रिटिश मूल के थे, लेकिन उन्हें अपनी मातृभूमि ब्रिटेन से कोई आन्तरिक लगाव नहीं था। ऐसा क्यों ? इसका कारण यह था कि ये लोग सिर्फ धन लाभ के लालच में अमेरिका नहीं आये थे, इनमें से बहुत से ऐसे थे जो इंग्लैण्ड की राजनीतिक, धार्मिक या सामाजिक परिस्थितियों से दुःखी होकर अमेरिका में पलायन कर गये थे, और वहीं बस जाना चाहते थे ऐसे लोगों के लिए इंग्लैण्ड उनकी स्मृति का एक दुःखद अतीत था, और अमेरिका उनके लिये उम्मीदों का नया क्षितिज इन लोगों ने अमेरिका की स्वतन्त्रता में अपने जीवन की मुक्ति का सपना देखा। ऐसे लोग कौन थे ? एक वर्ग में वे लोग थे जो इंग्लैण्ड की ऐंग्लिकन चर्च को नहीं मानते हैं, और इस कारण इंग्लैण्ड में उनके प्रति किये गये सौतेले बरताव से दुःखी थे । जैसा कि हेज ने लिखा है, ‘जबकि मातृदेश में रहने वाले अधिकांश अंग्रेज ऐग्लिकन ईंसाई थे, अमेरिकी उपनिवेशों में रहने वाले अंग्रेज ऐंग्लिकनवाद से असन्तुष्ट विद्रोही थे ….. लगभग उपनिवेशों में सभी जगह जनता उग्र प्यूरिटनवाद (Radical Puritanism) में विश्वास रखती थे ‘ अमेरिका में बसने वाला एक वर्ग ऐसा था जो इंग्लैण्ड में सामाजिक वर्गभेद की जटिलताओं से दुःखी था एक तीसरा वर्ग, राजनीतिक असंतुष्टों का था । यह भी उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश सरकार ने अनेक अपराधियों को सजा देने की बजाय अमेरिका में बसने के लिए भेज दिया अमेरिका में बसे गैर-ब्रिटिश यूरोपीय स्पष्टतः ब्रिटेन को अपनी मातृभूमि नहीं मानते थे।

(3) अमेरिका की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, ब्रिटेन की तुलना में इतनी अधिक आकर्षक थीं
कि यूरोपीय आव्रजकों ने वही बसने का फैसला कर लिया, और वे अपनी इस नई दुनिया में किसी का भी
हस्तक्षेप बरदाश्त करने के लिये तैयार नहीं थे, स्वयं ग्रेट ब्रिटेन का भी नहीं। एक तो अमेरिका में ब्रिटेन की
तरह शक्तिशाली आनुवंशिक कुलीनतन्त्र नहीं था, अमेरिका आने वाले अधिकांश यूरोपीय निरम्न या मध्यम वर्ग के लोग थे, वे अमेरिका में बसकर स्वयं को महत्त्वपूर्ण एवं स्वतन्त्र महसूस करने लगे थे। दूसरा, अमेरिका में इतनी अधिक जमीन खाली पड़ी थी कि कोई भी यूरोपीय व्यक्ति उस जमीन को खेती योग्य बनाकर उसका स्वतंत्र भूस्वामी बन सकता था इस प्रकार के स्वतंत्र कृपक भूस्वामी अमेरिका में ब्रिटिश उपनिवेशीय जीवन का एक नवीन एवं महत्त्वपूर्ण अंग थे, वे आत्मविश्वस्त एवं स्वाभिमानी थे और किसी की भी धीस स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस सम्बन्ध में विलियम पेन ने लिखा है कि, ‘ये लोग स्वयं से ऊँचा सिर्फ पेडो को ही मानते थे मेविन्स एवं कौमेजर ( सयुंक्त राज्य अमेरिका का इतिहास ) के शब्दों में, ‘अमरीका गणतन्त्रीय या अर्ध्गणतंत्रीय सिद्धान्तों के लिए उर्वर भूमि था ।

