हर्षवर्धन की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

हर्षवर्धन की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ धर्मशास्र वासखेड़ा और मधुवन के लेखन से पता चलता है कि हर्षवर्धन शुरू में शैवधर्मी (शिवधर्मी) थे। और बाद में उसे बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर दिया। यह संभव है कि वह पहले बौद्ध भिसू दिवाकर दोस्त के प्रभाव में बौद्ध धर्म में रुचि रखने लगा।…

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मौर्य युग की प्रशासनिक व्यवस्था

मौर्य युग की प्रशासनिक व्यवस्था प्रस्तावना चंद्र गुप्त मौर्य के नेतृत्व में, भारत ने केंद्रीकरण की दृष्टि को देखा और प्रथम चक्रवर्ती सम्राट के विचार को व्यावहारिक रूप दिया। मौर्य साम्राज्य के कई तत्वों को ग्रीस और ईरान के शासन से लिया गया था। मौर्य शासन का सर्वोच्च लक्ष्य हर…

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गुप्त युग की 04 उपलब्धियां

गुप्त युग की 04 उपलब्धियां हर देश के इतिहास में एक समय आता है जब देश में समाज की कमी नहीं है। और लोग सुख और शांति से रहते हैं। उस समय की संस्कृति चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं। देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अत्यधिक सुव्यवस्थित और समृद्ध…

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चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रम आदित्य) : प्राचीन भारत के आदर्श शासक के रूप में

चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रम आदित्य) : प्राचीन भारत के आदर्श शासक के रूप में चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपलब्धियों का वर्णन प्राचीन भारत के आदर्श शासक के रूप में करें। (विक्रम आदित्य) प्रस्तावना चंद्रगुप्त द्वितीय समुंद्र गुप्त के बाद सिंहासन पर आए जो उनके पिता के सबसे बड़े नहीं बल्कि सबसे अच्छे…

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सम्राट समुद्रगुप्त की 05 उपलब्धियाँ

सम्राट समुद्रगुप्त की 05 उपलब्धियाँ प्रस्तावना समुद्रगुप्त, जो चंद्रगुप्त की पहले मृत्यु के बाद सिंहासन पर चढ़ा, गुप्त सम्राटों में सबसे महान था। वह एक बहादुर और राजसी राजकुमार था। इलाहाबाद का अशोक स्तंभ समुद्रगुप्त के पराक्रम की कहानी उनके शाही कवि हरीश ने लिखी है। समुद्र बचपन से ही…

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वास्तु-विद्या विस्तार व विषय

वास्तु-विद्या विस्तार एवं विषय समराङ्गण वास्तु-शास्त्रीय पुराण है। समराङ्गण के प्रथम सात अध्यायों में वास्तु- विद्या के व्यापक स्वरूप, विस्तार एवं विषयों की पौराणिक शैली में बड़ी सुन्दर अवतारणा की गई है। तीसरे अध्याय के उपोद्घात में महासमागमन' तथा विश्वकर्मा और उसके पुत्रों का सम्वाद' इन दो अध्यायों में प्रतिपादित…

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वास्तु विद्या १६ परिभाषाये

वास्तु विद्या १६ परिभाषाये 01 वैदिक वास्तु-विद्या सर्वप्रथम वैदिक-कालीन वास्तु-विद्या के दर्शन करना चाहिए । ऋग्वेद-कालीन वास्तु- कला का कुछ आभास पूर्व ही दिया जा चुका है। उस समय वास्तु-विद्या के सिद्धान्तों का भी प्रचार था जो प्रायः लोग नहीं मानते हैं। ऋग्वेद के काल में गृह-निर्माण के अवसर पर…

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प्राचीन भारत में वास्तु विद्या की परम्पराये

प्राचीन भारत में वास्तु विद्या की परम्पराये परम्परायें एवं प्रवर्तक समराङ्गण सूत्रधार मध्यकालीन कृति है। इस ग्रंथ में जिस वास्तुविद्या के दर्शन होते हैं वह अत्यन्त प्रौढ़ एवं समुन्नत है। भारतीय वास्तु शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथों का निर्माण भी इस काल के पूर्व हो चुका था। इन विभिन्न ग्रंथों के…

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भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म, विकास एवं विशेषता

भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म, विकास एवं विशेषता भारतीय वास्तु-विद्या का जन्म वेदाङ्ग-घटक (विशेषत: ज्योतिष एवं कल्प) से हुआ । यतः भारतीय वास्तु-कला का प्राश्रय धर्म रहा है, अतः धार्मिक संस्कारों, यज्ञों एवं पूजाश्रों के सम्बन्ध में आवश्यक भूमिचयन, भू-संस्कार, भूमि के मान और उन्मान (नाप-जोख) एवं वेदि-रचना आदि-आदि आवश्यकीय अंगों…

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भारत की वास्तु विद्या

भारत की वास्तु विद्या महाराज भोजदेव की जीवन-गाथा 'भारतीय इतिहास में इने गिने राजर्षियों की गाथा में एक है। प्राप्त एवं अर्ध-प्राप्त भारतीय ऐतिहासिक सामग्री में राजर्षि 'प्रियदर्शि' अशोक, महाप्रतापी महाराज विक्रमादित्य के बाद भारतीय जन-समाज में अतिप्रसिद्ध राजा भोज ही हुआ है। महाराज व क्रमादित्य का यदि न्याय प्रसिद्ध…

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