उपनिवेशों की आबादी डेढ़ शताब्दी से लोकतन्त्र या ‘समानीकरण’ के वातावरण में रह रही थी। आर्थिक मतभेद बहुत कम थे; आर्थिक अवसर भी सबके लिए उन्मुक्त थे जो थोड़ा बहुत अभिजाततन्त्र रह भी गया था वह केवल लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों की अभिवृद्धि को ही प्रोत्साहित करता था

04 धार्मिक आयाम

अमेरिका के उपनिवेशों ने यूरोप के विभिन्न देशों में अवस्थित थार्मिक असंतुष्टों की शरणस्थली के रूप
में काम किया। इंग्लैण्ड में ऐंग्लिकन चुर्च की धार्मिक बाधाओं से दुःखी होकर ‘प्यूरिटन’ (Puritans),
‘क्वेकर’ (Quakers) तथा कैथोलिक ईसाई अमेरिका में आकर वस गये फ्रांस में लुई चौदहवें द्वारा अपमानित एवं दण्डित किये गये ‘ह्यूजिनाट’ (Huguenots) धर्मावलम्बी भी अमेरिका में अपना भाग्य आजमाने आ गये। जर्मनी के धार्मिक सम्प्रदायों- ‘मेनोनाइट’ (Mennonites), ‘मोरेवियन ब्रेदन’ (Moravian Brethren) तथा ‘पायटिस्ट’ (Pietists) के अनुयायियों ने भी अमेरिका को एक सुरक्षित तथा नवीन सम्भावनाओं से भरपूर, शरणस्थली के रूप में देखा। उपर्युक्त सभी घार्मिक असंतुष्ट वर्ग शीघ्र ही उपनिवेशों की गतिशील आर्थिक व्यवस्था के लाभों से जुड़ गये, वे अपने मातृदेशों में पुनः लौटने की बात भूल गये, तथा अमेरिका को उन्होंने अपनी कर्मस्थली मान लिया। ये लोग राजनीतिक परतन्त्रता के आदी नहीं थे, और वैचारिक स्वतन्त्रता को जीवन का अनिवार्य अंग मानते थे वे स्वभावत: ब्रिटिश आधिपत्य के विरोधी एवं अमेरिका की स्वतनत्रता के पक्षधर बन गये।

अमेरिका में बसने वाले लोगों को मुख्य धार्मिक असंतोष इस बात से था कि अनेक प्रान्तों में उन्हें भिन्न धार्मिक मतावलम्बी होते हुये भी, ऐंग्लिकन बिशपसंघवादी (Episcopalion) चर्च के लिये टैक्स देनापड़ता था। नेविन्स एवं कौमेजर के अनुसार, ‘उपनिवेशों की धार्मिक शिकायतें ऐंग्लिकन चर्च के साथ सम्बन्धों को लेकर पैदा हुई थीं । यह विरोध और विद्वेष दो मुख्य आधारों पर अवस्थित था। पहला यह कि उपनिवेशों के बहुत से लोग चर्च के लिए टैकस देने का तीव्र विरोध करते थे, और दूसरा यह कि लोगों को यह डर था कि चर्च के अधिकारी कहीं राजनीतिक प्रवृत्तियों में भाग न लेने लगें ‘ हेज के अनुसार, ‘अमेरिका की धार्मिक स्थिति राजनीतिक उग्रवाद या परिवर्तनवाद के लिये अनुकूल थी।’

05 बौद्धिक जागृति/एक अल्पसंख्यक प्रबुद्ध वर्ग की अहम् भूमिका

अमेरिकी क्रान्ति या स्वतन्त्रता संग्राम को वैचारिक आधार एवं दिशा देने का कार्य अमेरिका के एक
अल्पसंख्यक प्रबुद्ध वर्ग ने किया। उपनिवेशवासियों में स्वतन्त्रता की भावना जाग्रत करने तथा उस भावना को सही दिशा में रेखांकित करने में , अमेरिका के बुद्धिजीवियों की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। एच.बी. पाक्स्स (दि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका-ए हिस्ट्री) ने लिखा है, ‘उपनिवेशों के सभी लोगों को क्रान्ति की भावना का समर्थक नहीं माना जा सकता। सम्भवत: किसानों की एक बड़ी संख्या ने राजनीतिक घटनाक्रम में कोई रुचि नहीं ली। समृद्ध वर्गों में बहुत-से ऐसे लोग थे जो यथास्थितिवाद में विश्वास रखते थे, और ब्रिटिश नियन्त्रण की तुलना में अमेरिकी प्रजातन्त्र से अधिक भयभीत थे जब युद्ध शुरू हुआ, अमेरिकी लोगों का एक बड़ा हिस्सा उदासीन रहा, और बहुत से अन्य लोगों ने ब्रिटिश सरकार का सक्रिय समर्थन किया अमेरिकी क्रान्ति या स्वतन्त्रता संग्राम सम्पूर्ण जनसंख्या के एक अल्पसंख्यक वर्ग का कार्य था; लेकिन इस अल्पसंख्यक वर्ग में योग्यता, पराक्रम, उदारता एवं गतिमान उत्साह वाले लोग सम्मिलित थे ‘ नेविन्स एवं कौमेजर के अनुसार, ‘ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष एक व्यापक और स्वतः स्फूर्त आन्दोलन नहीं था। इसके विपरीत, वह चतुर व्यक्तियों द्वारा सावधानी से आयोजित और महाद्वीप में विद्यमान योग्यतम लोगों द्वारा बहुत विस्तार से और बहुत समझदारी से क्रियान्वित किया गया था। यदि वह बिना आयोजन के असंगठित छोड़ दिया जाता तो वह कभी सफल नहीं होता।

अमेरिकी स्वातन्त्र्य संग्राम के प्रमुख बुद्धिजीवी नेता थे-मैसाचूसेट्स प्रान्त के जॉन एडम्स (1735-
1826); न्यूयार्क के जॉन जे (1745-1829);B पेनसिलवेनिया के बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790); एवं वर्जीनिया के टॉमस जेफरसन (1743-1826) । ये प्रबुद्ध नेता बुद्धिवादी एवं उदारवादी चिन्तन की लहर से प्रभावित थे इन्होंने अपने लेखों, संभाषणों एवं गतिविधियों में लोकतन्त्र की महत्ता, जनता की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता एवं समानता के मूलभूत मानवीय अधिकार एवं क्रान्ति की आवश्यकता पर बल दिया।
टामस पेन की पुस्तक ‘कामन सेन्स’ (जनवरी, 1976 में प्रकाशित) ने भी अमेरिकावासियों में स्वातन्त्र्य प्रेम की भावना जाग्रत की। यह पुस्तिका लाखों की संख्या में बिक्री और इसे प्रायः अमेरिका के सभीशिक्षित देशभक्तों ने पढ़ा। इस पुस्तक में टॉमस पेन ने यह स्पष्ट किया कि अमेरिकावासियों के लिये ब्रिटिश शासन की तुलना में स्वशासन अधिक उपयुक्त रहेगा, उनके सामने अमेरिका में एक नये समाज के निर्माण का सुनहरा अवसर है, एक ऐसा समाज जो उनकी यूरोपीय पृष्ठभूमि के पूर्वाग्रहों एवं अनाचारों से मुक्त होगा।

अमेरिका में बौद्धिक चेतना के प्रचार में वहाँ की पत्र- पत्रिकाओं ने भी भूमिका निभाई । 1733 में न्यूयार्क के जेंगर मामले (Zenger Case) में न्यायिक विजय के बाद, अमेरिकन प्रेस को पर्याप्त स्वतन्त्रता मिल गयी थी। 1765 में अमेरिका के विभिन्न प्रान्तों से कुल मिलाकर 25 समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे थे ( बोस्टन न्यूजलेटर, अमेरिकन मर्करी, न्यूयार्क गजट आदि) पत्रिकाओं में विलियम स्मिथ द्वारा सम्पादित दि अमेरिकन मैगजीन ( 1757-58 से प्रकाशित) नवीन विचारों के प्रसार की महत्त्वपूर्ण संवाहक बनी।

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